जटिलता · नींद
अफ़ीम नींद छीनती नहीं। वह नींद की सबसे गहरी परत छीनती है, और वह परत रात में नहीं, दिन में बनती है। रात का काम बस दरवाज़ा खोलना है।
आदमी कहता है कि नशे से नींद आती है। एक हद तक वह ठीक कह रहा है। आँख लग जाती है।
पर सुबह उठकर लगता है कि सोया ही नहीं। यह उसकी कल्पना नहीं है। नींद की सबसे गहरी परत, जिसमें शरीर की मरम्मत होती है, अफ़ीम पर घट जाती है। और नशा छूटने के बाद भी वह कुछ समय घटी रहती है।
उस परत को रात में बुलाया नहीं जा सकता। वह दिन में बनती है: जितना शरीर दिन में जागकर काम करता है, उतनी गहरी नींद की ज़रूरत जमा होती है। रात को बस यह करना है कि शरीर की चौकसी उतर जाए, ताकि जो जमा हुआ है वह भीतर आ सके।
इसलिए इस तकलीफ़ के दो जवाब हैं, एक दिन में, एक रात में।
दोनों रातें बराबर लंबी हैं। एक में मरम्मत होती है और दूसरी में नहीं। यही वजह है कि आदमी आठ घंटे बाद भी थका हुआ उठता है।
वह जागा हुआ है दो बज चुके हैं। शरीर थका है, और फिर भी नींद नहीं आती। वह करवट बदलता है, फिर बदलता है।
वह घड़ी देखता है अब हिसाब शुरू होता है। अगर अभी सो गया तो चार घंटे मिलेंगे। फिर साढ़े तीन। हिसाब उसे और जगाता है।
उसे एक बात याद आती है शाम को कहा गया था: नींद को बुलाना नहीं है। बस सीधे लेट जाइए, एक हाथ पेट पर, एक छाती पर।
वह लेट जाता है साँस नीचे से भरती है। पहले पेट उठता है, फिर छाती, फिर हंसली। फिर वह ऊपर से ख़ाली होती है, और छोड़ी जाने वाली साँस भरी जाने वाली से लंबी है।
दस साँसें वह गिनता है। दसवीं के बाद गिनती छोड़ देता है। नींद नहीं आई। उसे कहा भी नहीं गया था कि आएगी।
दिन में सुबह नौवाँ समूह था: कूल्हे उठे, फिर और ऊँचे, फिर शरीर कंधों पर खड़ा हुआ, और उन्हीं क़दमों से नीचे आया। आख़िर में वह पीठ के बल लेटा रहा। उसने इसे नींद से नहीं जोड़ा।
किसी रात किसी रात उसे पता नहीं चलता कि वह कब सो गया। अगली सुबह वह यह भी नहीं बता पाता कि उसने आख़िरी बार घड़ी कब देखी थी।
गहरी नींद के लिए सबसे ज़्यादा काम किस समय होता है?
नशा छूटने के बाद भी गहरी नींद कुछ समय तक कम रहती है। नशा छोड़ चुके अफ़ीम पर निर्भर पुरुषों की नींद रात भर मशीनों से नापी गई और उतनी ही उम्र के स्वस्थ पुरुषों से मिलाई गई। फ़र्क़ नशा छूटने के बाद भी मिला, और वह ज़्यादातर गैर-सपनों वाली परतों में था। यानी जो सुधार धीरे आता है, वह आदमी का दोष नहीं।
एक शोध में दिन में दो बार किया गया अभ्यास अगली रात की गहरी नींद बढ़ा गया। बेंगलुरु में स्वस्थ पुरुषों ने एक दिन आसनों और बीच-बीच में पीठ के बल आराम का एक क्रम दो बार किया, और दूसरे दिन उतनी ही देर सिर्फ़ लेटे रहे। अभ्यास वाले दिन के बाद की रात गहरी नींद ज़्यादा थी और बीच में जागना कम।
धीमी साँस सोने से पहले की गई, तो नींद जल्दी आई। अनिद्रा वाले लोगों ने सोने से पहले बीस मिनट धीमी, नपी हुई साँस ली। नींद आने का समय घटा, और रात में जागना घटा।
अगर घर में कोई कहता है कि सोते हुए साँस रुकती है, या ज़ोर से खर्राटे के बीच लंबी चुप्पी आती है, या दिन में बैठे-बैठे नींद आ जाती है, तो यह डॉक्टर को बताने की बात है।
अफ़ीम के साथ नींद में साँस का रुकना आम है: मेथाडोन पर स्थिर चल रहे लगभग 30% लोगों में ऐसा मिला है। यह अभ्यास से ठीक होने वाली चीज़ नहीं है, और इसे अभ्यास पर छोड़ना ग़लत होगा।
और एक बात जो साथ रखने लायक़ है: एक आदमी में, जिसकी नींद में साँस अफ़ीम की वजह से रुकती थी, नशा छूटने के बाद दोबारा जाँच में यह दिखा ही नहीं।