Maithilīśaraṇ Gupt · Sāket · a kathputli

मैं वही केकयी · I am the same Kaikeyī

Two strings, one at the head and one at the waist, and a queen who moved as they were pulled. Every scene of Sāket that Kaikeyī is in, whole, played as a Rajasthani string puppet, until the strings are cut.

What a kathputli is

In Nagaur, in the desert of Rajasthan, there are families of Bhāṭs who once went from village to village with two trades. They kept the family histories of the villages, and they played the kathputli, the wooden doll. They carve and paint the dolls themselves. Most have no legs, only long skirts that twirl. Two strings hold each one: one around the waist, one at the top of the head, joined in a loop the puppeteer works between his fingers. There is nothing else. The doll moves as it is pulled.

The head of the family speaks for the dolls through a reed in his mouth, the boli, a whistling speech the audience cannot understand. A woman of the family sits outside the stage and tells the story in words they can.

Three things about it are true of this page.

A doll moves as it is pulled, and the one who pulls is not on the stage. Every man who has been led by a craving knows the two strings: one at the head, a thought he did not choose, and one at the waist, an old promise that was owed him.

The voice that moves the doll is a whistle nobody can follow. The voice that tells the truth of it is a woman's, in plain words. Kaikeyī is moved by a whisper, and at the end she speaks for herself.

And the puppeteers kept the histories of families. Kaikeyī asks for exactly that: that the story of the unlucky queen be told in the family for ever. This page tells it, and tells the end of it too.

The facts about the kathputli are from Françoise Gründ and Puran Bhatt, "Kathputli ka Khel", World Encyclopedia of Puppetry Arts (UNIMA), 2012.

Before the strings

The night before the coronation, the queen sees her maid looking sad, and asks why. When Mantharā hints that Rāma is not her son, this is Kaikeyī's first answer:

वचन क्यों कहती है तू वाम ?

नहीं क्या मेरा बेटा राम ?

p. 19

In our English Why do you say such twisted things? Is Rāma not my son?

Hold this line through everything that follows. Before any string was tied, this is who she was. Not a woman waiting for a chance. A mother who could not imagine Rāma as anyone's but hers.

Nothing in her was missing. Something was put in.

The stage is below. ↓

Each arch is a scene. Open them in turn, from the left.

123456

When all six scenes are played, the strings are cut.

Read it without the stage

Scene 1 of 6 · Ring 3: the mind

The two strings

Mantharā's one sentence: Bharata, such a son, is sent off to his uncle's and not even called home for the crowning. Kaikeyī drives her out. But the sentence stays, and the wind, the walls, her own ears say it back to her. Lying alone, she argues with it: Bharata is spotless, Rāma is the eldest, the king is generous. And still: then why was he not called? She breaks her jewels and lies on the floor. The king comes, kneels on the ground beside her for the first time, and reminds her himself of the two boons he owes her. She asks for them.

Gupt's lines

गई दासी, पर उसकी बात , दे गई मानो कुछ आघात—

लगा दी किसने आकर आग ? कहाँ था तू संशय के नाग ?

नाथ, कैकेयी के वर-वित्त , चीरकर देखो उसका चित्त । स्वार्थ का वहाँ नहीं है लेश ,

तुम्हें पहले ही दो वरदान , प्राप्य हैं, फिर भी क्यों यह मान ?

“नाथ, मुझको दो यह वर एक— भरत का करो राज्य-अभिषेक । दूसरा, सुन लो, न हो उदास , चतुर्दश वर्ष राम - वन - वास !”

pp. 18 to 34

In our English The maid was gone, but her words had dealt a kind of blow. Who came and set this fire? Where were you hiding, serpent of doubt? My lord, you who owe Kaikeyī her boons, cut open her heart and look: there is not a trace of self-seeking there. You have two boons already owed you; why then this sulking? "My lord, give me this one boon: crown Bharata. And the second, hear it, and do not be sad: fourteen years of forest for Rāma."

Here are the two strings. The head string is a sentence she did not think of herself. She threw the woman out; the sentence stayed in. Every man who has used knows that: the friend leaves, the thought stays, and by night it is speaking in your own voice.

The waist string is older. The boons were not hers to remember. It was the king who reminded her, kneeling, wanting her to smile. The one who most loved her handed her the second string.

And see where Gupt places the fault. Not in her. "Who came and set this fire?" She is a mind arguing with something that was put into it, and losing.

Gupt, the whole scene · pp. 18 to 34

p. 18

द्वितीय सर्ग

लेखनी, अब किसलिए विलम्ब ?
बोल,—जय भारति, जय जगदम्ब ।
प्रकट जिसका यों हुआ प्रभात ,
देख अब तू उस दिन की रात ।

धरा पर धर्मादर्श - निकेत ,
धन्य है स्वर्ग - सदृश साकेत ।
बढ़े क्यों आज न हर्षोद्रेक ?
राम का कल होगा अभिषेक ।
दशों दिग्पालों के गुण-केन्द्र ,
धन्य हैं दशरथ मही - महेन्द्र ।
त्रिवेणी - तुल्य रानियाँ तीन ,
बहाती सुख - प्रवाह नवीन ।
मोद का आज न ओर न छोर ,
आम्र वन-सा फूला सब ओर ।
किन्तु हा ! फला न सुमन-क्षेत्र ,
कीट बन गये मन्थरा - नेत्र ।
देखकर कैकेयी यह हाल ,
आप उससे बोली तत्काल—
“अरी, तू क्यों उदास है आज ,
वत्स जब कल होगा युवराज ?”
मन्थरा बोली निस्संकोच—
“आपको भी तो है कुछ सोच ?”

p. 19

हँसी रानी सुनकर वह बात ,
उठी अनुपम आभा अवदात ।
“सोच है मुझको निस्सन्देह ,
भरत जो है मामा के गेह ।
सफल करके निज निर्मल-दृष्टि ,
देख वह सका न यह सुख-सृष्टि !”
ठोककर अपना क्रूर - कपाल ,
जताकर यही कि फूटा भाल ,
किंकरी ने तब कहा तुरन्त—
“हो गया भोलेपन का अन्त !”
न समझी कैकेयी वह बात ,
कहा उसने—“यह क्या उत्पात ?
वचन क्यों कहती है तू वाम ?
नहीं क्या मेरा बेटा राम ?”
“और वे औरस भरत कुमार ;”
कुदासी बोली कर फटकार ।
कहा रानी ने पाकर खेद—
“भला दोनों में है क्या भेद ?”
“भेद ?”—दासी ने कहा सतर्क—
“सबेरे दिखला देगा अर्क ।
राजमाता होंगी जब एक ,
दूसरी देखेंगी अभिषेक !”
रोककर कैकेयी ने रोष ,
कहा—“देती है किसको दोष ?
राम की माँ क्या कल या आज ,
कहेगा मुझे न लोक - समाज ?”
कहा दासी ने धीरज त्याग—
“लगे इस मेरे मुँह में आग ।
मुझे क्या, मैं होती हूँ कौन ?
नहीं रहती हूँ फिर क्यों मौन ?

p. 20

देखकर किन्तु स्वामि-हित-घात ,
निकल ही जाती है कुछ बात ।
इधर भोली हैं जैसी आप ,
समझती सबको वैसी आप ।
नहीं तो यह सीधा षड्यन्त्र ,
रचा क्यों जाता यहाँ स्वतन्त्र ?
महारानी कौसल्या आज ,
सहज सज लेतीं क्या सब साज ?”
कहा रानी ने—“क्या षड्यन्त्र ?
वचन हैं तेरे मायिक मन्त्र ।
हुई जाती हूँ मैं उद्भ्रान्त ,
खोलकर कह तू सब वृत्तान्त ।”
मन्थरा ने फिर ठोका भाल—
“शेष है अब भी क्या कुछ हाल ?
सरलता भी ऐसी है व्यर्थ ,
समझ जो सके न अर्थानर्थ ।
भरत को करके घर से त्याज्य ,
राम को देते हैं नृप राज्य ।
भरत-से सुत पर भी सन्देह ,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह !”
कहा कैकेयी ने सक्रोध—
“दूर हो दूर अभी निर्बोध !
सामने से हट, अधिक न बोल ,
द्विजिह्वे, रस में विष मत घोल ।
उड़ाती है तू घर में कीच ,
नीच ही होते हैं बस नीच ।
हमारे आपस के व्यवहार ,
कहाँ से समझे तू अनुदार ?”
हुआ भ्रूकुंचित भाल विशाल ,
कपोलों पर हिलते थे बाल ।

p. 21

प्रकट थी मानो शासन - नीति ,
मन्थरा सहमी देख सभीत ।
तीक्ष्ण थे लोचन अटल अडोल ,
लाल थे लाली भरे कपोल ,
न दासी देख सकी उस ओर ,
जला दे कहीं न कोप कठोर ।
किन्तु वह हटी न अपने आप ,
खड़ी ही रही नम्र चुपचाप !
अन्त में बोली स्वर-सा साध—
“क्षमा हो मेरा यह अपराध ।
स्वामि-सम्मुख सेवक या भृत्य ,
आप ही अपराधी हैं नित्य ।
दण्ड दें कुछ भी, आप समर्थ ,
कहा क्या मैंने अपने अर्थ ?
समझ में आया जो कुछ मर्म ,
उसे कहना था मेरा धर्म ।
न था यह मेरा अपना कृत्य ,
भर्तृ हैं भर्तृ, भृत्य हैं भृत्य ।”
मही पर अपना माथा टेक ,
भरा था जिसमें अति अविवेक ,
किया दासी ने उसे प्रणाम ,
और वह चली गई अविराम ।

गई दासी, पर उसकी बात ,
दे गई मानो कुछ आघात—
‘भरत-से सुत पर भी सन्देह ,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह !’
पवन भी मानो उसी प्रकार ,
शून्य में करने लगा पुकार—

p. 22

‘भरत-से सुत पर भी सन्देह ,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह !’
गूँजते थे रानी के कान ,
तीर-सी लगती थी वह तान—
‘भरत-से सुत पर भी सन्देह ,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह !’
मूर्ति-सी बनी हुई उस ठौर ,
खड़ी रह सकी न अब वह और ।
गई शयनालय में तत्काल ,
गभीरा सरिता-सी थी चाल ।
न सहकर मानो तनु का भार ,
लेटकर करने लगी विचार ।
कहा तब उसने—“हे भगवान ,
आज क्या सुनते हैं ये कान ?
मनोमन्दिर की मेरी शान्ति ,
बनी जाती है क्यों उत्क्रान्ति ?
लगा दी किसने आकर आग ?
कहाँ था तू संशय के नाग ?
नाथ, कैकेयी के वर-वित्त ,
चीरकर देखो उसका चित्त ।
स्वार्थ का वहाँ नहीं है लेश ,
बसे हो एक तुम्हीं प्राणेश !
सदा थे तुम भी परमोदार ,
हुआ क्यों सहसा आज विकार ?
भरत-से सुत पर भी सन्देह ,
बुलाया तक न उसे जो गेह !
न थी हम माँ बेटे की चाह ,
आह ! तो खुली न थी क्या राह ?
मुझे भी भाई के घर नाथ ,
भेज क्यों दिया न सुत के साथ ?

p. 23

राज्य का अधिकारी है ज्येष्ठ ,
राम में गुण भी हैं सब श्रेष्ठ ।
भला फिर भी क्या मेरा वत्स ,
शान्त रस में बनता वीभत्स ?
तुम्हारा अनुज भरत हे राम ,
नहीं है क्या नितान्त निष्काम ?
जानते जितना तुम कुलधन्य ,
भरत को कौन जानता अन्य ?
भरत रे भरत, शील-समुदाय ,
गर्भ में आकर मेरे हाय !
हुआ यदि तू भी संशय-पात्र ,
दग्ध हो तो मेरा यह गात्र !
चली जा पृथिवी, तू पाताल ,
आपको संशय में मत डाल ।
कहीं तुझ पर होता विश्वास ,
भरत में पहले करता वास ।
अरे विश्वास, विश्व-विख्यात ,
किया है किसने तेरा घात ?
भरत ने ? वह है तेरी मूर्ति ,
राम ने ? वह है प्राणस्फूर्ति ।
देव ने ? वे हैं सदय सदैव ,
दैव ने ? हा घातक दुर्दैव !
तुझे क्या हे अदृष्ट, है इष्ट ?
सूर्य - कुल का हो आज अनिष्ट ?
बाँध सकता है कहाँ परन्तु—
राघवों को अदृष्ट का तन्तु ?
भाग्य - वश रहते हैं बस दीन ,
वीर रखते हैं उसे अधीन ।
हाय ! तब तूने अरे अदृष्ट ,
किया क्या जीजी को आकृष्ट ?

p. 24

जानकर अबला, अपना जाल—
दिया है उस सरला पर डाल ?
किन्तु हा ! यह कैसा सारल्य ?
सालता है जो बनकर शल्य ।
भरत-से सुत पर भी सन्देह ,
बुलाया तक न उसे जो गेह !
बहन कौसल्ये, कह दो सत्य ,
भरत था मेरा कभी अपत्य ?
पुत्र था कभी तुम्हारा राम ?
हाय रे ! फिर भी यह परिणाम ?
किन्तु चाहे जो कुछ हो जाय ,
सहूँगी कभी न यह अन्याय ।
करूँगी मैं इसका प्रतिकार ,
पलट जावे चाहे संसार ।
नहीं है कैकेयी निर्बोध ,
पुत्र का भूले जो प्रतिशोध ।
कहें सब मुझको लोभासक्त ,
किन्तु सुत, हूजो तू न विरक्त ।”

भरत की माँ हो गई अधीर ,
क्षोभ से जलने लगा शरीर ।
दाह से भरा सौतिया डाह ,
बहाता है बस विषप्रवाह ।
मानिनी कैकेयी का कोप ,
बुद्धि का करने लगा विलोप ।
और रह सकी न अब वह शान्त ,
उठी आँधी - सी होकर भ्रान्त ।
एड़ियों तक आ छूटे केश ,
हुआ देवी का दुर्गा-वेश ।

p. 25

पड़ा तब जिस पदार्थ पर हस्त ,
उसे कर डाला अस्त-व्यस्त ।
तोड़कर फेंके सब शृङ्गार ,
अश्रुमय - से थे मुक्ता - हार ।
मत्त करिणी-सी दलकर फूल ,
घूमने लगी आपको भूल ।
चूर कर डाले सुन्दर चित्र ,
हो गये वे भी आज अमित्र !
बताते थे आ आकर श्वास—
हृदय का ईर्ष्या-वह्नि-विकास ।
पतन का पाते हुए प्रहार ,
पात्र करते थे हाहाकार—
“दोष किसका है, किस पर रोष ,
किन्तु यदि अब भी हो परितोष !”

