जटिलता · ताक़त और हड्डी
अफ़ीम ऊपर से आने वाले आदेश, टेस्टोस्टेरोन, को दिमाग़ में रोक लेती है। पर मांसपेशी और हड्डी एक दूसरा आदेश भी सुनती हैं, बोझ, और वह नीचे से, शरीर के अपने वज़न से आता है। उसके रास्ते में दवा कभी खड़ी नहीं हुई।
आदमी कहता है कि शरीर में कोई ताक़त नहीं बची। जो वह महसूस कर रहा है, वह सच है।
जाँच में अक्सर टेस्टोस्टेरोन कम मिलता है, और साथ में वे हार्मोन भी जो अंडकोष को आदेश देते हैं। यानी अंडकोष ठीक है। आदेश ऊपर, दिमाग़ में रुका हुआ है। अफ़ीम वहीं बैठती है।
पर मांसपेशी सिर्फ़ ऊपर के आदेश पर नहीं चलती। वह एक दूसरा आदेश भी सुनती है, बोझ, और वह नीचे से आता है: ज़मीन से, शरीर के अपने वज़न से। उसके रास्ते में दवा कभी खड़ी नहीं हुई।
और ऊपर वाला आदेश भी हमेशा के लिए नहीं रुकता। जो लोग सालों तक अफ़ीम से बाहर रहे, उनमें से लगभग सब में वह चलता हुआ मिला।
यह चित्र एक विचार का है, नाप का नहीं। मांसपेशी की मोटाई कोई संख्या नहीं बताती। जो बात यह बताता है वह इतनी है: नीचे वाला आदेश ऊपर वाले का इंतज़ार नहीं करता।
वह उठता है ज़मीन से उठते हुए वह एक हाथ घुटने पर रखकर ज़ोर लगाता है। सालों से ऐसा ही करता आया है, बिना ध्यान दिए।
उसका हिसाब उसे लगता है कि ताक़त अब किसी दवा से ही आएगी। और दवा का नाम सुनते ही उसे वही एक दवा याद आती है।
एक पैर आगे चौथा समूह। हाथों और घुटनों से एक पैर दोनों हाथों के बीच आगे आता है। फिर साँस छोड़ते हुए पिछला घुटना ज़मीन से उठता है। अब पूरा शरीर उस एक अगले पैर पर है।
काँपन जाँघ काँपती है। उससे कहा जाता है: यहीं थोड़ा ठहरिए। फिर पिछला घुटना ज़मीन पर, धड़ सीधा, और आराम। काँपन में कुछ ग़लत नहीं है।
बाँहों पर किसी और दिन छठा समूह। शरीर एक सीधी रेखा में, फिर कोहनियाँ मुड़ती हैं और वह ज़मीन से ज़रा ऊपर उतरता है। बाँहें भी काँपती हैं। थोड़ा ठहरना, फिर सब नीचे।
कुछ हफ़्तों बाद वह अब भी कई बार घुटने पर हाथ रखकर उठता है। पर किसी-किसी सुबह हाथ की ज़रूरत नहीं पड़ती। हर सुबह नहीं।
जिन पुरुषों का टेस्टोस्टेरोन इलाज के लिए जानबूझकर बंद किया गया था, क्या प्रशिक्षण से उनकी ताक़त बढ़ी?
यह आलस नहीं है। ईरान के एक बड़े अध्ययन में अफ़ीम लेने वालों में मांसपेशी कम होना ज़्यादा आम मिला, उनमें भी जो उतने ही चलते-फिरते थे और उतना ही प्रोटीन खाते थे। पुरुषों में यह साफ़ था।
हल्का बोझ भी उतनी ही मांसपेशी बनाता है, अगर उसे आख़िरी उठान तक ले जाया जाए। अध्ययनों को मिलाकर देखा गया: हल्के वज़न को थकान तक उठाने पर मांसपेशी उतनी ही बढ़ी जितनी भारी वज़न से। एक बार में सबसे भारी उठाने की ताक़त भारी वज़न से ज़्यादा बढ़ी।
व्यायाम के बाद हार्मोन का उछाल मांसपेशी नहीं बनाता। एक प्रयोग में एक बाँह को उन दिनों प्रशिक्षित किया गया जब टाँगों की भारी कसरत से हार्मोन ऊपर थे, और दूसरी को उन दिनों जब नहीं थे। पंद्रह हफ़्ते बाद दोनों बाँहें बराबर बढ़ी थीं।