जटिलता · छोड़ने के बाद के फीके महीने
बीमारी गुज़रे हफ़्तों हो गए, फिर भी सब फीका है: थकान, टूटी नींद, और तलब लहरों में; और लोग कहते हैं कि अब तक तो ठीक हो जाना चाहिए था। उसमें कुछ नाकाम नहीं हुआ। दिमाग़ ने दवा के सामने अपने ही स्तर धीमे कर रखे थे, और बिना दवा की ज़िंदगी के लिए उन्हें फिर सधने में हफ़्ते और महीने लगते हैं; नापा गया, तो जो दूर रहे उनमें यह धूसर महीने-दर-महीने उठा। इसका इंतज़ार नहीं किया जाता। इसे पार किया जाता है, पूरे दिन को अभ्यास बनाकर।
शिविर को छह हफ़्ते हो गए। बीमारी कब की चली गई, और वह उन दिनों से भी बुरा महसूस करता है। खाने में स्वाद नहीं। नींद देर से आती है। तलब तब लहर की तरह आती है जब उम्मीद भी न हो। भाई कहता है, अब तक तो ठीक हो जाना चाहिए था; और वह भी ऐसा ही सोचने लगा है: कि उसमें कुछ टूटा है, या वह सच में छोड़ना ही नहीं चाहता।
दोनों में से कुछ सच नहीं। बरसों दवा एक चकाचौंध थी, और दिमाग़ ने वही किया जो दोपहर में आँख करती है: अपनी संवेदना धीमी कर ली, अपना चैन, अपना सुख, ताकि उसके सामने संतुलन बना रहे। दवा चली गई; स्तर अभी धीमे ही हैं। यही धूसर है: कुछ खोया नहीं, बस एक स्तर जो अभी पीछे चल रहा है।
वह साथ आ जाता है। 306 लोगों के एक प्रयोग में, जो दूर रहे उनमें उदासी, डर और फीकापन एक-दो महीने के भीतर सामान्य हो गए। हफ़्तों और महीनों के अंतर पर देखे गए लोगों में दिमाग़ के अपने रास्ते नाप में बदलते मिले, उन लोगों जैसे होते हुए जिन्होंने कभी नशा नहीं किया। रंग दीवारों पर पहले से थे; आँख उन तक पहुँच रही है।
इंतज़ार से यह नहीं होता; करने से होता है। शिविर इस धूसर को कोई एक अभ्यास नहीं देता; पूरा दिन देता है: सुबह की हरकत, साँस, मेहनत के बाद का आराम, शाम को कुछ श्लोक, रात की साँस, और आगे चलकर एक नए आदमी को रास्ता दिखाना। पहले दिन कीजिए। मन उसके बाद आता है, पहले नहीं।
चकाचौंध, धूसर, और दीवारें। यह विचार का चित्र है, नाप नहीं।
छह हफ़्ते हो गए, और सब अभी भी फीका है। लोग कहते हैं अब तक ठीक हो जाना चाहिए था। हो क्या रहा है?
रिसेप्टर बंद रहते हुए भी धूसर उठा। 306 लोगों के उस प्रयोग में कुछ को नाल्ट्रेक्सोन दिया गया, जो उन रिसेप्टरों को बंद कर देता है जिन पर दवा काम करती थी। उनकी उदासी, डर और फीकापन भी एक-दो महीने में सामान्य हुए, बाक़ियों की तरह। उठने के लिए दवा की ज़रूरत नहीं।
हेरोइन छोड़े आदमियों में दिमाग़ के सफ़ेद रास्ते बदलते मिले। कुछ ही समय से छोड़े आदमियों में सफ़ेद हिस्सा बड़े इलाक़ों में कमज़ोर था; लंबे समय से छोड़े आदमियों में बस दो छोटी जगहों पर, और जितना लंबा समय, उतने मज़बूत रास्ते। माथे के पीछे के दिमाग़ का एक हिस्सा जो तीसरे दिन अलग था, एक महीने पर अलग नहीं रहा।
जो आदमी वह बन रहा है, वह भी इस बदलाव का हिस्सा है। एक आवासीय समुदाय के 132 लोगों में, पहले महीने में चार में से तीन ने पुरानी, नशे वाली पहचान कम पकड़ी। जो जितना पुरानी पहचान से नई की ओर बढ़ा, उससे बाद के जीवन-संतोष का लगभग आधा फ़र्क़ समझ में आया।
छह हफ़्ते शिविर के छह हफ़्ते बाद वह सुबह चार बजे जागता है और लेटा रहता है। कुछ ग़लत नहीं, कुछ सही नहीं। वह सोचता है: बाक़ी सब तो अब तक ठीक हो गए होंगे।
धीमा घेरा फिर भी वह उठता है, क्योंकि सिखाने वाले ने कहा था: पहले दिन कीजिए। पैर चौड़े, धीमा घेरा, दस बार। उसे बेहतर नहीं लगता। वह करता है।
ज़मीन पर फिर पेट के बल, माथा नीचे, बाँहें आगे। ज़मीन ठंडी है। साँस धीमी हो रही है। वह उसके साथ रुकता है, जितना सोचा था उससे थोड़ा ज़्यादा।
नौवाँ श्लोक शाम को वह आदित्य हृदयम् वहीं से खोलता है जहाँ कल रुका था, नौवें श्लोक पर, और तीन और पढ़ता है। सब समझ में नहीं आता। जगह रखी हुई है।
नया आदमी आठवें हफ़्ते वह एक सुबह शिविर लौटता है। वहाँ एक नया आदमी है, काँपता हुआ। वह उसे धीमा घेरा दिखाता है, कि कितना धीमा होना चाहिए।
नीला दरवाज़ा घर लौटते हुए उसकी नज़र एक रंगे हुए दरवाज़े के नीले पर पड़ती है। वह एक पल रुकता है। फिर चल पड़ता है; कल फिर दिन है।