इसी क्षण कौशल्या अन्यत्र ,
सजाकर पट - भूषण एकत्र—
वधू को युवराज्ञी के योग्य ,
दे रही थीं उपदेश मनोज्ञ ।
इधर कैकेयी उनका चित्र ,
खींचती थी सम्मुख अपवित्र ।
दोष - दर्शी होता है द्वेष ,
गुणों को नहीं देखता त्वेष ।
राजमाता होकर प्रत्यक्ष ,
उसे करके वे मानो लक्ष ,
खड़ी हँसती हैं बारंबार ,
हँसी है वह या असि की धार ?
उठी तत्क्षण कैकेयी काँप ,
अधर - दंशन करके कर चाँप ।

p. 26

भूमि पर पटक पटककर पैर ,
लगी प्रकटित करने निज वैर ।
अन्त में सारे अंग समेट ,
गई वह वहीं भूमि पर लेट ।
छोड़ती थी जब तब हुङ्कार ,
चुटीली फणिनी - सी फुङ्कार !

इधर यों हुआ रंग में भंग ,
ऊर्मिला उधर प्राणपति - संग ।
भरत-विषयक ही वार्त्तालाप ,
छेड़कर सुनती थी चुपचाप ।
बताते थे लक्ष्मण वह भेद ,
कि “इसका है हम सबको खेद ।
किन्तु अवसर था इतना अल्प ,
न आ सकते वे शुभ-संकल्प ।
परे थी और न ऐसी लग्न ,
पिता भी थे आतुरता - मग्न ।
चलो, अविभिन्न आर्य की मूर्ति ,
करेगी भरत-भाव की पूर्ति ।”

इस समय क्या करते थे राम ?
हृदय के साथ हृदय - संग्राम ।
उच्च हिमगिरि-से भी वे धीर ,
सिन्धु-सम थे सम्प्रति गम्भीर ।
उपस्थित वह अपार अधिकार ,
दीख पड़ता था उनको भार ।
पिता का निकट देख वन-वास ,
हो रहे थे वे आप उदास ।

p. 27

हाय ! वह पितृ-वत्सलता-भोग ,
और निज बाल्यभाव का योग ,
विगत-सा समझ एक ही सङ्ग ,
शिथिल-से थे उनके सब अङ्ग ।
कहा वैदेही ने—“हे नाथ ,
अभी तक चारों भाई साथ—
भोगते थे तुम सम-सुख-भोग ,
व्यवस्था मेट रही वह योग ।
भिन्न-सा करके कोसलराज—
राज्य देते हैं तुमको आज ।
तुम्हें रुचता है यह अधिकार ?”
“राज्य है प्रिये, भोग या भार ?
बड़े के लिए बड़ा ही दण्ड !
प्रजा की थाती रहे अखण्ड ।
तदपि निश्चिन्त रहो तुम नित्य ,
यहाँ राहित्य नहीं, साहित्य ।
रहेगा साधु भरत का मन्त्र ,
मनस्वी लक्ष्मण का बल - तन्त्र ।
तुम्हारे लघु देवर का धाम ,
मात्र दायित्व-हेतु है राम ।”
“नाथ, यह राज-नियुक्ति पुनीत ,
किन्तु लघु देवर की है जीत ।
हुआ जिनके अधीन नृप-गेह ,—
सचिव - सेनापति-सह सस्नेह !”

कोपना कैकेयी की बात—
किसी को न थी अभी तक ज्ञात ।
न जाने पृथ्वी पर प्रच्छन्न
कहाँ क्या होता है प्रतिपन्न !

p. 28

भूप क्या करते थे इस काल ?
लेखनी, लिख उनका भी हाल ।
भूप बैठे थे कुलगुरु - संग ,
भरत का ही था छिड़ा प्रसंग ।
कहा कुलगुरु ने—“निस्सन्देह ,
खेद है भरत नहीं जो गेह ।
किन्तु यह अवसर था उपयुक्त ,
कि नृप हो जावें चिन्ता-मुक्त ।”
भूप बोले—“हाँ, मेरा चित्त ,
विकल था आत्म-भविष्य-निमित्त ।
इसी से था मैं अधिक अधीर ,
आज है तो कल नहीं शरीर !
मारकर धोखे में मुनि बाल ,
हुआ था मुझको शाप कराल ।
कि ‘तुमको भी निज पुत्र-वियोग ,
बनेगा प्राण - विनाशक रोग ।’
अस्तु यह भरत-विरह अक्लिष्ट ,
दुखमय होकर भी था इष्ट ।
इसी मिष था पाऊँ चिरशान्ति ,
सहज ही समझूँ तो निष्क्रान्ति !”
दिया नृप को वसिष्ठ ने धैर्य ,
कहा—“यह उचित नहीं अस्थैर्य ।
ईश के इंगित के अनुसार ,
हुआ करते हैं सब व्यापार ।”
“ठीक है” इतना कह कर भूप ,
शान्त हो गये सौम्य शुभरूप ।
हो रहा था उस समय दिनान्त ,
वायु भी था मानो कुछ श्रान्त ।
गोत्र - गुरु और देव भी आद्य ,
प्रणति युत पाकर अर्घ्य सपाद्य ,

p. 29

गये तब जाना था जिस ओर ,
चले नृप भी भीतर इस ओर ।

अरुण सन्ध्या को आगे ठेल ,
देखने को कुछ नूतन खेल ,
सजे विधु की बेंदी से भाल ,
यामिनी आ पहुँची तत्काल ।
सामने कैकेयी का गेह ,
शान्त देखा नृप ने सस्नेह ।
मन्थरा किन्तु गई थी ताड़ ,
कि यह है ज्वालामुखी पहाड़ !
पधारे तब भीतर भूपाल ,
वहाँ जाकर देखा जो हाल ,
रह गये उससे वे जड़ - तुल्य ,
बढ़ा भय - विस्मय का बाहुल्य ।
न पाकर मानो, आज शिकार ,
सिंहनी सोती थी सविकार ।
कोप क्या इसका यह एकान्त ,
प्राण लेकर भी होगा शान्त ?
कुशल है यदि ऐसा हो जाय ,
भूप-मुख से निकला बस “हाय !”
टूटकर यह तारा इस रात ,
न जाने, क्या न करे उत्पात !
पड़ी थी बिजली - सी विकराल ,
लपेटे थे घन - जैसे बाल !
कौन छेड़े ये काले साँप ?
अवनिपति उठे अचानक काँप ।
किन्तु क्या करते, धीरज धार ,
बैठ पृथिवी पर पहली बार ,

p. 30

खिलाते - से वे व्याल विशाल ,
विनयपूर्वक बोले भूपाल—
“प्रिये, किसलिए आज यह क्रोध ?
नहीं होता कुछ मुझको बोध ।
तुम्हारा धन है मान अवश्य ,
किन्तु हूँ मैं तो यों ही वश्य ।
जान पड़ता यह नहीं विनोद ,
आज यद्यपि सबको है मोद ।
सजे जाते हैं सुख के साज ,
तुम्हें क्या दुःख हुआ है आज ?
अम्ल होकर भी मधुर रसाल ,
गया निज प्रणय-कलह का काल ,
आज होकर हम रागातीत ,
हुए प्रेमी से पितर पुनीत ।
भरत की अनुपस्थिति का खेद ,
किन्तु है इसमें ऐसा भेद ,
निहित है जिसमें मेरा क्षेम ,
प्रिये, प्रत्यय रखता है प्रेम ।
हुआ हो यदि कुछ रोग-विकार ,
बुलाऊँ वैद्य, करूँ उपचार ।
अमृत भी मुझको नहीं अलभ्य ,
कि मैं हूँ अमर-सभा का सभ्य ।
किया हो कहीं किसीने दोष ,
कि जिसके कारण है यह रोष ,
बता दो तो तुम उसका नाम ,
दैव है निश्चय उस पर वाम ।
सुनूँ मैं उसका नाम सुमिष्ट ,
कौन - सी वस्तु तुम्हें है इष्ट ?
जहाँ तक दिनकर-कर-प्रसार ,
वहाँ तक समझो निज अधिकार ।

p. 31

किसी को करना हो कुछ दान ,
करो तो दुगना आज प्रदान ।
भरे रत्नाकर - सा भण्डार ,
रीत सकता है किसी प्रकार ?
माँगना हो तुमको जो आज ,
माँग लो, करो न कोप न लाज ।
तुम्हें पहले ही दो वरदान ,
प्राप्य हैं, फिर भी क्यों यह मान ?
याद है वह संवर - रण - रङ्ग ,
विजय जब मिली व्रणों के सङ्ग ?
किया था किसने मेरा त्राण ?
विकल क्यों करती हो अब प्राण ?”

हुआ सचमुच यह प्रिय संवाद ,
आ गई कैकेयी को याद ।
बिना खोले फिर भी वह नेत्र ,
चलाने लगी वचन मय वेत्र ।
“चलो रहने दो झूठी प्रीति ,
जानती हूँ मैं यह नृप - नीति ।
दिया तुमने मुझको क्या मान ,
वचन मय वही न दो वरदान ?”
भूप ने कहा—“न मारो बोल ,
दिखाऊँ कहो हृदय को खोल ?
तुम्हींने माँगा कब क्या आप ?
प्रिये, फिर भी क्यों यह अभिशाप ?
भला, माँगो तो कुछ इस बार ,
कि क्या दूँ दान, नहीं उपहार ?”
मानिनी बोली निज अनुरूप—
“न दोगे वे दो वर भी भूप !”

p. 32

कहा नृप ने लेकर निःश्वास—
“दिलाऊँ मैं कैसे विश्वास ?
परीक्षा कर देखो कमलाक्षि ,
सुनो तुम भी सुरगण, चिरसाक्षि !
सत्य से ही स्थिर संसार ,
सत्य ही सब धर्मों का सार ।
राज्य ही नहीं, प्राण-परिवार ,
सत्य पर सकता हूँ सब वार ।”
सरल नृप को छलकर इस भाँति ,
गरल उगले उरगी जिस भाँति ,
भरत-सुत-मणि की माँ मुदमान ,
माँगने चली अभय वरदान—
“नाथ, मुझको दो यह वर एक—
भरत का करो राज्य-अभिषेक ।
दूसरा, सुन लो, न हो उदास ,
चतुर्दश वर्ष राम - वन - वास !”

बचन सुन ऐसे क्रूर - कराल ,
देखते ही रह गये नृपाल ।
वज्र-सा पड़ा अचानक टूट ,
गया उनका शरीर - सा छूट !
उन्हें यों हतज्ञान - सा देख ,
ठोकती-सी छाती पर मेख ,
पुनः बोली वह भौंहें तान—
“मौन हो गये, कहो हाँ या न !”
भूप फिर भी न सके कुछ बोल ,
मूर्ति - से बैठे रहे अडोल ।
दृष्टि ही अपनी करुण - कठोर ,
उन्होंने डाली उसकी ओर !

p. 33

कहा फिर उसने देकर क्लेश—
“सत्य-पालन है यही नरेश ?
उलट दो बस तुम अपनी बात ,
मरूँ मैं करके अपना घात ।”
कहा तब नृप ने किसी प्रकार—
“मरो तुम क्यों, भोगो अधिकार ।
मरूँगा तो मैं अगति - समान ,
मिलेंगे तुम्हें तीन वरदान !”
देख ऊपर को अपने आप ,
लगे नृप करने यों परिताप—
“देव, यह सपना है कि प्रतीति ?
यही है नर - नारी की प्रीति ?
किसी को न दें कभी वर देव ,
वचन देना छोड़ें नर - देव ।
दान में दुरुपयोग का वास ,
किया जावे किसका विश्वास ?
जिसे चिन्तामणि - माला जान ,
हृदय पर दिया प्रधान स्थान ,
अन्त में लेकर यों विष-दन्त ,
नागिनी निकली वह हा हन्त !
राज्य का ही न तुझे था लोभ ,
राम पर भी था इतना क्षोभ ?
न था वह निस्पृह तेरा पुत्र ?
भरत ही था क्या मेरा पुत्र ?
राम-से सुत को भी वनवास ,
सत्य है यह अथवा परिहास ?
सत्य है तो है सत्यानाश ,
हास्य है तो है हत्या-पाश !”
प्रतिध्वनि-मिष ऊँचा प्रासाद ,
निरन्तर करता था अनुनाद ।

p. 34

पुनः बोले मुँह फेर महीप—
“राम, हा राम, वत्स, कुलदीप !”
हो गये गद्गद वे इस वार ,
तिमिरमय जान पड़ा संसार ।
गृहागत चन्द्रालोक-विधान ,
जँचा निज भावी शव-परिधान !
सौध बन गया श्मशान-समान ,
मृत्यु-सी पड़ी केकयी जान ।
चिता के अंगारे-से दीप ,
जलाते थे प्रज्वलित समीप !
“हाय ! कल क्या होगा ?” यह काँप ;
रहे वे घुटनों में मुँह ढाँप ।
आपसे ही अपने को आज ,
छिपाते थे मानो नरराज !
वचन पलटें कि भेजें राम को वन में ,
उभय विध मृत्यु निश्चित जानकर मन में ,
हुए जीवन - मरण के मध्य धृत - से वे ,
रहे बस अर्द्ध जीवित, अर्द्ध मृत - से वे ।
इसी दशा में रात कटी ,
छाती-सी पौ प्रात फटी ।
अरुण भानु प्रतिभात हुआ ,
विरूपाक्ष - सा ज्ञात हुआ !

Scene 2 of 6 · Ring 4: the family

The thorn

Morning. Rāma comes and finds his father fallen, and asks her what this is: let him pick the thorn out of his father's path. "I am the thorn," she says, and is silent. The king cries out at her. Rāma takes the forest gladly. Lakṣmaṇa, beside himself, calls her every name he has. She says nothing, bites her lip and takes it. Rāma stops him, and asks her to forgive him. Later, when Sumantra speaks against her, Rāma says: she too is my mother.

Gupt's lines

“सुनो, हे राम ! कण्टक आप हूँ मैं , कहूँ क्या और, बस चुपचाप हूँ मैं ।”

खड़ी है माँ बनी जो नागिनी यह , अनार्या की जनी, हतभागिनी यह ,

वचन सुन केकयी कुछ भी न बोली , गरल की गाँठ होठों पर न घोली । विवश थी, वाक्य उनके सह गई वह , अधर ही काटकर बस रह गई वह ।

क्षमा तुम भी करो सौमित्र को माँ ! न रक्खो चित्त में उस चित्र को माँ !

खड़ी थी केकयी, पर चित्त चल था ,— “कहा जो राम ने सच था कि छल था ?”

पर वे मेरे भ्राता हैं , मँझली माँ भी माता हैं ।

pp. 35 to 49, p. 52, pp. 62 to 63

In our English "Listen, Rāma: I myself am the thorn. What more can I say? I am silent." (Lakṣmaṇa:) She who stands there as a mother has become a serpent, born of a barbarian woman, ill-fated. Hearing his words Kaikeyī said nothing; she did not untie the knot of poison on her lips. Helpless, she bore his words, and only bit her lip. (Rāma:) Mother, forgive Saumitri too; do not keep that picture in your heart. Kaikeyī stood there, but her mind was moving: "Was what Rāma said true, or a trick?" (Rāma:) But they are my brothers, and the middle mother too is a mother.

