अभ्यास के पीछे का विचार

ज्योतिर्गण बनना

हमने लोगों को मरीज़ मानना क्यों छोड़ दिया, और उन्हें रक्षक की तरह प्रशिक्षित करना क्यों शुरू किया।

जिस समस्या को कोई हल नहीं करता

इलाज पूरा करने वाले ज़्यादातर लोग वापस लौट जाते हैं।

यही वह सच्चाई है जो इस पूरे क्षेत्र के नीचे बैठी है। नशा उतारने का इलाज काम करता है। दवाएँ काम करती हैं। काउंसलिंग काम करती है। और फिर भी, कार्यक्रम पूरा करने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा नशे पर लौट जाता है, जिसका मतलब यह है कि जिस चीज़ का इलाज हो रहा है, वह चीज़ नहीं है जो असल में उन्हें पकड़े हुए है।

ज़्यादातर लत के नीचे भागना होता है। मज़ा नहीं। भागना। किसी असहनीय दर्द से, अपने ही बारे में डगमगाते हुए भरोसे से, ऐसी हालत से जिससे निकलने का कोई दरवाज़ा नहीं दिखता। नशा कुछ घंटों की राहत देता है, उस समस्या से जिसे वह छू भी नहीं सकता। समस्या लौट आती है, और बड़ी होकर, क्योंकि अब उसमें नशे का अपना नुकसान भी जुड़ चुका है। तो आदमी फिर लेता है। आख़िर में नशा ही पूरी समस्या बन जाता है, और जो चीज़ पहले उसे वहाँ ले गई थी, वह सबको भूल जाती है, ख़ुद उसे भी।

अब देखिए कि आम इलाज उस आदमी से क्या कहता है: अपने ट्रिगर से बचिए, अपने दोस्तों से बचिए, गाँव के चौक से बचिए, दूर रहिए, और हमारे पास आते रहिए।

हम भागने का इलाज और ज़्यादा भागने से करते हैं,
और फिर हैरान होते हैं कि यह टिकता क्यों नहीं।

इसकी एक और गहरी क़ीमत है। किसी आदमी से यह कहना कि तुम हमेशा कमज़ोर रहोगे, कि नशा हमेशा तुमसे ताक़तवर रहेगा, कि तुम्हें ज़िंदगी भर मदद की पहुँच में बने रहना पड़ेगा। यह उसे यह सिखाता है कि वह स्वभाव से ही कमज़ोर है। वह नशा शायद छोड़ दे। पर यह मानना कम ही छोड़ पाता है।

हम जानना चाहते थे कि अगर इसका ठीक उल्टा कहा जाए तो क्या होगा।

This world was not built with random bricks of Chance,
A blind god is not destiny's architect;
A conscious power has drawn the plan of life,
There is a meaning in each curve and line.

यह संसार संयोग की बेतरतीब ईंटों से नहीं बना,
नियति का रचयिता कोई अंधा देव नहीं;
एक सचेतन शक्ति ने जीवन का नक़्शा खींचा है,
हर मोड़ और हर रेखा में एक अर्थ है।

श्री अरविंद · सावित्री

मूल पंक्तियाँ अंग्रेज़ी में हैं। ऊपर हिंदी भावानुवाद है।

यहीं बात पलटती है

हर मोड़ और हर रेखा में एक अर्थ है।

उस आख़िरी पंक्ति को एक बार फिर पढ़िए, और फिर उसे अफ़ीम के चालीस सालों पर रखकर देखिए।

अगर ज़िंदगी में कुछ भी बेवजह नहीं है, तो नशे में गँवाए हुए साल सिर्फ़ मलबा नहीं हैं जिस पर मातम किया जाए। वे कुछ सीखा हुआ हैं, सबसे कठिन तरीक़े से सीखा हुआ, ऐसी क़ीमत पर जो कोई चुनकर नहीं देता, पर सीखा हुआ फिर भी।

सोचिए कि बरसों की लत में जीने वाला आदमी असल में क्या-क्या जानता है। वह जानता है कि तलब अपने आने की ख़बर कैसे देती है, और उसके जीतने से पहले कितने मिनट बचते हैं। वह अपना हर झूठ जानता है, और यह भी कि उसने वे झूठ किस क्रम में ख़ुद से बोले थे। वह जानता है कि पूरे मन से किया गया वादा शाम तक टूट जाने पर कैसा लगता है। वह जानता है कि घरवालों की किस तरह की फ़िक्र आदमी से और ज़्यादा नशा करवाती है।

