ज्योतिर्गण

अधिकार · चौथा द्वार

वह आदमी जो नहीं माँगता

अब तक इस हिस्से में जो कुछ बताया गया, वह सब सच है और सब मौजूद है। फिर भी ज़्यादातर लोग वहाँ नहीं जाते। यह द्वार उसी पर है, और यह इस पूरे पंख का सबसे सीधा सवाल पूछता है।

एक चीज़ है जो आपने बहुत अच्छी तरह सीख ली है।

न माँगना।

वह भी उसी तरह सीखी गई जैसे बाक़ी सब सीखा गया: दोहराने से। हर वह दरवाज़ा जिस पर आपने दस्तक नहीं दी। हर वह बार जब आपने मान लिया कि यह आपके लिए नहीं है।

और हर बार वह थोड़ी और गहरी बैठती गई।

आज हालत यह है कि दरवाज़ा खुला हो, तब भी हाथ नहीं उठता।

यह कमज़ोरी नहीं है। यह अभ्यास है, बस उल्टी दिशा में। और जो चीज़ अभ्यास से भीतर गई है, वह अभ्यास से ही बदलेगी। यह वही बात है जो पहले द्वार से कही जा रही है, अब आप पर लगाई गई।

तो माँगना भी एक अभ्यास है।

और हर अभ्यास की तरह, इसमें पहला दोहराव सबसे भारी होता है। पहली सीढ़ी ऊँची है। उसके बाद की सीढ़ियाँ छोटी हैं। यह हर अभ्यास में ऐसा ही होता है, और आप यह पहले से जानते हैं।

अब वह बात जो सबसे कड़ी है, और जो इस पन्ने पर कहनी ही है।

क़ानून ने आपको अपराधी मानना 1989 में छोड़ दिया था, बशर्ते आप इलाज के लिए आगे आएँ।

संसद ने यह लिख दिया। मंत्रालयों ने केंद्र खोल दिए। नंबर चौबीस घंटे चालू कर दिया।

वे सब आपके बारे में अपना फ़ैसला बदल चुके हैं।

आपने कब बदला?

तीसरा घेरा · the third ringमन · the mind