की ओर · उसकी ओर
डर अपने पूरे आकार में। अभ्यास उससे भागना नहीं है। उसकी ओर चलना है।
पास में कुछ काला हो, धागा या कपड़ा, तो कलाई पर बाँध लो। भरत के यहाँ काला भयानक का रंग है। या जैसे हो, वैसे ही शुरू करो।
पहले शरीर, फिर आवाज़, उसके बाद सिर्फ़ भीतर। कोई भी, कभी भी; कुछ बंद नहीं है।
तुम उसकी ओर गए, और वह रोशनी बन गया।
हर राह शान्त पर, बीच में, ख़त्म होती है। वह राह किसी और दिन के लिये है।
यह क्यों
भरत किसी भाव को चार तरह से दिखाते हैं, चार अभिनय: शरीर से (आङ्गिक), आवाज़ से (वाचिक), जो पहना जाए उससे (आहार्य), और भीतर से (सात्त्विक) (अभिनयदर्पण ३८; घोष, १९५७)। यह अभ्यास इन्हें बाहर से भीतर की ओर चलता है।
भरत के यहाँ डर तेज़ है, उसकी आवाज़ तेज़ और नीची (१९.४३ और १९.५८ से ५९), उसका रंग काला (६.४२ से ४५), और उसका स्वर धैवत। इसलिये अँधेरे में ठहरी आवाज़ नीची है, और वह बाँसुरी के जिस स्वर में बदलती है, वह धा है।
गजेन्द्र, हाथियों का राजा, सरोवर में तब तक लड़ता रहा जब तक उसके मन, शरीर और प्राण का बल चुक न गया (भागवत ८.२.३०)। तब उसने सूँड़ में कमल उठाया और कठिनाई से पुकारा, और प्रभु उसी क्षण आए (८.३.३२ से ३३)। आवाज़ का द्वार वही पुकार है।
दूर हटने से कुछ नहीं खोता: आवाज़ बस ठहरी रहती है। उसकी ओर चलना ही पूरा अभ्यास है। कितना पास, पास गिना जाए, यह हमारा है। यहाँ जो भी करते हो, वह न रखा जाता है, न कहीं भेजा जाता है।