जटिलता · हड्डी
हड्डी पत्थर नहीं है। उसमें हर पल लाखों जगह पुरानी हड्डी हटती और नई बनती रहती है, और वह उतनी बनती है जितना उससे आज माँगा जाए। वह सबसे ध्यान से कुछ अचानक झटके सुनती है, और फिर थोड़ा आराम।
हड्डी के पतले होने में कोई दर्द नहीं होता। आदमी को पता ही नहीं चलता, जब तक एक दिन चारपाई से उतरते हुए या आँगन में फिसलकर कलाई, कूल्हा या रीढ़ का कोई मनका न टूट जाए।
जिन पुरुषों ने अफ़ीम ली थी, पच्चीस से पैंतालीस बरस के, उनमें आधे से ज़्यादा की रीढ़ पतली मिली; दूसरे पुरुषों में लगभग हर चौथे की। यह उसकी कोई कमी नहीं। इसका बड़ा हिस्सा उस हार्मोन से आता है जिसे दवा ऊपर रोक लेती है, और उस शरीर से जो बरसों हिला नहीं।
पर हड्डी पत्थर नहीं है। किसी भी पल पूरे ढाँचे में दस से बीस लाख छोटी जगहों पर पुरानी हड्डी हटाई और नई भरी जा रही होती है। इसलिए उसकी हड्डी हमेशा उससे कम उम्र की है।
और हड्डी उतनी बनती है जितना उससे आज माँगा जाए। वह सबसे ध्यान से कुछ अचानक झटके सुनती है, और फिर थोड़ी देर लगभग कुछ नहीं सुनती।
हर खड़ी रेखा एक झटका; उसकी ऊँचाई, हड्डी ने उसे कितना सुना। ऊँचाइयाँ विचार की हैं, नाप की नहीं।
एक प्रयोग में लगभग चवालीस बरस के पुरुष, जिनकी हड्डी पतली पाई गई थी, एक साल तक हफ़्ते में तीन बार कूदे। हड्डी कहाँ बढ़ी होगी?
रोज़ पाँच कूद से चूहों की हड्डी मज़बूत हुई। पाँच कूदने वालों की हड्डी तोड़ने में ज़्यादा ज़ोर लगा। दस, बीस और चालीस कूदने वालों में आपस में बहुत कम फ़र्क़ था। हड्डी को दिन में बहुत सारे झटके नहीं चाहिए।
बुज़ुर्ग पुरुष एक ही पैर पर उछले, और उसी ओर का कूल्हा बढ़ा। एक साल, धीरे-धीरे रोज़ पचास उछाल तक, अलग-अलग दिशाओं में, उस एक पैर पर जो पर्ची से चुना गया। दूसरा पैर तुलना के लिए था। उछलने वाली ओर कूल्हे की गर्दन बढ़ी।
हड्डी सुनना कम कर देती है, और आराम उसे लौटा देता है। हड्डी की कोशिकाएँ झटका सुनने के थोड़ी देर बाद कम सुनने लगती हैं। एक प्रयोग में दिन का वही बोझ, घंटों के फ़ासले पर चार छोटे दौरों में बाँटा गया, तो एक बार में देने से ज़्यादा हड्डी बनी।
कोई दर्द नहीं उसकी हड्डियाँ दुखती नहीं। उसे लगता है हड्डी की बीमारी औरतों की होती है, या बूढ़ों की।
चाचा पिछली सर्दी उसके चाचा आँगन में फिसले और कलाई टूट गई। सबने कहा, उम्र है।
रेत शिविर में, सुबह, रेत पर। बाँहें घेरा बनाती हैं, फिर कूद, एड़ियाँ पीछे, और नीचे नरम ज़मीन। पाँच। पहले दिन कुछ आदमी हँसते हैं कि यह बच्चों का खेल है।
हाथों पर दिन में बाद में, ज़मीन पर लहर। शरीर हाथों पर आता है, उलटा V बनता है, फिर नीचे, फिर ऊपर। पहले कुछ दिन कलाइयाँ दुखती हैं।
कुछ हफ़्तों बाद उसकी हड्डियों में क्या हो रहा है, यह कोई नहीं देख सकता, कई महीनों तक नहीं। वह फिर भी रेत पर पाँच बार कूदता है, और नहाने चला जाता है।