She calls herself the thorn before anyone else does. That is not the voice of the strings. That is her own.

Then come the names. A man who has used has heard every one of them, from the people who love him most, on the worst morning. Gupt does not soften them, and neither do we. Look at what she does: nothing. She bites her lip and bears it. And the strings are still pulling: even Rāma's kindness she cannot trust. Was it true, or a trick?

And Rāma, who loses everything here, will not let the family throw her out of it. Forgive him, mother. She too is my mother. The family's first word for the one who did the harm is not a name. It is "mother".

Gupt, the whole scene · pp. 35 to 49, p. 52, pp. 62 to 63

p. 35

तृतीय सर्ग

जहाँ अभिषेक-अम्बुद छा रहे थे ,
मयूरों-से सभी मुद पा रहे थे ।
वहाँ परिणाम में पत्थर पड़े यों ;
खड़े ही रह गये सब थे खड़े ज्यों ।
करें कब क्या, इसे बस राम जानें ,
वही अपने अलौकिक काम जानें ।
कहाँ है कल्पने ! तू देख आकर ,
स्वयं ही सत्य हो यह गीत गाकर ।
विदा होकर प्रिया से वीर लक्ष्मण—
हुए नत राम के आगे उसी क्षण ।
हृदय से राम ने उनको लगाया ,
कहा, “प्रत्यक्ष यह साम्राज्य पाया ।”
हुआ सौमित्र को संकोच सुनके ,
नयन नीचे हुए तत्काल उनके ।
न वे कुछ कह सके प्रतिवाद-भय से ,
समझते भाग्य थे अपना हृदय से ।
कहा आनन्दपूर्वक राम ने तब—
“चलो, पितृ-वन्दना करने चलें अब ।”
हुए सौमित्रि पीछे, राम आगे—
चले तो भूमि के भी भाग्य जागे ।
अयोध्या के अजिर को व्योम जानो ,
उदित उसमें हुए सुरवैद्य मानो ।

p. 36

कमल-दल-से बिछाते भूमितल में ,
गये दोनों विमाता के महल में ।

पिता ने उस समय ही चेत पाकर ,
कहा, “हा राम, हा सुत, हा गुणाकर !”
सुना करुणा-भरा निज नाम ज्यों ही ,—
चकित होकर बढ़े झट राम त्यों ही ।
अनुज-युत हो उठे व्याकुल बड़े वे ,
हुए जाकर पिता - सम्मुख खड़े वे ।
दशा नृप की विकट संकटमयी थी ,
नियति-सी पास बैठी केकयी थी ।
अनैसर्गिक घटा-सी छा रही थी ,
प्रलय-घटिका प्रकटता पा रही थी ।
नृपति कुछ स्वप्नगत-से मौन रहकर—
पुनः चिल्ला उठे, “हा राम !” कहकर ।
कहा तब राम ने, “हे तात ! क्या है ?
खड़ा हूँ राम यह मैं, बात क्या है ?
हुए क्यों मौन फिर तुम ? हाय ! बोलो ,
उठो, आदेश दो, निज नेत्र खोलो ।”
वचन सुनकर फिरा फिर बोध नृप का ,
हुआ पर साथ ही हृद्रोध नृप का ।
पलक सूजे हुए निज नेत्र खोले ,
रहे वे देखते ही, कुछ न बोले !
पिता की देखकर ऐसी अवस्था ,
भँवर में पोत की जैसी अवस्था !
अवनि की ओर दोनों ने विलोका ,
बड़े ही कष्ट से निज वेग रोका ।
बढ़ाई राम ने फिर दृष्टि-रेखा ,
विमाता केकयी की ओर देखा ।

p. 37

कहा भी, “देवि ! यह क्या है, सुनूँ मैं ,
कुसुम-सम तात के कण्टक चुनूँ मैं ।”
“सुनो, हे राम ! कण्टक आप हूँ मैं ,
कहूँ क्या और, बस चुपचाप हूँ मैं ।”
हुई चुप केकयी यह बात कहकर ,
रहे चुप राम भी आघात सहकर !
कहा सौमित्रि ने—“माँ चुप हुई क्यों ?
चुभाती चित्त में हो यों सुई क्यों ?
न हो कण्टक पिता के हेतु, मानो ,
हमें पितृ-भक्त भार्गव-तुल्य जानो ।”
इसी क्षण भूप ने कुछ शक्ति पाई ,
पिता ने पुत्र की दृढ़ भक्ति पाई ।
बढ़ाकर बाहु तब वे छटपटाये ,
उठे, पर पैर उनके लटपटाये !
चढ़ाकर मौन - रोदन - रत्न - माला ,
पिता को राम-लक्ष्मण ने सँभाला ।
पिता ने भी किया अभिषेक मानो ,
न रक्खी सत्य की भी टेक मानो !
हृदय से भूप ने उनको लगाया ,
कहा, “विश्वास ने मुझको ठगाया !”
निरखती केकयी थी भौंहें ताने ;
चढ़ाकर कोप से दो दो कमानें !
पकड़कर राम की ठोड़ी ठहरके ,
तथा उनका वदन उस ओर करके
कहा गतधैर्य होकर भूपवर ने—
“चली है, देख, तू क्या आज करने !
अभागिन ! देख, कोई क्या कहेगा ?
यही चौदह बरस वन में रहेगा !
विभव पर हाय ! तू भव छोड़ती है ,
भरत का राम का जुग फोड़ती है !

p. 38

भरत का भी न ऐसे राज्य होगा ;
प्रजा-कोपाग्नि का वह आज्य होगा ।
मरूँगा मैं तथा पछतायगी तू ,
यही फल अन्त में बस पायगी तू !”
हुए आवेग से भूपाल गद्गद ,
तरंगित हो उठा फिर शोक का नद ।
पुनः करने लगे वे राम - रटना ,
समझ ली राम ने भी सर्व घटना ।
विमाता बन गई आँधी भयावह ,
हुआ चंचल न तो भी श्याम घन वह ,
पिता को देख तापित भूमितल-सा ,
बरसने यों लगा वर-वाक्य-जल-सा—
“अरे, यह बात है, तो खेद क्या है ?
भरत में और मुझमें भेद क्या है ?
करें वे प्रिय यहाँ निज-कर्म-पालन ,
करूँगा मैं विपिन में धर्म-पालन ।
पिता ! इसके लिए ही ताप इतना !
तथा माँ को अहो ! अभिशाप इतना !
न होगी अन्य की तो राज - सत्ता ,
हमारी ही प्रकट होगी महत्ता ।
उभय विध सिद्ध होगी लोक-रंजन ,
यहाँ जन-भय वहाँ मुनि-विघ्न-भंजन ।
मुझे था आप ही बाहर विचरना ;
धरा का धर्म-भय था दूर करना ।
करो तुम धैर्य-रक्षा, वेश-रक्षा ,
करूँगा क्या न मैं आदेश - रक्षा ?
मुझे यह इष्ट है, चिन्तित न हो तुम ,
पड़ूँ मैं आग में भी जो कहो तुम !
तुम्हीं हो तात ! परमाराध्य मेरे ,
हुए सब धर्म अब सुखसाध्य मेरे ।

p. 39

अभी सबसे विदा होकर चला मैं ,
करूँ क्यों देर शुभ विधि में भला मैं ?”
हुए प्रभु मौन आज्ञा के लिए फिर ,
विवश नृप भी हुए अत्यन्त अस्थिर ।
“हुए क्यों पुत्र तुम, हे राम ! मेरे ?
यही हैं क्या पिता के काम मेरे !
विधाता !”—बस न फिर कुछ कह सके वे ,
हुए मूर्च्छित, न बाधा सह सके वे ।
धसकने-सी लगी नीचे धरा भी !
पसीजी पर न पाषाणी जरा भी !

निरखते स्वप्न थे सौमित्र मानो !
स्वयं निस्पन्द थे, निज चित्र मानो !
समझते थे कि मिथ्याऽलीक है यह ,
यही बोले कि “माँ ! क्या ठीक है यह ?”
कहा तब केकयी ने, “क्या कहूँ मैं ?
कहूँ तो रेणुका बनकर रहूँ मैं !
खड़ी हूँ मैं, बनो तुम मातृघाती ,
भरत होता यहाँ तो मैं बताती ।”
गई लग आग-सी, सौमित्रि भड़के ,
अधर फड़के, प्रलय-घन-तुल्य तड़के !
“अरे, मातृत्व तू अब भी है जताती !
ठसक किसको भरत की है बताती ?
भरत को मार डालूँ और तुझको ,
नरक में भी न रक्खूँ ठौर तुझको !
युधाजित आततायी को न छोड़ूँ ,
बहन के साथ भाई को न छोड़ूँ ।
बुला ले सब सहायक शीघ्र अपने ,
कि जिनके देखती है व्यर्थ सपने ।

p. 40

सभी सौमित्रि का बल आज देखें ,
कुचक्री चक्र का फल आज देखें ।
भरत को सानती है आपमें क्यों ?
पड़ेंगे सूर्यवंशी पाप में क्यों ?
हुए वे साधु तेरे पुत्र ऐसे—
कि होता कीच से है कंज जैसे ।
भरत होकर यहाँ क्या आज करते ,
स्वयं ही लाज से वे डूब मरते !
तुझे सुत-भक्षिणी साँपिन समझते ,
निशा को, मुँह छिपाते, दिन समझते !
भला वे कौन हैं जो राज्य लेवें ,
पिता भी कौन हैं जो राज्य देवें ?
प्रजा के अर्थ है साम्राज्य सारा ,
मुकुट है ज्येष्ठ ही पाता हमारा ।”
वचन सुन केकयी कुछ भी न बोली ,
गरल की गाँठ होठों पर न घोली ।
विवश थी, वाक्य उनके सह गई वह ,
अधर ही काटकर बस रह गई वह ।
अनुज की ओर तब अवलोक करके ,
कहा प्रभु ने उन्हें यों रोक करके—
“रहो, सौमित्र ! तुम क्या कह रहे हो ?
सँभालो वेग, देखो, बह रहे हो !”
“रहूँ ?” सौमित्रि बोले, “चुप रहूँ मैं ?
तथा अन्याय चुप रहकर सहूँ मैं ?
असम्भव है, कभी होगा न ऐसा ,
वही होगा कि है कुल-धर्म जैसा ।
चलो, सिंहासनस्थित हो सभा में ,
वही हो जो कि समुचित हो सभा में ।
चले वे भी कि जो हों विघ्नकारी ,
कहो तो लौट दूँ यह भूमि सारी ?

p. 41

खड़ा है पार्श्व में लक्ष्मण तुम्हारे ,
मरें आकर अभी अरिगण तुम्हारे ।
अमरगण भी नहीं अनिवार्य मुझको ,
सुनूँ मैं कौन दुष्कर कार्य मुझको !
तुम्हें कुछ भी नहीं करना पड़ेगा ,
स्वयं सौमित्र ही आगे अड़ेगा ।
मुझे आदेश देकर देख लीजे ,
न मन में नाथ ! कुछ संकोच कीजे ।
इधर मैं दास लक्ष्मण हूँ तुम्हारा ,
उधर हो जाय चाहे लोक सारा ।
नहीं अधिकार अपना वीर खोते ,
उचित आदेश ही हैं मान्य होते ।
खड़ी है माँ बनी जो नागिनी यह ,
अनार्या की जनी, हतभागिनी यह ,
अभी विषदन्त इसके तोड़ दूँगा ,
न रोको तुम, तभी मैं शान्त हूँगा ।
बने इस दस्युजा के दास हैं जो ,
इसीसे दे रहे वनवास हैं जो ,
पिता हैं वे हमारे या—कहूँ क्या ?
कहो हे आर्य ! फिर भी चुप रहूँ क्या ?”
कहा प्रभु ने कि “हाँ, बस चुप रहो तुम ,
अरुन्तुद वाक्य कहते हो अहो ! तुम !
जताते कोप किसपर हो, कहो तुम ?
सुनो, जो मैं कहूँ, चंचल न हो तुम ।
मुझे जाता समझकर आज वन को ,
न यों कलुषित करो प्रेमान्ध मन को !
तुम्हींको तात यदि वन-वास देते ,
उन्हें तो क्या तुम्हीं यों त्रास देते ?
पिता जिस धर्म पर यों मर रहे हैं ,
नहीं जो इष्ट वह भी कर रहे हैं ,

p. 42

उन्हीं कुल-केतु के हम पुत्र होकर—
करें राजत्व क्या वह धर्म खोकर ?
प्रकृति मेरी स्वयं तुम जानते हो ,
वृथा हठ हाय ! फिर क्यों ठानते हो ?
बड़ों की बात है अविचारणीया ,
मुकुट-मणि-तुल्य शिरसा धारणीया ।
वचन रक्खे बिना जो रह न सकते ,
तदपि वात्सल्य-वश कुछ कह न सकते ,
उन्हीं पितृदेव का अपमान लक्ष्मण ?
किया है आज क्या कुछ पान लक्ष्मण !
उऋण होना कठिन है तात-ऋण से ,
अधिक मुझको नहीं है राज्य तृण से ।
मनःशासक बनो तुम, हठ न ठानो ,
अखिल संसार अपना राज्य जानो ।
समझ लो, दैव की इच्छा यही है ;
करे जो कुछ कि वह होता वही है ।
मुझे गौरव मिला है आज, आओ ,
विदा देकर प्रणय से जी जुड़ाओ ।”
बढ़ीं तापिच्छ-शाखा-सी भुजाएँ—
अनुज की ओर दायें और बायें ।
जगत् संसार मानो क्रोड़गत था ,
क्षमा-छाया तले नत था, निरत था ।
मिटा सौमित्रि का वह कोप सारा ,
उमड़ आई अचानक अश्रु-धारा ।
पदाब्जों पर पड़ें वे आप जब तक—
किया प्रभु ने उन्हें भुजबद्ध तब तक ।
मिले रवि-चन्द्र-सम युग बन्धु ज्यों ही ,
अमा का तम चतुर्दिक देख त्यों ही ,
लगे बालक-सदृश नृप वृद्ध रोने ;
विगत सर्वस्व-सा समझा उन्होंने !

p. 43

कहा इस ओर अग्रज से अनुज ने ,
पकड़ उनके चरण उस दीर्घभुज ने—
“वही हो जो तुम्हें हो इष्ट मन में ,
बने नूतन अयोध्या नाथ वन में ।
भले ही दैव का बल दैव जाने ,
पुरुष जो है न क्यों पुरुषार्थ माने ?
हुआ, कुछ भी नहीं मैं जानता हूँ ,
तुम्हें जो मान्य है सो मानता हूँ ।
विदा की बात किससे और किसकी ?
अपेक्षा कुछ नहीं है नाथ ! इसकी ।
मुझे यदि मारना है, मार डालो ,
निकालो तो न जीते जी निकालो ।
प्रभो ! रक्खो सदा निज दास मुझको ,
कि निष्कासन न हो गृह-वास मुझको ।
अयोध्या है कि यह उसका चिता-वन ?
करूँगा क्या यहाँ मैं प्रेत-साधन ?”
“अरे, यह क्या” कहा प्रभु ने कि “यह क्या ?
समझते हो विदा को तुम विरद क्या ?
तुम्हें क्या योग्य है उद्वेग ऐसा ?
सुनो, जो चित्त में है, दूर कैसा ?
पिता हैं और हैं माता यहाँ पर ,
भरत-शत्रुघ्न-से भ्राता यहाँ पर ।
अनुज ! रहना उचित तुमको यहीं है ।
यहाँ जो है त्रिदिव में भी नहीं है ।
मुझे वन में न कुछ आयास होगा ,
सतत मुनि-वृन्द का सहवास होगा ।
पिता की ओर देखो, धर्म पालो ,
अरे, मूर्च्छित हुए फिर ये, सँभालो !”