यह कोई विश्वविद्यालय नहीं सिखाता। कोई डॉक्टर इसे हासिल नहीं कर सकता। यह एक पूरा पाठ्यक्रम है, और वह उसे पूरा कर चुका है।

उनकी लत उनकी ज़िंदगी की बर्बादी नहीं थी।
वह, उनकी मर्ज़ी के बिना, उनका प्रशिक्षण थी।

यही है रक्षक का विचार। हमारे सामने खड़ा आदमी कोई मरीज़ नहीं है जिसकी पहचान उसकी बीमारी हो और जो ठीक किए जाने का इंतज़ार कर रहा हो। वह एक प्रशिक्षु है, जो एक कठिन शिक्षा का आधा हिस्सा पहले ही झेल चुका है, और अब जिसे बाक़ी आधा चाहिए: अभ्यास, शरीर की समझ, कौशल, और ज़िम्मेदारी।

और नशा अब वह राक्षस नहीं रहता जिससे ज़िंदगी भर भागना है। वह बस वह विषय बन जाता है जिसका वह आदमी जानकार है।

यह बात कहाँ तक पहुँचती है

ऊपर की पूरी दलील में अफ़ीम की कोई ज़रूरत नहीं है।

उसे दोबारा पढ़िए, बस शब्द बदलकर। जो औरत गहरे अवसाद से निकलकर आई है, वह जानती है कि उसके भीतर से वह कैसा सुनाई देता है, और कौन-सी तसल्ली उसे और भारी कर देती है। जिस आदमी ने अपना बच्चा खोया है, वह जानता है कि दूसरा साल कैसा होता है, जब बाकी सब आगे बढ़ चुके होते हैं और घर आना-जाना बंद हो जाता है। जिसका शरीर साथ छोड़ चुका है, वह उस ख़ास शर्मिंदगी को जानता है जो पिछले साल तक ख़ुद हो जाने वाले काम के लिए किसी से मदद माँगने में होती है।

इनमें से हर एक ने वह पाठ्यक्रम पूरा किया है जिसमें कोई अपनी मर्ज़ी से दाख़िला नहीं लेता। और इनमें से हर एक को दुनिया क़ाबिल नहीं, टूटा हुआ मानती है।

पूरी बात यही है, और यह किसी नशे के बारे में नहीं है। यह इस बारे में है कि दुख इंसान के भीतर क्या छोड़ जाता है, और उसे काम में लाने का हक़ किसका सबसे ज़्यादा बनता है।

अब तक हमने इसे ठीक से सिर्फ़ एक जगह खड़ा किया है: अफ़ीम, पश्चिमी राजस्थान में, एक अभ्यास-क्रम, एक प्रकाशित शोधपत्र और साफ़-साफ़ बताई गई सीमाओं के साथ। सिद्धांत उससे कहीं चौड़ा है। हमारा प्रमाण, अभी, नहीं है। हम ये दोनों बातें एक साथ सामने रखते रहेंगे।

एक केन्द्र

घेरा, और उसका पलटना।

आपके साथ कोई ज़्यादती हुई थी। शायद बहुत पहले; शायद रोज़।

आप उसका जवाब नहीं दे सके। तो वह उस पर उतरी जो पास था।

फिर जो पास था, वही आपके साथ ज़्यादती करने लगा।

यह आप नहीं हैं। यह एक घेरा है, और घेरा पलट सकता है।

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घेरा

शुरुआत ज़्यादती से होती है। किसी ने, या किसी चीज़ ने, आपके साथ की: कोई हाथ, कोई बात, कोई घर, कोई भूख, कोई बीमारी, कोई बरस जो ख़त्म ही न हुआ। वह भीतर तक लगी।

जो हमारे साथ होता है, उसे कहीं तो जाना होता है। आप उसे वहाँ लौटा नहीं सके जहाँ से वह आई थी; वह आदमी बहुत बड़ा था, वह हालत बहुत भारी थी, या वह रही ही नहीं। तो वह उस पर गई जो हाथ के पास था। इस धरती पर वह अफ़ीम थी, डोडा पोस्त था। आपने उसे किसी इंसान पर नहीं उतारा। एक चीज़ पर उतारा।

