बिना दीये के पढ़िए
दीया सौंपा जाता है
ऊर्मिला चित्र बनाती थी। वह लक्ष्मण की पत्नी थी, सीता की बहन। जब राम चौदह बरस के लिए वन गये और लक्ष्मण उनके साथ गये, वह अयोध्या के महल में पीछे रह गयी। रामायण उसका नाम उसके विवाह में लेती है, फिर लगभग कभी नहीं। मैथिलीशरण गुप्त ने उसे पूरी एक पोथी दी, साकेत, और उसमें वह बोलती है।
यह उसका फड़ है। दीया लीजिए।
बारह सर्ग, एक रात। आप कहीं भी रुक सकते हैं; दीया वहीं मिलेगा जहाँ आपने छोड़ा था।
सर्ग १ / १२ · घेरा: वह ज़मीन जिस पर घेरा खड़ा है, कुछ भी होने से पहले का प्रेम
पहली रात
राम के अभिषेक से पहले की रात, अयोध्या। अपने कक्ष में ऊर्मिला ने पूरा अभिषेक चित्र में उतारा है, और लक्ष्मण उसमें खुद को ढूँढ़ते हैं।
चित्र में जगह
पहला सर्ग। राज्याभिषेक से पहले की रात। ऊर्मिला ने पूरा अभिषेक चित्र में उतारा है। लक्ष्मण उसमें खुद को ढूँढ़ते हैं।
“निरुपमे, पर चित्र मेरा है कहाँ?”
“प्रिय, तुम्हारा कौन-सा पद है यहाँ?”
“भावती, मैं भार लूँ किस काम का?
एक सैनिक मात्र लक्ष्मण राम का।”
“किन्तु सीता की बहन है ऊर्मिला,
वाह, उलटा योग यह अच्छा मिला!”
पृ. १५
साथ ही सात्विक-सुमन खिलने लगे,
लेखिका के हाथ कुछ हिलने लगे!
…
चिबुक-रचना में उमंग नहीं रुकी,
रंग फैला लेखनी आगे झुकी।
एक पीत तरंग-रेखा-सी बही,
और वह अभिषेक-घट पर जा रही!
पृ. १५ से १६
उसके चित्र में पूरा दरबार है: खम्भे, नगाड़े, राजा-रानी, जल ढालते मुनि। वह उसमें खुद को ढूँढ़ता है, और उसके कुछ कहने से पहले खुद ही उत्तर दे देता है: कोई नहीं। एक सैनिक मात्र।
यह उस आदमी का सबसे पुराना वाक्य है जिसके लिए यह पन्ना है। “मुझसे गलती हुई” नहीं, उस पर तो बहस हो सकती है। “इस चित्र में मेरी कोई जगह नहीं”, और यह वाक्य हर चीज़ के नीचे बैठा रहता है। ब्याह में, त्योहार में, जब परिवार साथ खड़ा होता है, वह किनारे पर होता है, या पहले ही उठकर चला गया होता है।
ऊर्मिला उससे बहस नहीं करती। तूलिका उठा लेती है। उसे बनाते हुए उसका हाथ इतना काँपता है कि रंग बह निकलता है, और गुप्त उसे सीधे अभिषेक के घट पर जाने देते हैं। जिसने कहा था कि चित्र में उसकी कोई जगह नहीं, वह अनजाने ही चित्र के बीचोंबीच जा पहुँचा।
आप किनारे खड़े हों या तूलिका आपके हाथ में हो: उसके बिना चित्र कभी पूरा नहीं था, और रंग बह चुका है।
सर्ग १ / १२ · घेरा: वह ज़मीन जिस पर घेरा खड़ा है, कुछ भी होने से पहले का प्रेम
पहली रात
जहाँ मन जुड़े हों
सर्ग की अन्तिम पंक्तियाँ, जब सुबह उन्हें बुला लेती है:
इसके आगे ? विदा विशेष ;
हुए दम्पती फिर अनिमेष ।
किन्तु जहाँ है मनोनियोग ,
वहाँ कहाँ का विरह वियोग ?
पृ. १७
गुप्त पूरी पोथी का उत्तर उसकी पहली ही रात में रख देते हैं, कुछ भी बिगड़ने से पहले। इसे थामे रहिए। आगे जो कुछ होगा, सब विरह जैसा दिखेगा।
सर्ग २ / १२ · घेरा: केन्द्र, जहाँ से सब आता है
एक वाक्य
उसी रात, महल के दूसरे हिस्से में, एक दासी, मन्थरा, रानी कैकेयी से एक वाक्य कहती है: उनके बेटे भरत को ननिहाल भेज दिया गया, और अभिषेक पर भी बुलाया नहीं गया। कैकेयी उसे डाँटकर निकाल देती हैं। पर वाक्य रह जाता है, और गूँजता रहता है, यहाँ तक कि उन्हें बस वही सुनाई देता है। जिस माँ ने कभी राज्य नहीं चाहा था, अब उसे लगता है कि उसके बेटे पर सन्देह किया गया, और वह अपने कक्ष की हर चीज़ तोड़ देती है।
गई दासी, पर उसकी बात ,
दे गई मानो कुछ आघात—
‘भरत-से सुत पर भी सन्देह ,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह !’
पृ. २१
गूँजते थे रानी के कान ,
तीर-सी लगती थी वह तान—
पृ. २२
तोड़कर फेंके सब शृङ्गार ,
अश्रुमय-से थे मुक्ता-हार ।
…
चूर कर डाले सुन्दर चित्र ,
हो गये वे भी आज अमित्र !
पृ. २५
यही घेरे का केन्द्र है, जहाँ से सब आता है। कोई खलनायक नहीं। एक वाक्य। किसी से कहा जाता है, या कोई सुनता है, कि उस पर सन्देह किया गया, और वह सन्देह भीतर जाकर निकलता नहीं। उस रात कैकेयी लालची नहीं थीं। वे घायल थीं, और घायल मन सबसे पास वाली चीज़ पर वार करता है। इस जगह घेरा यही कहता है: जिस पर ज़्यादती हुई, वह ज़्यादती करता है। गुप्त ने 1931 में यही देखा: जिस पर सन्देह हुआ, वह सब पर सन्देह करती है।
जिस आदमी ने अफ़ीम से शुरू किया, उसकी शुरुआत भी अक्सर यहीं से हुई: नशे से नहीं, एक वाक्य से जो भीतर जाकर रह गया। उस पर किया गया कोई सन्देह, कोई अपमान, कोई हानि जो किसी ने नहीं देखी। नशा बाद में आया, उस गूँज को चुप कराने।
देखिए, वह सबसे पहले क्या तोड़ती हैं। अपने चित्र। जो सुन्दर था, वही शत्रु बन जाता है। इसे याद रखिए, क्योंकि जो स्त्री चित्र बनाती है, वह सब कुछ खोने वाली है, और वह एक भी चित्र नहीं तोड़ेगी।
सर्ग ३ / १२ · घेरा: मन
कोप किस पर?
