चौथा चरण · प्राणायाम

साँस, एक औज़ार की तरह

इस साइट पर दो अभ्यास मौजूद हैं, और उन्हें समझाने वाले सत्र भी। बाक़ी जैसे-जैसे लिखे जाएँगे, यहीं इसी रूप में जुड़ते जाएँगे।

the fruit that comes away from the stem

महामृत्युञ्जय

महामृत्युञ्जय

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

जैसे पका फल डंठल से अपने आप छूट जाता है, वैसे ही बंधन से छूटूँ, जीवन से नहीं।

यही क्यों

पूरा मंत्र एक ही चित्र पर टिका है। उर्वारुकमिव बन्धनात्। जैसे ककड़ी अपने डंठल से।

पके फल को कोई खींचकर नहीं तोड़ता। वह पूरे समय पकता रहा, और अंत में डंठल स्वयं छोड़ देता है। छूटने में फल को चोट नहीं लगती, क्योंकि छूटना पकने से आया, ज़ोर से नहीं। आदमी को छोड़ने का जो तरीका आमतौर पर बताया जाता है, वह इसका उल्टा है: काटो, लड़ो, खुद को खींचकर अलग करो, और घाव बनकर रहो।

और फिर अंतिम तीन शब्द, जिन्हें लोग उद्धरण में छोड़ देते हैं। मा अमृतात्। जीवन से नहीं। बंधन से छुड़ाइये, जीने से नहीं। यह किसी ओर से भागने की नहीं, किसी ओर जाने की प्रार्थना है, और यही इस प्रशिक्षण की पूरी दृष्टि है।

शरीर जब छूटने की पीड़ा में हो, यह मंत्र उसी के लिये है, और बहुत लंबे समय से इसी कारण लिया जाता रहा है।

वाचिक: एक साँस छोड़ने भर की लंबाई में, बोलकर। अक्षर साथ-साथ जलते हैं। उपांशु: होंठ हिलते हैं, साँस उसे उठाती है, कमरे में कोई और नहीं सुनता। मंत्र पर्दे पर रहता है, पर हिलता नहीं। मानस: कुछ कहा नहीं जाता, कुछ दिखाया नहीं जाता। केवल साँस और गिनती। अन्तर्यात्रा: एक माला जो अपने आप भीतर की ओर जाती है। पहला तिहाई बोलकर, दूसरा फुसफुसाकर, आख़िरी मन में। आवाज़ कमरे से अपने आप चली जाती है, आपको तय नहीं करना पड़ता।

कितनी बार

परंपरा में यह कई दिनों तक सैकड़ों और हज़ारों में गिना जाता है। यहाँ: जितना बिना जल्दबाज़ी के हो सके।

किस तरह

यही परंपरा का क्रम है, और यह स्तरों की सीढ़ी नहीं, भीतर की ओर लौटना है। यहाँ कुछ भी बंद नहीं है। आज आप जिस पायदान पर हैं, वहीं खड़े रहिये।

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