ज्योतिर्गण

मोड़ · पहला द्वार

वह सवाल जो कोई नहीं पूछता

सब आपसे एक ही सवाल पूछते हैं: फिर लोगे या नहीं। दूसरा सवाल कोई नहीं पूछता, और असल में वही सवाल है। जो जीवन सिर्फ़ न करने पर बनाया जाता है, उसकी एक छत होती है, और वह छत नीची है।

सब आपसे एक ही सवाल पूछते हैं।

फिर लोगे या नहीं। घर वाले, डॉक्टर, गाँव, और सबसे ज़्यादा आप ख़ुद।

दूसरा सवाल कोई नहीं पूछता।

आप किस लिए हैं।

अब इस पर सोचिए, क्योंकि इसमें एक गणित है।

जो कार्यक्रम सिर्फ़ रोकने का है, उसकी सबसे बड़ी कामयाबी क्या है?

यही, कि आप उस दिन पर लौट आएँ जो शुरू होने से एक दिन पहले था।

और वही दिन वह दिन है जहाँ से यह शुरू हुआ था। अगर उसके सिवा कुछ नहीं बदला, तो वह वही दिन है जहाँ से यह दुबारा शुरू हो सकता है।

इसीलिए शून्य कभी लक्ष्य नहीं था।

शून्य पर आदमी रह नहीं सकता। वह वहाँ खड़ा रह सकता है, कुछ महीने, दाँत भींचकर। रह नहीं सकता।

तो सवाल बदलिए।

“मैं क्या नहीं करूँगा” की जगह “मैं क्या बन रहा हूँ”।

पहले सवाल की एक छत है।

दूसरे की कोई छत नहीं है। और यह अकेला सवाल है जिसका जवाब उस चीज़ के हाथ में नहीं है।

तीसरा घेरा · the third ringमन · the mind