सुबह। अभिषेक की जगह, दो वर: भरत राजा होंगे, राम चौदह बरस के लिए वन जाएँगे। बूढ़े राजा, अपने ही वचन से बँधे, बोल नहीं पाते। कैकेयी बस इतना कहती हैं: “काँटा तो मैं खुद हूँ।” लक्ष्मण भड़क उठते हैं; राम के लिए वे अपने ही परिवार से, पिता से, पूरे संसार से लड़ जाएँगे। राम उन्हें रोकते हैं।
“सुनो, हे राम ! कण्टक आप हूँ मैं ,
कहूँ क्या और, बस चुपचाप हूँ मैं ।”
…
कहा, “विश्वास ने मुझको ठगाया !”
पृ. ३७
कहा प्रभु ने कि “हाँ, बस चुप रहो तुम ,
अरुन्तुद वाक्य कहते हो अहो ! तुम !
जताते कोप किसपर हो, कहो तुम ?
सुनो, जो मैं कहूँ, चंचल न हो तुम ।
पृ. ४१
मनःशासक बनो तुम, हठ न ठानो ,
अखिल संसार अपना राज्य जानो ।
पृ. ४२
घेरा मन तक पहुँच गया है। इस कमरे में हर कोई पीड़ा में है, और पीड़ा क्रोध बन गयी है, और क्रोध किसी को ढूँढ़ रहा है। लक्ष्मण ने ढूँढ़ लिया है: विमाता। परिवार को बचाने के लिए वे परिवार को तोड़ देंगे।
राम उनसे यह नहीं कहते कि ऐसा महसूस करना गलत है। वे एक प्रश्न पूछते हैं। जताते कोप किसपर हो? यही प्रश्न निर्भरता वाले हर घर को उस क्षण अपने आप से पूछना चाहिए जब वह लड़ने को तैयार हो: उस आदमी पर, उसकी माँ पर, उस दोस्त पर जिसने पहली बार नशा दिया, गाँव पर। फिर राम उन्हें वह एक राज्य देते हैं जो कोई नहीं छीन सकता। मनःशासक बनो। और उसका फल कोई छोटा जीवन नहीं। पूरा संसार।
उस आदमी के लिए, क्रोध अक्सर अपने ही ऊपर होता है, और फिर भी वह क्रोध ही है। प्रश्न वही है।
सर्ग ४ / १२ · घेरा: परिवार
किसने क्या अन्याय किया
राम अपनी माताओं के पास जाते हैं। कौसल्या घुटनों पर बैठकर विनती करेंगी कि वह रुक जाए; लक्ष्मण की माँ सुमित्रा भीख माँगने से लड़ना बेहतर समझती हैं। राम दोनों को उत्तर देते हैं। वन में जो भी हो, सीता साथ जाएँगी। लक्ष्मण जाएँगे। ऊर्मिला से कोई नहीं पूछता।
कोई खलनायक नहीं
किसने क्या अन्याय किया ,
कि जो क्षोभ यों जाय किया ?
माँ ने पुत्र-वृद्धि चाही ,
नृप ने सत्य-सिद्धि चाही ।
मँझली माँ पर कोप करूँ ?
पुत्र-धर्म का लोप करूँ ?
पृ. ५७
यदि अपना आत्मिक बल है ,
जंगल में भी मंगल है ।
सीता, पृ. ६७
राम किसी को खलनायक नहीं बनने देते। उस स्त्री को भी नहीं जिसके दो वरों ने अभी उन्हें वन भेजा है। माँ ने पुत्र-वृद्धि चाही, नृप ने सत्य-सिद्धि चाही। बस इतना। हर एक ने कुछ अच्छा चाहा, और सबने मिलकर यह बना दिया।
जिस घर में कोई किसी चीज़ पर निर्भर है, वहाँ परिवार के पास एक खलनायक तैयार रहता है: दोस्त, बहू के मायके वाले, पति की माँ, गाँव, सरकार, खुद वह आदमी। राम का रास्ता कुछ माफ़ नहीं करता। बस शत्रु बनाने से मना करता है, और इसलिए परिवार परिवार बना रहता है।
सर्ग ४ / १२ · घेरा: परिवार
किसने क्या अन्याय किया
जो कहा नहीं गया
चौथा सर्ग। राम वन जा रहे हैं। सीता साथ जाएँगी। लक्ष्मण जाएँगे। ऊर्मिला से कोई नहीं पूछता।
लक्ष्मण ने सोचा कि—“अहो,
कैसे कहूँ चलो कि रहो!
…
नहीं, नहीं, यह बात न हो,
रहो, रहो, हे प्रिये! रहो।
यह भी मेरे लिए सहो,
और अधिक क्या कहूँ, कहो?”
लक्ष्मण हुए वियोगजयी,
और ऊर्मिला प्रेममयी?
वह भी सब कुछ जान गई,
विवश भाव से मान गई।
पृ. ५९
कहा ऊर्मिला ने—“हे मन!
तू प्रिय-पथ का विघ्न न बन।
आज स्वार्थ है त्याग-भरा!
हो अनुराग विराग भरा!”
पृ. ६२
इधर ऊर्मिला मुग्ध तिरीं—
कहकर “हाय!” धड़ाम गिरी!
…
लक्ष्मण ने दृग मूँद लिए,
सबने दो दो बूँद दिए।
पृ. ६८
जिस घर में कोई किसी चीज़ पर निर्भर हो, वहाँ सबसे ज़रूरी वाक्य कभी बोला नहीं जाता। वह नहीं कहता: मैं किसी चीज़ के भीतर जा रहा हूँ, और नहीं जानता कब लौटूँगा। वह नहीं कहती: मैं जानती हूँ। दोनों बरसों तक उस अनकहे को अकेले ढोते हैं, और दोनों यही समझते हैं कि दूसरे को पता नहीं।
गुप्त उस चुप्पी के दोनों तरफ़ दिखाते हैं। उसकी चुप्पी रुखाई नहीं थी: उसने ऐसा शब्द ढूँढ़ा जो उसे चोट न दे, नहीं मिला, तो बात मन में ही कह ली। उसका मान जाना कमज़ोरी नहीं था। देखिए, वह किससे बोलती है। उससे नहीं। अपने मन से: तू उसके रास्ते की रुकावट मत बन।
अगले चौदह बरसों में वह जो कुछ बनती है, सब यहीं से शुरू होता है, एक स्त्री के अपने मन से बोलने से। फिर वह सबके सामने गिर पड़ती है, और कोई उस पर लज्जित नहीं होता। कमरे में हर कोई दो-दो बूँद देता है।
सर्ग ५ / १२ · घेरा: गाँव, और फिर दुनिया
राह
रथ अयोध्या से निकलता है। लोग उसके आगे सड़क पर लेट जाते हैं: जा सको तो हमें रौंदकर जाओ। राम बात करके उन्हें उठाते हैं। राज्य की सीमा पर वे अपनी जन्मभूमि को प्रणाम करते हैं। गंगा पर, निषादों के मुखिया गुह भेंट लेकर उनसे मिलने आते हैं, और एक दिन के लिए भूल जाते हैं कि वे सबसे नीचे हैं। प्रयाग में, जहाँ नदियाँ मिलती हैं, राम बताते हैं कि मिलना क्या है।
बोल उठे जन—‘भद्र, न ऐसा तुम कहो ,
देते हैं हम तुम्हें बिदा ही कब अहो !
