संग · तीसरा द्वार
हर घर में वह दिन आता है जब वह फिर लेता है। उसके बाद के एक घंटे में यह घर जो करता है, उससे अगले दो साल तय होते हैं। और वह एक घंटा या तो पहले से तय होता है, या ग़ुस्से में तय होता है।
वह दिन आएगा।
यह डराने के लिए नहीं कहा जा रहा। यह इसलिए कहा जा रहा है कि उसकी तैयारी हो सके।
फिर लेना इस इलाज की नाकामी नहीं है।
वह इस इलाज की सबसे आम घटना है। जो घर यह पहले से जानता है, वह उस दिन टूटता नहीं। जो नहीं जानता, वह उसी दिन सब बंद कर देता है।
तो उस दिन का फ़ैसला आज कर लीजिए, जब घर शांत है।
और उसे ज़ोर से कह दीजिए, सबके सामने, उसके सामने भी।
फ़ैसला यह है: वह लौटकर आएगा, और उसी शाम वही दस मिनट फिर शुरू होंगे। बस इतना। न सज़ा, न घर से निकाला, न बहिष्कार, न वह लंबी चुप्पी जो हफ़्तों चलती है।
और यह भी तय कर लीजिए कि उस दिन क्या नहीं होगा।
उस दिन कोई हिसाब नहीं गिना जाएगा। “इतने दिन ख़राब कर दिए” वाला वाक्य उस दिन का सबसे महँगा वाक्य है, क्योंकि वही उसे यह बताता है कि अब लौटने की कोई जगह नहीं बची।
अब वह बात जो इस पूरे द्वार की जड़ है।
जो चीज़ बनी थी, वह उस दिन मिटी नहीं। जब यह नापा गया, तो बीच में मौक़ा छूट जाने से बनी हुई चीज़ पीछे नहीं गई। वह ठहरी, और अगले दिन से फिर चली।
इसीलिए इस घर में कोई गिनती नहीं है।
जिसमें गिनती है, उसमें एक दिन टूटता है।
और यहाँ टूटने के लिए कुछ है ही नहीं।