और यहीं घेरा बंद हो जाता है, बिना किसी के देखे। ज़्यादती करना यह मान लेना है कि ज़्यादती ही चलन है। जो आपके साथ हुआ, वही अब आप करते हैं। और जो आप करते हैं, वह लौटकर आता है: अब वह चीज़ आपके साथ ज़्यादती करने लगती है। शरीर अपने समय पर माँगता है। मन उसके बिना चैन नहीं लेता।

तो आप उसके साथ और ज़्यादती करते हैं, और वह आपके साथ और। हर फेरा पिछले से थोड़ा चौड़ा।

घेरे पर घेरा

घेरा आपके और उस चीज़ के बीच नहीं रुकता।

आपका अपना शरीर आपके ख़िलाफ़ हो जाता है: दर्द में, नींद न आने में, पेट में। आप और लेते हैं।

रात को आपका अपना मन आप पर टूट पड़ता है। आप और लेते हैं।

परिवार डरता है, शर्मिंदा होता है, चिल्लाता है। आप उसी तरह जवाब देते हैं जैसे आपने सीखा है; और लेते हैं। वे और ज़ोर से चिल्लाते हैं।

गाँव मुँह फेर लेता है। आप और लेते हैं।

घेरे पर घेरा, जब तक घेरे में ज़्यादती के सिवा कुछ नहीं बचता। न आप, न वह चीज़, न परिवार: बस ज़्यादती, करना, सहना, फिर करना।

दुनिया भी इसी घेरे में

यह एक आदमी का घेरा नहीं है।

यह पूरा क्षेत्र ही उसे "substance abuser" कहता है, यानी नशे के साथ ज़्यादती करने वाला। एक अध्ययन (Kelly और Westerhoff, 2010) में चिकित्सकों ने एक ही आदमी के बारे में पढ़ा। कुछ को बताया गया कि वह "substance abuser" है, कुछ को कि उसे "नशे से जुड़ा विकार" है। जिन्होंने "abuser" पढ़ा, उन्होंने उसे ज़्यादा दोषी माना, और सज़ा के ज़्यादा लायक़। 2013 में मनोचिकित्सकों की अपनी किताब, DSM-5, ने "abuse" को निदान के रूप में छोड़ दिया। शब्द आज भी हर जगह है।

इलाज भी इसमें आ जाता है: ज़ंजीर, बंद कमरा, मार, शर्मिंदगी, डंडे की तरह उठाया गया कोई आँकड़ा। ज़्यादती का जवाब ज़्यादती से। और जब पूरा देश किसी नशे से जंग छेड़ता है, तो वही घेरा एक देश जितना बड़ा हो जाता है।

नशे से लड़ना भी इसी घेरे का हिस्सा है। उस चीज़ को दुश्मन बनाना उसके साथ एक और ज़्यादती है।

ज़्यादती करने वाला कोई नहीं

इसलिए यहाँ दोष किसी का नहीं। न आपका, न आपके पिता का, न गाँव का, न डॉक्टर का, न पोस्त के फूल का। घेरे में हर कोई पहले सहकर आया है। ज़्यादती कोई इंसान नहीं है। वह एक धारा है, और जो उसमें खड़ा हो, उसी में से होकर बहती है।

धारा हराई नहीं जाती। मोड़ी जाती है।

पलटना

वही घेरा, पलटकर, प्रेम है।

जिसे प्रेम मिला, वह प्रेम करता है। प्रेम करना यह मान लेना है कि प्रेम ही चलन है। और दिया हुआ प्रेम लौटकर आता है।

वह घेरे पर घेरा पलटता है, वही घेरे:

  • पहले वह जगह जो ख़ुराक की थी: पूरी ली गई एक साँस, ध्यान से साधा हुआ एक आसन
  • शरीर
  • मन, रात के इल्ज़ामों की जगह एक मंत्र के साथ
  • परिवार
  • गाँव
  • और दुनिया, जो किसी दूसरे आदमी से शुरू होती है, जो वहीं है जहाँ आप थे। आप उसके सामने खड़े होते हैं और वह आपकी बात मानता है, क्योंकि आप वहाँ से होकर आए हैं।

