गण · दूसरा द्वार
इस गाँव में एक ही आदमी है जो अगले घर के साथ बैठकर वह बात कह सकता है और जिस पर वह घर यक़ीन करेगा। और वह वही आदमी है जिस पर गाँव को सबसे ज़्यादा शर्म आती थी। उन सालों के बावजूद नहीं। उन्हीं सालों की वजह से।
इस गाँव में एक चीज़ है जो और किसी के पास नहीं है।
एक आदमी जो वहाँ से गुज़र चुका है।
अगले घर के लिए वही अकेला भरोसेमंद है। न डॉक्टर, न सरपंच, न कोई काग़ज़, न कोई अफ़सर। वह आदमी।
और वह वही आदमी है जिस पर गाँव को सबसे ज़्यादा शर्म आती थी।
यह इत्तिफ़ाक़ नहीं है।
वह उस घर को इसीलिए पहचानता है क्योंकि वह वहाँ रह चुका है। जो वहाँ नहीं रहा, उसे वह घर दिखता ही नहीं। वह उसके सामने से रोज़ गुज़रता है और उसे कुछ नहीं दिखता।
इसलिए वे साल, जिन्हें गाँव ने बर्बादी कहा, इस एक काम की योग्यता हैं।
और यह योग्यता किसी संस्थान से नहीं मिलती। इस गाँव में शायद उसके सिवा किसी के पास नहीं है, और उसने इसे सबसे महँगे तरीक़े से कमाया है।
अब वह चीज़ जो नापी हुई है।
जो मदद करता है, उसकी अपनी मदद हो जाती है। यह कहावत नहीं है। साथी-सहायता पर हुए काम में यह बार-बार दिखा है।
यानी वह जब किसी और के साथ जाकर बैठता है, तो वह अपने लिए भी कर रहा होता है।
और यह काम काग़ज़ पर पहले से मौजूद है।
राष्ट्रीय योजना में गाँव के स्तर पर साथी-आधारित काम की अपनी मद है। यानी यह कोई नई या अनौपचारिक चीज़ नहीं है। वह पहले से एक मान्य भूमिका है, बस उस गाँव में उसे किसी ने भरा नहीं।