साधन · पहला द्वार
तलब एक हालत नहीं है जिसमें आदमी फँस जाता है। उसका एक आकार है: वह उठती है, चढ़ती है, और अपने आप उतरती है। जो आदमी यह आकार जानता है, वह उस वक़्त कुछ और ही कर रहा होता है।
तलब आती है।
और तलब जाती भी है। यह दूसरी बात पहली जितनी ही सच है, और आमतौर पर कोई इसे कहता नहीं।
उस वक़्त ऐसा लगता है कि यह अब कभी नहीं उतरेगी।
यही उसका सबसे बड़ा झूठ है। वह जिस रफ़्तार से चढ़ती है, उसी रफ़्तार से उतरती भी है। उसे उतारने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता।
तो असल सवाल यह नहीं है कि उसे कैसे हराया जाए।
असल सवाल यह है कि जब तक वह उतरे, तब तक आप कहाँ हैं।
अगर आप उससे लड़ रहे हैं, तो आप उसी के भीतर हैं। और भीतर रहने से वह लंबी लगती है। ध्यान जिस चीज़ पर टिका रहे, वह बड़ी होती जाती है।
अगर आप कुछ और कर रहे हैं, तो वह अपने रास्ते चली जाती है।
इसीलिए यहाँ जवाब कोई दलील नहीं है।
जवाब एक हरकत है। दस मिनट की, शुरू और ख़त्म वाली, जो पूरी हो जाती है।
और सबसे तेज़ पहुँचने वाली हरकत साँस है।
साँस अकेली वह लय है जो अपने आप भी चलती है और जिसे आप चला भी सकते हैं। दिल की धड़कन आप नहीं चला सकते। पेट नहीं चला सकते। साँस दोनों तरफ़ खुली है, और वही दरवाज़ा है।
तलब मन तक पहुँचने से पहले साँस तक पहुँचती है।
जिसने साँस पकड़ना सीख लिया, उसे कुछ सेकंड की चेतावनी मिल जाती है। और कुछ सेकंड ही लेने और न लेने के बीच का पूरा फ़र्क़ हैं।