इसके लिए कुछ तोड़ना नहीं पड़ता। जो तीव्रता उस चीज़ में जाती थी, वही तीव्रता है; उसे बस कहीं जाना था।

यह कभी ख़त्म क्यों नहीं होता

ज़्यादती का घेरा ज़्यादती पर ही ख़त्म होता है। प्रेम का घेरा ख़त्म नहीं होता: हर घेरा अगला खोल देता है। इसीलिए अभ्यास कभी रुकता नहीं। इसलिए नहीं कि कुछ है जिससे लड़ते रहना है, बल्कि इसलिए कि प्रेम फैलता ही जाता है।

हर रूप, एक केन्द्र

अफ़ीम, शराब, तंबाकू, फ़ोन, जुआ, खाना, ग़ुस्सा, काम। घेरे अलग हैं। केन्द्र एक है। यह साइट पश्चिमी राजस्थान की अफ़ीम से शुरू होती है, क्योंकि वहीं खड़ी है। लिखी सबके लिए गई है।

यह क्या है

यह हमारी, ज्योतिर्गण की, समझ है। यह कोई खोज नहीं है, और हम यह नहीं कहते कि हमने इसे नापा है। ऊपर का अध्ययन और किताब एक शब्द के बारे में जो दिखाते हैं, उसी के लिए दिए गए हैं, उससे ज़्यादा के लिए नहीं।

Kelly JF, Westerhoff CM. Does it matter how we refer to individuals with substance-related conditions? A randomized study of two commonly used terms. International Journal of Drug Policy, 2010; 21(3): 202-207. American Psychiatric Association, DSM-5, 2013.

एक

एक ही है।

कोई गिरता है, तो हम देखते रहते हैं।

कोई उठता है, तो हम राह देखते हैं।

बात अपने दरवाज़े तक आती है, तो हम उँगली उठाते हैं।

हर बार एक ही सोच: वह कोई और है। कोई और है ही नहीं।

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देखते रहना

जब किसी और का बेटा हो, तो बात हमें छूती नहीं।

और जब छूती है, तो हम कर्म नहीं करते, प्रतिक्रिया करते हैं। किसी का गिरना हमारे लिए अपनी झुँझलाहट उँडेलने की जगह बन जाता है। चिन्ता नहीं, करुणा नहीं। झुँझलाहट, जिसे कहीं जाना था।

अगर यह वहाँ हो जहाँ उस नेता का राज है जो हमें नहीं भाता, तो उसे पीटने की लाठी मिल गई, और हमारी विचारधारा का पेट भर गया। अपने घर में हो, तो जो ले रहा है उसे नीचा दिखाने का ज़रिया। किसी रिश्तेदार के घर में हो, तो उस परिवार को नीचा दिखाने का; या उनके ऊपर खड़े होकर, हम तुम्हारे लिए कुछ करने आए हैं, उन्हें यह जताने का कि हम कितने ऊँचे हैं।

बात कभी उस आदमी की नहीं। कभी कारण की नहीं। कभी कुछ बेहतर करने की नहीं। हमेशा अपनी।

हाल ही में राजस्थान में गाँवों के चुनाव हुए। उम्मीदवारों ने खुलेआम शराब और नशा बाँटा। गाँव का एक-एक आदमी जानता था। एक ने भी सवाल नहीं किया, न विनती की, न समझाया, न चेताया। एक ने भी नहीं। मुफ़्त था। जब तक अपनी ज़रूरत पूरी हो रही है, मुँह से एक शब्द नहीं निकलता। जब तक उन्हें न छुए जिन्हें हम छुआ देखना चाहते हैं, परवाह नहीं। और कल यही मुँह भाषण देंगे कि नशा समाज को कैसे खा रहा है।

इन सबके नीचे एक ही चुपचाप वाक्य: वह कोई और है।

राह देखना

देखने का एक और ढंग है, जो दिखता कम है।

किसी भी क्षेत्र में कोई थोड़ा भी आगे बढ़े, तो उसके चारों ओर विरोध जुटने लगता है, भीतर भी, बाहर भी। एक ऐसे आदमी को लीजिए जो कुछ भी नहीं लेता, अच्छा कर रहा है, सच पर टिका है और किसी के भी मुँह पर सच कह सकता है। लोगों से वह पचता नहीं। बाहर वालों से ही नहीं, अपने घर वालों से भी। जलन, ईर्ष्या, द्वेष, और इन सबके नीचे एक चाह जो ज़ोर से कम ही कही जाती है। कि वह गिरे। कि वह हारे।