राजा हमने राम, तुम्हीं को है चुना ,
करो न तुम यों हाय ! लोकमत अनसुना ।
जाओ, यदि जा सको रौंद हमको यहाँ !“
यों कह पथ में लेट गये बहु जन वहाँ ।
…
प्रजा नहीं, तुम प्रकृति हमारी बन गये ,
दोनों के सुख-दुःख एक में सन गये ।
पृ. ७४
पाकर यह आनन्द-सम्मिलन-लीनता ,
भूल रही है आज मुझे निज हीनता ।
मैं अभाव में भाव लेखता हूँ तुम्हें ,
निज गृह में गृह नहीं, देखता हूँ तुम्हें ।
गुह, पृ. ८०
सुनो, मिलन ही महातीर्थ संसार में ,
पृथ्वी परिणत यहीं एक परिवार में ।
पृ. ८८
घेरा गाँव पर खुलता है। पूरी प्रजा सड़क पर लेट जाती है, क्योंकि जब उनमें से एक जाता है, तो जैसे सब जाते हैं। राम का उत्तर वही है जो यह जगह हर गाँव को देती है: प्रजा नहीं, तुम प्रकृति हमारी बन गये। गाँव उस आदमी का दर्शक या न्यायाधीश नहीं है। वह उसकी अपनी प्रकृति है, और उसके सुख-दुःख पहले ही उसमें सन चुके हैं।
फिर जो सबसे नीचा महसूस करता है, वह नाविक, एक दिन के लिए भूल जाता है कि वह कितना नीचा है, क्योंकि कोई अतिथि बनकर उसके घर आया। कम होने का भाव ऐसे ही जाता है: बहस से नहीं, किसी मिलन में भूल जाने से।
और संगम पर, संसार। मिलन ही महातीर्थ संसार में, पृथ्वी परिणत यहीं एक परिवार में। किसी को तीर्थ जाना नहीं है। तीर्थ वहीं है जहाँ दो लोग मिलते हैं।
सर्ग ६ / १२ · घेरा: परिवार, और गाँव का दुःख
घृणा की एक मूर्ति
उनके बिना अयोध्या। उनके जाने के बाद से ऊर्मिला बेहोश पड़ी है; जब जागती है, तो उसके पास बस वह आशा बचती है जो मरती नहीं, और वह वाक्य जो उसने उनसे कभी कहा नहीं। सारथी खाली रथ लेकर लौटता है। बूढ़े राजा, जो दिनों से राम का नाम ले रहे थे, उस विरह में चल बसते हैं। पूरा नगर शोक में डूब जाता है, और उसका दुःख टिकने के लिए एक जगह ढूँढ़ता है।
“सब गया, हाय ! आशा न गई ।
आशे, निष्फल भी बनी रहो ,
तुम हो हीरे की कनी अहो !
ऊर्मिला, पृ. ९७
तो क्यों इतना भी कह न सकी—
“हे नाथ, साथ दो भ्राता का ,
बल रहे मुझे उस त्राता का ।
…
है प्रेम स्वयं कर्त्तव्य बड़ा ,
जो सींच रहा है तुम्हें खड़ा ।
पृ. ९७
इस शोक के सम्बन्ध से—
सब देखते थे अन्ध-से—
बस एक मूर्ति घृणामयी ,
वह थी कठोरा केकयी !
पृ. ११०
इस सर्ग में दो बातें साथ-साथ होती हैं, और दोनों घेरा हैं।
ऊर्मिला, जिसने सबसे अधिक खोया है, एक चीज़ बचाकर रखती है: आशा, जिसे वह हीरे की कनी कहती है। निष्फल भी हो, तो भी बनी रहे। और अब वह जानती है कि उसे क्या कहना चाहिए था: भाई का साथ दो। प्रेम स्वयं बड़ा कर्त्तव्य है। वही तुम्हें खड़ा रखता है। उसे इस बात पर क्रोध नहीं कि वे गये। दुःख इस बात का है कि उसने उन्हें भेजा नहीं।
और नगर, अपने दुःख में, वही करता है जो हर गाँव करता है। सब कुछ डालने के लिए एक चेहरा ढूँढ़ता है। बस एक मूर्ति घृणामयी। एक स्त्री पूरा कारण बन जाती है। गाँव में किसी लत वाला कोई भी आदमी इस चेहरे को जानता है। उसने इसे पहना है। गली में कुछ भी बिगड़े, तो वह उसका है।
सर्ग ७ / १२ · घेरा: परिवार; वह जिस पर दोष डाला जाता है
मारोगे किसे?
भरत ननिहाल से लौटते हैं, सूने नगर और मृत पिता के पास, और जानते हैं कि यह सब उनके लिए किया गया। वे राज्य लेने से मना कर देते हैं। उनका छोटा भाई शत्रुघ्न, दुःख में बेसुध, अपनी ही माँ पर हाथ उठाता है; भरत उसे रोकते हैं। फिर भरत राम की माँ कौसल्या के पास जाते हैं, खुद को अपराधी, राज्य का चोर कहते हुए। वे उसे गले से लगा लेती हैं। कुलगुरु वसिष्ठ उससे उठ खड़े होने को कहते हैं।
वीर ने मारी हृदय पर मुष्टि ।
उठ भरत ने धर लिया झट हाथ ,
और वे बोले व्यथा के साथ—
“हाय ! मारोगे किसे हे तात ,
पृ. १२५
“तुम कहाँ हो अम्ब, दीना अम्ब ,
…
भरत—अपराधी भरत—है प्राप्त ,
दो उसे आदेश अपना आप्त ।
पृ. १२५
“झूठ यह सब झूठ, तू निष्पाप ;
साक्षिणी तेरी यहाँ मैं आप ।
…
देख लो हे नाथ लो परितोष ;
जननियों के जात हैं निर्दोष ।”
कौसल्या, पृ. १२६
अब उठो हे वत्स, धीरज धार ,
बैठते हैं वीर क्या थक-हार ?
