लोकलाज · तीसरा द्वार
गाँव के पास आज एक ही वाक्य है, और वह चरित्र के बारे में है। दूसरा वाक्य किसी ने उसे दिया नहीं। यह द्वार वही वाक्य है, और वह इतना छोटा है कि गली में खड़े-खड़े कहा जा सकता है।
गाँव के पास अभी एक ही वाक्य है।
“वह आदमी ख़राब है।”
जब तक दूसरा वाक्य नहीं होगा, यही चलता रहेगा। लोग चुप नहीं रहते। जिसके पास एक ही वाक्य हो, वह वही दोहराता है।
तो दूसरा वाक्य यह है, और यह छोटा है।
“उसे दवा और अभ्यास से फ़र्क़ पड़ता है, और वह मुफ़्त में है।”
बस इतना। इसमें न सफ़ाई है, न बहस, न किसी को समझाना। इसमें एक कारण है और एक रास्ता, और उतना ही चाहिए।
और इसमें सबसे ज़रूरी शब्द “मुफ़्त” है।
क्योंकि गाँव इलाज को पैसे वाली चीज़ मानता है, और इसीलिए उसे नामुमकिन मानता है। जिस दिन गली को यह मालूम हो जाता है कि यह मुफ़्त है, उस दिन बात का रुख़ बदल जाता है।
और यह वाक्य किसी सभा में नहीं कहा जाता।
यह वहीं कहा जाता है जहाँ पहली वाली बात कही जा रही थी। दुकान पर। खेत की मेंड़ पर। हैंडपंप पर। शादी में। वहीं, जहाँ गाँव असल में बात करता है।
और अब एक बात जो लगभग हर आदमी नहीं जानता।
गली में लगभग हर आदमी यही सोच रहा है कि उसके सिवा कोई और ऐसा नहीं सोचता। सब चुप हैं, इसलिए सब मान रहे हैं कि बाक़ी सब उस पुरानी बात पर हैं। और यह लगभग हमेशा ग़लत होता है।
इसलिए पहला वाक्य किसी को तो कहना ही पड़ेगा।
और उसके बाद अक्सर पता चलता है कि गली इंतज़ार कर रही थी।