अलाव · पहला समूह
पहला समूह अभ्यास नहीं है, अभ्यास की तैयारी है। और वह पूरा का पूरा जोड़ों में बना है: ऊपर, फिर पीछे। खुलना, फिर मुड़ना। झुकना, फिर उठना।
नशे में रहा हुआ शरीर सिकुड़ा हुआ शरीर होता है। छाती अंदर, कंधे आगे, साँस छोटी, पेट बंद, पीठ अकड़ी हुई।
पहला समूह उसी सिकुड़न को खोलता है। और उसका तरीक़ा एक ही है, हर बार: कोई भी हरकत अकेली नहीं आती, हर एक का एक जोड़ीदार होता है।
हाथ ऊपर जाते हैं। फिर पीछे बँधते हैं।
छाती खुलती है। फिर माथा ज़मीन पर आता है।
पीठ नीचे झुकती है। फिर ऊपर उठती है।
एक तरफ़ जो हुआ, दूसरी तरफ़ उसका उलटा हुए बिना नहीं छोड़ा जाता। यही पूरे समूह का ढाँचा है, और यही इसका अर्थ भी।
सबसे पहला काम हाथ ऊपर उठाना है। इससे पहले साँस पर कुछ नहीं कहा जाता। क्यों?
वही आदमी, वही फेफड़े। फ़र्क़ सिर्फ़ जगह का है। हाथ ऊपर उठते ही पसलियाँ ऊपर उठती हैं और डायफ़्राम को नीचे उतरने की जगह मिलती है।
ऊपर जाने के बाद समूह नीचे आता है। कूल्हे एड़ियों पर, माथा ज़मीन पर, हाथ आगे।
यह सिर्फ़ खिंचाव नहीं है। इस मुद्रा में दो अलग-अलग चीज़ें एक साथ होती हैं, और दोनों शरीर को यही ख़बर देती हैं कि ख़तरा नहीं है।
दो रास्ते, एक ही ख़बर। हरी रेखा वेगस है, जो पेट के दबाव से ऊपर जाती है। नीली ट्राइजेमिनल है, जो माथे की ज़मीन से आती है। दोनों अलग-अलग नसें हैं और दोनों एक ही जगह पहुँचती हैं।
माथा ज़मीन से लगाना अपने आप में काम करता है। माथे की त्वचा से जो नस ख़बर ले जाती है, वह सीधे मस्तिष्क के तने तक जाती है। इसीलिए दुनिया भर में झुकने की मुद्राओं में माथा ही ज़मीन पर रखा जाता है, और इसीलिए वह शांत करती हैं।
मुँह बंद रखकर गुनगुनाने से नाक के भीतर नाइट्रिक ऑक्साइड कई गुना बढ़ जाता है। यह सबसे मज़बूती से नापी गई बातों में है। इसीलिए पहला समूह ॐ के 'म' पर, शशांकासन में, गुनगुनाकर ख़त्म होता है, चुपचाप नहीं।
बारह में से दस मुद्राएँ जोड़ी में आती हैं। हर आगे झुकने के साथ एक पीछे झुकना है, हर ऊपर उठने के साथ एक नीचे आना। शरीर एक ही दिशा में छोड़ा नहीं जाता। अकड़न इसी से बचती है।
उसे बताया गया कि एड़ियों पर बैठ जाइए। वह बैठ नहीं पाता। घुटने नहीं मुड़ते।
उसके नीचे एक मुड़ा हुआ कंबल रख दिया जाता है। अब वह बैठ जाता है।
हाथ ऊपर उठाइए। वह उठाता है। कुछ नहीं होता। उसे लगता है यह बेकार है।
साँस लीजिए। वह लेता है। और तब उसे कुछ महसूस होता है, बहुत थोड़ा सा, कि साँस आज पहले से थोड़ी नीचे तक गई।
यह कोई चमत्कार नहीं है। हाथ ऊपर थे इसलिए पसलियाँ ऊपर थीं, और पसलियाँ ऊपर थीं इसलिए नीचे जगह थी।
आगे झुककर माथा ज़मीन पर। वह इतना झुक नहीं पाता। माथे के नीचे भी कंबल रख दिया जाता है।
पाँच मिनट बाद वह वहीं बैठा है और कुछ भी ठीक नहीं हुआ है। शरीर वैसा ही है, तलब वैसी ही है।
पर एक बात हुई है। आज उसने अपने शरीर से कुछ माँगा और शरीर ने मना नहीं किया। सालों बाद पहली बार।
हर समूह तीन बार किया जाता है, और तीनों बार वही मुद्राएँ होती हैं। बदलता सिर्फ़ यह है कि हर मुद्रा कितनी देर रुकती है और ध्यान से क्या माँगा जाता है।
नई मुद्राएँ सीखने से कुछ नहीं बदलता। उन्हीं मुद्राओं में देर तक रुकने से बदलता है।
एक ही रास्ता, तीन रफ़्तार। बिंदु हर बार वही दूरी तय करता है, बस धीरे-धीरे।