ज्योतिर्गण

लोकलाज · पहला द्वार

गाँव क्या कहता है, और क्यों

इस विषय में सबसे बड़ी रुकावट नशा नहीं है और पैसा नहीं है। रुकावट यह है कि लोग क्या कहेंगे। और गाँव जो कहता है, वह द्वेष से नहीं कहता। वह इसलिए कहता है कि उसे आज तक कोई दूसरा वाक्य दिया ही नहीं गया।

इस विषय में सबसे बड़ी रुकावट क्या है?

नशा नहीं। पैसा नहीं। दूरी नहीं।

लोकलाज। लोग क्या कहेंगे। यही वह चीज़ है जो घर को केंद्र तक नहीं जाने देती और आदमी को दरवाज़े तक नहीं।

और अब वह बात जो नापी जा चुकी है।

जब लोगों से अलग-अलग तकलीफ़ों के बारे में पूछा गया, तो नशे की निर्भरता पर सबसे ज़्यादा दूरी दिखी। मानसिक बीमारी से भी ज़्यादा। लोग ऐसे आदमी के साथ काम करने, या उसे अपने घर में रिश्ता देने में सबसे ज़्यादा हिचके।

यह किसी एक गाँव की बात नहीं है। यह वहाँ भी वैसा ही निकला जहाँ यह सर्वेक्षण हुआ।

तो यह बात मान लीजिए, और उसके बाद असली सवाल पर आइए।

गाँव यह क्यों कहता है?

इसलिए नहीं कि गाँव बुरा है।

इसलिए कि गाँव के पास कहने को कोई दूसरा वाक्य नहीं है। उसे आज तक सिर्फ़ एक ही बात बताई गई: यह आदमी ख़राब है। न कोई कारण बताया गया, न कोई रास्ता।

जिस गाँव को कारण नहीं बताया गया, वह चरित्र ही बताएगा।

और चरित्र वाली बात का कोई इलाज नहीं होता, इसलिए गाँव कुछ करता भी नहीं। वह सिर्फ़ दूरी बनाता है, और दूरी बनाना उसे भी थकाता है, क्योंकि वह आदमी उसी गली में रहता है।

तो इस पूरे हिस्से में गाँव पर कोई दोष नहीं है।

इसमें वह है जो गाँव को किसी ने बताया नहीं।

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