और अगर वह किसी लत में पड़ जाए, तो कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। उसे नीचा दिखाते हैं, और गहरे अँधेरे में घसीटते हैं, और उससे ऐसा बर्ताव करते हैं कि वह उसी चक्कर में और, और फँसता जाए। पत्नी यह करती है, बच्चा करता है, पति, माँ, पिता, समाज, नेता। अक्सर बिना जाने कि उनकी प्रतिक्रियाएँ क्या पैदा कर रही हैं।

हम लोगों से तभी तक प्यार करते हैं जब तक वे हमारी इच्छाएँ पूरी करते हैं। जिस घड़ी नहीं करते, हम बग़ावत कर देते हैं।

हम दूसरे की सफलता का आनन्द नहीं लेते। उसमें साझेदार नहीं होते। अपने को उससे अलग रखते हैं, अलग दिखाते हैं। और यही सारी समस्या की जड़ है: उसका उठना किसी और का है।

उँगली उठाना

और जब बात अपने दरवाज़े तक आती है, तो हम उँगली उठाते हैं।

सरकार। पुलिस। बेचने वाला। फ़लाँ ने किया। वह क्या कर रहा है, वे क्या कर रहे हैं, यह क्या कर रहा है, वह क्या कर रहा है। कभी यह नहीं: मैं क्या कर रहा हूँ।

जितना दोष देते हैं, उतना समाधान से बचने का बहाना बनाते हैं। समस्या को हाथ ही न लगाने का इससे लचर रास्ता कोई नहीं।

और उसके बाद की प्रतिक्रिया, कितनी भी ऊँची आवाज़ में हो, कुछ नहीं करती। उससे न विकास आता है, न रूपान्तर। बस यह भ्रम आता है कि कुछ किया जा रहा है।

नियम लगाए जा सकते हैं। नशे का फैलना रोका जा सकता है। इलाज के लिए नशा-मुक्ति केन्द्र हो सकते हैं। पर जो इसे बढ़ावा देता है, उसका क्या? कल अफ़ीम थी। आज सिंथेटिक नशा है। कल कुछ नया होगा। जब भी हम इसके कारण के, इसकी आत्मा के, इसकी सम्पूर्णता के पास पहुँचते हैं, इसे किसी और को थमा देते हैं।

दोष किसी और का है।

एक ही है

कोई और है ही नहीं।

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥

ईशोपनिषद्, मन्त्र ६

इस मन्त्र पर अपनी एक आरम्भिक टीका में श्रीअरविन्द:

“लेकिन जो मनुष्य अपने-आपको सभी प्राणियों में देखता है, घृणा नहीं कर सकता, वह किसीसे कतराता नहीं, उसमें न तो जुगुप्सा होती है न भय।”

श्रीअरविन्द, ईशावास्योपनिषद्, श्रीअरविंद सोसायटी, पांडिचेरी, पृ. ६८-६९

मन्त्र उस कतराने के लिए जो शब्द कहता है, वह है जुगुप्सा। देखते रहना, राह देखना, उँगली उठाना, तीनों यही एक शब्द हैं। हर एक की शुरुआत अलगाव से होती है। अलगाव हटा दीजिए, तो उनके खड़े होने की जगह नहीं बचती। उसी टीका में कुछ पन्ने पहले उन्होंने इसे सूर्योदय की तरह लिखा:

“अगर तुम अपने-आपको सभी प्राणियों में देखते हो तो तुम सभी प्राणियों के साथ प्रेम किये बिना नहीं रह सकते। बहु में एक की अनुभूति का अनिवार्य परिणाम है वैश्व प्रेम और वैश्व प्रेम के साथ भला घृणा, जुगुप्सा, नफरत आदि का लेशमात्र भी कैसे रह सकता है? ये चीजें उसके अंदर उसी तरह घुल जाती हैं जैसे उदय होते हुए सूर्य की ज्योति में रात का कुहरा।”

