महामृत्युञ्जय
भयानक · डर, घबराहट
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
जैसे पकी ककड़ी अपने डंठल से अपने आप छूट जाती है, वैसे ही मैं मृत्यु से छूटूँ, अमृत से नहीं।
यही क्यों
डर वह शरीर है जो किसी चीज़ से खींचकर अलग किये जाने के ख़िलाफ़ तना हुआ है। यह मंत्र उस बिछड़ने का एक ही चित्र रखता है जिसमें कुछ नहीं फटता: पका फल और उसका डंठल। इसीलिये यहाँ यह डर का जप है, और इसलिये भी कि यह मा अमृतात् पर रुकता है, अमृत से नहीं।
पूरा मंत्र एक ही चित्र पर टिका है। उर्वारुकमिव बन्धनात्। जैसे ककड़ी अपने डंठल से।
पके फल को कोई खींचकर नहीं तोड़ता। वह पूरे समय पकता रहा, और अंत में डंठल स्वयं छोड़ देता है। छूटने में फल को चोट नहीं लगती, क्योंकि छूटना पकने से आया, ज़ोर से नहीं। आदमी को छोड़ने का जो तरीका आमतौर पर बताया जाता है, वह इसका उल्टा है: काटो, लड़ो, खुद को खींचकर अलग करो, और घाव बनकर रहो।
और फिर अंतिम दो शब्द, जिन्हें उद्धरण में अक्सर छोड़ दिया जाता है। मा अमृतात्। अमृत से नहीं। मृत्यु से छुड़ाइये, उससे नहीं जो कभी नहीं मरता। यह केवल किसी ओर से भागने की नहीं, किसी ओर जाने की प्रार्थना है, और यही इस प्रशिक्षण की पूरी दृष्टि है।
शरीर जब छूटने की पीड़ा में हो, यह मंत्र उसी के लिये है। यह बहुत समय से रोग में और मृत्यु के डर में कहा जाता रहा है।
जिन कठिनाइयों में यह साथ देता है: पहले दिन · रोग-प्रतिरोध · भारी मन
वाचिक: एक साँस छोड़ने भर की लंबाई में, बोलकर। अक्षर साथ-साथ जलते हैं। उपांशु: होंठ हिलते हैं, साँस उसे उठाती है, कमरे में कोई और नहीं सुनता। रोशनी हर पंक्ति में अपने रंग में चलती है, जैसे बोलकर। मानस: कुछ कहा नहीं जाता। शब्द धुँधले हो जाते हैं, रोशनी फिर भी उनमें चलती है, और उनका अर्थ रहता है, साँस और मनकों के साथ। अन्तर्यात्रा: एक माला जो अपने आप भीतर की ओर जाती है। पहला तिहाई बोलकर, दूसरा फुसफुसाकर, आख़िरी मन में। आवाज़ कमरे से अपने आप चली जाती है, आपको तय नहीं करना पड़ता।
कितनी बार
परंपरा में यह कई दिनों तक सैकड़ों और हज़ारों में गिना जाता है। यहाँ: जितना बिना जल्दबाज़ी के हो सके।
किस तरह
यही परंपरा का क्रम है, और यह स्तरों की सीढ़ी नहीं, भीतर की ओर लौटना है। यहाँ कुछ भी बंद नहीं है। आज आप जिस पायदान पर हैं, वहीं खड़े रहिये।