p. 44

किया उपचार दोनों ने पिता का ,
उन्हें चैतन्य था चढ़ना चिता का ।
खड़ी थी केकयी, पर चित्त चल था ,—
“कहा जो राम ने सच था कि छल था ?”
सँभलकर कुछ किसी विध भूप बोले—
विकल सौमित्रि से इस भाँति बोले—
“कहो फिर वत्स ! जो पहले कहा था ,
वही गर्जन मुझे सुख दे रहा था ।
नहीं हूँ मैं पिता सचमुच तुम्हारा ,
(यही है क्या पिता की प्रीति धारा ?)
तदपि सत्पुत्र हो तुम शूर मेरे ,
करो सब दुःख लक्ष्मण दूर मेरे ।
मुझे बन्दी बनाकर वीरता से ,
करो अभिषेक साधन धीरता से ।
स्वयं निःस्वार्थ हो तुम, नीति रक्खो ,
न होगा दोष कुछ, कुल-रीति रक्खो ।
भरत था आप ही राज्याधिकारी ,
हुआ पर राज्य से भी राम भारी ।
उसीसे हा ! वंचित यों भरत हो ,
भले ही वाम वामा लोभरत हो ।
सुनो, हे राम ! तुम भी धर्म धारो ,
पिता को मृत्यु के मुँह से उबारो ।
न मानो आज तुम आदेश मेरा ,
प्रबल उससे नहीं क्या क्लेश मेरा ,

भरत की माँ डरी सुन भूप-वाणी ,
कहीं वह राम-लक्ष्मण ने प्रमाणी !
पतित क्या उन्नतों के भाव जानें ?
उन्हें वे आप ही में क्यों न सानें !

p. 45

कहा प्रभु ने, “पिता ! हा ! मोह इतना !
विचारो किन्तु होगा द्रोह कितना ?
तुम्हारा पुत्र मैं आज्ञा तुम्हारी—
न मानूँ, तो कहे क्या सृष्टि सारी ?
प्रकट होगा कपट ही हाय ! इससे ,
न माँ के साथ होगा न्याय इससे ।
मिटेगी वंश - मर्यादा हमारी ,
बनेंगे हम अगौरव - मार्गचारी ।
कहाँ है हा ! तुम्हारा धैर्य वह सब ?
कि कौशिक-संग भेजा था मुझे जब ।
लड़कपन भूल लक्ष्मण का सदय हो ,
हमारा वंश नूतन कीर्तिमय हो ,
क्षमा तुम भी करो सौमित्र को माँ !
न रक्खो चित्त में उस चित्र को माँ !
विरत तुम भी न हो अब और भाई !
अरे फिर तात ने संज्ञा गँवाई !
रहूँगा मैं यहाँ अब और जब तक—
बढ़ेगा मोह इनका और तब तक ।
करूँ प्रस्थान इससे शीघ्र ही अब ,
इन्हें दें सान्त्वना मिलकर स्वजन सब ।”
प्रणति-मिस निज मुकुट-सर्वस्व देकर ,
चले प्रभु तात की पद-धूलि लेकर ।
चले उनके अनुज भी अनुसरण कर ,
सभीको छोड़ सेवा को वरण कर !
कहा प्रभु ने कि “भाई ! बात मानो ,
पिता की ओर देखो, हठ न ठानो ।”
कहा सौमित्रि ने कर जोड़कर तब—
“रहा यह दास तुमको छोड़कर कब ?
रहे क्या आज जाता देख वन को ?
करो दोषी न इतना नाथ ! जन को ।

p. 46

तुम्हीं माता, पिता हो और भ्राता ,
तुम्हीं सर्वस्व मेरे हो विधाता ।
रहूँगा मैं, कहोगे तो रहूँगा ,
नरक की यातना को भी सहूँगा ।
विनश्वर जीव होता तो न सहता ,
तदपि क्या रह सकेगा देह दहता ?
कला, क्रीड़ा, कुतुक, मृगयाऽभिनय में ,
सभा-संलाप, निर्णय और नय में ,
जिसे है साथ रक्खा नाथ ! तुमने ,
उसीसे आज खींचा हाथ तुमने !
यहाँ मेरे बिना क्या रुक रहेगा ?
न अपना भार भी यह तन सहेगा ।
तुम्हीं हो एक अन्तर्बाह्य मेरे ,
नहीं क्या फूल-फल भी ग्राह्य मेरे !
न रक्खो आज ही यदि साथ मुझको ,
चले जाओ हटाकर नाथ ! मुझको ।
न रोकूँगा, रहूँगा जो जियूँगा ,
अमृत जब है पिया, विष पियूँगा ।”
हुए गद्गद यहीं रघुनन्दनानुज ,
शिशिर-कण-पूर्ण मानो प्रातरम्बुज ।
खड़े थे सूर्य-कुल के सूर्य सम्मुख ,
न जानें देव समझे दुःख या सुख ?
अनुज को देख सम्मुख दीन रोते ,
दयामय क्या द्रवित अब भी न होते ?
“अहो ! कातर न हो सौमित्रि ! आओ ,
सदा निज राम का अर्द्धांश पाओ ।
यही है आज का-सा यह सबेरा ,
मिटा राजत्व वन में भी न मेरा !
अनुज ! मुझसे न तुम न्यारे कभी हो ,
सुहृत, सहचर, सचिव, सेवक सभी हो ।”

p. 47

बचे सौमित्र मानो प्राण पाकर ।
बची त्यों केकयी भी त्राण पाकर ।
न रहना था न रखना था किसीको ,
सहज सन्तोष कहते हैं इसीको !

निकलकर अग्रजानुज तब वहाँ से ,
चले, पर शब्द यह कैसा, कहाँ से ;
“मुझे इस मृत्यु-मुख में छोड़कर यों ,
चले हा पुत्र ! तुम मुँह मोड़कर क्यों ?”
कहा प्रभु ने कि “भाई ! क्या करूँ मैं !
पिता का शोक यह कैसे हरूँ मैं ?
हुआ है धैर्य सहसा नष्ट उनका ,
चलो, कातर न कर दे कष्ट उनका ।”
बढ़ाकर चाल अपनी और थोड़ी ,
उन्होंने एक लम्बी साँस छोड़ी !
न थी अपने लिए वह साँस निकली ,
फँसाती जो यहाँ वह फाँस निकली ।
चले दोनों अलौकिक शान्तिपूर्वक—
कि आये थे यथा विश्रान्तिपूर्वक !
अजिर-सर के बने युग हंस थे वे ,
स्वयं रवि-वंश के अवतंस थे वे ।
झुकाकर सिर प्रथम फिर टक लगाकर ,
निरखते पार्श्व से थे भृत्य आकर ।
यहीं होकर अभी यद्यपि गये थे ,
तदपि वे दीखते सबको नये थे !
लगे माँ के महल को घूमने जब—
“जियो, कल्याण हो” यह सुन पड़ा तब ।
सुमन्त्रागम समझकर रुक गये वे ,
“अहा ! काका,” विनय से झुक गये वे !

p. 48

सचिववर ने कहा, “भैया ! कहाँ थे ?”
बताया राम ने उनको, जहाँ थे ।
कहा फिर, “तात आतुर हो रहे हैं ,
मिलो तुम शीघ्र, धीरज खो रहे हैं ।”
हुई सुनकर सचिववर को विकलता ,
रहा “क्यों ?” भी निकलता ही निकलता !
अमंगल पूछना भी कष्टमय है ,
न जानें क्या न हो अस्पष्ट भय है ।
न थी गति किन्तु बोले वे, “हुआ क्या ?
हमें भी अब विकारों ने छुआ क्या ?
मुझे भी हो रहा था सोच मन में ,
अभी तक आज नृप क्यों हैं शयन में !
बुलाऊँ वैद्य या मैं देख आऊँ ,
सभागत सभ्यगण को क्या बताऊँ ?
कुशल हो, विघ्न होते गूढ़तर यों ,
इधर तुम जा रहे हो लौटकर क्यों ?”
कहा सौमित्रि ने, “हे तात सुनिए ,
उचित-अनुचित हृदय में आप गुनिए ।
कि मँझली माँ हमें वन भेजती हैं ,
भरत के अर्थ राज्य सहेजती हैं ।”
निरखकर सामने ज्यों साँप भारी ,
सहम जावें अचानक मार्गचारी ,
सचिववर रह गये त्यों भ्रान्त होकर ,
रुका निःश्वास भी क्या श्रान्त होकर ।
सँभलकर अन्त में इस भाँति बोले—
कि “आये खेत पर ही दैव, ओले !
कहाँ से यह कुमति की वायु आई ,
किनारे नाव जिससे डगमगाई !
भरत दशरथ पिता के पुत्र होकर—
न लेंगे, फेर देंगे राज्य रोकर ।

p. 49

बिना समझे भरत का भाव सारा ,
विपिन का व्यर्थ है प्रस्ताव सारा ।
न जाने दैव को स्वीकार क्या है ?
रहो, देखूँ कि यह व्यापार क्या है ?
न रोकूँगा तुम्हें मैं धर्म-पथ से ,
तदपि इति तक समझ लूँ मर्म अथ से ।”
उत्तर की अनपेक्षा कर के आँसू रोक सुमन्त्र ,
चले भूप की ओर वेग से, घूमा अन्तर्यन्त्र ।
“अरे !” मात्र कहकर ही उनको रहे देखते राम ,
और राम को रहे देखते लक्ष्मण लोक ललाम ।

चले फिर रघुवर माँ से मिलने ,
बढ़ाया धन-सा प्राणानिल ने !
चले पीछे लक्ष्मण भी ऐसे—
भाद्र के पीछे आश्विन जैसे ।

p. 52

चतुर्थ सर्ग

लक्ष्मण ने सोचा मन में—
“जाने देंगी ये वन में ?
प्रभु उनको भी छोड़ेंगे ,
तो किस धन को जोड़ेंगे ?
मँझली माँ ! तू मरी न क्यों ?
लोक-लाज से डरी न क्यों ?”
लक्ष्मण ने निःश्वास लिया ,
माँ के जान सु-वास लिया !

p. 62

चतुर्थ सर्ग

इसी समय दुख से छाये ,
सचिव सुमन्त्र वहाँ आये ।
वे परिवार - भक्त - से थे ,
अति अविभिन्न युक्त-से थे ।
प्रभु जो उनकी ओर बढ़े ,
प्रथम अश्रु फिर वचन कढ़े—
“राम ! क्या कहूँ मैं अब हा !
बनकर भी बिगड़ा सब हा !
देख तुम्हारा निष्कासन ,
कैकेयी-सुत का शासन ,
नहीं चाहती कभी प्रजा ,
उड़ी क्रान्ति की कहीं ध्वजा ?
विदित तुम्हें है नृप-गति भी ,
कैकेयी की दुर्मति भी ।

p. 63

ऐसी विषमावस्था है ,
फिर भी वन-व्यवस्था है ?
पितृ-स्पृहा क्या ज्ञेय नहीं ?
प्रजा-भाव क्या ध्येय नहीं ?”
प्रभु बोले—“यह बात नहीं ,
तात ! तुम्हें क्या ज्ञात नहीं ?
स्पृहा बड़ी या धर्म बड़ा ?
किसमें है शुभ कर्म बड़ा ?
और प्रजा में द्रोह कहाँ ?
है बस मेरा मोह वहाँ ।
मैंने क्या कर दिया किसे ,
कर न सकेंगे भरत जिसे ?
उनके निन्दा - वाक्य मुझे ,
होंगे विष के बाण बुझे ।
उनकी निन्दा मेरी है ,
प्रजा प्रीति की प्रेरी है ।
पर वे मेरे भ्राता हैं ,
मँझली माँ भी माता हैं ।”

Scene 3 of 6 · Ring 5: the village

The figure of hate

The whole town lines the road as Rāma leaves, praising him and cursing what she did. At Śṛṅgaverapura Guha asks the night what she gained. The old king dies saying: tell her, her thorns are cleared away. Ūrmilā, crying "where has father gone?", falls at Kaikeyī's feet, and Kaikeyī cannot even open her mouth; to weep seems a mockery of herself. And all Ayodhyā, blind with grief, sees one figure made of hate.

Gupt's lines

करती थीं अपवाद केकयी-कर्म का ।

खोकर ऐसे लाल, लिया क्या केकयी ? क्या करना था तुझे, किया क्या केकयी ?

कोई उससे जा कहे अभी ,— ‘ले, तेरे कण्टक टले सभी !’

जा गिरी कैकेयी के आगे । कैकेयी का मुँह भी न खुला , पाषाण - शरीर हिला न डुला ।

रोना उसको उपहास हुआ , निज कृत वैधव्य - विकास हुआ । तब वह अपने से आप डरी , किस कुसमय में मन्थरा मरी !

सब देखते थे अन्ध से बस एक मूर्ति घृणामयी , वह थी कठोरा केकयी !

pp. 72 to 73, p. 82, pp. 106 to 110

In our English They cursed what Kaikeyī had done. Losing such a son, Kaikeyī, what did you gain? What did you have to do, and what have you done? (The dying king:) Let someone go and tell her now: "There, all your thorns are cleared away!" (Ūrmilā) fell before Kaikeyī. Kaikeyī's mouth did not open; her stone body did not stir. Weeping would have mocked her; she had made her own widowhood. Then she grew afraid of herself: at what evil hour had Mantharā been born! All saw, as if blind, only one figure made of hate: the hard Kaikeyī.

This is the village ring. Everyone knows what she did, and everyone says it. Gupt's own word for what they see is "as if blind": the grief has made them see one figure only.

And look at her in the middle of it. A girl in grief falls at her feet, and she cannot move. She cannot even weep, because weeping, from her, would be a mockery. That is the place a man reaches when the village has made up its mind: he cannot grieve in front of anyone, because his grief is not believed.

And in that silence, for the first time, she is afraid of herself. That fear is not the strings. It is the beginning of the way back.