…
सतत कर्मक्षेत्र है नरलोक ।
वसिष्ठ, पृ. १३०
यह सर्ग उसके लिए है जिस पर दोष डाला जाता है, और उसके लिए जो खुद पर दोष डालता है।
शत्रुघ्न का दुःख वार बन जाता है, और भरत उसका हाथ पकड़ लेते हैं। हाय! मारोगे किसे? जिस घर में कोई किसी चीज़ पर निर्भर है, वहाँ देर-सबेर एक हाथ उठता है: उस आदमी पर, उसकी माँ पर, खुद पर। यह प्रश्न उसे हवा में रोक देता है।
भरत उस स्त्री के कक्ष में जाते हैं जिसके साथ उनकी माँ ने अन्याय किया, खुद को अपराधी कहते हुए। बहुत-से आदमी अपने परिवार के सामने ऐसे ही जाते हैं, बरसों का अपराध-बोध एक वाक्य में लिये। कौसल्या उनसे बहस नहीं करतीं, उपदेश नहीं देतीं। कहती हैं: यह सब झूठ है। साक्षिणी तेरी यहाँ मैं आप। और फिर वह पंक्ति, राजस्थान की हर उस माँ के लिए जिसने देखा है कि गाँव ने उसके बेटे को कारण ठहरा दिया: जननियों के जात हैं निर्दोष।
फिर गुरु उससे भूल जाने को नहीं कहते। उठ खड़े होने को कहते हैं। बैठते हैं वीर क्या थक-हार? सतत कर्मक्षेत्र है नरलोक। इस जगह का पूरा प्रशिक्षण, एक वाक्य में।
सर्ग ८ / १२ · घेरा: गाँव, दुनिया, और वह जिससे सब घृणा करते थे, उसी पर घेरा मुड़ता है
चित्रकूट
चित्रकूट, वन में एक पहाड़ी। सीता अपने पौधे सींचती हैं और गाती हैं; वे कभी इतनी मुक्त नहीं रहीं। राम उन्हें बताते हैं कि वे वन आये ही क्यों हैं। फिर भरत पूरी अयोध्या के साथ राम को घर ले जाने आते हैं, और कैकेयी, सबके सामने, अपना किया स्वीकार करती हैं। और एक कुटी में, एक क्षण के लिए, लक्ष्मण और ऊर्मिला मिलते हैं।
अपने पैरों पर
औरों के हाथों यहाँ नहीं पलती हूँ ,
अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ ।
श्रमवारि विन्दु फल स्वास्थ्य शुचि फलती हूँ ,
अपने अंचल से व्यजन आप झलती हूँ ।
तनु-लता-सफलता-स्वाद आज हो आया ,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया ।
पृ. १३८
ओ भोली कोल-किरात-भिल्ल-बालाओ ,
मैं आप तुम्हारे यहाँ आ गई, आओ ।
मुझको कुछ करने योग्य काम बतलाओ ,
पृ. १४०
महल ने उसे दूसरों के हाथों पाला। वन, जिसके लिए सब उस पर तरस खाते थे, वहीं वह अपने पैरों पर खड़ी होती है। तनु-लता-सफलता-स्वाद आज हो आया। इस जगह का अभ्यास इसी के लिए है: आदमी के शरीर को काबू में करने के लिए नहीं, उसे यह चखने देने के लिए कि शरीर किसलिए है।
और वन में उसकी पहली इच्छा सेवा पाने की नहीं है। वह वन की स्त्रियों के पास जाती है, भील और कोल लड़कियों के, और उनसे काम माँगती है। अपने पैरों पर खड़ा होना लगभग तुरन्त दूसरों की ओर मुड़ जाता है।
सर्ग ८ / १२ · घेरा: गाँव, दुनिया, और वह जिससे सब घृणा करते थे, उसी पर घेरा मुड़ता है
चित्रकूट
विवश के लिए
मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं ,
जो विवश, विकल, बल-हीन, दीन, शापित हैं ।
पृ. १४५
सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया ,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया ।
पृ. १४६
विवश। ऊर्मिला यही शब्द अपने लिए कहेगी। राम हर वह शब्द गिनाते हैं जो उस आदमी के बारे में कहा गया है जिसके लिए यह जगह है: तापित, विवश, विकल, बल-हीन, दीन, शापित। और कहते हैं कि वे उन्हीं के लिए आये। स्वर्ग के लिए नहीं; इसी धरती के लिए, कि उसे यहीं स्वर्ग बनायें।
सर्ग ८ / १२ · घेरा: गाँव, दुनिया, और वह जिससे सब घृणा करते थे, उसी पर घेरा मुड़ता है
चित्रकूट
जिससे सब घृणा करते थे
“हाँ, जनकर भी मैंने न भरत को जाना ,
सब सुन लें, तुमने स्वयं अभी यह माना ।
यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया ,
अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया ।
पृ. १५४
“क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी ,
मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी ।
पृ. १५५
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई ,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई ।”
पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई—
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई ।”
पृ. १५६
“छल किया भाग्य ने मुझे अयश देने का ,
बल दिया उसीने भूल मान लेने का ।
पृ. १५७
यहाँ घेरा मुड़ता है, और उसी पर मुड़ता है जिससे सब घृणा करते थे।
कैकेयी पूरी अयोध्या के सामने खड़ी होती हैं। वे दासी पर दोष नहीं डालतीं: क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी, मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी। वे क्षमा नहीं माँगतीं। खुद को अपराधिन कहती हैं और राम से घर लौटने को कहती हैं। और राम, फिर पूरी सभा, वही पुकारते हैं जो नगर ने कहा था उसका उल्टा: सौ बार धन्य वह एक लाल की माई। घृणा की एकमात्र मूर्ति को सब ज़ोर से धन्य कहते हैं।
फिर उसके बारे में उनका अपना वाक्य: छल किया भाग्य ने मुझे अयश देने का, बल दिया उसीने भूल मान लेने का। मान लेना सज़ा नहीं है। वह एक बल है जो उन्हें मिला।
सर्ग ८ / १२ · घेरा: गाँव, दुनिया, और वह जिससे सब घृणा करते थे, उसी पर घेरा मुड़ता है
चित्रकूट
कुटी में एक घड़ी
आठवाँ सर्ग। चित्रकूट। पूरा परिवार राम को लौटाने वन आया है। सीता एक पिटारी लाने के बहाने लक्ष्मण को कुटी में भेजती हैं। वहाँ ऊर्मिला राह देख रही है।
जाकर परन्तु जो वहाँ उन्होंने देखा,
तो दीख पड़ी कोणस्थ ऊर्मिला-रेखा।
यह काया है या शेष उसीकी छाया,
क्षण भर उनकी कुछ नहीं समझ में आया!
“मेरे उपवन के हरिण, आज वनचारी,
मैं बाँध न लूँगी तुम्हें, तजो भय भारी।”
गिर पड़े दौड़ सौमित्रि प्रिया-पद-तल में,
वह भींग उठी प्रिय-चरण धरे दृग-जल में।
“वन में तनिक तपस्या करके
बनने दो मुझको निज योग्य,
भाभी की भगिनी, तुम मेरे
अर्थ नहीं केवल उपभोग्य।”
“हा स्वामी! कहना था क्या क्या
कह न सकी, कर्मों का दोष!
पर जिसमें सन्तोष तुम्हें हो
मुझे उसी में है सन्तोष।”
एक घड़ी भी बीत न पाई,
बाहर से कुछ वाणी आई।
पृ. १६६
देखिए, दोनों किस बात से डरते हैं। वह बँध जाने से डरता है। वह उसके बोलने से पहले ही जानती है, और उसके पहले ही शब्द वह डर उतार देते हैं: मैं तुम्हें बाँधूँगी नहीं। जो घर किसी निर्भर आदमी की राह देखता है, उसने यह डर उसकी आँखों में देखा है, कि घर एक रस्सी है।
जिस क्षण उसका डर जाता है, वह वही माँगता है जो माँगने लायक है। “मुझे क्षमा करो” नहीं। मुझे अपने योग्य बनने दो। वह भी जो कहने आयी थी, कह नहीं पाती। फिर भी उस क्षण से, जो एक घड़ी भी नहीं टिका, वह बरसों जीती है।
ऐसे घर में बहुत-सी मुलाक़ातें ऐसी ही होती हैं: एक क्षण, जिसमें सब कहा जा सकता था, और बहुत कम कहा जाता है, और वही काफ़ी होता है।
सर्ग ९ / १२ · घेरा: केन्द्र से गाँव तक
महल, और बरस
वापस अयोध्या, चौदह बरसों के लिए। यह गुप्त का ऊर्मिला के लिए अपना सर्ग है, वही जिसके बारे में उन्होंने कहा कि वे इसे कभी पूरा नहीं कर पाये।
पिंजड़ा, और खुला द्वार
नवाँ सर्ग। महल, और बरस। ऊर्मिला अपनी सखी से कहती है।
विरह संग अभिसार भी,
भार जहाँ आभार भी।
मैं पिंजड़े में पड़ी हूँ किंतु खुला है द्वार भी,
काल कठिन क्यों न हो किंतु है मेरे लिए उदार भी!
