ज्योतिर्गण

संग · दूसरा द्वार

वह एक घंटा

यह द्वार व्यावहारिक है और इसमें कुछ भी दार्शनिक नहीं है। कौन सा समय, कौन सा कमरा, कौन क्या करेगा, बूढ़े क्या करेंगे, बीमार क्या करेंगे, और उस दिन क्या होगा जब कोई नहीं आता।

समय एक ही रखिए, रोज़ वही।

और उसे किसी ऐसी चीज़ से बाँध दीजिए जो वैसे भी रोज़ होती है। चाय के बाद। या भैंस के बाद। या स्कूल जाने से पहले। घड़ी से बाँधने पर वह छूट जाता है, काम से बाँधने पर नहीं छूटता।

दस मिनट। इससे बड़ा नहीं।

जो बड़ा है वह बुरे दिन पर छूटता है, और बुरे दिन ही वे दिन हैं जिनके लिए यह सब है।

जगह एक ही रखिए।

वही आँगन, वही कमरा, वही कोना। जगह अपने आप याद दिलाने लगती है। कुछ दिनों बाद वह कोना ही घंटी का काम करने लगता है।

अब कौन क्या करेगा।

जो चल-फिर सकते हैं, वे पूरा समूह करेंगे।

जो बूढ़े हैं, वे कुर्सी पर बैठकर करेंगे। साँस और हाथ-पैर के जोड़। यह कम नहीं है। यह उन्हीं के लिए बना है।

जो बीमार हैं, वे सिर्फ़ साँस करेंगे।

बच्चे जो चाहें करें। उनके लिए यह खेल है, और उनका हँसना उस कमरे की सबसे क़ीमती चीज़ है।

और उस दिन क्या, जब कोई नहीं आता?

जो आया है वह कर ले, और किसी को कुछ न कहे। जिस दिन एक आदमी अकेला करता है, उस दिन भी घर का समय बचा रहता है। जिस दिन शिकायत होती है, उस दिन समय टूट जाता है।

और छूट जाए तो हिसाब मत लगाइए।

कल वही कोना, वही समय।

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