श्रीअरविन्द, ईशावास्योपनिषद्, श्रीअरविंद सोसायटी, पांडिचेरी, पृ. ६१

यह ऊपर वाला घेरा ही है, घूमा हुआ। जो ज़्यादती बनकर घूमता था, वही प्रेम बनकर लौटता है।

अगर एक ही है, तो किसी और की लत नाम की कोई चीज़ नहीं। उसका गिरना मेरा है। उसका उठना मेरा है। आदमी अपने ही हाथ के गिरने की राह नहीं देखता, और लड़खड़ाने पर अपने ही पैर को नीचा नहीं दिखाता। उसे उठा लेता है। ज़िम्मेदारी बस इतनी ही है।

आख़िर में बात आपकी है। सच में बदल आप केवल ख़ुद को सकते हैं, और सच में बदलना भी आपको ही है। बदलाव भीतर से आना है। बाहर से कोई किसी को, किसी चीज़ को नहीं बदल सकता।

कभी किसी को दोष नहीं देना। ज़िम्मेदारी लेनी है। ज़िम्मेदारी में ही हम कर्म करते हैं, वरना हमेशा प्रतिक्रिया में रहते हैं। और कर्म का अर्थ है चेतना को बीच में लाना।

तो यह मेरा करना है, और यह सब भीतर है। जब सुनूँगा कि कोई गिरा है, तो मुझमें जो सबसे पहले उठे, उसे पकड़ूँगा: वह राहत, वह कहानी, उससे ऊपर खड़े होने का वह सुख। उसे उसका नहीं, अपना जानूँगा। जब मेरे पास कोई उठेगा, तो जलन को चाह बनने से पहले पकड़ूँगा, और उसके उठने को अपना उठना मानूँगा। जब दोष देने का मन होगा, तो उँगली अपनी ओर मोड़ूँगा और पूछूँगा कि मैं क्या कर रहा हूँ। और जो कुछ उसमें दिखे, वह तलब, वह कमज़ोरी, वह गिरना, उसे पहले अपने भीतर ढूँढ़ूँगा, क्योंकि वह वहाँ भी है। बदलने को कोई और है ही नहीं।

इससे कमरे का माहौल कैसे बदलता है

पहले हमें शब्द बदलने पड़े।

जो विचार सिर्फ़ शोधपत्र में रहता है, वह कुछ नहीं बदलता। उसे उन शब्दों तक पहुँचना पड़ता है जिनसे लोगों को हर सुबह पुकारा जाता है, क्योंकि आदमी अपने बारे में वही मानने लगता है।

मरीज़
→
प्रशिक्षु
इलाज कार्यक्रम
→
प्रशिक्षण
दोबारा गिरने से बचाव
→
कौशल-विकास
मदद लेना
→
मदद करना सीखना
नशेड़ी
→
ज्योतिर्गण

यह सजावट नहीं है। जिस आदमी से तीस दिन तक कहा जाए कि वह प्रशिक्षण ले रहा है, वह उस आदमी से अलग बर्ताव करता है जिससे तीस दिन तक कहा जाए कि वह बीमार है।

ज़मीन पर बुज़ुर्गों के बीच बैठकर बात करता एक प्रशिक्षक।
कोई खड़ा नहीं है। टोपी वाले सज्जन स्टाफ़ हैं, बाकी प्रशिक्षु। रक्षक का विचार असल में इसी बात का दावा है कि आप कहाँ बैठते हैं।
एक ईमानदार क़र्ज़, और एक असहमति

बारहवाँ क़दम सही था।

Alcoholics Anonymous ने हम सबसे बहुत पहले एक गहरी बात पकड़ ली थी: कि किसी दूसरे पीड़ित तक संदेश पहुँचाना, ले जाने वाले के लिए उससे कहीं ज़्यादा करता है जितना कोई सेवा उसके लिए कर सकती है। लाखों ज़िंदगियाँ उसी समझ पर टिकी हैं। अगर हम इसे पहले न मानें तो हमारा विचार बेईमान होगा।