Gupt, the whole scene · pp. 72 to 73, p. 82, pp. 106 to 110

p. 72

पंचम सर्ग

सुन कैकेयी - कर्म, जिसे लज्जा हुई ,
पाकर मानो ताप गलित मज्जा हुई ।
वैदेही को देख वधू - गण वच गया ,
कोलाहल युग भावपूर्ण तब मच गया ।
उभय ओर थीं खड़ी नगर-नर-नारियाँ ,
बरसाती थीं साश्रु सुमन सुकुमारियाँ ।
करके जय जयकार राम का धर्म का ,
करती थीं अपवाद केकयी-कर्म का ।

p. 73

“जहाँ हमारे राम, वहीं हम जायेंगे ,
वन में ही नव-नगर-निवास बनायेंगे ।
ईंटों पर अब करें भरत शासन यहाँ !”
जन-समूह ने किया महा कलकल वहाँ ।

“हरकर प्रभु का राज्य कठोरा केकयी ,
प्रजा-प्रीति भी हरण कर अब यह नई ।”
भाभी को यह भाव जताने के लिए ,
लक्ष्मण ने निज नेत्र उधर प्रेरित किये ।
वैदेही में पुलक भाव था भर रहा ,
प्रियगुणानुभव रोम रोम था कर रहा ।
केकयी का स्वार्थ, राम का त्याग था ,
परम खेद था और चरम अनुराग था ।

p. 82

पंचम सर्ग

हाय ! फूलते हुए भाग्य कैसे फले ,
उस भावुक के अश्रु उमड़कर बह चले ।
“घुरक रही है साँय साँय कर रात भी ,
मानो लय में लीन तरंगाघात भी ।
तब भी लक्ष्मण घूम रहे हैं जागकर ,
निद्रा का निज तुच्छ भाग तक त्यागकर ।
यह किसका अभिशाप न जाने हे हरे ,
चलती है दुर्नीति राज्य से ही अरे !
खोकर ऐसे लाल, लिया क्या केकयी ?
क्या करना था तुझे, किया क्या केकयी ?
इस भव पर है असित वितान तना सदा ,
जिसके खम्भे दुःख, शोक, भय, आपदा ।
उस अचिन्त्यगति गगन तले जब तक पड़े ,
हम हैं कितने विवश सभी छोटे-बड़े !

p. 106

षष्ठ सर्ग

“क्या शान्ति ? शान्ति, हा शान्ति कहाँ ?
बन गई कैकेयी क्रान्ति यहाँ ।
हो गया पुण्य ही पाप मुझे ,
दे रहा धर्म ही ताप मुझे ।
कुछ नहीं कहा क्या सीता ने ?
वैदेही वधू विनीता ने ?”
बोले सुमन्त्र—“वे कह न सकीं ।
कहने जाकर भी रुकीं, थकीं ।
साकेतस्मृति में मग्न हुईं ,
करके प्रणाम भूलग्न हुईं ,
फिर नभ की ओर हाथ जोड़े ,
दृग सजल हुए थोड़े थोड़े ।
आँसू बरौनियों तक आये ,
नीचे न किन्तु गिरने पाये ।
जा खड़ी हुईं पति के पीछे !
ज्यों मुक्ति महा यति के पीछे !”

p. 107

नृप रोने लगे—“हाय ! सीते ,
हम हैं कठोर अब भी जीते ।
सहकर भी घोर कष्ट तन पर ,
आया न मैल तेरे मन पर ।
गृह-योग बने हैं वनस्पृही ,
वन-योग्य हाय ! हम बने गृही ।
हे विधे, व्यतिक्रम यह तेरा ,
किसलिए बता श्रम यह तेरा ?
यदि मन्थरा न पहचान सकी ,
तो क्यों केकयी जान सकी ?
कोई उससे जा कहे अभी ,—
‘ले, तेरे कण्टक टले सभी !’”
बोले सुमन्त्र सहसा कि “हहा—
लक्ष्मण ने भी है यही कहा ।”
भूपति को जीवन भार हुआ ,
बस यह अन्तिम उद्गार हुआ—
“मेरे करयुग हैं टूट चुके ,
कटि टूट चुकी, सुख छूट चुके ।
आँखों की पुतली निकल पड़ी ,
वह यहीं कहीं है विकल पड़ी !
खाकर भी बार बार झटके—
क्यों प्राण अभी तक हैं अटके ?
हे जीव, चलो अब दिन बीते ,
हा राम, राम, लक्ष्मण, सीते !”

बस, यहीं दीप - निर्वाण हुआ ,
सुत-विरह वायु का बाण हुआ ।
धुँधला पड़ गया चन्द्र ऊपर ,
कुछ दिखलाई न दिया भू पर ।

p. 108

अति भीषण हाहाकार हुआ ,
सूना - सा सब संसार हुआ ।
अर्द्धांग रानियाँ शोककृता ,
मूर्च्छिता हुईं या अर्द्ध - मृता ?
हाथों से नेत्र बन्द करके ,
सहसा यह दृश्य देख डरके ,
‘हा स्वामी !’ कह ऊँचे रव से ,
दहके सुमन्त्र मानो दव से ।
अनुचर अनाथ - से रोते थे ,
जो थे अधीर सब होते थे ।
थे भूप सभी के हितकारी ,
सच्चे परिवार - भार - धारी ।

“माँ, कहाँ गये वे पूज्य पिता ?”
करके पुकार यों शोक - सिता ,
ऊर्मिला सभी सुध - बुध त्यागे ,
जा गिरी कैकेयी के आगे ।
कैकेयी का मुँह भी न खुला ,
पाषाण - शरीर हिला न डुला ।
बस फट - सी गईं बड़ी आँखें ,
मानो थीं नई जड़ी आँखें ।
रोना उसको उपहास हुआ ,
निज कृत वैधव्य - विकास हुआ ।
तब वह अपने से आप डरी ,
किस कुसमय में मन्थरा मरी !
भूपति - पद का विच्छेद हुआ ,
यह सुनकर किसे न खेद हुआ ?
नभ भी रोया चुपचाप हहा !
हिम - कण - मिस अश्रु-समूह बहा ।

p. 109

दानव - भय - हारी देह मिटा ,
वह राजगुणों का गेह मिटा ।
ऊपर सुरांगनाएँ रोईं ,
भू पर पुरांगनाएँ रोईं !
थे मुनि वसिष्ठ तत्त्वज्ञानी ,
पर व्यथा उन्होंने भी मानी ।
होकर भी जन्म - मृत्यु संगी ,
रखते हैं भिन्न भाव - भंगी ।
वह डील अपूर्व मनोहारी ,
हेमाद्रि - शृङ्ग - समताकारी ,
रहता जो मानो सदा खड़ा ,
था आज निरा निश्चेष्ट पड़ा ।
मुख पर थे शोक - चिह्न अब भी ,
नृप गये, न भाव गये तब भी !
या इसीलिए वे थे सोये ,
सुत मिलें स्वप्न में ही खोये !
मुँह छिपा पदों में प्रिय पति के ,
आधार एक जो थे गति के ,
कर रहीं विलाप रानियाँ थीं ,
जीवन-धन-मयी हानियाँ थीं ।
देखा वसिष्ठ ने और कहा—
“क्षर देह यहीं का यहीं रहा ।
वह श्वास-शृङ्खला टूट गई ,
आत्मा बन्धन से छूट गई !”
बोले सुमन्त्र कातर होकर—
“क्या हुआ देखिए, यह गुरुवर !
हा ! अमर-पूज्य इस भाँति मरें !
सुत चार कहाँ जो क्रिया करें ?”
धैर्य देकर धीर मुनि ने ज्ञान के प्रस्ताव से ,
तेल में रखवा दिया नृप-शव सुरक्षित भाव से ।

p. 110

दूत भेजे दक्ष फिर सन्देश के अक्षर गिना—
जो बुला लावें भरत को प्रकृत-वृत्त कहे बिना ।
इस शोक के सम्बन्ध से—
सब देखते थे अन्ध से
बस एक मूर्ति घृणामयी ,
वह थी कठोरा केकयी !

Scene 4 of 6 · Ring 4: the family

The son comes home

Bharata and Śatrughna come home to a silent city. At the threshold of the inner palace Bharata cries out for his father and falls; Kaikeyī runs to him with Mantharā and strokes him. She tells him plainly: I asked for it, the throne for you. Then she begs: let everyone revile me, only you, son, love me; rule, and let me burn in hell. He turns on her with every name his grief can find, and runs to Kauśalyā calling himself the thief. Śatrughna wants the two remaining horrors done, the mother killed, the house burned; Bharata holds his hand. Kauśalyā takes Bharata in her lap: "what did Kaikeyī do that was so terrible, out of love for Bharata?" And Vasiṣṭha: the poison was Kaikeyī's share.

Gupt's lines

“मैं स्वयं पतिघातिनी हूँ हाय ! जीव जीवन - मृत्यु का व्यवसाय !”

“वत्स, मेरा भी इसी में सार ,— जो किया, कर लूँ उसे स्वीकार ।

“सब करें मेरा महा अपवाद ; किन्तु उठ ओ भरत, मेरा प्यार , चाहता है एक तेरा प्यार ।

जी, द्विरसने ! हम सभीको मार ,

‘क्या लिया’ बस है यहीं सब शल्य , किन्तु मेरा भी यहीं वात्सल्य ।”

केकयी ने कर भरत का मोह , क्या किया ऐसा बड़ा विद्रोह ?

भरत - भावामृत पियें जन जाग , मोह - विष था केकयी का भाग ।

pp. 117 to 130

In our English "I myself am my husband's killer, alas! A creature's life and death are a trade." "Son, this is my whole truth: what I did, let me own it." "Let all revile me; but rise, Bharata, my love wants only your love." (Bharata:) Live, double-tongued one, having killed us all! "'What did she take': that is the whole thorn; but here too is my mother's love." (Kauśalyā:) If Kaikeyī, out of love for Bharata, did this, what great rebellion was it? (Vasiṣṭha:) Let people wake and drink the nectar of Bharata's heart; the poison of delusion was Kaikeyī's share.

The first thing she does is own it. Not after a trial, not when found out: the moment he asks. "What I did, let me own it." That is the step every programme asks of a man, and she takes it in the first minute.

And she asks for one thing: her son's love, while everyone else reviles her. That is exactly what the man asks of his family, and exactly what he does not get, at first. Bharata cannot give it. His grief is too new. Gupt lets him say everything.

But look who speaks next. Kauśalyā, who lost the most, takes the other woman's son in her lap and says: what she did was out of love; what great rebellion was that? And Vasiṣṭha names it rightly: the poison was moha, delusion, and it was hers to drink. A share of poison, not a poisoned woman. Nothing in her was lost.

Gupt, the whole scene · pp. 117 to 130

p. 117

सप्तम सर्ग

“आ गये !” सहसा उठा यह नाद ,
बढ़ गया अवरोध तक संवाद ।
रथ रुका, उतरे उभय अविलम्ब ,
ले सचिव सिद्धार्थ - कर - अवलम्ब ।
“हो गये तुम जीर्ण ऐसे तात !
मैं सुनूँगा क्या भयानक बात ?”
मुँह छिपा सचिवांक में तत्काल ,
हो गये चुप भरत आँसू डाल ।
सचिव उनको एक बार विलोक ,
ले चले, आँसू किसी विध रोक ।
“मैं कहूँ तुमसे भयानक बात ?
राज्य भोगो तुम जयी-कुल-जात !”
भरत को क्या ज्ञात था वह भेद ,
तदपि बोले वे सशंक, सखेद—
“तात कैसे हैं ?” सचिव की उक्ति—
“पा चुके वे विश्व-बाधा-मुक्ति ।”
“पर कहाँ इस समय नरनाथ ?”
सचिव फिर बोले उठाकर हाथ—
“सब रहस्य जहाँ छिपे हैं रम्य ,
योगियों का भी वहाँ क्या गम्य ?”

p. 118

“किन्तु उनके पुत्र हैं हम लोग ,
मार्ग दिखलाओ मिले शुभ योग ।”
“मार्ग है शत्रुघ्न, दुर्गम सत्य ,
तुम रहो उनके यथार्थ अपत्य ।”

आ गया शुद्धान्त का था द्वार ,
एक पद था देहली के पार ।
“हा पितः !” सहसा चिहुँक, चीत्कार ,
गिर पड़े सुकुमार भरत कुमार !

केकयी बढ़ मन्थरा के साथ ,
फेरने उन पर लगी झट हाथ ।
रह गये शत्रुघ्न मानो मूक ,
कण्ठरोधक थी हृदय की हूक ,
देर में निकली गिरा—“हा अम्ब !
आज हम सबके कहाँ अवलम्ब ?
देखने को तात शून्य निकेत ,
क्या बुलाये हम गये साकेत ?”
सिहरकर गिरते हुए से काँप ,
बैठ वे नीचे गये मुँह ढाँप ।
“वत्स, स्वामी तो गये उस ठौर ,
लौटना होगा न जिससे और !”
“कौन था हमसे अधिक हा शोक !
वे गये जिसके लिए उस लोक ?
हृदय, आशंका हुई क्या ठीक ,
हो गई आशा अशेष अलीक !”
“मैं स्वयं पतिघातिनी हूँ हाय !
जीव जीवन - मृत्यु का व्यवसाय !”

p. 119

“हा ! अमर भी मृत्यु-करगत जीव !
मुक्त होकर भी अधीन अतीव !
किन्तु साधारण न थी वह व्यक्ति ,
अतुल थी जिसकी अलौकिक शक्ति ।
जीर्ण तुमको जान सहसा तात !
कर गया क्या काल यह अपघात ?
तो धरा - धन हो भले ही ध्वस्त ,
आर्य, हो जाओ तनिक आश्वस्त ।
हम करेंगे काल से संग्राम ,
हैं कहाँ अग्रज हमारे राम ?”
“हैं कहाँ वे सजल घन-सम श्याम ?”
वन न था हा ! किन्तु वह था धाम ?
“वन गये वे अनुज - सीता - युक्त !”
“वन गये ?” बोले भरत भययुक्त ।
“तो सँभालेगा हमें अब कौन ?
यों अनाश्रित रह सका कब कौन ?”
“आर्य का औदास्य यह अवलोक ,
सहम - सा मेरा गया पितृ - शोक !”
“अनुज, ठहरो, मैं लगा दूँ होड़ ,
रह सकें यदि आर्य हमको छोड़ ।
जायँ वे इस गेह ही से रूठ ,
यह असम्भव, झूठ निश्चय झूठ !
हँस रही यह मन्थरा क्यों घूर ?
री अभागिन ! दूर हो तू दूर ।
भेद है इसमें निहित कुछ गूढ़ ,
माँ कहो, मैं हो रहा हूँ मूढ़ ।”
“वत्स, मेरा भी इसी में सार ,—
जो किया, कर लूँ उसे स्वीकार ।
साक्षि हो अनपेक्ष्य मेरे अर्थ ,
सत्य कर दे सर्व सहन-समर्थ !

p. 120

तो सुनो, यह क्यों हुआ परिणाम ,—
प्रभु गये सुर - धाम, वन को राम ।
माँग मैंने ही लिया कुल-केतु ,
राजसिंहासन तुम्हारे हेतु ।”

