या कोई दीया खुद छू लीजिए
वाणी · श्रीमाँ और श्रीअरविन्द
श्रीमाँ की डायरी के नौ पन्ने, हर दीये पर एक। हर दीये का स्तोत्र उसके पन्ने पर पूरा होता है, मौन में पढ़ा हुआ; यहाँ इन्हें कभी भी पढ़ा जा सकता है।
- रौद्र · गुस्साश्रीमाँ · २१ नवंबर, १९१४
- भयानक · डरश्रीमाँ · ३ दिसंबर, १९१२
- करुण · उदासश्रीमाँ · २ फरवरी, १९१४
- बीभत्स · शर्मश्रीमाँ · १९ मार्च, १९१४
- शृङ्गार · तलबश्रीमाँ · २३ जनवरी, १९१७
- वीर · बेचैनश्रीमाँ · ८ जुलाई, १९१४
- हास्य · हल्काश्रीमाँ · १७ मई, १९१४
- अद्भुत · अभिभूतश्रीमाँ · ४ जुलाई, १९१४
- शान्त · सुन्नश्रीमाँ · ७ दिसंबर, १९१२
- दुर्गा स्तोत्र · श्रीअरविन्दसाहस के दीये, वीर, का स्तोत्र।
यह क्यों
जो भी भीतर है, वही सामग्री है। ये पन्ने उसे जाने को नहीं कहते। हर अवस्था को उसकी जगह मिलती है, और उसके लिये बनी एक बैठक।
भरत नाट्यशास्त्र में बताते हैं कि एक भाव रस कैसे बनता है: विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः। विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के मेल से रस बनता है (अध्याय ६, श्लोक ३१ के बाद का गद्य; घोष, खंड १, पृ. १०५)।
भरत ने अभिनेता और दर्शक के लिये लिखा था। यहाँ आप दोनों हैं: मंच आपका अपना शरीर है, दर्शक आप स्वयं हैं, और यह सब भगवान की ओर मुड़ा है। यह मोड़ हमारा है, भरत का नहीं।
आठ दीये भरत के आठ रस हैं, हर एक उस रंग में जो वे उसे देते हैं (६.४२ से ४३)। नौवाँ, शान्त, उनके पाठ में नहीं है, इसलिये उसका रंग हमारा है। इनमें कोई उत्तर ग़लत नहीं है।
हर रास्ता भक्ति के वही रूप गिनाता है जो उसमें सचमुच हैं, श्रीमद्भागवत ७.५.२३ में प्रह्लाद की नवधा भक्ति से। हर रस भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है, यह रूप गोस्वामी की शिक्षा है, उनके भक्तिरसामृतसिन्धु में।
श्रीमद्भागवत (७.१.३१ से ३२) में नारद युधिष्ठिर से कहते हैं कि गोपियाँ कृष्ण तक काम से पहुँचीं, कंस भय से, शिशुपाल और दूसरे राजा द्वेष से, वृष्णि संबंध से, पाण्डव स्नेह से और मुनि भक्ति से; इसलिये किसी भी उपाय से मन उन्हीं में लगाओ। कोई भाव ग़लत राह नहीं है।