हमारा फ़र्क़ सिर्फ़ एक बात पर है: पहचान।

"एक बार नशेड़ी, हमेशा नशेड़ी।" ऐसे कमरे में कहा जाए जहाँ लोगों को विनम्रता चाहिए, तो यह लापरवाही से बचाता है, और इसने बहुतों को ज़िंदा रखा है। पर पश्चिमी राजस्थान के उस मज़दूर से कहिए, जिससे सब पहले ही कह चुके हैं कि वह ख़त्म हो गया, तो यह उस फ़ैसले को उठाने के बजाय उस पर मुहर लगा देता है। कमज़ोरी का पक्का ठप्पा, और ऊपर से ज़िंदगी भर आते रहने की शर्त, चुपचाप एक और निर्भरता बन सकती है, इस बार कार्यक्रम की।

हमें लगता है कि पहचान को आगे बढ़ने की छूट मिलनी चाहिए। हमेशा-नशेड़ी नहीं, बल्कि: वह इंसान जो अंधेरे से गुज़रा, उसे पूरी तरह जान गया, और अब एक रोशनी लिए चलता है जिससे दूसरे अपना रास्ता ढूँढ़ सकें। बीता हुआ न झुठलाया जाता है, न घाव की तरह पहना जाता है। उसे काम में लाया जाता है।

हिंदी में लिखे व्हाइटबोर्ड के पास खड़े शिक्षक, और ज़मीन पर बैठे लोग।
दूसरा स्तर। निर्देश नहीं, समझ। उनकी अपनी भाषा में, पर्दे पर नहीं, व्हाइटबोर्ड पर।
प्रशिक्षण

छह चरण। एक महीना। 150 से ज़्यादा अभ्यास।

विचार वजह है। यह तरीक़ा है। हर चरण वह खोलता है जिसकी अगले को ज़रूरत है। जो शरीर अभी बैठ ही नहीं सकता उससे ध्यान नहीं कराया जाता, और जो ख़ुद अभी सँभला नहीं उससे दूसरों का नेतृत्व नहीं कराया जाता।

१

सूक्ष्म एवं स्थूल व्यायाम

ढीला करना

धीरेंद्र ब्रह्मचारी की परिकल्पना के अनुसार, अपने मूल रूप में। शुरुआत यहीं से इसलिए होती है कि जो शरीर दशकों से अफ़ीम पर चला हो, उससे पहले ही दिन आसन नहीं माँगा जा सकता। एक-एक जोड़ करके शरीर को दोबारा उपलब्ध बनाया जाता है। स्थूल व्यायाम के पाँच अभ्यास इसी वेबसाइट पर हैं।

२

श्वास अभ्यास एवं षट्कर्म

योगिक शुद्धि

स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान (SVYASA) में विकसित और शोधित श्वास अभ्यास, और उनके साथ छह शास्त्रीय शुद्धि क्रियाएँ। फेफड़ों में जो सुधार नापा गया, उसकी शुरुआत यहीं से होती है, और यहीं शरीर आगे के सब अभ्यासों के लायक साफ़ होता है। साँस के अभ्यास इसी वेबसाइट पर हैं।

३

आसन: नौ प्रवाह

शक्ति और स्थिरता

आसनों की कोई सूची नहीं, बल्कि नौ समूह, हर एक लगातार बहते हुए क्रम में सजाया हुआ। विचार विन्यास से लिया गया है; क्रम नहीं। हर प्रवाह इस हिसाब से बना है कि नशा छूटते वक़्त का शरीर सचमुच कितना झेल सकता है और उसे उबरने के लिए क्या चाहिए। आसन के नौ समूह इसी वेबसाइट पर हैं।

४

प्राणायाम

साँस एक औज़ार

तलब मन तक पहुँचने से पहले साँस में आती है। जो आदमी दबाव के बीच अपनी साँस ढूँढ़ लेता है, उसे कुछ सेकंड की चेतावनी मिल जाती है, और लेने और न लेने के बीच का पूरा फ़र्क़ उन्हीं कुछ सेकंडों का होता है। दोनों प्रकार इसी वेबसाइट पर हैं: अपने आप में गिनी गई साँस, और मंत्र या स्तोत्र को साथ लेकर चलती साँस।

५

धारणा एवं ध्यान

एकाग्रता और ध्यान

लत यानी ध्यान का क़ैद हो जाना। धारणा यानी वही ध्यान जानबूझकर, एक-एक मिनट करके वापस छीन लेना। और ध्यान यानी उस चीज़ के साथ बैठना जिसे नशा ढँके हुए था। यही सबसे कठिन चरण है, और वही तय करता है कि इनमें से कुछ भी टिकेगा या नहीं। इसकी इन्द्रिय-शिक्षा इस साइट पर है।