पृ. १७७
सखि, न हटा मकड़ी को, आई है वह सहानुभूति-वशा,
जालगता मैं भी तो, हम दोनों की यहाँ समान-दशा।
पृ. १९८
उठ अवार न पार जाकर भी गई,
ऊर्मि हूँ मैं इस भवार्णव की नई,
…
पर विलीन नहीं, रहूँ गतिहीन मैं,
दैन्य से न दबूँ कभी, वह दीन मैं।
अति अवश हूँ, किन्तु आत्म-अधीन मैं,
सखि, मिलन के पूर्व ही प्रिय-लीन मैं।
पृ. २०९
अवश। जिसका अपने पर वश नहीं। यही उस आदमी का शब्द है जिसके लिए यह जगह है। वह कब सोए, क्या खर्च करे, यह दूसरे तय करते हैं, और हर सुबह उसका शरीर उसके लिए तय करता है। ऊर्मिला अपने लिए यही कहती है: अति अवश। और उसी पंक्ति में: किन्तु आत्म-अधीन, अपनी ही अधीन।
वह आज़ाद होने के लिए महल नहीं छोड़ती। पिंजड़े में ही उसे दिखता है कि द्वार खुला है। निर्भरता यही है, जैसी गुप्त ने 1931 में देखी, किसी नशे के बारे में एक शब्द लिखे बिना: एक पिंजड़ा जिसका द्वार खुला है। कोई उसे धक्का देकर बाहर नहीं निकाल सकता। द्वार कहीं आगे नहीं है, किसी दूर के छुटकारे वाले दिन के पार। वह अभी खुला है, पिंजड़े वाले उसी वाक्य में।
वह इसे अपना नाम देती है: ऊर्मि, लहर। लहर सागर से भागती नहीं। उसी में से उठती है और चल पड़ती है। “विलीन नहीं,” वह कहती है। दीवारों के भीतर, वही एक चीज़ है जो चलती है।
और मकड़ी। उसे मत हटा, वह सहानुभूति से आयी है, जाल में मैं भी हूँ। जो फँसा है, वह हर फँसे हुए का सगा हो जाता है। यह घाव नहीं है। यहीं से आगे का हर घेरा शुरू होता है।
सर्ग ९ / १२ · घेरा: केन्द्र से गाँव तक
महल, और बरस
चौदह चक्कर
नवाँ सर्ग एक-एक ऋतु से होकर चलता है: गर्मी, बरसात, शरद, हेमन्त, शिशिर, वसन्त।
चौदह चक्कर खायगी जब यह भूमि अभंग,
घूमेंगे इस ओर तब प्रियतम प्रभु के संग।
पृ. १९६
नाइन, रहने दे तू, तेल नहीं चाहिए मुझे तेरा,
तनु चाहे रूखा हो, मन तो सुस्नेह-पूर्ण है मेरा।
पृ. १९५
वेदने, तू भी भली बनी!
पाई मैंने आज तुझीमें अपनी चाह घनी।
नई किरण छोड़ी है तूने, तू वह हीर-कनी,
पृ. १७६
जहाँ विरह ने गार दिया है किया वहाँ उपकार भी,
सुधबुध हर ली किंतु दिया है कालज्ञान विचार भी।
…
जाना मैंने इस उर में थी ज्वाला भी जलधार भी,
प्रिय ही नहीं यहाँ मैं भी थी, और एक संसार भी!
पृ. १७७
प्रिय ने सहज गुणों से, दीक्षा दी थी मुझे प्रणय, जो तेरी,
आज प्रतीक्षा द्वारा, लेते हैं वे यहाँ परीक्षा मेरी!
पृ. १७४
री, आवेगा फिर भी वसन्त,
जैसे मेरे प्रिय प्रेमवन्त।
दुःखों का भी है एक अन्त,
पृ. २०५
उसके आसपास हर कोई इन बरसों को खोया हुआ गिनता है। एक जवान स्त्री के जीवन से चौदह बरस निकल गये। गाँव ठीक ऐसे ही उन बरसों को गिनता है जो कोई आदमी अफ़ीम पर, डोडे पर, किसी भी चीज़ पर बिताता है: बरस गये, उनकी भरपाई करनी है।
गुप्त उल्टा गिनते हैं। वे उसे हर ऋतु से ले जाते हैं, गर्मी और बरसात, शरद, हेमन्त, शिशिर, वसन्त, और हर ऋतु में उसे कुछ मिलता है। उसका तन रूखा होता है, मन नहीं। जिस वेदना को उसने केवल वेदना समझा था, वह “हीर-कनी” निकलती है। और फिर वह पंक्ति जिसके चारों ओर यह पूरा फड़ बना है:
प्रिय ही नहीं यहाँ मैं भी थी, और एक संसार भी।
निर्भरता के बरस भीतर से ऐसे दिखते हैं, अगर उन्हें देर तक देखा जाए। जीवन में कोई खाली जगह नहीं। वे बरस जिनमें उसने पाया कि वह भी वहाँ था। कुछ खोया नहीं गया।
और देखिए, वह इस प्रतीक्षा को क्या कहती है। उसने दीक्षा दी थी, और प्रतीक्षा परीक्षा है। ये बरस घाव नहीं हैं। ये उसकी योग्यता हैं।
सर्ग ९ / १२ · घेरा: केन्द्र से गाँव तक
महल, और बरस
घेरे खुलते हैं
नवाँ और दसवाँ सर्ग। अब भी महल के भीतर, अब भी राह देखते हुए।
बनाती रसोई, सभीको खिलाती,
इसी काम में आज मैं तृप्ति पाती।
रहा किन्तु मेरे लिए एक रोना,
खिलाऊँ किसे मैं अलौना-सलौना?
पृ. १७०
प्रोषितपतिकाएँ हों
जितनी भी सखि, उन्हें निमन्त्रण दे आ,
समदुःखिनी मिलें तो
दुःख बँटे, जा, प्रणयपुरस्सर ले आ।
सुख दे सकते हैं तो दुःखी जन ही मुझे, उन्हें यदि भेटूँ,
कोई नहीं यहाँ क्या जिसका कोई अभाव मैं भी मेटूँ?
पृ. १७३
मैं निज ललितकलाएँ भूल न जाऊँ वियोग-वेदन में,
सखि, पुरबाला-शाला खुलवा दे क्यों न उपवन में?
पृ. १७४
हम राज्य लिए मरते हैं?
