ज्योतिर्गण

देहरी · दूसरा द्वार

देखना और पहरा देना

पहरा देना प्यार का ही एक रूप है, और यह घर का सबसे थकाने वाला काम है। इस द्वार में यह है कि पहरे की क़ीमत क्या है, वह किस पर पड़ती है, और उसकी जगह क्या रखा जा सकता है जो उससे कमज़ोर न हो।

पहरा देना प्यार ही है। इसे नकारने की ज़रूरत नहीं।

जो आदमी परवाह नहीं करता, वह पहरा भी नहीं देता।

पर पहरे की एक क़ीमत है, और वह क़ीमत आप चुका रहे हैं।

पहरा चौबीस घंटे का काम है और उसमें कोई छुट्टी नहीं होती। और जिस काम में छुट्टी नहीं होती, वह आदमी को धीरे-धीरे ख़ाली कर देता है।

अब पहरे की दूसरी क़ीमत, जो कम दिखती है।

जिस पर पहरा है, वह उस घर में मेहमान की तरह रहने लगता है। उसकी हर चीज़ जाँची जाती है, इसलिए वह हर चीज़ छिपाने लगता है। छिपाना पहरे का जवाब है, बेईमानी नहीं।

तो जितना पहरा बढ़ता है, उतना छिपाना बढ़ता है।

और जितना छिपाना बढ़ता है, उतना पहरा बढ़ाना पड़ता है।

यह एक चक्र है और यह अपने आप तेज़ होता जाता है।

इसे कोई भी तेज़ नहीं करना चाहता। यह अपने आप होता है।

अब एक कठोर सवाल, और यह अपने आप से पूछिए।

इन सालों में पहरे ने कितनी बार उसे रोका? ईमानदारी से। एक-दो बार शायद। और उन दो बार की क़ीमत में आपके कितने साल गए?

यह इल्ज़ाम नहीं है। यह हिसाब है।

और इसका मतलब यह नहीं कि आप हाथ खड़े कर दें।

इसका मतलब यह है कि वही ज़ोर कहीं और लगे, जहाँ वह काम करता है।

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