अधिकार · पहला द्वार
उसी क़ानून में, जिससे लोग डरते हैं, एक धारा है जो कहती है कि जो आदमी ख़ुद इलाज के लिए आगे आता है, उस पर मुक़दमा नहीं चलेगा। यह 1989 से लिखी हुई है। ज़्यादातर लोगों ने इसका नाम भी नहीं सुना।
जिस क़ानून का नाम सुनकर डर लगता है, उसी में एक धारा आपके पक्ष में है।
उसका नाम है धारा 64क। वह 1989 में जोड़ी गई थी, और तब से लिखी हुई है।
वह क्या कहती है, सीधे शब्दों में।
जो आदमी नशे का आदी है, और जिस पर धारा 27 का या कम मात्रा वाला आरोप है,
और जो ख़ुद, अपनी मर्ज़ी से, सरकार या स्थानीय निकाय द्वारा चलाए या मान्यता प्राप्त अस्पताल या संस्था में इलाज के लिए जाता है,
और वह इलाज पूरा करता है,
उस पर उन अपराधों के लिए मुक़दमा नहीं चलेगा। यह किसी अफ़सर की मेहरबानी नहीं है। यह संसद का लिखा हुआ है।
एक शर्त है, और वह साफ़ है।
इलाज पूरा नहीं किया, तो यह छूट वापस ली जा सकती है। यानी क़ानून उससे यह नहीं कह रहा कि जाओ, माफ़ किया। वह कह रहा है कि इलाज करो, और तब मुक़दमा नहीं।
और यह सब पर लागू नहीं है।
बड़ी मात्रा और तस्करी इसमें नहीं आती। यह पन्ना क़ानून का पाठ बता रहा है, किसी के अपने मुक़दमे की सलाह नहीं दे रहा। जिस पर सचमुच मुक़दमा है, उसे वकील चाहिए।
अब वह बात जो इस पूरे द्वार की जड़ है।
क़ानून ने आपको अपराधी मानना 1989 में ही छोड़ दिया था, बशर्ते आप इलाज के लिए आगे आएँ।
सवाल यह है कि आपने कब छोड़ा।