सच्चा राज्य परन्तु हमारे कर्षक ही करते हैं।
पृ. १९५
तरसूँ मुझ-सी मैं ही, सरसे-हरसे-हँसे प्रकृति प्यारी,
सबको सुख होगा तो मेरी भी आयगी वारी।
पृ. १८६
आज भीगते ही घर पहुँचे, जन जन के जन, बरसो।
पृ. १८६
यहाँ पिंजड़ा खुलता है। द्वार से नहीं: घेरों से।
पहला घेरा रसोई है। वह रसोई बनाती है, सबको खिलाती है, और गुप्त यह नहीं दिखाते कि दुख चला गया: खिलाऊँ किसे? फिर भी वह खिलाती है। अगला घेरा नगर की हर वह स्त्री है जो किसी दूर गये की राह देख रही है। सबको बुला लाओ; समदुःखिनी मिलें तो दुख बँटे। फिर वह पंक्ति जो पूरी कविता को मोड़ देती है: कोई नहीं यहाँ क्या जिसका कोई अभाव मैं भी मेटूँ? फिर नगर की बेटियों के लिए एक शाला, उसके अपने उपवन में। फिर किसान, जो सच्चा राज्य हैं। फिर वर्षा, कि हर किसी का अपना घर पहुँचे। और आख़िर में उसके आँसू, सरयू को सौंपे हुए, कि वे सागर बनें, फिर बादल, फिर संसार पर वर्षा।
घेरे के बाद घेरा। यही वह घेरा है जो The Idea वाले पन्ने पर है, मुड़ा हुआ। ज़्यादती घेरे-दर-घेरे फैलती है, यहाँ तक कि ज़्यादती के सिवा कुछ नहीं बचता; वही फैलाव, मुड़ जाए, तो प्रेम है। वह राह देखना कभी नहीं छोड़ती। अकेले राह देखना छोड़ देती है।
जो जाल में रहा है, वह हर जाल को जानता है। जिसने राह देखी है, वह हर उस घर को जानता है जो राह देख रहा है। किसी को पहले ठीक होना नहीं है। ऊर्मिला ने अपने सबसे कठिन बरस के बीच से शुरू किया।
सर्ग ९ / १२ · घेरा: केन्द्र से गाँव तक
महल, और बरस
काँटे गिनने वाली रात
नवाँ सर्ग। एक रात, जब उसे लगता है कि चौदह बरस पूरे हो गये और वह द्वार पर खड़ा है।
सखि, विचार कभी उठता यही—
अवधि पूर्ण हुई, प्रिय आ गये।
तदपि मैं मिलते सकुचा रही,
वह वही, पर आज नये नये!
पृ. २१३
प्रिय, फिरो, फिरो हा! फिरो, फिरो!
न इस मोह की धूम से घिरो।
…
घर फिरे तुम्हीं मोह से कहीं,
तब हुए तपोभ्रष्ट क्या नहीं?
पृ. २१५
और जिस लक्ष्मण की वह कल्पना करती है, वह उत्तर देता है:
विदित क्या तुम्हें, देवि, क्या हुआ,
रुधिर स्वेद के रूप में चुआ।
विपिन में कभी सो सका न मैं,
अधिक क्या कहूँ, रो सका न मैं।
वचन ये पुरस्कार में मिले,
अहह ऊर्मिले! हाय ऊर्मिले!
गिन सको, गिनो शूल, जो चुभे,
सहज है समालोचना शुभे।
कठिन साधना किन्तु तत्व की,
प्रथम चाहिए सिद्धि सत्व की।
…
प्रियतमे, तपोभ्रष्ट मैं? भला!
मत छुओ मुझे, लौट मैं चला।
पृ. २१७
उन्मादिनी कभी थी,
विवेकिनी ऊर्मिला हुई सखि अब है,
पृ. २१८
जिस भी घर ने राह देखी है, उसकी एक रात ऐसी रही है। वह घर आता है, या आता हुआ लगता है, और मुँह से पहली बात स्वागत की नहीं निकलती। शक की निकलती है। सच में पूरा कर आया? कमज़ोरी में जल्दी तो नहीं लौट आया? कहीं गिर तो नहीं गया?
और गुप्त में वह आदमी उत्तर देता है। गिड़गिड़ाता नहीं। वह बताता है जो उसने नहीं देखा: पसीना बनकर बहा खून, बिना नींद की रातें, ऐसा थमा हुआ दुख कि रो भी न सका। फिर वह वाक्य जो हर घर को अपने द्वार पर रखना चाहिए: सहज है समालोचना। आलोचना आसान है। असली साधना कठिन है।
फिर ऊर्मिला जागती है, और गुप्त पागलपन उसे देते हैं जिसने परखा, उसे नहीं जिसे परखा गया। “उन्मादिनी कभी थी, विवेकिनी अब हूँ।”
आदमी के लिए: जो आवाज़ आपसे कहती है कि आप गिर गये, चाहे वह घर से आए या रात के दो बजे आपके अपने सिर के भीतर से, वह पागल आवाज़ है। वह काँटे गिनती है। घर के लिए: जो लौटा है, वह शायद वह ढो रहा है जो आपने कभी देखा ही नहीं।
सर्ग १० / १२ · घेरा: दुनिया
रात में नदी से
सरयू किनारे एक रात। ऊर्मिला नदी को बताती है कि वह कौन थी: मिथिला की एक लड़की, इतनी चंचल कि उसका नाम लहर पर रखा गया; एक लड़की जो अपनी गुड़िया में जान डाल देती थी। वह उसे अपना विवाह सुनाती है। फिर अपने आँसू नदी को सौंप देती है।
कुछ चंचल मैं सदा रही ,
फिरती थी तुझ-सी वही-बही ।
इस कारण ऊर्मिला हुई ,
गति में मैं अति दुर्मिला हुई ।
…
‘मुझसे समभाग छाँट ले ,
पुतली, जी उठ,—जीव बाँट ले ।
पृ. २२५
तब ले दृग-बिन्दु क्षुद्र ये ,
बढ़ हो जायँ स्वयं समुद्र ये ,
घन पान करें कभी इन्हें ,
रुचता है परमार्थ ही जिन्हें ।
यह भी इस भाँति धन्य हों ,
जगती के उपकार-जन्य हों ।
पृ. २४९
उसका नाम उसकी चंचलता पर रखा गया। एक लहर, जिसे पकड़ना कठिन। और बचपन में वह अपनी गुड़िया से कहती थी: मुझसे समभाग छाँट ले, जी उठ, जीव बाँट ले। अब नदी किनारे, बरसों पिंजड़े में रहने के बाद, वही बैठी है: वही लड़की, वही लहर, अपना जीवन दे देने की वही इच्छा, कि कुछ और जी उठे।
तो वह नदी को वह एक चीज़ देती है जो उसके पास है, अपने आँसू, और उससे कहती है कि उन्हें सागर तक ले जाए, कि सागर उन्हें बादलों को दे, कि बादल उन्हें संसार पर बरसा दें। घेरे का आख़िरी छल्ला संसार है, और वह उस तक एक महल की खिड़की से, एक नदी किनारे, रात में, खाली हाथों पहुँचती है।
सर्ग ११ / १२ · घेरा: गाँव
नन्दिग्राम
भरत महल में नहीं रहते। नगर के बाहर एक गाँव, नन्दिग्राम में, वे राम की पादुकाएँ सिंहासन पर रखकर चौदह बरस वनवासी की तरह रहते हैं, घर में निभाया गया एक व्रत। उनकी पत्नी माण्डवी रोज़ उन्हें भोजन लाती हैं। और उस व्रत के नीचे गाँव फलते-फूलते हैं। फिर एक यात्री दक्षिण से ख़बर लाता है।
खेतों के निकेत बनते हैं
और निकेतों के फिर खेत ,
वे प्रासाद रहें न रहें, पर ,
अमर तुम्हारा यह साकेत ।
माण्डवी, पृ. २५७
जीवन में सुख-दुख निरन्तर
आते जाते रहते हैं ,
सुख तो सभी भोग लेते हैं ,
दुःख धीर ही सहते हैं ।
पृ. २५८
भूरि-भाग्य ने एक भूल की ,
सबने उसे सँभाला है ,
हमें जलाती पर प्रकाश भी
फैलाती यह ज्वाला है ।
पृ. २५९
एक शाल में बहु विभिन्न दल
और विविध वर्धित फल-फूल ,
यथा-विचित्र विश्व-विटपी में
अगणित विटप, एक ही मूल !
