जटिलता · रोग-प्रतिरोध
शरीर के पहरेदार खोए नहीं थे। उन्हें दवा से ज़्यादा उसके आसपास का झूला दबाता है: ख़ुराक और तलब, टूटी रातें, तनाव का हार्मोन। जहाँ दिन ठहरे, वहाँ वे किसी के भी जितने अच्छे मिले। और वे तीन सीधी चीज़ों को सुनते हैं: चलना, सोना, और शांत मन।
हर सर्दी में ज़ुकाम आता है और छाती तक उतर जाता है। हाथ का एक कट हफ़्तों भरता नहीं। गाँव में लोग कहते हैं कि अफ़ीम से सर्दी नहीं लगती, और फिर भी उसे लगती है।
जानवरों में अफ़ीम-जाति की दवा शरीर के पहरेदारों को धीमा करती है: वे कोशिकाएँ जो रोगाणु पहचानती और मारती हैं। पर पहरेदार कहीं गए नहीं। जो आदमी पहले हेरोइन लेते थे और दस बरस से ठहरी ज़िंदगी जी रहे थे, उनकी मारने वाली कोशिकाएँ स्वस्थ आदमियों जितनी ही तेज़ निकलीं।
उन्हें दबाता है झूला: ख़ुराक, फिर तलब, फिर ख़ुराक; टूटी रातें; और हर तलब में ऊपर चढ़ता तनाव का हार्मोन। यह झूला ठहर सकता है, और पहरा उसके साथ लौटता है।
और पहरेदार तीन सीधी चीज़ों को सुनते हैं। चलने पर वे ख़ून में निकल पड़ते हैं, गश्त पर। नींद में वे अपनी चौकियों पर लौटते हैं और याद करते हैं कि किसे पहचानना है। और शांत मन के साथ ज़ुकाम छोटा रहता है।
एक घेरा, उस पर पहरेदार, और तीन चौकियाँ। यह विचार का चित्र है, नाप नहीं।
ग्यारह आदमी जो पहले नस में हेरोइन लेते थे, और दस बरस से नहीं ले रहे थे, एक ठहरी ख़ुराक और ठहरी ज़िंदगी के साथ। उनकी मारने वाली कोशिकाएँ स्वस्थ आदमियों के मुक़ाबले कैसी निकली होंगी?
जो हफ़्ते में पाँच दिन या ज़्यादा चलते-दौड़ते थे, उन्हें ज़ुकाम के दिन काफ़ी कम रहे। एक हज़ार से ज़्यादा लोगों को बारह हफ़्ते देखा गया: जो लगभग बैठे रहते थे, उनके मुक़ाबले ऐसे लोगों में ज़ुकाम के दिन 43% कम थे, और ज़ुकाम हल्का भी।
नींद पहरेदारों की तैयारी है। एक ही ज़ुकाम का विषाणु नाक में डाला गया। जो रात में आठ घंटे या ज़्यादा सोते थे, उन्हें ज़ुकाम सात घंटे से कम सोने वालों के मुक़ाबले लगभग एक तिहाई बार ही हुआ।
अफ़ीम खाँसी चुप कराती है, ज़ुकाम नहीं। खाँसी छाती की अपनी सफ़ाई है। दवा उसे दबाती है, और यह उन कारणों में गिना गया है जिनसे अफ़ीम-जाति की दवा लेने वालों में निमोनिया ज़्यादा मिला।
सर्दी हर सर्दी वही। नाक, फिर गला, फिर छाती, और तीन हफ़्ते की खाँसी। माँ कहती है, थोड़ी अफ़ीम ले ले, खाँसी रुक जाएगी। रुक भी जाती है।
कट खेत में हँसिए से हाथ कटा। एक महीने बाद भी लाल है। वह उसे कपड़े से बाँधे रखता है और किसी को नहीं दिखाता।
शिविर में सुबह पहले चरण के पाँच अभ्यास, नाक से साँस। फिर बैठना नहीं: सीधे तीसरा समूह, हर क़दम एक साँस पर। सिखाने वाला कहता है, बस इतना कि मुँह न खोलना पड़े।
शाम महामृत्युंजय, धीमे स्वर में, एक पंक्ति एक साँस। उसे शब्दों का अर्थ नहीं पता। उसे बस उसकी आवाज़ अच्छी लगती है।
रात पहली बार हफ़्तों में वह बिना जागे सोता है। सुबह उसे याद नहीं कि रात कैसे गई।
अगली सर्दी अगली सर्दी में ज़ुकाम आता है। वह नाक में रहता है, और कुछ दिनों में चला जाता है। उसे बाद में इसका ध्यान भी नहीं आता।