चौथा चरण · प्राणायाम

साँस, एक औज़ार की तरह

इस साइट पर दो अभ्यास मौजूद हैं, और उन्हें समझाने वाले सत्र भी। बाक़ी जैसे-जैसे लिखे जाएँगे, यहीं इसी रूप में जुड़ते जाएँगे।

Sri Aurobindo, 1909

दुर्गास्तोत्र

दुर्गास्तोत्र

चौदह अनुच्छेद, दुर्गा रूप में माँ से प्रार्थना कि वे आएँ: धरती में, और प्रार्थना करने वाले के भीतर।

यही क्यों

श्रीअरविन्द ने इसे बंगला में लिखा, धर्म पत्रिका में, १८ अक्टूबर १९०९ को, बंगाल के युवकों के लिये। यहाँ यह उस रूप में है जिसमें आज पढ़ा जाता है, भारत के नाम से। संस्कृत: चिन्मयी माहेश्वरी (श्री अरविन्द सोसाइटी)। हिन्दी अनुवाद। अंग्रेज़ी: नलिनीकान्त गुप्त (अंग्रेज़ी में छठा अनुच्छेद नहीं है)।

वाचिक: एक पंक्ति, एक साँस। अक्षर साथ जलते हैं। उपांशु: होंठ हिलते हैं, कोई और नहीं सुनता। पाठ पर्दे पर रहता है, हिलता नहीं। मानस: कुछ कहा नहीं, कुछ दिखाया नहीं। साँस और जगह। अन्तर्यात्रा: पहला तिहाई बोलकर, दूसरा फुसफुसाकर, आख़िरी मन में।

किस भाषा में

किस तरह

परंपरा के तीन, और यह सीढ़ी नहीं, भीतर की ओर लौटना है।

कहीं भी रुक सकते हैं। पृष्ठ आपका श्लोक याद रखता है, केवल इसी उपकरण पर।

पूरा पाठ

1

ॐ मातर्दुर्गे! सिंहवाहिनि सर्वशक्तिप्रदायिनि मातः शिवप्रिये तव शक्त्यंशजा वयं भारतवर्षस्य युवानः त्वन्मन्दिरे समासीनाः त्वां प्रार्थयामहे ॥ श‍ृणु मातः आविर्भव भारते वर्षे प्रकाशमाना भव ।

मात: दुर्गे ! सिंहवाहिनी सर्वशक्तिदायिनि मात: शिवप्रिये ! तुम्हारे शक्त्यंश से उत्पन्न हम भारत के युवकगण तुम्हारे मंदिर में आसीन हैं, प्रार्थना करते हैं,-सुनो मात:, भारत में आविर्भूत होओ, प्रकट होओ ।

2

मातर्दुर्गे! युगे युगे मानवीं तनुं धृत्वा जन्मनि जन्मनि तवैव कर्म कृत्वा च त्वदानन्दधाम प्रतियाम। एतर्ह्यपि जन्मजुषो वयं त्वदेककार्यव्रतिन एव श‍ृणु मातः आविर्भव भारते अस्मत्सहाया भव ॥

मात: दुर्गे ! युग-युग में मानव शरीर में अवतीर्ण हो जन्म-जन्मांतर में तुम्हारा ही कार्य कर तुम्हारे आनन्दधाम को लौट जाते हैं । इस बार भी जन्म ले तुम्हारे ही कार्यव्रती हैं हम, सुनो मात:, भारत में आविर्भूत होओ, हमारी सहायता करो ।

3

मातर्दुर्गे! सिंहवाहिनि त्रिशूलधारिणि वर्मावृतसुन्दरशरीरे मातः जयदायिनि त्वत्प्रतीक्षापरं ह्यद्य भारतं तामेव ते मङ्गलमयीं मूर्तिं वीक्षितुं समुत्सुकम् । श‍ृणु मातः प्रादुर्भव भारते वर्षे प्रकाशस्व ॥

मात: दुर्गे ! सिंहवाहिनी, त्रिशूलधारिणि, वर्म-आवृत-सुन्दर-शरीरे, मात: जयदायिनि ! भारत तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है, तुम्हारी वही मंगलमयी मूर्ति देखने के लिये उत्सुक है । सुनो मात:, भारत में आविर्भूत होओ, प्रकट होओ ।

4

मातर्दुर्गे! बलदायिनि प्रेमदायिनि ज्ञानदायिनि शक्तिस्वरूपे भीमे सौम्य-रौद्र-रूपे जीवन-सङ्घर्षे भारत-सङ्ग्रामे च त्वत्प्रेरिता योद्धारो वयम् । देहि मातः प्राणमनसोरसुरस्य शक्तिं असुरस्योद्यमं देहि मातः बुद्धिचित्तयोर्देवस्य चरित्रं देवस्य ज्ञानम् ॥

