मोड़ · तीसरा द्वार
इस मॉड्यूल का छठा चरण यह है कि आप मुड़कर उस आदमी को सिखाएँ जो आपके बाद आया। यह अंत में जोड़ा गया समारोह नहीं है। बाक़ी पाँच चरण इसी को सम्भव बनाने के लिए हैं, और आपके वे साल ही इसकी योग्यता हैं।
आपसे एक दिन सिखाने को कहा जाएगा।
अंत में नहीं, जब आप “पूरे” हो जाएँ। क्योंकि यहाँ कोई अंत नहीं है। यह पहले भी हो सकता है, और आमतौर पर होता भी पहले ही है।
और इसकी वजह भावुक नहीं है।
जो आदमी वहाँ से नहीं गुज़रा, वह यह बात कहे तो सामने वाला उस पर यक़ीन नहीं करता।
और आप गुज़रे हैं। वे साल, जिन्हें आप अपनी सबसे बड़ी हार मानते हैं, इस एक काम की सबसे बड़ी योग्यता हैं। यह योग्यता किसी डिग्री से नहीं आती और आपके गाँव में शायद आपके सिवा किसी के पास नहीं है।
दूसरी वजह और भी सीधी है, और वह नापी हुई है।
जो मदद करता है, उसकी अपनी मदद हो जाती है। यह कोई कहावत नहीं है। साथियों की मदद पर हुए काम में यह बार-बार दिखा है, और इसका अपना नाम है।
सिखाते हुए आदमी वह चीज़ दुबारा सीखता है, और इस बार गहरी।
और सिखाते हुए वह किसी और की नज़र में वह आदमी बन जाता है जो जानता है। और यही वह जगह है जहाँ अपने बारे में उसकी अपनी राय बदलती है, किसी के समझाने से नहीं।
अब इस आंदोलन का नाम।
ज्योतिर्गण।
ज्योति एक नहीं है। गण का मतलब है समूह। नाम में ही यह है कि एक दीये की बात नहीं हो रही। दीयों की एक क़तार की बात हो रही है।
और एक दीया दूसरे को जलाकर छोटा नहीं होता।
यह कोई सांत्वना की बात नहीं है। यह इस चीज़ का गणित है।