“हा हतोस्मि !” हुए भरत हतबोध ,
‘हूँ !’ कहा शत्रुघ्न ने सक्रोध ।
ओंठ काटा और पटका पैर ,
किन्तु लेता वीर किससे वैर ?
केकयी चिल्ला उठी सोन्माद—
“सब करें मेरा महा अपवाद ;
किन्तु उठ ओ भरत, मेरा प्यार ,
चाहता है एक तेरा प्यार ।
राज्य कर, उठ वत्स, मेरे बाल ,
मैं नरक भोगूँ भले चिरकाल ।
दण्ड दे, मैंने किया यदि पाप ,
दे रही हूँ शक्ति वह मैं आप ।”
“दण्ड, ओहो दण्ड, कैसा दण्ड ?
पर कहाँ उद्दण्ड ऐसा दण्ड ?
घोर नरकानल चिरन्तन चण्ड ,
किन्तु वह तो है यहाँ हिम - खण्ड ।
चण्डि ! सुनकर ही जिसे, सातंक ,
चुभ उठे सौ बिच्छुओं के डंक ।
दण्ड क्या उस दुष्टता का स्वल्प ?
है तुषानल तो कमल-दल-तल्प ?
जी, द्विरसने ! हम सभीको मार ,
कठिन तेरा उचित न्याय - विचार ।
मृत्यु ? उसमें तो सहज ही मुक्ति ,
भोग तू निज भावना की भुक्ति ।

p. 121

धन्य तेरा क्षुधित पुत्र - स्नेह ,
खा गया जो भूनकर पति - देह !
ग्रास करके अब मुझे हो तृप्त ,
और नाचे निज दुराशय - दृप्त !”
“चुप अरे चुप, केकयी का स्नेह ,
जान पाया तू न निस्सन्देह ।
पर वही यह वत्स, तुझमें व्याप्त ,
छोड़ता है राज - पद भी प्राप्त ।
सब करें मेरा महा अपवाद ,
किन्तु तू तो न कर हाय ! प्रमाद ।
हो गये थे देव जीवन्मुक्त ,
उचित था जाना न ऋण-संयुक्त ।
ले लिए इस हेतु वर युग लभ्य ,
उचित मानेंगे इसे सब सभ्य ।
‘क्या लिया’ बस है यहीं सब शल्य ,
किन्तु मेरा भी यहीं वात्सल्य ।”
“सब बचाती हैं सुतों के गात्र ,
किन्तु देती हैं डिठौना मात्र ।
नील से मुँह पोत मेरा सर्व ,
कर रही वात्सल्य का तू गर्व ।
खर मँगा, वाहन वही अनुरूप ,
देख लें सब—है यही वह भूप !
राज्य, क्यों माँ, राज्य, केवल राज्य ?
न्याय - धर्म - स्नेह, तीनों त्याज्य !
सब करें अब से भरत की भीति ,
राजमाता केकयी की नीति—
स्वार्थ ही ध्रुव-धर्म हो सब ठौर !
क्यों न माँ ? भाई, न बाप, न और !
आज मैं हूँ कोसलाधिप धन्य ,
गा, विरुद गा, कौन मुझ-सा अन्य ?

p. 122

कौन हा ! मुझ-सा पतित-अतिताप ?
हो गया वर ही जिसे अभिशाप !
तू अड़ी थी राज्य ही के अर्थ ,
तो न था तेरा तनय असमर्थ ।
और भू पर था न कोसल मात्र ,
छत्र-भागी है कहीं भी क्षात्र ।
क्षत्रियों के चाप - कोटि - समक्ष ,
लोक में है कौन दुर्गम लक्ष ?
था न किस फल का तुझे अधिकार ?
सुत न था मैं एक, हम थे चार !
राज सुख है वलि पुरुष का भोग ,
मूल्य जिसका प्राण का विनियोग ।
स्वार्थिनी तू कर सकेगी त्याग ?
राज्य में घर से लगी हा आग ।
स्वप्न किसका देखते हैं लोग ,
जो तजे लोकार्थ निद्रा - योग ।
किन्तु करके दूसरे का होम ,
पान करना चाहती तू सोम ।
हाय ! ऐसी तो न थी यह बुद्धि ,
क्या हुई तेरे हृदय की शुद्धि ?
और से करते हुए छल - पाप ,
हम छले जाते प्रथम ही आप ।
सूर्यकुल में यह कलंक कठोर !
निरख तो तू तनिक नभ की ओर ।
देख तेरी उग्र यह अनरीति ,
खस पड़ें नक्षत्र ये न सभीति !
भरत - जीवन का सभी उत्साह ,
हो गया ठंडा यहाँ तक आह !
ये गगन के चन्द्रमणि-मय हार ,
जान पड़ते हैं ज्वलित अंगार !

p. 123

कौन समझेगा भरत का भाव—
जब करे माँ आप यों प्रस्ताव !
री, हुआ तुझको न कुछ संकोच ?
तू बनी जननी कि हननी, सोच !
इष्ट तुझको दृप्त - शासन - नीति ,
और मुझको लोक - सेवा - प्रीति ।
वेन होता योग्य जिसका जात ,
जड़भरत - जननी वही विख्यात !
व्यर्थ आशा, व्यर्थ यह संसार !”
रो दिया, हो मौन राजकुमार ।
थे भरे घन - से खड़े शत्रुघ्न ,
बरस अब मानो पड़े शत्रुघ्न ,—
“तुम यहाँ थे हाय ! सोदरवर्य ,
और यह होता रहा, आश्चर्य !
वे तुम्हारे भुज - भुजंग विशाल ,
क्या यहाँ कीलित हुए उस काल ?
राज्य को यदि हम बना लें भोग ,
तो बनेगा वह प्रजा का रोग ।
फिर कहूँ मैं क्यों न उठकर ओह !
आज मेरा धर्म राजद्रोह !
विजय में बल और गौरव - सिद्धि ,
क्षत्रियों के धर्म - धन की वृद्धि ।
राज्य में दायित्व का ही भार ,
सब प्रजा का वह व्यवस्थागार ।
बहु प्रलोभन हो किसी के हेतु ,
तो उचित है क्रान्ति का ही केतु ।
दूर हो ममता, विषमता, मोह ,
आज मेरा धर्म राजद्रोह ।
त्याग से भी कठिन जिसकी प्राप्ति ,
स्वार्थ की यदि हो उसी में व्याप्ति ,

p. 124

छोड़ दूँ तो क्यों न मैं भी छोह ?
आज मेरा धर्म राजद्रोह ।
दो अभीप्सित दण्ड मुझको अम्ब ,
न्याय ही शत्रुघ्न का अवलम्ब ,
मैं तुम्हारा राज्य - शासन - भार ,
कर नहीं सकता यथा स्वीकार ।
मानते थे सब जिसे निज शक्ति ,
बन गई अब राजभक्ति विरक्ति ।
हा ! अराजक भाव, जो था पाप ,
कर दिया है पुण्य तुमने आप ।
राज-पद ही क्यों न अब हट जाय ?
लोभ-मद का मूल ही कट जाय ?
कर सके कोई न दर्प न दम्भ ,
सब जगत में हो नया आरम्भ ।
विगत हों नर-पति, रहें नर मात्र ,
और जो जिस कार्य के हों पात्र—
वे रहें उस पर समान नियुक्त ,
सब जियें ज्यों एक हो कुल भुक्त ।”
“अनुज, उस राजत्व का हो अन्त ,
हन्त ! जिस पर केकयी के दन्त ।
किन्तु राजे रामराज्य नितान्त—
विश्व के विद्रोह करके शान्त ।
रघु - भगीरथ - सगर-राज्य-किरीट ,
केकयी का सुत भरत मैं ढीट—
यदि छुऊँ तो पाप - कर गल जाय ,
या वही अनुताप से जल जाय !
तात, राज्य नहीं किसी का वित्त ,
वह उन्हीं के सौख्य-शान्ति-निमित्त—
स्वबलि देते हैं उसे जो पात्र ,
नियत शासक लोक-सेवक मात्र !”

p. 125

“आर्य छाती फट रही है हाय !
राज्य भी अब तो बना व्यवसाय ।
हम उसे लें बेचकर भी धर्म ,
अतुल कुछ में आज ऐसा कर्म !
भ्रातृ-निष्कासन, पिता का घात ,
हो चुके दो दो जहाँ उत्पात ,
और दो हों—मातृवध, गृहदाह !
बस यही इस चित्त की अब चाह !
पूर्ण हो दुरदृष्ट तेरी तुष्टि !”
वीर ने मारी हृदय पर मुष्टि ।
उठ भरत ने धर लिया झट हाथ ,
और वे बोले व्यथा के साथ—
“हाय ! मारोगे किसे हे तात ,
मृत्यु निष्कृति हो जिसे हे तात ?
छोड़ दो इसको इसी पर वीर ,
आर्य-जननी-ओर आओ धीर !”
युगल कण्ठों से निकल अविलम्ब ,
अजिर में गूँजी गिरा—“हा अम्ब !”
शोक ने ली अफर आज डकार—
वत्स हम्बा कर उठे डिडकार !
सहन कर मानो व्यथा की चोट ,
हृदय के टुकड़े उड़े सस्फोट—
“तुम कहाँ हो अम्ब, दीना अम्ब ,
पति - विहीना, पुत्र - हीना अम्ब !
भरत—अपराधी भरत—है प्राप्त ,
दो उसे आदेश अपना आप्त ।
आज माँ, मुझ-सा अधम है कौन ?
मुँह न देखो, पर न हो तुम मौन ।
प्राप्त है यह राज्यहारी चोर ,
दूर से षड्यन्त्रकारी घोर ,

p. 126

आ गया मैं—गृहकलह का मूल ;
दण्ड दो, पर दो पदों की धूल ।”

“झूठ यह सब झूठ, तू निष्पाप ;
साक्षिणी तेरी यहाँ मैं आप ।
भरत में अभिसन्धि का हो गन्ध ,
तो मुझे निज राम की सौगन्ध ।
केकयी, सुन लो बहन यह नाद ,
ओह ! कितना हर्ष और विषाद !”
पूर्ण महिषी का हुआ उत्संग ,
जा गिरा शबरीशरार्त - कुरंग ।
“वत्स रे आ जा, जुड़ा यह अंक ;
भानुकुल के निष्कलंक मयंक ?
मिल गया मेरा मुझे तू राम ,
तू वही है, भिन्न केवल नाम ।
एक सुहृदय, और एक सुगात्र ,
एक सोने के बने दो पात्र ।
अग्रजानुज मात्र का है भेद ,
पुत्र मेरे, कर न मन में खेद ।
केकयी ने कर भरत का मोह ,
क्या किया ऐसा बड़ा विद्रोह ?
भर गई फिर आज मेरी गोद ,
आ, मुझे दे राम का - सा मोद ।
किन्तु बेटा, हो गई कुछ देर ,
सो गये हैं देव ये मुँह फेर !
हो गई है हृदय की गति मग्न ,
तदपि अब भी स्नेह में है मग्न !
देख लो हे नाथ लो परितोष ;
जननियों के जात हैं निर्दोष !”

p. 127

नाव में नृप किन्तु पाँव पसार ,
सुप्त थे भव - सिन्धु के पर-पार !

“हा पिता, यों हो रहे हो सुप्त ;
क्या हुई वह चेतना चिरलुप्त ?
जिस अभागे के लिए यह काण्ड ,
आ गया वह भर्त्सना का भाण्ड !
शास्ति दो, पाओ अहो ! आरोग्य ,
मैं नहीं हूँ यों अभाषण-योग्य ।
त्याज्य भी यह नीच हे नरराज ,
हो न अन्तिम वचन-वंचित आज !”
“राज्य तुमको दे गये नरराज ,
सुत, जलांजलि दो उन्हें तुम आज !”
दे तुम्हें क्या वत्स, मेरा प्यार ?
लो तुम्हीं अन्त्येष्टि का अधिकार ।
“राज्य—” हा ! वह राज्य बनकर काल ,
भरत के पीछे पड़ा विकराल !
यह अराजक उग्र आज नितान्त ,
प्राण लेकर भी न होगा शान्त !”
“वत्स, धीरे, कठिनता के साथ ,
सो सके हैं, छटपटाकर नाथ ।
हो न जावे शान्ति उनकी भंग ,
धर्म पालो धीरता के संग ।
संगिनी इस देह को मैं नित्य ,
साक्षि हैं ध्रुव, धरणि, अनिलादित्य ।
सुत, तुम्हारे भाव ये अविभक्त ,
मैं स्वयं उन पर करूँगी व्यक्त ।”
“हाय ! मत मारो मुझे इस भाँति ,
माँ, जियो, मैं जी सकूँ जिस भाँति ।

p. 128

मैं सहन के अर्थ ही, मन-मार ,
वहन करता हूँ स्वजीवन - भार ।
मैं जियूँ लोकापवाद - निमित्त ,
तब न होगा तनिक प्रायश्चित्त ?
तुम सभी त्यागो मुझे यदि हाय !
तो मरूँ मैं भी न क्यों निरुपाय !
आर्य को तो मुँह दिखाने योग्य ,
रख मुझे ओ भाग्य के फल भोग्य ।”
शोक से अति आर्त, अनुज समेत ,
भरत यों कह हो गये हतचेत ।
लोटता हो ज्यों हृदय पर साँप ,
समय कौसल्या, सुमित्रा काँप—
हाय कर, करने लगीं उपचार—
व्यजन, सिंचन, परस और पुकार ।
भ्रातृ युग सँभले नयन निज खोल ,
पर सके मुँह से न वे कुछ बोल ।
देख सुत - हठ और वंश - अरिष्ट ,
कह न माँएँ भी सकीं निज इष्ट ।
आ गये तब तक तपोव्रतनिष्ठ ,
राजकुल के गुरु वरिष्ठ वसिष्ठ ।
प्राप्त कर उनके पदों की ओट ,
रो पड़े युग बन्धु उनमें लोट—
“क्या हुआ गुरुदेव, यह अनिवार्य ?”
“वत्स, अनुपम लोक-शिक्षण-कार्य ।
त्याग का संचय, प्रणय का पर्व ,
सफल मेरा सूर्यकुलगुरु-गर्व !”
“किन्तु मुझ पर आज सारी सृष्टि ,
कर रही मानो घृणा की वृष्टि ।
देव, देखूँ मैं किधर, किस भाँति ?”
“भरत, तुम आकुल न हो इस भाँति ।

p. 129

वत्स, देखो तुम पिता की ओर ,
सत्य भी शव-सा अकम्प कठोर !
और उनका प्रेम - ओघ अभग्न ,
वे स्वयं जिसमें हुए चिरमग्न !
और देखो भ्रातृवर की ओर ,
त्याग का जिसके न ओर, न छोर ।
अतुल जिसकी पुण्य पितर-प्रीति—
स्वकुल-मर्यादा, विनय, नय-नीति ।
और उस अग्रज-वधू की ओर ,
वत्स, देखो तुम निहार—निहोर ।
हाँ, जिसे वे गहन-कण्टक-शूल ,
बन गये गृह-वाटिका के फूल !
और देखो उस अनुज की ओर ,
आह ! वह लाक्ष्मण्य कैसा घोर !
वह विकट व्रत और वह दृढ़ भक्ति ,
एक में सबकी अटल अनुरक्ति ।
और देखो इस अनुज की ओर ,
हो रहा जो शोक - मग्न विभोर ।
आज जो सबसे अधिक उद्भ्रान्त ;
सुमन - सम हिमवाष्प भाराक्रान्त !
वत्स, देखो जननियों की ओर ,
आज जिनकी भोग-निशि का भोर !”
“हाय भगवन् ! क्यों हमारा नाम ?
अब हमें इस लोक में क्या काम ?
भूमि पर हम आज केवल भार ,
क्यों सहे संसार हाहाकार ?
क्यों अनाथों की यहाँ हो भीड़ ?
जीव-खग उड़ जाय अब निज नीड़ ।”
“देवियो, ऐसा नहीं वैधव्य ,
भाव भव में कौन वैसा भव्य ?