मात: दुर्गे ! बलदायिनि, प्रेमदायिनि, ज्ञानदायिनि, शक्तिस्वरूपिणि भीमे, सौम्य-रौद्र-रूपिणि ! जीवन-संग्राम में, भारत-संग्राम में तुम्हारे ही प्रेरित योद्धा हैं हम, दो मात:, प्राण में, मन में असुर की शक्ति, असुर का उद्यम दो और हृदय और बुद्धि में दो देवता का चरित्र, देवता का ज्ञान ।

5

मातर्दुर्गे! जगदग्रगण्या भारतजातिर्ननु समाच्छन्नासीन्निबिडतमसा । त्वं मातः उत्तरोत्तरं समुदीयसे व्योमप्रान्ते त्वद्दिव्यविग्रहस्य तिमिरविजयिना ज्योतिषा सञ्जात उषसः प्रकाशः प्रवितनुस्वालोकं मातः प्रविधुनु तिमिरम् ॥

मात: दुर्गे ! जगत्-श्रेष्ठ भारतजाति निविड़ तिमिर से आच्छन्न थी । तुम मात:, गगनप्रांत में धीरे-धीरे उदय हो रही हो, तुम्हारे स्वर्गीय शरीर की तिमिर-विनाशी आभा से उषा का प्रकाश हुआ है । आलोक-विस्तार करो, मात:, तिमिर का विनाश करो ।

6

मातर्दुर्गे! श्यामला सर्वसौन्दर्यसमलङ्कृता ज्ञान-प्रेम-शक्तीनां प्रतिष्ठा पुण्यभूमिर्ननु ते विभूतिः एतावत्कालं शक्तिसंहरणार्थं आत्मसंवरणमकार्षीत् । अध्यागतं तद्युगं आगतं तद्दिनं यदा सकलभुवनस्य भारं स्कन्धे वहन्ती समुत्तिष्ठति भारतमाता। एहि मातः प्रकाशस्व ॥

मात: दुर्गे ! श्यामला, सर्वसौन्दर्य-अलंकृता, ज्ञान-प्रेम-शक्ति का आधार भारतभूमि तुम्हारी विभूति है, इतने दिनों तक शक्ति-संवरण के लिये उसने आत्मगोपन किया था । आगामी युग में, आगामी दिनों में समस्त विश्व का भार कंधों पर ले भारतमाता उठ रही है, आओ मात:, प्रकट होओ ।

7

मातर्दुर्गे! तव सन्ततिर्वयं त्वत्प्रसादात् त्वत्प्रभावात् बृहतोवदानस्य महनीयभावस्य समुपयुक्ता स्याम । हे मातः क्षोदय क्षुद्रतां समुत्सारय स्वार्थं भञ्जय भयम् ॥

मात: दुर्गे! तुम्हारी सन्तान हम, तुम्हारे प्रसाद से, तुम्हारे प्रभाव से महत् कार्य के, महत् भाव के उपयुक्त हों । विनष्ट करो क्षुद्रता, विनष्ट करो स्वार्थ, विनष्ट करो भय ।

8

मातर्दुर्गे! कालीरूपिणि नृमुण्डमालिनि दिगम्बरे कृपाणपाणि देवि असुरविनाशिनि दारुणनिनादेन निषूदय रिपुदलमन्तरस्थं येन नैकोऽपि रिपुरस्मदन्तरे जीवितस्तिष्ठेत् येन च वयं विमला निर्मलाश्च स्याम इयमेव प्रार्थना मातः प्रकाशमाना भव ॥

मात: दुर्गे! कालीरूपिणी नृमुंडमालिनि दिगंबरि, कृपाणपाणि देवि असुरविनाशिनि ! क्रूरनिनाद से अंत:स्थ रिपुओं का विनाश करो । एक भी हमारे भीतर जीवित न रह जाये, हम विमल, निर्मल हो जायें, बस, यही प्रार्थना है मात:, प्रकट होओ ।

9

मातर्दुर्गे! स्वार्थेन भयेन क्षुद्राशयत्वेन म्रियमाणं खलु भारतम् । हे मातः विधेहि नो महतः महाप्रयासकृतः उदारचेतसः सत्यसङ्कल्पजुष येन नातःपरं स्याम स्वल्पाशंसिनः निश्चेष्टा अलसाः सन्त्रस्ताः वा ॥

मात: दुर्गे । स्वार्थ से, भय से, क्षुद्राशयता से म्रियमाण हो रहा है भारत । हमें महत् बनाओ, महत्प्रयासी बनाओ, उदारचेता बनाओ, सत्संकल्पी बनाओ । अब और अल्पाशी, निश्चेष्ट , अलस, भयभीत न बने रहें हम ।

10

मातर्दुर्गे! विस्तारय योगशक्तिम् । त्वत्प्रिया हि वयमार्यसन्ततयः अस्मात् सुसमुद्भावय लुप्तां शिक्षां मेधाशक्तिं च श्रद्धां भक्तिं तपस्यां च लुप्तं चरित्रं ब्रह्मचर्यं सत्यज्ञानं च अस्मदन्तः समुद्भाव्य च भुवनाय च वितर। मानवसह्ये दुर्गतिनाशिनि जगदम्बे प्रकाशस्व ॥

