अलाव · चौथा समूह
चौथे समूह में हाथ चार बार खुलते हैं, हर बार पहले से ज़्यादा। और ठीक उसी समय पैरों के नीचे की ज़मीन कम होती जाती है।
इस समूह का नाम ही बता देता है कि इसमें क्या होता है। हाथ खुलते हैं।
पर वे एक बार में नहीं खुलते। चार बार खुलते हैं, और हर बार पिछली बार से चौड़े।
पहले हथेलियाँ छाती के सामने जुड़ती हैं। फिर दोनों हाथ सिर के ऊपर जाते हैं। फिर दोनों तरफ़ बराबर खुलते हैं। और आख़िर में एक हाथ पीछे के घुटने पर और दूसरा तिरछा ऊपर, यानी शरीर की पूरी लंबाई।
जुड़े हुए, फिर ऊपर, फिर चौड़े, फिर पूरा तिरछा। यही चौथा समूह है।
कुछ लोगों के हाथ पूरे ऊपर नहीं जाते, कान तक नहीं पहुँचते। इसकी सबसे आम वजह क्या है?
बग़ल से देखिए तो पैर दूर-दूर हैं और मुद्रा मज़बूत लगती है। पर सामने से देखिए तो दोनों पैर लगभग एक ही लकीर पर हैं। आगे-पीछे लंबा, इधर-उधर सँकरा। और ठीक उसी समय हाथ सबसे चौड़े खुलते हैं।
यही इस समूह की पूरी बनावट है, और यह दोनों तरफ़ काम करती है।
हाथ खोलने से छाती खुलती है। और छाती खुलने से हाथ और ऊपर जा पाते हैं।
इसीलिए यह समूह जाँच भी है और इलाज भी। जो आज कान तक नहीं पहुँचता, वह छह हफ़्ते बाद पहुँचता है, और उसे किसी ने कंधा नहीं खींचा। पसलियाँ चलने लगीं।
हाथ ऊपर उठाने में कंधे की हड्डी तीन काम एक साथ करती है। वह ऊपर की ओर घूमती है, पीछे झुकती है, और बाहर की ओर मुड़ती है। तीनों के लिए पसलियों का हिलना ज़रूरी है। इसीलिए साँस और कंधा एक ही सवाल के दो हिस्से हैं।
इस समूह का ज़्यादातर काम एक पैर आगे और एक पीछे रखकर होता है। इसके तेईस क़दमों में से पंद्रह ऐसे हैं जहाँ एक पैर आगे और एक पीछे होता है। यही वह जगह है जहाँ आदमी ज़मीन से उठता है।
पैर जितने पास, संतुलन उतना मुश्किल। संतुलन सिखाने का क्रम हमेशा यही रहा है: पहले चौड़ा आधार, फिर सँकरा, फिर एक पैर। आगे-पीछे वाला आधार लंबा तो है पर चौड़ा नहीं, इसीलिए वह बीच की सीढ़ी है।
उसे कहा गया कि दोनों हाथ ऊपर ले जाइए, कानों के पास से।
वह ले गया। सिखाने वाला कुछ नहीं बोला।
बाद में उसने शीशे में देखा। हाथ कानों के पास नहीं थे। वे आगे की तरफ़ थे, सिर से एक बालिश्त आगे।
उसे लगा कि वह ठीक से कोशिश नहीं कर रहा। उसने और ज़ोर लगाया। हाथ वहीं रहे।
अगले हफ़्ते उसे पहले पसलियों वाला काम कराया गया। बिल्ली और गाय, बीस बार। फिर हाथ ऊपर।
इस बार हाथ थोड़े और पीछे गए। ज़ोर उतना ही था।
छह हफ़्ते बाद वे कानों के पास थे। किसी ने उसका कंधा नहीं खींचा था।
उसकी छाती ने जगह दे दी थी। बस इतना हुआ था।
हर समूह तीन बार किया जाता है, और तीनों बार वही मुद्राएँ होती हैं। बदलता सिर्फ़ यह है कि हर मुद्रा कितनी देर रुकती है और ध्यान से क्या माँगा जाता है।
नई मुद्राएँ सीखने से कुछ नहीं बदलता। उन्हीं मुद्राओं में देर तक रुकने से बदलता है।