पृ. २६३
अन्न-वृद्धि से तृप्त तथा बहु
कला-सिद्धि से सहज प्रसन्न ,
अपना ग्राम ग्राम है मानो
एक स्वतन्त्र वेश सम्पन्न ।
पृ. २६५
यह गाँव का घेरा है, और इसे एक घर मोड़ता है। एक आदमी नगर के छोर पर एक कुटी में व्रत निभाता है, और उसकी पत्नी उसका भोजन लाती है, और उनके चारों ओर गाँव अन्न उगाते हैं, कपड़ा बुनते हैं, औषधियाँ बनाते हैं, गौवंश बढ़ाते हैं, यहाँ तक कि हर गाँव एक स्वतन्त्र वेश सम्पन्न हो जाता है।
और माण्डवी वह वाक्य कहती हैं जो यह जगह किसी भी गाँव से उस घर के बारे में कहेगी जिसमें निर्भरता रही है: भूरि-भाग्य ने एक भूल की, सबने उसे सँभाला है, हमें जलाती पर प्रकाश भी फैलाती यह ज्वाला है। छिपाया नहीं, नकारा नहीं। सबने सँभाला, और रोशनी बना दिया।
सर्ग १२ / १२ · घेरा: दुनिया, और फिर प्रेम
लौटना
लंका की ख़बर अयोध्या पहुँचती है: सीता का हरण, लक्ष्मण को शक्ति। अयोध्या की सेना तैयार होती है। फिर चौदह बरस पूरे होते हैं, और वे घर लौटते हैं।
धड़कन
बारहवाँ सर्ग। अयोध्या में ख़बर आती है कि लंका में लक्ष्मण को शक्ति लगी है। जैसे किसी दृश्य में, पूरा नगर उन्हें राम की गोद में पड़ा देखता है। कोई बोल नहीं पाता।
जड़ीभूत-से हुए देख साकेत-निवासी,
बोल सके कुछ भी न,—हुए यद्यपि अभिलाषी।
तदपि ऊर्मिला ने प्रयास कर हाथ उठाया,—
देखा अपना हृदय, मन्द-सा स्पन्दन पाया!
पृ. ३१८
किन्तु जहाँ है मनोनियोग,
वहाँ कहाँ का विरह वियोग?
पहला सर्ग, पृ. १७
दोनों के बीच एक सागर है। वह लंका में आहत पड़ा है; वह अयोध्या में खड़ी है। कोई नहीं कह सकता कि वह जीवित है। वह अपना हाथ अपने हृदय पर रखती है, धीमी-सी धड़कन पाती है, और ऐसे जानती है।
गुप्त ने यह पहली ही रात कह दिया था, कुछ होने से पहले: जहाँ मनोनियोग है, वहाँ कहाँ का विरह वियोग? जो घर किसी आदमी की राह देखता है, वह उससे अलग खड़ा होकर देख नहीं रहा। वह कहीं भी हो, उस घर में किसी हृदय पर रखा एक हाथ जानता है कि वह जीवित है या नहीं। एक ही है।
सर्ग १२ / १२ · घेरा: दुनिया, और फिर प्रेम
लौटना
सेना के सामने
बारहवाँ सर्ग, पूरा। अयोध्या की सेना लंका पर चढ़ने को तैयार खड़ी है। उसका नायक अभी-अभी कह चुका है: जाओ, सोने की नगरी लूट लो।
“नहीं, नहीं”—सुन चौंक पड़े शत्रुघ्न और सब!
ऊषा-सी आ गई ऊर्मिला उसी ठौर तब!
वीणांगुलि-सम सती उतरती-सी चढ़ धाई,
तालपूर्ति-सी संग सखी भी खिंचती आई!
आ शत्रुघ्न-समीप रुकी लक्ष्मण की रानी,
प्रकट हुई ज्यों कार्तिकेय के निकट भवानी।
जटा-जाल-से बाल विलम्बित छूट पड़े थे,
आनन पर सौ अरुण, घटा में फूट पड़े थे।
माथे का सिन्दूर सजग, अंगार-सदृश था,
प्रथमातप-सा पुण्य गात्र, यद्यपि वह कृश था।
बायाँ कर शत्रुघ्न-पृष्ठ पर कण्ठ-निकट था,
दायें कर में स्थूल किरण-सा शूल विकट था।
पृ. ३१५
गरज उठी वह—‘नहीं, नहीं, पापी का सोना,
यहाँ न लाना, भले सिन्धु में वहीं डुबोना।
धीरो, धन को आज ध्यान में भी मत लाओ,
जाते हो तो मान-हेतु ही तुम सब जाओ।
सावधान! वह अधम-धान्य-सा धन मत छूना,
तुम्हें तुम्हारी मातृभूमि ही देगी दूना।
किस धन से हैं रिक्त कहो, सुनिकेत हमारे?
उपवन फल-सम्पन्न अन्नमय खेत हमारे।
जय पयस्य-परिपूर्ण सुघोषित घोष हमारे;
अगणित आकर सदा स्वर्ण-मणि-कोष हमारे।
देव दुर्लभा भूमि हमारी प्रमुख पुनीता,
उसी भूमि की सुता पुण्य की प्रतिमा सीता।
मातृभूमि का मान ध्यान में रहे तुम्हारे,
लक्ष लक्ष भी एक लक्ष रक्खो तुम सारे।
हैं निज पार्थिव-सिद्धि-रूपिणी सीता रानी,
और दिव्य-फल-रूप राम राजा बल-दानी।
करे न कौणप-गन्ध कलंकित मलय पवन को,
लगे न कोई कुटिल कीट अपने उपवन को।
विन्ध्य-हिमालय-भाल, भला! झुक जाय न धीरो,
चन्द्र-सूर्य-कुल-कीर्ति-कला रुक जाय न वीरो,
चढ़कर उतर न जाय, सुनो कुल-मौक्तिक मानी,
गंगा-यमुना-सिन्धु और सरयू का पानी,—
बढ़कर इसी प्रसिद्ध पुरातन पुण्यस्थल से,
किये दिग्विजय वार वार तुमने निज बल से।
यदि, परन्तु कुल-कान तुम्हारी हो संकट में,
तो अपने ये प्राण व्यर्थ ही हैं इस घट में।
किसका कुल है आर्य बना अपने कार्यों से?
पढ़ा न किसने पाठ अवनितल में आर्यों से?
पावें तुमसे आज शत्रु भी ऐसी शिक्षा,
जिसका अथ हो दण्ड और इति दया-तितिक्षा।
पृ. ३१६
देखो, निकली पूर्व दिशा से अपनी ऊषा,
यही हमारी प्रकृति पताका भव की भूषा।
ठहरो, यह मैं चलूँ कीर्ति-सी आगे आगे,
भोगें अपने विषम कर्म-फल अधम अभागे!”
