अलाव · आठवाँ समूह
हर पिछले समूह के पास हाथ थे, जिनसे ज़मीन को दबाया जा सके। यहाँ बाँहें बग़ल में पड़ी रहती हैं और जो कुछ उठता है, उसे पीठ उठाती है।
इस समूह की हर बड़ी मुद्रा पेट के बल होती है। बाँहें या तो बग़ल में पड़ी रहती हैं, या सामने फैली रहती हैं। किसी भी क्षण वे ज़मीन को दबाकर शरीर को ऊपर नहीं उठातीं।
इससे पहले के हर समूह में हाथ थे। हाथों से ज़मीन को दूर धकेलिए और छाती अपने आप ऊपर आ जाती है। वहाँ बाँहें काम करती हैं और पीठ साथ चलती है।
यहाँ बाँहें कुछ नहीं करतीं। जो कुछ उठता है, उसे पीठ उठाती है, और सिर्फ़ पीठ।
इसीलिए इस समूह का नाम यही है।
फ़र्क़ छोटा दिखता है। असल में यही तय करता है कि मेहनत किस मांसपेशी पर पड़ेगी।
जब हाथों का सहारा हटा लिया जाता है, तो शरीर का कौन सा हिस्सा काम करता है?
यह पूरे समूह का नक़्शा है। जिस रास्ते से वह नीचे उतरा, ठीक उसी रास्ते से वापस ऊपर आता है, और वहीं बैठकर ख़त्म करता है जहाँ से शुरू किया था।
नौ समूहों में यह अकेला है जो ऐसा करता है। बाक़ी सब आगे बढ़ते हैं और जहाँ पहुँचते हैं, वहीं रुक जाते हैं।
यहाँ बैठक से शुरू होता है, चार शक्लों से होकर ज़मीन तक उतरता है, बीच का सारा काम करता है, और फिर उन्हीं चार शक्लों से उल्टे क्रम में ऊपर आकर वापस उसी बैठक पर आ जाता है।
उतरना अभ्यास का हिस्सा है। चढ़ना भी अभ्यास का हिस्सा है। बीच में जो हुआ, वह बीच में छोड़कर नहीं आया जाता।
इस समूह में सबसे ज़्यादा बार आने वाला चित्र कोई मुद्रा नहीं है। सबसे ज़्यादा बार आने वाला चित्र आराम का है। पेट के बल सीधे लेटे, बाँहें आगे, माथा ज़मीन पर। वह तेरह बार आता है। उठाने वाली कोई भी मुद्रा तीन बार से ज़्यादा नहीं आती।
पीठ की मांसपेशियाँ कितनी देर टिकती हैं, यह पहले से बता सकता है कि आगे कमर दर्द होगा या नहीं। एक पुराने अध्ययन में जिन पुरुषों की पीठ 176 सेकंड से कम टिकी, उनमें अगले साल कमर दर्द ज़्यादा हुआ। जिनकी 198 सेकंड से ज़्यादा टिकी, उनमें कम। यह ताक़त की नहीं, टिकने की बात है।
अफ़ीम हड्डी को दो अलग रास्तों से कमज़ोर करती है, और उनमें से एक को दबाव ठीक उल्टी दिशा में मोड़ता है। अफ़ीम हड्डी की कोशिका में स्क्लेरोस्टिन नाम का एक अणु बढ़ा देती है, जो हड्डी बनना रोकता है। हड्डी पर पड़ने वाला यांत्रिक दबाव उसी अणु को घटाता है। एक ही जगह, दो उल्टी दिशाएँ।
पहला दिन वह पेट के बल लेटा है। कहा गया है कि साँस भरते हुए छाती उठाइए। वह ज़ोर लगाता है। छाती एक इंच भी नहीं उठती।
वह अपने हाथ खोजता है बिना सोचे उसके हाथ ज़मीन की तरफ़ जाते हैं, दबाने के लिए। शिक्षक कहता है, हाथ बग़ल में। वह हाथ वापस रख देता है और छाती फिर वहीं की वहीं रहती है।
उसे शर्म आती है बग़ल वाला आदमी उठा लेता है। वह नहीं उठा पाता। वह सोचता है कि उसके शरीर में अब कुछ बचा ही नहीं।
आराम वाला चित्र आता है सीधे लेट जाइए, सिर एक तरफ़। वह लेट जाता है। साँस चलती रहती है। कोई उसे देख नहीं रहा। यह सबसे आसान हिस्सा है और वह इसे आसानी से कर लेता है।
फिर वही मुद्रा, दूसरी बार इस बार वह ज़ोर नहीं लगाता। वह सिर्फ़ साँस भरता है और होने देता है। छाती शायद आधा इंच उठती है। शायद नहीं भी। पर इस बार कोशिश में जकड़न नहीं थी।
तीसरा हफ़्ता वह वही मुद्रा कर रहा है और यह देखे बिना कर रहा है कि बग़ल में कौन क्या कर रहा है। छाती उठ रही है। कितनी, यह उसने नापा नहीं।
कोई तारीफ़ नहीं करता कोई नहीं कहता कि देखो, आज तुमने कर लिया। समूह अगली मुद्रा पर चला जाता है। यह अच्छा है। जिस दिन तारीफ़ शुरू होती है, उस दिन से करना तारीफ़ के लिए होने लगता है।
और फिर वापसी चक्र के आख़िर में वे उन्हीं शक्लों से उल्टा चलकर वापस बैठक तक आते हैं। वह बैठा है, वहीं जहाँ से शुरू किया था। पीठ में कुछ गरम सा लग रहा है। यह ताक़त नहीं है। पर यह कुछ तो है, और यह उसका अपना है।
हर समूह तीन बार किया जाता है, और तीनों बार वही मुद्राएँ होती हैं। बदलता सिर्फ़ यह है कि हर मुद्रा कितनी देर रुकती है और ध्यान से क्या माँगा जाता है।
नई मुद्राएँ सीखने से कुछ नहीं बदलता। उन्हीं मुद्राओं में देर तक रुकने से बदलता है।