ज्योतिर्गण

अलाव · दूसरा समूह

साँस छोटी क्यों हो गई

फेफड़े छोटे नहीं हुए। उनके ऊपर की पिंजरी बंद हो गई। दूसरा समूह उसी पिंजरी पर काम करता है।

अफ़ीम साँस को धीमा करती है। यह उसका सबसे ख़तरनाक असर है और सबसे कम दिखने वाला भी।

पर सालों बाद जो बचता है वह सिर्फ़ धीमी साँस नहीं है। छाती ख़ुद छोटी हो जाती है। कंधे आगे, पसलियाँ जकड़ी हुई, पीठ अकड़ी हुई। फेफड़े वही हैं। उनके चारों ओर की जगह घट गई है।

गहरी साँस लेने के लिए छाती को क्या करना पड़ता है?

इन्हें अंग्रेज़ी में pump handle और bucket handle कहते हैं। नल का हत्था ऊपर उठता है, बाल्टी का हत्था बग़ल में खुलता है। दोनों एक ही साँस में होते हैं, और यही इस पूरे समूह का काम है।

दूसरा समूह इसी दो-तरफ़ा हरकत को वापस लाता है, और वह उसे धीरे-धीरे करता है।

पहले माथा ज़मीन पर, ताकि साँस पीठ की ओर जाए। फिर पीठ नीचे-ऊपर, बार-बार, ताकि पसलियाँ चलना याद करें। फिर ऊँटासन, जहाँ छाती सबसे ज़्यादा खुलती है। और फिर वापस माथा ज़मीन पर।

जो सबसे ज़्यादा खुला, वही सबसे ज़्यादा बंद था।

क्या आप जानते हैं

फेफड़ों के कुछ हिस्से हफ़्तों तक इस्तेमाल ही नहीं होते। जो साँस छोटी होती है वह हमेशा फेफड़ों के बीच वाले हिस्से में ही चलती है। नीचे और पीछे के हिस्से बंद पड़े रहते हैं। पसलियाँ फिर से चलने लगें तो वे हिस्से दोबारा खुलते हैं।

पिंडली को शरीर का दूसरा दिल कहा जाता है। टाँग की नसों में एक तरफ़ा वाल्व होते हैं। पिंडली की मांसपेशी सिकुड़ती है तो ख़ून ऊपर धकेला जाता है। दिन भर बैठे रहना निष्क्रिय नहीं है, वह पंप का बंद रहना है।

हड्डी को मज़बूत होने के लिए वज़न चाहिए, आराम नहीं। इसी समूह में एक घुटने पर टिककर किया जाने वाला तख़्ता हाथों और कंधों पर वज़न डालता है। रोज़ के काम से ज़्यादा वज़न पड़े, तभी हड्डी जवाब देती है।

पहला ऊँटासन

उसे कहा गया कि घुटनों पर आ जाइए और हाथ कमर के पीछे रखिए।

फिर कहा गया कि धीरे-धीरे पीछे झुकिए और सिर को जाने दीजिए।

वह डेढ़ इंच पीछे जाता है और रुक जाता है। शरीर आगे नहीं जाने देता।

उसे यह बुरा लगता है। बग़ल में एक आदमी पूरा पीछे झुका हुआ है, एड़ियों तक हाथ लगाए।

सिखाने वाला उससे कुछ नहीं कहता। बस कहता है, वहीं रुकिए, और तीन साँस लीजिए।

तीसरी साँस में उसे लगता है कि छाती में कहीं कुछ खुला। बहुत थोड़ा सा। जैसे कोई खिड़की एक उँगली भर सरकी हो।

वह पूरा ऊँटासन नहीं था। वह ऊँटासन था ही नहीं। वह डेढ़ इंच था।

पर वह डेढ़ इंच पिछले साल भर में सबसे ज़्यादा था जितना उसकी छाती खुली थी।

एक ही समूह, तीन बार

हर समूह तीन बार किया जाता है, और तीनों बार वही मुद्राएँ होती हैं। बदलता सिर्फ़ यह है कि हर मुद्रा कितनी देर रुकती है और ध्यान से क्या माँगा जाता है।

नई मुद्राएँ सीखने से कुछ नहीं बदलता। उन्हीं मुद्राओं में देर तक रुकने से बदलता है।

पहला घेरा · the first ringसाँस · आसन · a breath · a posture