६

सहपाठी-शिक्षण

इन सबका मक़सद

वह चरण जिसे संभव बनाने के लिए बाक़ी पाँच मौजूद हैं। प्रशिक्षु मुड़ता है और उन लोगों को राह दिखाने लगता है जो उसके बाद आए। यह आख़िर में जोड़ा गया कोई दीक्षांत समारोह नहीं है। यही पूरे प्रशिक्षण का लक्ष्य है, और यही वह क्षण है जब आदमी ज्योतिर्गण बनता है। छठा चरण कैसे बना है।

और नशे ने शरीर के साथ जो किया, उसके लिए तेईस जटिलताओं में से हर एक का अपना अभ्यास है, ऊपर के चरणों से जोड़कर बना हुआ। सभी तेईस देखिए।

रेत के आँगन में क़तारों में बैठे लोग, सामने एक शिक्षक।
सूरज चढ़ने से पहले का बैठा हुआ अभ्यास। शिक्षक वहीं बैठता है जहाँ से सब उसे देख सकें, किसी मंच पर नहीं।
हर अभ्यास कैसे सिखाया जाता है

करो। समझो। सिखाओ।

150 से ज़्यादा अभ्यासों में से हर एक इन्हीं तीन स्तरों से गुज़रता है। जिस आदमी को सिर्फ़ बताया गया है, वह पीछे-पीछे चल सकता है। जो समझता है, वह ढाल सकता है। और जो सिखा सकता है, वह उसे कभी नहीं खोएगा।

पहला स्तर

अभ्यास

शिक्षक जैसा बताएँ, वैसा अभ्यास। समझाने से पहले शरीर। जानने से पहले करना।

दूसरा स्तर

समझ

शैक्षिक सत्र। यह अभ्यास है क्या, इस क्रम में क्यों है, इसे कैसे किया जाना चाहिए, और यह ठीक किस दिक्कत पर काम कर रहा है। यहाँ प्रशिक्षु आदेश मानना छोड़कर अपना इलाज ख़ुद जानने लगता है। सारे शिक्षा सत्र, एक जगह।

तीसरा स्तर

नेतृत्व

वह इसे उस आदमी को सिखाता है जो उसके बाद आया। यह प्रशिक्षण का इनाम नहीं, उसका लक्ष्य है। एक महीने बाद वह अपनी मदद करने के लायक होता है, और किसी और की भी।

छोटी अग्नि के चारों ओर बैठे लोग, हाथ जोड़े हुए, बीच से उठता धुआँ।
शिविर आग से शुरू होता है और आग पर ख़त्म। किसी से कुछ मानने को नहीं कहा जाता; बस साथ बैठने को कहा जाता है।
क्या सिद्ध है और क्या अभी प्रस्तावित है। इस अभ्यास-क्रम के शारीरिक नतीजे नापे और प्रकाशित किए जा चुके हैं। नतीजे देखिए। लेकिन रक्षक का विचार अपने आप में एक सैद्धांतिक ढाँचा है, जो श्री अरविंद की सावित्री और सहपाठी-सहायता के शोध-साहित्य से निकला है, और उसे अभी जाँचा जा रहा है, सिद्ध नहीं किया गया है। हम इसे यहाँ इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि हमें यह सही लगता है, और क्योंकि आपको यह जानने का हक़ है कि हमने क्या नापा है और हम क्या मानते हैं, दोनों।

एक आदमी उस महीने से निकला और उसने पूरा गाँव रोशन कर दिया।

पढ़िए यह कैसे हुआ
अगर आज का दिन भारी है

यह पढ़कर ख़त्म करने की ज़रूरत नहीं। अभी फ़ोन कीजिए।

निःशुल्क। गोपनीय। चौबीसों घंटे। आपकी अपनी भाषा में।

योग इलाज में सहारा देता है, उसकी जगह नहीं लेता। अफ़ीम, शराब और नींद की कुछ दवाओं को अचानक छोड़ना निगरानी के बिना ख़तरनाक हो सकता है। अपने आप एकदम से कोई नशा मत छोड़िए। पहले 14446 पर फ़ोन कीजिए या डॉक्टर से मिलिए।