p. 130

धन्य वह अनुराग निर्गत - राग ,
और शुचिता का अपूर्व सुहाग ।
अग्निमय है अब तुम्हारा नाम ,
दग्ध हों जिसमें स्वयं सब काम ।
सहमरण के धर्म से भी ज्येष्ठ ,
आयु भर स्वामि - स्मरण है श्रेष्ठ ।
तुम जियो अपना वही व्रत पाल ,
धर्म की बल - वृद्धि हो चिरकाल ।
सहन कर जीना कठिन है देवि ,
सहज मरना एक दिन है देवि !
भरत, देखो आप अपनी ओर ,
निज हृदय - सागर गभीर हिलोर ।
पूर्ण हैं अगणित वहाँ गुण-रत्न ,
अमर भी जिनके लिए कृतयत्न ।
भरत - भावामृत पियें जन जाग ,
मोह - विष था केकयी का भाग ।

Scene 5 of 6 · the centre, where it comes from

The strings cut

At Chitrakūṭa, under the night sky, the whole court sits before Rāma's hut. Bharata begs him to come home. Rāma says even Bharata's mother never knew him. And Kaikeyī, who has sat silent, speaks. She owns everything in front of everyone, blames no maid, asks no pity, and begs Rāma to come home for Bharata's sake. The whole sabhā cries out: a hundred times blessed is the mother of such a son. Then she says: the strings are cut. I am the same Kaikeyī, and you are my same Rāma. She thinks of dying, and chooses instead to live and bear the shame. And Rāma, laughing through tears, asks her for her command.

Gupt's lines

करके पहाड़ - सा पाप मौन रह जाऊँ ? राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ ?”

“क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी , मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी ।

थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके , जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके ? छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे ,

युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी— ‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी ।’

“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई , जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई ।”

“छल किया भाग्य ने मुझे अयश देने का , बल दिया उसीने भूल मान लेने का । अब कटे सभी वे पाश नाश के प्रेरे , मैं वही केकयी, वही राम तुम मेरे ।

मर मिटना भी है एक हमारी क्रीड़ा , पर भरत-वाक्य है—सहूँ विश्व की व्रीड़ा ।

“तुम हलके कब थे ?”—हँसी केकयी, रोई !

pp. 150 to 160

In our English Having done a mountain of wrong, shall I stay silent, and not be allowed even a mustard seed of remorse? What could she have done, the wretched maid Mantharā? It was my own mind that could not keep faith with itself. Let the three worlds spit on me; let anyone say whatever they can. But let no one take from me my place as Bharata's mother. Let the hard story run age after age: "In the house of Raghu too there was one unlucky queen." (The sabhā:) A hundred times blessed is that mother of one son, who bore a brother like Bharata! Fate tricked me into infamy; and fate gave me the strength to own my mistake. Now all those strings are cut that drove me to ruin. I am the same Kaikeyī; you are my same Rāma. To die and be done is a game we women know; but Bharata's word is: bear the world's shame. "When were you ever light?" Kaikeyī laughed, and wept.

This is the centre, where it comes from, and she names it herself. Not Mantharā. "What could the maid have done? It was my own mind that could not keep faith with itself." Every man at the centre of his own wheel has to say that sentence once, in front of the village, with no one else to blame. She says it under the open sky.

And then the cut. Gupt's word is पाश, the noose, the string. All the strings that drove me to ruin are cut. What is left when the strings are cut is not a broken doll and not a new woman. "I am the same Kaikeyī." The one from the first night, who said "is Rāma not my son?" Nothing was lost. And Rāma is "the same Rāma, mine."

She thinks of the other way, the end. Gupt lets her say it, and she turns from it: dying is easy, a game; Bharata's word is to bear the shame and live. If tonight the end looks like the easier way to you, she has walked this exact road before you: she chose to stay and bear it, and in the next breath she was laughing and weeping with her son. And tell someone tonight. Tele-MANAS answers at 14416, free, at any hour.

And the sabhā. The same people who saw only a figure of hate now cry out with Rāma: a hundred times blessed is that mother. The village ring turned, in one night, because she spoke.

Gupt, the whole scene · pp. 150 to 160

p. 150

अष्टम सर्ग

जिस पर पाले का एक पर्त - सा छाया ,
हत जिसकी पंकज-पंक्ति, अचल-सी काया ,
उस सरसी-सी, आभरणरहित, सितवसना ,
सिहरे प्रभु माँ को देख, हुई जड़ रसना ।
“हा तात !” कहा चीत्कार समान उन्होंने ,
सीता सह लक्ष्मण लगे उसी क्षण रोने ।
उमड़ा माँओं का हृदय हाय ! ज्यों फटकर ,—
“चिर मौन हुए वे तात तुम्हींको रटकर ।”
“जितने आगत हैं रहें क्यों न गत - धर्मा ,
पर मैं उनके प्रति रहा क्रूर ही कर्मा ।”
दी गुरु वसिष्ठ ने उन्हें सान्त्वना बढ़कर ,—
“वे समुपस्थित सर्वत्र कीर्ति पर चढ़कर ।

p. 151

वे आप उऋण ही नहीं हुए जीवन से ,
उलटा भव को कर गये ऋणी निज धन से ।
वे चार चार दे गये एक के बदले ,
तुम तक को यों तज गये टेक के बदले !
वे हैं अशोच्य, हाँ स्मरण-योग्य हैं सबके ,
अभिमान-योग्य, अनुकरण-योग्य हैं सबके ।”
बोले गुरु से प्रभु साश्रु वदन, बद्धांजलि—
“दे सकता हूँ क्या उन्हें अभी श्रद्धांजलि ?
पितृ-देव गये हैं हाय ! तृषित ही सुरपुर !”
भर आया उनका गला, हुआ आतुर उर ।
फिर बोले वे—“क्या करूँ और मैं कहिए ,
गुरुदेव, आप ही तात-तुल्य अब रहिए ।”
“वह भार प्राप्त है मुझे अपूर्ण प्रथम ही ,
हम जब जो उनके लिए करें, है कम ही ।”
“भगवन् इस जन में भक्तिभाव अविचल है ,
पर अर्पणार्थ बस पत्र - पुष्प - फल - जल है ।”
“हा ! याद न आवे उन्हें तुम्हारे वन की ?”
प्रभु-जननी रोने लगीं व्यथा से मन की ।
“वे सब दुःखों से परे आज हैं देवी ,
स्वर्गीय भाव से भरे आज हैं देवी ।
उनको न राम - वनवास देख दुख होगा ,
अवलोक भरत का वही भाव सुख होगा ।”
गुरु - गिरा श्रवण कर हुए सभी गद्गद-से ,
बोले तब राघव भरे स्नेह के नद - से—
“पूजा न देखकर देव भक्ति देखेंगे ,
थोड़े को भी वे सदय बहुत लेखेंगे ।”
कौसल्या को अब रहा न मान - परेखा ,
पर कैकेयी की ओर उन्होंने देखा ।
बोली वह अपना कण्ठ परिष्कृत करके ,
प्रभु के कन्धे पर वलय - शून्य कर धरके—

p. 152

“है श्रद्धा पर ही श्राद्ध, न आडम्बर पर ,
पर तुम्हें कमी क्या, करो, कहें जो गुरुवर ।”
यह कह मानो निज भार उतारा उसने ,
लक्ष्मण - जननी की ओर निहारा उसने ।
कुछ कहा सुमित्रा ने न अश्रुमय मुख से ,
सिर से अनुमति दी नेत्र पोंछकर दुख से ।
“जो आज्ञा” कह प्रभु घूम अनुज से बोले—
“लेकर अपने कुछ चुने वनेचर भोले ,
सबका स्वागत - सत्कार करो तुम तब लौं ,
मैं करूँ स्वयं करणी कार्य सब जब लौं ।”

p. 153

तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे ,
नीले वितान के तले दीप बहु जागे ।
टकटकी लगाये नयन सुरों के थे वे ,
परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे ।
उत्फुल्ल करौंदी - कुञ्ज वायु रह रहकर ,
करती थी सबको पुलक - पूर्ण मह महकर ।
वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी ,
प्रभु बोले गिरा गम्भीर नीरनिधि जैसी ।
“हे भरतभद्र, अब कहो अभीप्सित अपना ,”
सब सजग हो गये, भङ्ग हुआ ज्यों सपना ।

p. 154

“हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी ?
मिल गया अकंटक राज्य उसे जब, तब भी ?
पाया तुमने तरु - तले अरण्य - बसेरा ,
रह गया अभीप्सित शेष तदपि क्या मेरा ?
तनु तड़प तड़पकर तप्त तात ने त्यागा ,
क्या रहा अभीप्सित और तथापि अभागा ?
हा ! इसी अयश के हेतु जनन था मेरा ,
निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा ।
अब कौन अभीप्सित और आर्य वह किसका ?
संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका ।
मुझसे मैंने ही आज स्वयं मुँह फेरा ,
हे आर्य, बता दो तुम्हीं अभीप्सित मेरा ?”
प्रभु ने भाई को पकड़ हृदय पर खींचा ,
रोदन जल से सविनोद उन्हें फिर सींचा !—
“उसके आशय की थाह मिलेगी किसको ?
जनकर जननी ही जान न पाई जिसको ?”

“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को ।”
चौंके सब सुनकर अटल केकयी-स्वर को ।
सबने रानी की ओर अचानक देखा ,
वैधव्य - तुषारावृत यथा विधु - लेखा ।
बैठी थी अचल तथापि असंख्यतरंगा ,
वह सिंही अब थी हहा ! गोमुखी गंगा—
“हाँ, जनकर भी मैंने न भरत को जाना ,
सब सुन लें, तुमने स्वयं अभी यह माना ।
यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया ,
अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया ।
दुर्बलता का ही चिह्न विशेष शपथ है ,
पर, अबलाजन के लिए कौन-सा पथ है ?

p. 155

यदि मैं उकसाई गई भरत से होऊँ ,
तो पति समान ही स्वयं पुत्र भी खोऊँ !
ठहरो, मत रोको मुझे, कहूँ सो सुन लो ,
पाओ यदि उसमें सार उसे सब चुन लो ।
करके पहाड़ - सा पाप मौन रह जाऊँ ?
राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ ?”
थी सनक्षत्र शशि - निशा ओस टपकाती ,
रोती थी नीरव सभा हृदय थपकाती ।
उल्का - सी रानी दिशा दीप्त करती थी ,
सबमें भय - विस्मय और खेद भरती थी ।
“क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी ,
मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी ।
जल पंजर - गत अब अरे अधीर, अभागे ,
वे ज्वलित भाव थे स्वयं तुझीमें जागे ।
पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में ?
क्या शेष बचा था कुछ न और इस जन में ?
कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य - मात्र, क्या तेरा ?
पर आज अन्य-सा हुआ वत्स भी मेरा ।
थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके ,
जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके ?
छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे ,
रे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे ?
कहते आते थे यही अभी नरदेही ,
‘माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही ।’
अब कहें सभी यह हाय ! विरुद्ध विधाता ,—
‘है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता ।’
बस मैंने इसका बाह्य - मात्र ही देखा ,
दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा ,
परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा ,
इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा !

p. 156

युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी—
‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी ।’
निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा—
‘धिक्कार ! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा ।’”
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई ,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई ।”
पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई—
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई ।”

“हा ! लाल ? उसे भी आज गमाया मैंने ,
विकराल कुयश ही यहाँ कमाया मैंने ।
निज स्वर्ग उसीपर वार दिया था मैंने ,
हर तुम तक से अधिकार लिया था मैंने ।
पर वही आज यह दीन हुआ रोता है ,
शंकित सबसे धृत हरिण-तुल्य होता है ।
श्रीखण्ड आज अंगार - चण्ड है मेरा ,
तो इससे बढ़कर कौन दण्ड है मेरा ?

