गायत्री
गायत्री
ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
जो सबको चलाता है, उसी प्रकाश से यह प्रार्थना कि बुद्धि चल पड़े।
यही क्यों
यह कुछ माँगने की प्रार्थना नहीं है। ध्यान से पढ़िये तो एक ही बात माँगी गई है: बुद्धि चल पड़े। धियो यो नः प्रचोदयात्।
निर्भरता आदमी की समझ नहीं छीनती। उसे रोक देती है। जो हो रहा है वह उसे दिखता है, अक्सर आसपास के लोगों से भी साफ, और देखने से करने तक वह पहुँच नहीं पाता। यही दूरी पूरी बीमारी है।
इसलिये यह मंत्र और कुछ नहीं, उसी रुकी हुई शक्ति के चलने की प्रार्थना करता है। और वह सूर्य से करता है, जो एक दिन भी नहीं रुका।
वाचिक: एक साँस छोड़ने भर की लंबाई में, बोलकर। अक्षर साथ-साथ जलते हैं। उपांशु: होंठ हिलते हैं, साँस उसे उठाती है, कमरे में कोई और नहीं सुनता। मंत्र पर्दे पर रहता है, पर हिलता नहीं। मानस: कुछ कहा नहीं जाता, कुछ दिखाया नहीं जाता। केवल साँस और गिनती। अन्तर्यात्रा: एक माला जो अपने आप भीतर की ओर जाती है। पहला तिहाई बोलकर, दूसरा फुसफुसाकर, आख़िरी मन में। आवाज़ कमरे से अपने आप चली जाती है, आपको तय नहीं करना पड़ता।
कितनी बार
गिनती आमतौर पर एक सौ आठ होती है, और वहीं से शुरू करना ज़रूरी नहीं। ग्यारह भी पूरा जप है।
किस तरह
यही परंपरा का क्रम है, और यह स्तरों की सीढ़ी नहीं, भीतर की ओर लौटना है। यहाँ कुछ भी बंद नहीं है। आज आप जिस पायदान पर हैं, वहीं खड़े रहिये।