भाल-भाग्य पर तने हुए थे तेवर उसके,
“भाभी! भाभी” रुद्ध कण्ठ थे देवर उसके।
सम्मुख सैन्य-समूह सिन्धु-सा गरज रहा था,
बरज विनय से उसे शत्रु पर तरज रहा था।
“क्या हम सब मर गये हाय! जो तुम जाती हो,
या हमको तुम आज दीन-दुर्बल पाती हो?—
मारेंगे हम देवि, नहीं तो मर जावेंगे,
अपनी लक्ष्मी लिये बिना क्या घर आवेंगे?
होगा होगा वही, उचित है जो कुछ होना,
इस मिट्टी पर सदा निछावर है वह सोना।
तुम इस पुर की ज्योति, अहो! यों धैर्य न खोओ,
प्रभु के स्वागत-हेतु, गीत रच, थाल सँजोओ।”
“वीरो, पर, यह योग भला क्यों खोऊँगी मैं,
अपने हाथों घाव तुम्हारे धोऊँगी मैं।
पानी दूँगी तुम्हें, न पल भर सोऊँगी मैं,
गा अपनों की विजय, परों पर रोऊँगी मैं।”
पृ. ३१७
सेना तैयार खड़ी है। उसका सेनापति अभी-अभी कह चुका है: जाओ, सोने की लंका लूट लो। और जिसे सब भूल चुके थे, वह उसके सामने आ खड़ी होती है, बाल खुले, हाथ में शूल, और कहती है: नहीं, नहीं।
देखिए, वह सेना के सामने किसलिए खड़ी है। उसे जाने से रोकने के लिए नहीं। लूट रोकने के लिए। सोने का ध्यान भी मत लाओ। जाओ तो मान के लिए, नहीं तो मत जाओ। और फिर वह वाक्य जो आख़िरी घेरे को मोड़ देता है: शत्रु भी आज तुमसे ऐसी शिक्षा पाए, जिसका अथ हो दण्ड और इति दया-तितिक्षा।
वे उससे विनती करते हैं कि घर रहे, स्वागत के गीत रचे। वह कहती है, यह अवसर मैं क्यों खोऊँ। अपने हाथों तुम्हारे घाव धोऊँगी। पानी दूँगी। अपनों की विजय गाऊँगी, और परों पर रोऊँगी।
यही घेरे का आख़िरी छल्ला है: कोई दूसरा आदमी, संसार, उस पार वाला भी। इस क्षेत्र में जो भी युद्ध लड़ा जाता है, नशे पर युद्ध, नशा करने वाले पर युद्ध, घर का अपने ही किसी पर युद्ध, वह सोने के लिए निकलता है: जीतने, सज़ा देने, सही साबित होने। ऊर्मिला हर ऐसी सेना के सामने खड़ी होकर कहती है: नहीं। शुरुआत किसी से भी हो, अन्त दया में हो। और जब सब हो चुके, वह पानी लिये वहाँ होगी, दोनों ओर के लिए।
सर्ग १२ / १२ · घेरा: दुनिया, और फिर प्रेम
लौटना
जैसी हूँ
बारहवाँ सर्ग। चौदह बरस पूरे हो गये। लक्ष्मण घर आ गये हैं। सखी उसे वैसे सजाना चाहती है जैसी वह ब्याह के दिन थी।
“हाय! सखी, शृङ्गार? मुझे अब भी सोहेंगे?
क्या वस्त्रालंकार मात्र से वे मोहेंगे?
पृ. ३३०
मैंने जो वह ‘दग्ध-वर्त्तिका’ चित्र लिखा है,
तू क्या उसमें आज उठाने चली शिखा है?
नहीं, नहीं, प्राणेश मुझी से छले न जावें,
जैसी हूँ मैं, नाथ मुझे वैसा ही पावें।
पृ. ३३१
और लक्ष्मण, जब वे मिलते हैं:
मिला उसी दिन किन्तु तुम्हें मैं खोया खोया,
जिस दिन आर्या विना आर्य का मन था रोया।
पूर्ण रूप से सुनो, तुम्हें मैंने कब पाया,
जब आर्या का हनूमान ने विरह सुनाया!
अब तक मानो जिसे वेषभूषा में टाला,
अपने को ही आज मुझे तुमने दे डाला।
आँखों में ही रही अभी तक तुम थीं मानो,
अन्तस्तल में आज अचल निज आसन जानो।
पृ. ३३२
…
धन्य अनावृत-प्रकृत-रूप यह मेरे आगे।
…
“वह वर्षा की बाढ़, गई, उसको जाने दो,
शुचि-गंभीरता प्रिये, शरद की यह आने दो।”
पृ. ३३३
यहाँ लौटने के बारे में संसार जो कुछ कहता है, सब उलट जाता है।
उसकी सखी उसे वैसे सजाना चाहती है जैसी वह थी, चौदह बरस पहले की दुल्हन। वह मना कर देती है। वह यौवन अब कहीं मिलने वाला नहीं। और वह उससे उन्हें छलना भी नहीं चाहती। जैसी हूँ मैं, नाथ मुझे वैसा ही पावें। जैसी थी, वैसी नहीं। लौटाने को कुछ नहीं, क्योंकि कुछ खोया नहीं गया। कोई पहले वाला “मैं” नहीं जिसकी ओर लौटना है। यही वाली है, और यही वाली वह चाहता है।
और फिर वह वह बात कहता है जो “पहले जैसा हो जाने” की हर कहानी को खोल देती है। उसने उसे ब्याह के दिन नहीं पाया। पूरा उसे तब पाया जब समझा कि विरह क्या होता है। तब तक वह उसकी आँखों में थी; अब उसके अन्तस्तल में है। अलग बीते बरस ही वह जगह थे जहाँ उन्होंने एक-दूसरे को पाया।
वह वर्षा की बाढ़ गई, उसको जाने दो; शुचि-गंभीरता शरद की यह आने दो।
जो लौटता है, उसके लिए, और जो घर उसे लेता है, उसके लिए: लौटने को सजाइए मत। जो थे, वह बनने की कोशिश मत कीजिए। जैसे हैं, वैसे पाए जाइए।
भोर
अब दीये की ज़रूरत नहीं। पहली बार पूरा फड़ उजाले में है। उसके पहले चित्र में अभिषेक पूरा हो गया है: वे दोनों, बिना सजावट के, और पीली लकीर अब भी घट तक बहती हुई।
कमल, तुम्हारा दिन है और कुमुद, यामिनी तुम्हारी है,
कोई हताश क्यों हो, आती सबकी समान वारी है।
गुप्त का निवेदन, साकेत, पृ. ३
अब चित्र को देखिए। पहली रात उसमें उसकी कोई जगह नहीं थी। उसके काँपते हाथ से जो रंग अभिषेक के घट पर बह गया था, वह अब भी वहीं है। वही पहली चीज़ थी जो उसने उसकी बनायी थी।
सोने से पहले, एक बार देखिए कि अपने घर के चित्र में आपने खुद को कहाँ रखा है। अगर किनारे पर पाएँ, तो हिलने की ज़रूरत नहीं। बस देख लीजिए कि तूलिका किसके हाथ में है।