पटके मैंने पद - पाणि मोह के नद में ,
जन क्या क्या करते नहीं स्वप्न में, मद में ?
हा ! दण्ड कौन, क्या उसे डरूँगी अब भी ?
मेरा विचार कुछ दयापूर्ण हो तब भी ?
हा दया ! हन्त वह घृणा ! अहह वह करुणा !
वैतरणी - सी हैं आज जाह्नवी - वरुणा !
सह सकती हूँ चिरनरक, सुनें सुविचारी ,
पर मुझे स्वर्ग की दया दण्ड से भारी ।
लेकर अपना यह कुलिश-कठोर कलेजा ,
मैंने इसके ही लिए तुम्हें वन भेजा ।

p. 157

घर चलो इसीके लिए, न रूठो अब यों ,
कुछ और कहूँ तो उसे सुनेंगे सब क्यों ?
मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे ,
मेरे दुगुने प्रिय रहो न मुझसे न्यारे ।
मैं इसे न जानूँ, किन्तु जानते हो तुम ,
अपने से पहले इसे मानते हो तुम ।
तुम भ्राताओं का प्रेम परस्पर जैसा ,
यदि वह सबपर यों प्रकट हुआ है वैसा ,
तो पाप-दोष भी पुण्य-तोष है मेरा ,
मैं रहूँ पंकिला, पद्म-कोष है मेरा ।
आगत ज्ञानीजन उच्च भाल ले लेकर ,
समझावें तुमको अतुल युक्तियाँ देकर ।
मेरे तो एक अधीर हृदय है बेटा ,
उसने फिर तुमको आज भुजा भर भेटा ,
देवों की ही चिरकाल नहीं चलती है ,
दैत्यों की भी दुर्वृत्ति यहाँ फलती है ।”
हँस पड़े देव केकयी-कथन यह सुनकर ,
रो दिये क्षुब्ध दुर्दैव दैत्य सिर धुनकर !
“छल किया भाग्य ने मुझे अयश देने का ,
बल दिया उसीने भूल मान लेने का ।
अब कटे सभी वे पाश नाश के प्रेरे ,
मैं वही केकयी, वही राम तुम मेरे ।
होने पर बहुधा अर्ध रात्रि अँधेरी ,
जीजी आकर करती पुकार थीं मेरी—
‘लो कुहुकिनि, अपना कुहुक, राम यह जागा ,
निज मँझली माँ का स्वप्न देख उठ भागा !’
भ्रम हुआ भरत पर मुझे व्यर्थ संशय का ,
प्रतिहिंसा ने ले लिया स्थान तब भय का ।
तुम पर ऐसी भ्रान्ति भरत से पाती ,
तो उसे मानने भी न यहाँ मैं आती ।—

p. 158

जीजी ही आतीं, किन्तु कौन मानेगा ?
जो अन्तर्यामी, वही इसे जानेगा ।”
“हे अम्ब तुम्हारा राम जानता है सब ,
इस कारण वह कुछ खेद मानता है कब ?”
“क्या स्वाभिमान रखती न केकयी रानी ?
बतला दे कोई मुझे उच्चकुल - मानी ।
सहती कोई अपमान तुम्हारी अम्बा ?
पर हाय, आज वह हुई निपट नालम्बा ।
मैं सहज मानिनी रही, सरल क्षत्राणी ,
इस कारण सीखी नहीं दैन्य यह वाणी ।
पर महा दीन हो गया आज मन मेरा ,
भावज्ञ, सहेजो तुम्हीं भाव - धन मेरा ।
समुचित ही मुझको विश्व - घृणा ने घेरा ,
समझाता कौन सशान्ति मुझे भ्रम मेरा ?
यों ही तुम वन को गये, देव सुरपुर को ,
मैं बैठी ही रह गई लिए इस उर को !
बुझ गई पिता की चिता भरत - भुजधारी ,
पितृभूमि आज भी तप्त तथापि तुम्हारी ।
भय और शोक सब दूर उड़ाओ उसका ,
चलकर सुचरित, फिर हृदय जुड़ाओ उसका ।
हो तुम्हीं भरत के राज्य, स्वराज्य सम्हालो ,
मैं पाल सकी न स्वधर्म, उसे तुम पालो ।
स्वामी को जीते जी न दे सकी सुख मैं ,
मरकर तो उनको दिखा सकूँ यह मुख मैं ।
मर मिटना भी है एक हमारी क्रीड़ा ,
पर भरत-वाक्य है—सहूँ विश्व की व्रीड़ा ।
जीवन-नाटक का अन्त कठिन है मेरा ,
प्रस्ताव मात्र में जहाँ अधैर्य अँधेरा ।
अनुशासन ही था मुझे अभी तक आता ,
करती है तुमसे विनय आज यह माता ।”—

p. 159

“हा मातः, मुझको करो न यों अपराधी ।
मैं सुन न सकूँगा बात और अब आधी ।
कहती हो तुम क्या अन्य तुल्य यह वाणी ,
क्या राम तुम्हारा पुत्र नहीं वह मानी ?
इस भाँति मानकर हाय, मुझे न रुठाओ ,
जो उठूँ न मैं, क्यों तुम्हीं न आप उठाओ ।
वे शैशव के दिन आज हमारे बीते ,
माँ के शिशु क्यों शिशु ही न रहे मनचीते ।
तुम रीझ - खीझकर प्यार जनाती मुझको ,
हँस आप रुठातीं, आप मनातीं मुझको ।
वे दिन बीते, तुम जीर्ण दुःख की मारी ,
मैं बड़ा हुआ अब और साथ ही भारी ।
अब उठा सकोगी तुम न तीन में कोई ।”
“तुम हलके कब थे ?”—हँसी केकयी, रोई !
“माँ, अब भी तुमसे राम विनय चाहेगा ?
अपने ऊपर क्या आप अद्रि ढाहेगा ?
अब तो आज्ञा की अम्ब, तुम्हारी बारी ,
प्रस्तुत हूँ मैं भी धर्मधनुर्धृतिधारी ।
जननी ने मुझको जना, तुम्हींने पाला ,
अपने साँचे में आप यत्न से ढाला ।
सबके ऊपर आदेश तुम्हारा मैया ,
मैं अनुचर पूत, सपूत, प्यार का भैया ।
वनवास लिया है मान तुम्हारा शासन ,
लूँगा न प्रजा का भार, राज - सिंहासन ?
पर यह पहला आदेश प्रथम हो पूरा ,
वह तात - सत्य भी रहे न अम्ब, अधूरा—
जिस पर हैं अपने प्राण उन्होंने त्यागे ,
मैं भी अपना व्रत - नियम निबाहूँ आगे ।
निष्फल न गया माँ, यहाँ भरत का आना ,
सिरमाथे मैंने वचन तुम्हारा माना ।

p. 160

सन्तुष्ट मुझे तुम देख रही हो वन में ,
सुख धन धरती में नहीं, किन्तु निज मन में ।
यदि पूरा प्रत्यय न हो तुम्हें इस जन पर ,
तो चढ़ सकते हैं राजदूत तो घन पर !”
“राघव, तेरे ही योग्य कथन है तेरा ,
दृढ़ बाल - हठी तू वही राम है मेरा ।
देखें हम तेरा अवधि मार्ग सब सहकर ,”
कौसल्या चुप हो गई आप यह कहकर ।
ले एक साँस रह गई सुमित्रा भोली ,
कैकेयी ही फिर रामचन्द्र से बोली—
“पर मुझको तो परितोष नहीं है इससे ,
हा ! तब तक मैं क्या कहूँ सुनूँगी किससे ?”
“जीती है अब भी अम्ब, ऊर्मिला बेटी ;
इन चरणों की चिरकाल रहूँ मैं चेटी ।”
“रानी, तूने तो रुला दिया पहले ही ,
यह कह काँटों पर सुला दिया पहले ही ।
आ मेरी सबसे अधिक दुःखिनी, आ जा ,
पिस मुझसे चन्दन-लता मुझीपर छा जा ।
हे वत्स, तुम्हें वनवास दिया मैंने ही ,
अब उसका प्रत्याहार किया मैंने ही ।”
“पर रघुकुल में जो वचन दिया जाता है ,
लौटाकर वह कब कहाँ लिया जाता है ?
क्यों व्यर्थ तुम्हारे प्राण खिन्न होते हैं ,
वे प्रेम और कर्त्तव्य भिन्न होते हैं ।
जाने दो निर्णय करें भरत ही सारा—
मेरा अथवा है, कथन यथार्थ तुम्हारा ।
मेरी - इनकी चिर - पंच रहीं तुम माता ,
हम दोनों के मध्यस्थ आज ये भ्राता ।”

Scene 6 of 6 · Ring 6: another man, the world

Like a lamp

Years later news comes that Lakṣmaṇa lies struck down at Laṅkā, and Śatrughna takes leave to go to war. Kaikeyī says she will go too: let this calamity in a woman's shape turn her face to the enemy's country. And Śatrughna, who once wanted her dead, answers: forgive me; you seemed a calamity to me too, but you were lighting the way. She says she went to war at her husband's side once; she will go now at her son's. And when Rāma comes home at last, she tells him: you took my faults and made them virtues; I gave only grief, but in finding you, I found Bharata.

Gupt's lines

मूर्त्तिमती आपत्ति यहाँ से मुँह मोड़ेगी , शत्रु-देश-सा ठौर मिला, वह क्यों छोड़ेगी ?”

“अम्ब, अम्ब, तुम आत्म-निरादर करती हो क्यों ? दे नव नव यश हमें, अयश से डरती हो क्यों ? क्षमा करो, आपत्ति मुझे भी लगती थीं तुम । मार्ग - दर्शिनी किन्तु ज्योति - सी जगती थीं तुम ।

“जलता है जो जननि, जाग कर वही जगाता ,

कैकेयी के दोष लिए तुमने गुण करके , ढोया जीवन - भार, दुख ही ढाया मैंने , पाकर तुम्हें परन्तु भरत को पाया मैंने !”

pp. 305 to 306, pp. 329 to 330

In our English (Kaikeyī:) Let calamity in bodily form turn its face from here; it has found a place like the enemy's land, why would it leave it? (Śatrughna:) Mother, mother, why do you so despise yourself? You who give us new glory, why fear dishonour? Forgive me: you seemed a calamity to me too. But you were showing the way, lit like a lamp. Whoever burns, mother, wakes and wakes others. (Kaikeyī, to Rāma:) You took Kaikeyī's faults and made them virtues. I carried the weight of life and brought only grief; but finding you, I found Bharata.

The last ring is the world, and another man. Śatrughna is the one who wanted her dead. He is the one who says: forgive me. You were lighting the way.

Look what he calls her: ज्योति-सी, like a lamp. The site's own word. Not a lamp despite what she did. A lamp because of the way she came through it. "Whoever burns, wakes, and wakes others." That is the sixth phase: the one who has been through the fire is the one others can see their way by.

And she is still calling herself a calamity. Years later, she still cannot set it down. That is true too, and Gupt does not hide it. The way back is not one night. But see who carries her now: the son who wanted her dead.

Gupt, the whole scene · pp. 305 to 306, pp. 329 to 330

p. 305

द्वादश सर्ग

थकता है क्यों हृदय हाय ! जब वह पकता है ?
सुरगण उलटा आज तुम्हारा मुँह तकता है ।”
“बेटा बेटा, नहीं समझती हूँ यह सब मैं ,
बहुत सह चुकी और नहीं सह सकती अब मैं ।
हाय ! गये सो गये, रह गये सो रह जावें ,
जाने दूँगी तुम्हें न, वे आवें जब आवें ।
तुष्ट तुम्हीं में उन्हें देखकर रही, रहूँगी ,
तुम्हें छोड़कर निराधार मैं कहाँ बहूँगी ?
देखूँ, तुमको कौन छीनने मुझसे आता ?”
पकड़ पुत्र को लिपट गई कौशल्या माता ।
धाड़ मारकर विलख रो पड़ी रानी भोली ,
पाश छुड़ाती हुई सुमित्रा तब यों बोली—
“जीजी, जीजी उसे छोड़ दो, जाने दो तुम ।
सोदर की गति अमर - समर में पाने दो तुम ।
सुख से सागर पार करे यह नागर मानी ,
बहुत हमारे लिए यहीं सरयू में पानी ।
जा, भैया, आदर्श गये तेरे जिस पथ से ,
कर अपना कर्त्तव्य पूर्ण तू इति तक अथ से ।
जिस विधि ने सविशेष दिया था मुझको जैसा ,
लौटाती हूँ आज उसे वैसा का वैसा ।”
पोंछ लिया नयनाम्बु मानिनी ने अंचल से ,
कैकेयी ने कहा रोककर आँसू बल से—
“भरत जायगा प्रथम और यह मैं जाऊँगी ,
ऐसा अवसर भला दूसरा कब पाऊँगी ?
मूर्त्तिमती आपत्ति यहाँ से मुँह मोड़ेगी ,
शत्रु-देश-सा ठौर मिला, वह क्यों छोड़ेगी ?”
“अम्ब, अम्ब, तुम आत्म-निरादर करती हो क्यों ?
दे नव नव यश हमें, अयश से डरती हो क्यों ?
क्षमा करो, आपत्ति मुझे भी लगती थीं तुम ।
मार्ग - दर्शिनी किन्तु ज्योति - सी जगती थीं तुम ।

p. 306

वत्स, वत्स, पर कौन जानता उसकी ज्वाला ,
उसके माथे वही धुआँ है काला काला !”
“जलता है जो जननि, जाग कर वही जगाता ,
जो इतना भी नहीं जानता, हाय ! ठगाता ।”
“मैं निज पति के संग गई थी असुर-समर में ,
जाऊँगी अब पुत्र - संग भी अरि - संगर में ।”

p. 329

पहुँचे पहुँचे राम राज-तोरण के आगे ।
न कुछ कह सकीं, न वे देख ही सकीं सुतों को ,
रोकर लिपटीं उठा उठा उन प्रणति-युतों को ।
काँप रही थीं हर्ष-भार से तीनों थर थर ,
लुटा रही थीं रत्न आज वे तीनों भर भर ।
लिए आरती वे उतारती थीं तीनों पर ,
क्या था, जिसे न आज वारती थीं तीनों पर ।
दिन था मानो यही वधू - वर के लेने का ,
जो जिसको हो इष्ट, वही उसको देने का ।
“बहू, बहू वैदेहि, बड़े दुख पाये तूने !”
“माँ, मेरे सुख आज हुए हैं दूने दूने !”
“आया फिर तू राम, कोख में मानो मेरी ,
लक्ष्मण, मेरी गोद रहे शिशु शैया तेरी ।”
“जन्म जन्म में यही कोख जननी, मैं पाऊँ ।”
“माँ, मैं लक्ष्मण इसी गोद में पलता आऊँ ।”
सुप्रभ प्रभु ने कहा सुमित्रा से नत होकर—
“पाया मैंने अम्ब, पुनः लक्ष्मण को खोकर ।
रख न सका मैं हाय ! दिया मुझको जो तुमने ,
धन्य तुम्हारा पुण्य, प्राण पाये इस द्रुम ने ।”
“किन्तु तुम्हें ही सौंप चुकी हूँ राम इसे मैं ,
लूँ फिर कैसे उसे, दे चुकी आप जिसे मैं ?
लिया अन्य का भार भरत ने, मैं अब हलकी ,
तुमको पाया, रही कामना फिर किस फल की ?”

p. 330

समझी प्रभु ने कसक भरत-जननी के मन की ,—
“मूल शक्ति माँ तुम्हीं सुयश के इस उपवन की ।
फल, सिर पर ले धूल दिए तुमने जो मीठे ,
उनके आगे हुए सुधा के घट भी सीठे ।”
“भागी हो तुम वत्स राम रघुवर, भव भर के ।
कैकेयी के दोष लिए तुमने गुण करके ,
ढोया जीवन - भार, दुख ही ढाया मैंने ,
पाकर तुम्हें परन्तु भरत को पाया मैंने !”

The end of the play

अब कटे सभी वे पाश नाश के प्रेरे ,

मैं वही केकयी, वही राम तुम मेरे ।

p. 157

A kathputli moves only as it is pulled. When its strings are cut, a doll falls.

Kaikeyī did not fall. Gupt cut the strings himself, in her own mouth: "अब कटे सभी वे पाश". What stood there was not a doll. It was the woman from the first night, the same one: "मैं वही केकयी".

The Bhāṭs kept the histories of families. Kaikeyī asked that her story be told for ever, as the story of an unlucky queen. Let it be told whole: the night, the strings, the names, the silence, the owning, the cut, and the son who called her a lamp.

Sāket by Maithilīśaraṇ Gupt, Saket Prakashan, Chirgaon (Jhansi). Every scene with Kaikeyī transcribed whole from the printing of 1980, shared on the Internet Archive. The kathputli facts are from Françoise Gründ and Puran Bhatt, "Kathputli ka Khel", World Encyclopedia of Puppetry Arts (UNIMA), 2012. The tellings, the readings and the drawing are ours.
Sāket, the whole book, as printed (archive.org)

← The circle  ·  ऊर्मि · The wave  ·  निकलना · The way out