चाहो तो आँखें बंद। न कुछ रिकॉर्ड होता है, न कहीं भेजा जाता है। जब तक यह चलता है, स्क्रीन जली रहती है।
कैसे चलता है
- जहाँ हो वहीं बैठो। आँखें खुली या बंद।
- जो सुनाई देता है। जो तुम्हें छूता है। जो दिखता है। मुँह का स्वाद। हवा की गन्ध। हर एक पर छुओ।
- पाँचों एक साथ। मन किसी एक को पकड़ लेगा: बाक़ी को धीरे से वापस लाओ। छुओ।
- अब पाँचों को साथ साथ फैलने दो: ध्वनि आकाश में, स्पर्श हवा में, दृष्टि रोशनी में, स्वाद जल में, गन्ध धरती में। हर एक पर छुओ।
- कोई किनारा नहीं। उसी में रहो। दबाए रखो, और यह मौन है।
- जब तैयार हो, फिर दबाए रखो। हर पड़ाव से होकर लौटो, उसी रास्ते से, अपने पास की पाँचों तक।
- तुम लौट आए। उठने से पहले एक पल बैठो।
पाँचों यात्राओं के बाद, पहले नहीं: हर इन्द्रिय को फैलाना तब आसान है जब उसके साथ अकेले चला जा चुका हो। कुछ बंद नहीं है।
सावधानी
- वापसी का रास्ता हमेशा एक बार दबाए रखने जितना दूर है, या ऊपर का बटन: यह तुम्हें कभी बीच में नहीं छोड़ता।
- अगर कोई एक इन्द्रिय तुम्हारे लिए शांत है, तो रहने दो: चार, या तीन, अपने आप में पूरा अभ्यास हैं।
- अगर मौन से डर लगे, तो आँखें खोलो और लौट आओ। वह भी अभ्यास का हिस्सा है।
श्रीअरविन्द ने एक साधक को लिखा, जिसे एकाग्रता में आए ख़ालीपन से डर लगता था:
Consciousness is not dissolved; it is the limits of the consciousness that are dissolved.चेतना मिटती नहीं; मिटती हैं चेतना की सीमाएँ।
Letters on Yoga III, CWSA 30, पृ. २७६
यह कहाँ से आया
श्रीअरविन्द की बहुविध एकाग्रता (A System of National Education, १९१०), लौटने वाली एक यात्रा बनाई गई, अपने से पहले की पाँचों की तरह। हर इन्द्रिय का अपने तत्त्व से होकर फैलना गीता ७.८ और ७.९ की उनकी व्याख्या पर चलता है। यह रूप हमारा है।
इसे परखा नहीं गया है। हम इससे कोई परिणाम होने का दावा नहीं करते।
श्रीअरविन्द, A System of National Education (1910) में, यह कहने के बाद कि मन एक चीज़ को पकड़ लेता है और बाक़ी को धुँधला सा देखता है:
Yet this can be remedied and the attention equally distributed over a set of circumstances in such a way as to observe and remember each perfectly. It is merely a matter of abhyasa or steady natural practice.फिर भी इसका उपाय है, और ध्यान को कई बातों पर बराबर इस तरह बाँटा जा सकता है कि हर एक को पूरी तरह देखा और याद रखा जाए। यह बस अभ्यास की बात है, स्थिर और स्वाभाविक अभ्यास की।
Early Cultural Writings, CWSA 1, पृ. ४०३
श्रीअरविन्द, अपने Essays on the Gita में गीता ७.८ और ९ पढ़ते हुए:
“I am taste in the waters, sound in ether, scent in earth, energy of light in fire,” and, it may be added for more completeness, touch or contact in air.“मैं जल में रस हूँ, आकाश में शब्द, पृथ्वी में गन्ध, अग्नि में प्रकाश की शक्ति,” और, अधिक पूर्णता के लिए जोड़ा जा सकता है, वायु में स्पर्श या संपर्क।
Essays on the Gita, CWSA 19, पृ. २७२