अलाव · पाँचवाँ समूह
इस समूह का नाम है साहस। सवाल यह है कि पीछे जाने से रोकता कौन है, और वह चीज़ बदलती कैसे है।
इस समूह में हाथ एक लंबा चक्कर काटते हैं। पहले जुड़े हुए ऊपर। फिर आगे और ऊपर, तिरछे। फिर कानों के पास सीधे। फिर उसी जगह से थोड़ा और ऊपर। फिर पीछे की ओर। और फिर उससे भी पीछे और नीचे।
हर बार निर्देश यही है: जहाँ अभी पहुँचे, उससे थोड़ा और।
तो सवाल यह है कि थोड़ा और जाने से रोकता कौन है।
कोई आदमी हफ़्तों तक खिंचाव का अभ्यास करता है और उसकी पहुँच बढ़ जाती है। उसके शरीर में क्या बदला?
बाहर वाली बिंदुओं की रेखा हिलती नहीं। वह ऊतक की हद है और वह वैसी की वैसी रहती है। जो हिलती है वह भीतर वाली सुनहरी रेखा है, यानी आज कितना करने दिया जा रहा है। तीनों बटन दबाकर देखिए।
यह बात सुनने में छोटी लगती है और है नहीं।
जब आप किसी मुद्रा में रुक जाते हैं, तो आपको लगता है कि शरीर वहाँ तक ही जा सकता है। पर वह हद शरीर की बनावट की नहीं है। वह एक फ़ैसला है, जो आपकी जानकारी के बिना लिया जाता है, कि इतनी संवेदना सुरक्षित है और इससे ज़्यादा नहीं।
और फ़ैसले बदले जा सकते हैं। बनावट नहीं बदलती, फ़ैसला बदलता है।
नशा छोड़ते समय यह हद बहुत नीचे रख दी जाती है। पूरा शरीर पहरे पर होता है और हर संवेदना ख़तरा लगती है। पाँचवाँ समूह उसी पहरे से बात करता है, एक-एक डिग्री करके।
खिंचाव से मांसपेशी के रेशे लंबे नहीं होते। यह अल्ट्रासाउंड से नापा गया है। एक बार के खिंचाव से भी नहीं, और हफ़्तों के अभ्यास से भी नहीं। जो बात हर जगह कही जाती है, वह नाप में नहीं मिलती।
सहने की हद एक दिन में नहीं बढ़ती। अध्ययनों में यह तीन से आठ हफ़्ते में बढ़ती है, और तब जब हफ़्ते में कम से कम दो बार अभ्यास हो। एक दिन का खिंचाव अकड़न कम करता है, हद नहीं बढ़ाता।
जो हद बदलती है, उसका दर्द से रिश्ता है। एक सुझाया गया कारण यह है कि लगातार अभ्यास से मांसपेशी में मौजूद दर्द बताने वाले सिरों की संवेदनशीलता घटती है। यानी हद इसलिए बढ़ती है कि वहाँ पहुँचना अब उतना ख़तरनाक नहीं लगता।
उससे कहा गया कि हाथ पीछे ले जाइए और छाती खोलिए।
उसके हाथ मुश्किल से कंधे की सीध तक गए। वहाँ कुछ खिंचा और वह रुक गया।
उसने सोचा कि उसके कंधे ख़राब हैं। बरसों से ऐसे ही हैं।
अगले निर्देश में कहा गया: वहीं से थोड़ा और। बस थोड़ा।
वह एक उँगली भर और गया। दर्द नहीं हुआ। कुछ नहीं टूटा।
उसे यह अजीब लगा। अगर वह वहाँ जा सकता था, तो पहले क्यों रुक गया था?
किसी ने उसे कुछ नहीं बताया। छह हफ़्ते बाद उसके हाथ कहीं ज़्यादा पीछे जाते थे।
उसके कंधे नहीं बदले थे। जो बदला था वह यह था कि उसका शरीर अब उसे वहाँ जाने देता था।
हर समूह तीन बार किया जाता है, और तीनों बार वही मुद्राएँ होती हैं। बदलता सिर्फ़ यह है कि हर मुद्रा कितनी देर रुकती है और ध्यान से क्या माँगा जाता है।
नई मुद्राएँ सीखने से कुछ नहीं बदलता। उन्हीं मुद्राओं में देर तक रुकने से बदलता है।