अलाव · चौथा चरण
अफ़ीम साँस को कमज़ोर नहीं करती। वह उस लय को दबाती है जिससे साँस बनती है। और पूरे शरीर में वही अकेली लय है जिसे आदमी ख़ुद, बाहर से, बिना किसी दवा के चला सकता है।
नशे पर रहने वाला आदमी अक्सर कहता है कि उसे नींद आ जाती है। जो वह नहीं कहता, क्योंकि उसे पता ही नहीं होता, वह यह है कि रात में उसकी साँस उथली हो जाती है और कभी-कभी कुछ पलों के लिए रुक जाती है।
यह डराने के लिए नहीं लिखा जा रहा। यह इसलिए लिखा जा रहा है कि इसका मतलब कुछ और है, और वह मतलब काम का है।
साँस अपने आप नहीं चलती। उसे दिमाग़ के तने में बैठी एक छोटी सी जगह हर बार गिनकर चलाती है। अफ़ीम फेफड़ों पर नहीं बैठती। वह उसी गिनने वाली जगह पर बैठती है।
और यहीं से एक बात निकलती है जो पूरे अभ्यास में और कहीं नहीं मिलती। दिल की धड़कन आप नहीं चला सकते। आँत आप नहीं चला सकते। पर साँस, जिसे वही तना चलाता है, आप चला सकते हैं। जब चाहें, जितनी देर चाहें।
समवृत्ति इसी एक छूट का इस्तेमाल है। चार बराबर हिस्से: भरिए, रोकिए, छोड़िए, रुकिए। सब बराबर।
इसमें याद रखने के लिए कुछ भी नहीं है। चार तरफ़ हैं और चारों बराबर हैं। जो आदमी सालों से किसी चीज़ पर टिक नहीं पाया, उसके लिए यह मायने रखता है।
जिस आदमी की साँस अफ़ीम ने धीमी कर दी है, उसके साथ रात में सबसे ज़्यादा ख़तरा कब होता है?
जिस अभ्यास को दुनिया भर की फ़ौजें box breathing कहती हैं, वह समवृत्ति ही है। चार-चार-चार-चार। अंदर चार, रोकिए चार, बाहर चार, रुकिए चार। यह हमारी सीढ़ी का दूसरा स्तर है, हूबहू। नाम बदला है, गिनती नहीं।
साँस की लय बनाने वाली जगह से एक तार सीधे उस जगह तक जाता है जो घबराहट और सतर्कता चलाती है। वह कोई रूपक नहीं है। चूहों में उन कोशिकाओं की गिनती की गई है, लगभग एक सौ पचहत्तर, और उन्हें हटा देने पर साँस बिल्कुल वैसी ही चलती रही और जानवर शांत हो गए।
अफ़ीम से दबी साँस को नालॉक्सोन उठाता है, पर वह दर्द-निवारण भी साथ ले जाता है। इसीलिए एक दूसरी दवा पर काम हुआ जो सिर्फ़ लय को उठाती है और दर्द-निवारण को छूती नहीं। वह चली, और उसने यह साबित किया कि लय को म्यू-रिसेप्टर के बाहर से भी चलाया जा सकता है।
तीन बजे हैं वह जागा हुआ है। सीने में वही जानी-पहचानी बेचैनी है। छोड़े हुए ग्यारह दिन हो गए और ग्यारहवीं रात भी वैसी ही है जैसी पहली थी।
वह कुछ करना चाहता है कुछ भी। उठकर टहलना उसने कर लिया। पानी पी लिया। जो काम बचता है वह सिर्फ़ सोचना है, और सोचना उसे उसी एक जगह ले जाता है।
उसे तीन गिनती याद हैं शिविर में सिखाया गया था। अंदर तीन। रोकिए तीन। बाहर तीन। रुकिए तीन। बस इतना ही, और कुछ नहीं।
पहला चक्र बुरा जाता है तीसरी गिनती पर सीना खिंचता है और उसे लगता है यह उसके बस का नहीं। वह दो चक्र में छोड़ देता है और फिर, बिना किसी वजह के, दुबारा शुरू कर देता है।
चौथे चक्र पर गिनती अपने आप चलने लगती है वह उस पर ध्यान नहीं दे रहा। वह बस गिन रहा है। इन कुछ मिनटों में वह उस चीज़ के बारे में नहीं सोच रहा जिसके बारे में वह ग्यारह दिन से सोच रहा है।
दस चक्र पूरे होते हैं नींद नहीं आती। बेचैनी गई नहीं। पर उसने दो मिनट में एक चीज़ शुरू की और पूरी की, और आज की रात के लिए इतना ही है।