जटिलता · पहले दिन: छोड़ने की बीमारी
जम्हाई, बहती नाक, रोंगटे, हड्डियों में दर्द, मरोड़ती और दौड़ती आँत, तेज़ दिल, और नींद नहीं। इसमें कुछ भी शरीर का टूटना नहीं। बरसों शरीर दवा के सामने ज़ोर लगाए खड़ा रहा, उलटी ओर, ताकि वह बराबर रहे; दवा हटी, तो उस ज़ोर के सामने कुछ नहीं, और कुछ दिन वह आगे झूल जाता है। हर लक्षण दवा का अपना काम है, उलटा होकर, और हर एक उसका अपना तंत्र है जो पूरे समय वहीं था। शिविर उस ज़ोर को जाने की जगह देता है: सुबह हरकत, दिल के बैठने तक शवासन, शाम को सूक्ष्म अभ्यास, और सोने से पहले चुप्पी।
आख़िरी ख़ुराक के बाद यह आता है, अफ़ीम में हेरोइन से धीमा: एक जम्हाई जो रुकती नहीं, नाक और आँखें बहती हुईं, त्वचा पर रोंगटे, हड्डियों में दर्द, आँत मरोड़ती और ढीली होती, दिल दौड़ता, और रात जिसमें नींद नहीं। उसे बताया गया है कि यह दवा की सज़ा है, या उसकी अपनी कमज़ोरी दिख रही है।
यह दोनों में से कुछ नहीं। बरसों शरीर ने एक अद्भुत काम किया: वह दवा के सामने झुककर नहीं, ज़ोर लगाकर खड़ा रहा। दवा ने आँत धीमी की, तो शरीर ने उसे चलाने का ज़ोर लगाया; दवा ने चौकसी चुप की, तो शरीर ने चौकसी ऊँची की; दवा ने दर्द दबाया, तो शरीर ने उसे तेज़ किया, जब तक दोनों बराबर न हो गए और वह साधारण महसूस करने लगा। वह ज़ोर उसके शरीर की अपनी ताक़त थी, बरसों दिन-रात लगी हुई।
दवा हटाइए, और उस ज़ोर के सामने कुछ नहीं। इसलिए कुछ दिन वह आगे झूल जाता है, जैसे एक छोटा पेड़ जिसे रस्सी से झुकाकर बाँधा गया हो, रस्सी खुलते ही सीधे से आगे निकल जाता है। जो आँत रुकी थी, अब दौड़ती है; जो पुतलियाँ सिकुड़ी थीं, फैलती हैं; जो चौकसी चुप थी, दिल दौड़ाती और पसीना लाती है; जो दर्द दबा था, हड्डियों में उठता है; जो ऊँघ थी, रात की जाग बनती है। हर लक्षण दवा का अपना काम है, उलटा होकर।
और झूलता पेड़ बैठ जाता है। कच्ची अफ़ीम छोड़ने वालों में बीमारी दूसरे से चौथे दिन सबसे ऊँची मिली, और आम तौर पर हेरोइन से हल्की। उसमें कुछ खोया नहीं; इनमें से हर एक उसका अपना तंत्र है, कुछ दिन ऊँचा, अपनी जगह ढूँढ़ता हुआ। इसलिए शिविर झूले से नहीं लड़ता। वह ज़ोर को जाने की जगह देता है: सुबह रेखा-गति, और जितनी हरकत आज शरीर दे; दिल के बैठने तक शवासन; शाम को सूक्ष्म अभ्यास; और सोने से पहले चुप्पी।
बरसों का ज़ोर, रस्सी खुलना, और खड़ा होना। यह विचार का चित्र है, नाप नहीं।
दूसरी रात है। हड्डियाँ दुख रही हैं, टाँगें टिकती नहीं, और नींद नहीं आती। वह क्या करे?
अफ़ीम छोड़ना आम तौर पर हेरोइन से हल्का है। ईरान, भारत और थाईलैंड के तेरह प्रयोगों की एक समीक्षा लिखती है कि कच्ची अफ़ीम पर निर्भरता आम तौर पर हल्की होती है और उसका छोड़ना भी, और वह दूसरे से चौथे दिन सबसे ऊँचा होता है।
जितना बुरा सोचा, उतना बुरा लगा। धीरे-धीरे दवा घटाते लोगों में, जहाँ न उन्हें पता था न देखने वालों को कि किसे क्या मिला, छोड़ने की बीमारी कितनी भारी होगी, इसका सबसे पक्का संकेत यह निकला कि उन्होंने उसे कितना भारी सोचा था। इसलिए नहीं कि वह झूठी है: डर उसी चौकसी पर चलता है।
रात की साँस लौट आई। लंबे समय से दर्द की ओपिऑइड दवा लेते 18 लोगों से दवा छुड़ाई गई। नींद में साँस के रुकने घंटे में लगभग 41 से घटकर 17 रह गए, और आधों में जो साँस का अपने-आप रुकना था, वह चला गया। साँस का अपना ज़ोर कहीं गया नहीं था।
दूसरी सुबह वह खड़ा नहीं रह पाता। टाँगें अपने-आप चलना चाहती हैं, और हाथ काँपते हैं। सिखाने वाला ज़मीन पर एक सीधी लकीर दिखाता है और बस इतना कहता है: एड़ी से उँगली, आँखें सामने।
लकीर पर पहले दस क़दम टेढ़े। फिर आँखें सामने टिकती हैं, और पैर लकीर ढूँढ़ लेते हैं। पचास आगे, पचास पीछे। टाँगों को कुछ करने को मिल गया।
शवासन दिल अब भी धड़क रहा है, कान में सुनाई देता हुआ। वह पीठ के बल, पैर खुले, हथेलियाँ ऊपर। पंजे भारी, पिंडलियाँ भारी, फिर पीठ। कुछ देर में धड़कन कान से उतरकर छाती में आ जाती है।
शाम सूक्ष्म अभ्यास, धीमे: आँखें, गर्दन, उँगलियाँ, टख़ने। कोई जल्दी नहीं। खाना चुपचाप। फिर दूसरों के साथ तारों के नीचे धीमी सैर, कोई कुछ नहीं बोलता।
रात दो घंटे की नींद। वह जागता है और उसे खोई हुई रात नहीं गिनता; दो घंटे गिनता है।
पाँचवाँ दिन उस सुबह एक नया आदमी आया है, जो खड़ा नहीं रह पाता। वह उसे ज़मीन की लकीर दिखाता है। एड़ी से उँगली, वह कहता है। आँखें सामने।