जब तलब उठे
बैठिए · उसे शरीर में ढूँढ़िए
जहाँ हैं वहीं बैठ जाइए। आँखें खुली या बंद, जैसे आसान हो।
ढूँढ़िए कि वह शरीर में कहाँ है: छाती में कसाव, मुँह में पानी, हाथों में बेचैनी, पेट में कुछ। बस जानिए; उसे धकेलिए मत।
इस सूची में कुछ भी ग़लत नहीं किया जा सकता।
योगिक श्वास · बाहर की साँस लंबी
पूरी साँस, पहला स्तर: चार भीतर, छह बाहर। नीचे से भरिए, ऊपर से ख़ाली। कहीं रोकिए मत।
गिनती आसान न लगे, तो बस बाहर की साँस को भीतर से थोड़ा लंबा होने दीजिए। जब तक लहर रहे।
खोलिएअगर शरीर बैठने न दे · हृद्-गति
पहले चरण की इंजन दौड़, पंजों पर, कुछ मिनट; या बाहर तेज़ चलना। धीमे नहीं: तलब मध्यम और तेज़ हरकत से ज़्यादा घटी।
जब टाँगें बैठें, बैठिए, और फिर लंबी बाहर की साँस।
खोलिएअगर तस्वीर सामने हो · त्राटक की आँखें
तस्वीर को आने दीजिए; जितनी साफ़ है, उतनी रहने दीजिए।
सिर स्थिर, सिर्फ़ आँखें, धीरे, तस्वीर मन में ही: ऊपर और नीचे, कुछ बार; दाएँ और बाएँ, कुछ बार; फिर दोनों तिरछे, कोने से कोने।
फिर हथेलियाँ आँखों पर, गरम। फिर एक नज़र तस्वीर पर: उतनी ही चमकीली? उतनी ही पास? खिंचाव?
फिर आँखें बंद, और भौंहों के बीच लौ की छाप; दीया पास हो तो पहले उसे थोड़ी देर देखिए, न हो तो पिछले त्राटक की याद की लौ। फिर लंबी बाहर की साँस। सब पाँच मिनट से कम।
सिर्फ़ उस तलब के लिए जो आ चुकी है; अभ्यास के लिए कभी तलब मत जगाइए। यह हमारा अनुमान है, जिसे अभी नापा जाना है: चाहें तो कॉपी में दो अंक, 0 से 10, कितनी चमक, कितना ज़ोर, पहले और बाद।
सुबह
दूसरा समूह · लहर, लय में
हर हरकत एक साँस पर। समूह उठता है, एक शिखर तक जाता है, और उन्हीं क़दमों से लौटता है: वही आकार जो तलब का है, शरीर से किया हुआ।
समूह शुरू कीजिए · लयदिन में
MSRT · दोपहर के खाने से पहले, और दोपहर बाद
बैठकर, आँखें बंद: अ, उ, म और पूरा ॐ, ज़ोर से, उनकी गूँज शरीर में महसूस करते हुए; फिर वही मन में। शिविर में सिखाई जाती है; इसका मार्गदर्शन आगे जोड़ा जाएगा।
शिविर में सिखाया जाता है · मार्गदर्शन आगेशाम
रात, सोने से पहले
शवासन में पूरी साँस
पीठ के बल, एक हाथ पेट पर, एक छाती पर।
नीचे से भरिए: पेट, छाती, हंसली। ऊपर से ख़ाली कीजिए, और बाहर की साँस को लंबी रहने दीजिए। कहीं रोकिए मत।
दस साँसें, फिर बस लेटे रहिए।
घर पर
घर पर
अपने इशारे पहचानिए: कौन-सी गंध, कौन-सी जगह, कौन-सा पहर। उस पहर के लिए साँस पहले से रखिए।
घर में किसी एक को बता दीजिए कि जब आप अचानक बैठ जाएँ और आँखें चलाएँ, तो वह क्या है। उसे कुछ करना नहीं है; बस जानना है।
तलब के साथ ख़ुद को नुक़सान पहुँचाने के ख़याल आएँ, तो उसी दिन किसी के पास जाइए: शिविर के किसी साथी के पास, या डॉक्टर के पास।
यह क्रम क्यों
तलब एक ख़याल से शुरू होकर तस्वीरों में बढ़ती है, जो मन के एक छोटे कमरे में रहती हैं; आँखों का एक काम उस कमरे की जगह लेता है, और तस्वीर की चमक और खिंचाव घटे। लंबी बाहर की साँस और योगिक साँस से तलब घटी, और हरकत से, मध्यम और तेज़ से ज़्यादा। कि त्राटक की हरकतें यही करती हैं, यह हमारा अनुमान है, जब तक नापा जाए।
शुरू करने से पहले
अपनी सुविधा के भीतर ही कीजिए। ज़रा भी दर्द हो तो रुक जाइए। यह इलाज का साथ देता है, उसकी जगह नहीं लेता; जो ब्यूप्रेनॉर्फ़िन या मेथाडोन पर है, वह उस पर बना रहे।
जब तक अफ़ीम चल रही है, हर बार साँस रोकना छोटा रखिए।
पत्र · श्रीअरविन्द का एक पत्र
एक शिष्य को; पत्र यह नहीं बताता कि किसे।
श्रीअरविन्द ने यह पत्र अंग्रेज़ी में लिखा था, और यहाँ यह उन्हीं के शब्दों में है। आश्रम का हिन्दी अनुवाद अभी हमारे पास नहीं है, और उनके शब्दों का अनुवाद हम स्वयं नहीं करते।
The habit in the physical is obstinate and seems unchangeable because it always recurs — even when one thinks it is gone. But it is not really unchangeable; if the physical mind detaches itself, stands separate, refuses to accept it, then the habit in the physical begins to lose its force of repetition. Sometimes it goes slowly, sometimes (but this is less frequent) it stops suddenly and recurs no more.
श्रीअरविन्द, Letters on Yoga IV (संपूर्ण ग्रंथावली, खंड ३१), पृष्ठ ४०४
यह यहाँ क्यों है
यह पन्ना तस्वीर को आने देता है और आँखों को दूसरा काम देता है, ताकि वह उससे अलग खड़ा रहे। पत्र बताता है कि इससे क्या होता है: आदत की दोहराने की ताक़त घटने लगती है। और वह कहता है कि आदत तब भी लौटती है जब लगे कि वह जा चुकी, इसलिए उसका लौटना कोई फ़ैसला नहीं है। यह पढ़ना हमारा है।