बैठक · दूसरा द्वार
इस द्वार में कुछ भी दार्शनिक नहीं है। कौन सी जगह, कौन सा समय, कौन खोलेगा, कितनी देर, बूढ़े और औरतें कैसे आएँगी, और उस ज़मीन पर क्या नहीं कहा जाएगा।
जगह ऐसी चुनिए जो सबको दिखे।
स्कूल का मैदान। मंदिर का चौक। पंचायत भवन के सामने। किसी का बड़ा आँगन। छिपी हुई जगह मत चुनिए। दिखना ही इसका तरीक़ा है। जिसे कोई नहीं देखता, वह गाँव में कुछ नहीं बदलता।
समय एक ही रखिए, रोज़ वही।
और उसे किसी ऐसी चीज़ से बाँधिए जो गाँव में वैसे भी रोज़ होती है। दूध डालने के बाद। स्कूल की घंटी से पहले। घड़ी से बाँधने पर छूट जाता है, काम से बाँधने पर नहीं छूटता।
दस मिनट। इससे बड़ा नहीं।
बीस मिनट का कार्यक्रम एक हफ़्ते में बंद हो जाता है। दस मिनट वाला साल भर चलता है, और गाँव में जो साल भर चलता है वही गिना जाता है।
कोई एक आदमी उसे खोलेगा, और वही रोज़ खोलेगा।
उसका काम सिखाना नहीं है। उसका काम आना है। जो आदमी रोज़ आ जाता है, वह पूरे गाँव के लिए घंटी का काम करता है, और उसे एक शब्द बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
और औरतों के लिए वही जगह ठीक नहीं होगी।
तो दो बैठकें रखिए। एक ही समय, दो जगह। या आँगनवाड़ी में, या किसी घर के आँगन में। यह अलगाव नहीं है, यह उस गाँव में चलने वाला इंतज़ाम है, और यह न मानना कि इसकी ज़रूरत है, इस चीज़ को शुरू ही नहीं होने देगा।
बूढ़े कुर्सी पर बैठकर करेंगे, और बच्चे जो चाहें करेंगे।
और उस ज़मीन पर किसी के बारे में कोई बात नहीं होगी।
यह अकेला नियम है, और यही सबसे ज़रूरी है।