मात: दुर्गे ! योगशक्ति का विस्तार करो । तुम्हारी प्रिय आर्य-सन्तान हैं हम लुप्त शिक्षा, चरित्र, मेधाशक्ति, भक्ति-श्रद्धा, तपस्या, ब्रह्मचर्य , सत्य-ज्ञान का हममें विकास कर जगत् में वितरण करो । मानवसहायि दुर्गतिनाशिनि जगदम्बे, प्रकट होओ ।

11

मातर्दुर्गे! अन्तःस्थानां रिपूणां संहारं विधाय समुन्मूलय बाह्यविघ्नबाधाः । बलपराक्रमोपेता समुन्नतचेता आर्यजातिर्भारतस्य पवित्रकाननेषु समुर्वरक्षेत्रेषु व्योमचुम्बिपर्वतप्रदेशेषु पूतसलिलसरितां तीरेषु किलैकत्वे प्रेम्णि च सत्ये शक्तौ च शिल्पे साहित्ये च विक्रमे ज्ञाने च मूर्धन्या सति निवसेत् एषैव प्रार्थना मातृचरणयोः प्रकाशमाना भव ॥

मात: दुर्गे ! अन्त:स्थ रिपुओं का संहार कर बाहर के बाधा-विघ्नों को निर्मूल करो । बलशाली, पराक्रमी, उन्नतचेता जाति भारत के पवित्र काननों में, उर्वर खेतों में, गगनसहचर पर्वतों के नीचे, पूतसलिला नदियों के किनारे, एकता में, प्रेम में, सत्य में, शक्ति में, शिल्प में, साहित्य में, विक्रम में, ज्ञान में श्रेष्ठ बन निवास करे, मातृचरणों में यही प्रार्थना है, प्रकट होओ ।

12

मातर्दुर्गे! अनुप्रविश नो देहं योगशक्त्या भविष्यामस्तव यन्त्राणि अशुभविनाशिनस्तव निस्त्रिंशाः अज्ञानतिमिरापहास्तव प्रदीपाः । हे मातः सम्पूरय स्पृहामेतां भारतीयतरुणवृन्दस्य। यन्त्रस्वामिनि चालय यन्त्रम्। अशुभोच्छेदिनि समुल्लासय चन्द्रहासं ज्ञाननदीप्तिविभासिनि गृहाण हस्ते प्रदीपं प्रकाशस्व प्रकाशस्व ॥

मात: दुर्गे ! हमारे शरीर में , योगबल से प्रवेश करो । यंत्र तुम्हारे, अशुभविनाशी खड्ग तुम्हारे, अज्ञानविनाशी प्रदीप तुम्हारे बनेंगे हम, भारतीय युवकों की यह अभिलाषा पूर्ण करो । यंत्री होकर यंत्र चलाओ, अशुभहंत्री होकर खड्ग घुमाओ, ज्ञान- दीप्तिप्रकाशिनी होकर प्रदीप हाथ में लो मात:, प्रकट होओ ।

13

मातर्दुर्गे! त्वां प्राप्य न वयमितःपरं विधास्यामस्तव विसर्जनं श्रद्धाभक्तिप्रेम्णां सूत्रेण समासज्ज्य हृदये सन्निधास्यामः । एहि मातः अस्माकं मनसि प्राणे शरीरे च प्रकाशस्व ॥

मात: दुर्गे ! तुम्हें पाने पर फिर विसर्जन नहीं करेंगे, श्रद्धा-भक्ति-प्रेम की डोरी से बांधे रखेंगे । आओ मात:, हमारे मन में, प्राण में, शरीर में प्रकट होओ ।

14

वीरमार्गप्रदर्शिनि आयाहि न हि विधास्यते विसर्जनमतःपरं आस्तां ननु समस्तमस्मज्जीवनमनवच्छिन्नं दुर्गापूजनं सर्वमपि नः कार्यजातं अविरतं पवित्रं प्रेममयं शक्तिमयं च मातृसेवाव्रतं स्यात् एषैव प्रार्थना मातः । आविर्भव भारते वर्षे प्रकाशमाना भव ॥

वीरमार्गप्रदर्शिनि, आओ! अब विसर्जन नहीं करेंगे । हमारा अखिल जीवन अनवच्छिन्न दुर्गापूजा हो, हमारे समस्त कर्म अविरत पवित्र प्रेममय शक्तिमय मातृसेवाव्रत हों, यही प्रार्थना है, मात:, भारत में आविर्भूत होओ, प्रकट होओ ।

संस्कृत किसी की संपत्ति नहीं, और यहाँ वैसे ही दिया गया है जैसे गाया जाता है। इस पृष्ठ पर जो कहा गया है वह हमारा है।

← वीर

तीसरा घेरामन