ज्योतिर्गण

साधन · दूसरा द्वार

जो अपने आप चलता है

जो चीज़ बहुत दोहराई जाती है, वह सोचने वाले हिस्से से निकलकर अपने आप चलने वाले हिस्से में चली जाती है। इसीलिए तय करने से कुछ नहीं होता: तय करना उस हिस्से तक पहुँचता ही नहीं। पर उस चक्र में घुसने की जगहें हैं, और वे बताई जा सकती हैं।

आपने कभी तय नहीं किया था कि यह हर रोज़ होगा।

फिर भी वह हर रोज़ होने लगा। क्योंकि जो चीज़ बहुत बार दोहराई जाती है, वह तय करने के दायरे से बाहर चली जाती है।

शुरू में हर बार एक फ़ैसला होता था।

आख़िर में फ़ैसला रह ही नहीं गया था। बस एक क्रम था जो चल पड़ता था। यही उसका असली रूप है। और इसी वजह से “अब से नहीं” कहने से कुछ नहीं होता।

“अब से नहीं” सोचने वाले हिस्से में कहा जाता है।

और वह चीज़ अब सोचने वाले हिस्से में रहती ही नहीं। आप एक कमरे में खड़े होकर उस आदमी को आवाज़ दे रहे हैं जो दूसरे कमरे में है।

तो फिर उस तक पहुँचा कैसे जाए।

वहाँ से, जहाँ से वह हर बार शुरू होता है।

हर ऐसे क्रम के आगे एक इशारा होता है। एक वक़्त। एक जगह। एक आदमी। एक हालत। थकान, ख़ाली दोपहर, कोई ख़ास मोड़, कोई ख़ास आवाज़।

इशारा आपके भीतर नहीं है। वह बाहर है, और बाहर की चीज़ें बदली जा सकती हैं।

और दूसरी जगह बीच वाला हिस्सा है: जो किया जाता है।

वहाँ कुछ और रखा जा सकता है। इशारा वही रहे, नतीजा वही रहे, बीच का काम बदल जाए। यही पूरा साधन है।

इसीलिए यहाँ आपसे कुछ छोड़ने को नहीं कहा जाता।

आपसे उसी वक़्त, उसी जगह, कुछ करने को कहा जाता है।

तीसरा घेरा · the third ringमन · the mind