भूमि · दूसरा द्वार
यह नहीं कि आपको लगता था कि इससे मदद मिल रही है। इससे सचमुच मदद मिल रही थी। वह किस चीज़ में मदद कर रहा था, यह नाम दिए बिना उसकी जगह कुछ और नहीं रखा जा सकता।
आप बेवक़ूफ़ नहीं थे।
वह चीज़ काम करती थी। इसीलिए दोहराई गई। जो काम नहीं करता, वह दोहराया नहीं जाता। यह सीधी बात है और यही सबसे पहले माननी है।
पहले वह कुछ देती थी।
फिर एक दिन वह देना बंद कर देती है और सिर्फ़ न होने की तकलीफ़ हटाने लगती है। उसी दिन से आदमी उसे अच्छा लगने के लिए नहीं, बुरा न लगने के लिए लेता है।
और यह बदलाव इतना धीरे होता है कि किसी को पता नहीं चलता।
अकेलापन शरीर में वहीं महसूस होता है जहाँ चोट महसूस होती है। यह मुहावरा नहीं है। रास्ता एक ही है।
और अफ़ीम उसी रास्ते पर बैठती है।
इसलिए जिसने अकेलेपन में इसे लिया, उसे सचमुच राहत मिली। वह भ्रम नहीं था।
यहाँ इसके और भी काम थे।
गरमी। लंबी मज़दूरी। थकी हुई कमर। और मेहमान के आगे रखा हुआ प्याला। इसका एक सामाजिक काम भी था और वह भी असली था।
इतने सारे काम एक चीज़ कर रही थी।
इसीलिए उसे छोड़ना एक चीज़ छोड़ना नहीं है। वह पाँच खाली जगहें एक साथ छोड़ जाता है, और कोई नहीं बताता कि उनका क्या करना है।
जब तक हर काम का नाम न लिया जाए, उसकी जगह कुछ रखा नहीं जा सकता।
और यही इस पूरे अभ्यास का ढंग है। कमर के लिए एक चीज़। नींद के लिए एक। साँस के लिए एक। और आख़िर में, साथ बैठने के लिए एक।
कुछ छीना नहीं जा रहा।
जो काम वह करती थी, वे किसी और के हाथ में दिए जा रहे हैं।