उदास
उदासी झुकना जानती है। यहाँ वह पूरी धरती पर लेटकर झुकती है।
दुःख-दर्द हमारी दिव्य जननीका स्पर्श है जो हमें यह सिखाती है कि किस तरह सहन किया जाता और आनंदमें वर्द्धित हुआ जाता है। उस माताकी शिक्षाके तीन स्तर हैं — सबसे पहले सहनशीलता, फिर अंतरात्माकी समता और अंतमें परमानंद।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ९३ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. १७७) पूरा प्रसंग →१कथा
राहवाल्मीकि, जिनका शोक पहला श्लोक बना›
तमसा
नारद ने अभी-अभी वाल्मीकि को राम की कथा सुनाई थी और आकाश को लौट गए थे। थोड़ी देर बाद ऋषि तमसा के तट पर उतरे, गंगा से कुछ ही दूर, शिष्य भरद्वाज साथ। उन्होंने स्नान का घाट देखा और ठहर गए। 1.2.1 से 8
अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा॥वाल्मीकि रामायण 1.2.5
देखो भरद्वाज, इस घाट पर कीचड़ नहीं है। पानी सुंदर और निर्मल है, जैसे किसी भले आदमी का मन। उन्होंने शिष्य के हाथ से अपना वल्कल लिया और तट पर चलने लगे, चारों ओर फैले वन को देखते हुए। 1.2.5 से 8
क्रौञ्च
उनके पास क्रौञ्च पक्षियों का एक जोड़ा साथ-साथ घूम रहा था, कभी अलग नहीं, एक-दूसरे को मीठे स्वर में पुकारता। और उनके देखते-देखते एक बहेलिये ने, जिसका मन हिंसा पर लगा था, नर को मार गिराया। 1.2.9 से 10
तं शोणितपरीताङ्गं वेष्टमानं महीतले।
भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम्॥वाल्मीकि रामायण 1.2.11
वह धरती पर तड़प रहा था, देह लहू से लथपथ, और उसकी संगिनी ने उसे मरा देखा और रो उठी, शोक से भरी पुकार। और बहेलिये के गिराए उस पक्षी को देखकर ऋषि पर करुणा छा गई। 1.2.11 से 12
आह
क्रौञ्ची का रोना सुनकर, उनके जाने बिना, उनके मुँह से शब्द निकल पड़े: 1.2.13
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥वाल्मीकि रामायण 1.2.14
बहेलिये, तुम्हें अनंत बरसों तक कोई ठौर न मिले, क्योंकि तुमने प्रेम में डूबे क्रौञ्च के जोड़े में से एक को मार दिया। 1.2.14
श्लोक
फिर वे ठिठक गए, बेचैन। एक पक्षी के शोक में व्याकुल होकर मैंने यह क्या कह दिया? उन्होंने उस पर सोचा, और सुना कि वह क्या था, और शिष्य की ओर मुड़े। 1.2.15 से 16
पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः।
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा॥वाल्मीकि रामायण 1.2.17
पादों में बँधा, अक्षरों में सम, वीणा और ताल के योग्य: मेरे शोक में जो मुझसे निकला, वह श्लोक हो, और कुछ नहीं। शिष्य ने प्रसन्न होकर उसे कंठ कर लिया, और गुरु उससे प्रसन्न हुए। वाल्मीकि ने स्नान किया और आश्रम लौटे, अब भी उसी पर सोचते हुए। 1.2.17 से 19
ब्रह्मा हँसे
तब स्वयं ब्रह्मा उनसे मिलने आए। वाल्मीकि ने प्रणाम किया, आसन दिया, और सामने बैठ गए; पर उनका मन अब भी उस पक्षी पर था। कितना निर्दय काम, उन्होंने सोचा, इतने मीठे गाने वाले जीव को बिना कारण मार देना। और क्रौञ्ची के लिये बार-बार शोक करते हुए, शोक में डूबे, उन्होंने वह श्लोक फिर गाया, ब्रह्मा के सामने ही। 1.2.22 से 28
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन्मुनिपुंगवम्।
श्लोक एव त्वया बद्धो नात्र कार्या विचारणा॥वाल्मीकि रामायण 1.2.29
और ब्रह्मा हँसे और उनसे बोले: तुमने श्लोक ही रचा है; इसमें संदेह मत करो। मेरी ही इच्छा से यह वाणी तुम्हें आई है। अब राम की पूरी कथा, जैसी तुमने नारद से सुनी, ऐसे ही छन्द में कहो। जब तक धरती पर पर्वत रहेंगे और नदियाँ बहेंगी, तब तक राम की कथा लोगों में चलती रहेगी। 1.2.29 से 35
शोक श्लोक बना
ब्रह्मा अंतर्धान हो गए। वाल्मीकि और उनके शिष्य विस्मय में रह गए। और शिष्य वह श्लोक बार-बार गाते रहे, आनंद में, चकित, और आपस में कहते रहे: 1.2.37 से 38
समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा।
सोऽनुव्याहरणाद्भूयः शोकः श्लोकत्वमागतः॥वाल्मीकि रामायण 1.2.39
महर्षि ने चार समान अक्षरों वाले पादों में जो गाया, बार-बार दोहराए जाने से वह शोक श्लोक बन गया। और उन्होंने पूरी रामायण ऐसे ही श्लोकों में रची। 1.2.39 से 41
उसका शोक
हर ज्योतिर्गण शोक उठाए चलता है। कुछ उसका अपना है: बीते बरस, काम, गाँव में उसका नाम। कुछ दूसरों के लिये है: एक दोस्त जो लौटा नहीं, माँ का चेहरा, एक बच्चा जो तब बड़ा हो गया जब वह उसके भीतर कहीं खोया था। उससे कहा गया है कि इससे उबर जाओ, जैसे शोक कोई रास्ता हो जिसके अंत तक पहुँचना है।
वाल्मीकि अपने शोक से उबरे नहीं। उन्होंने उसे पाद दिए और ताल दी। उन्होंने उसे फिर कहा, और फिर, और वह शोक संसार का पहला श्लोक बन गया, और पूरी रामायण उसी से उगी। ब्रह्मा ने उनसे शोक छोड़ने को नहीं कहा। ब्रह्मा हँसे, आनंद से, और उनसे आगे कहने को कहा।
यही इस दीये का अभ्यास है, शोक से श्लोक: शोक को एक माप देना, थपथपाना, फिर कहना, जब तक वह गा न उठे। यह शोक को छोटा नहीं करता, न उसे सुखद होने का दिखावा करता है। यह उसे एक रूप देता है जिसे उठाया जा सके, गाया जा सके, आगे दिया जा सके। जो शोक वह उठाए है, वह उसमें खोट नहीं है। वह उसके अपने गीत की पहली पंक्ति हो सकता है।
कथा: वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 1.2.1 से 41, समीक्षित संस्करण (बड़ौदा) से, GRETIL के पाठ में पढ़ी गई; श्लोक संख्या उसी संस्करण की है। डाकू रत्नाकर की कथा बाद की परंपरा है और यहाँ नहीं कही गई। हिन्दी में कहना हमारा है, और इसका उसके लिये क्या अर्थ है, यह भी।
४वाणी
श्रीमाँ की डायरी, प्रार्थना और ध्यान, का एक पूरा पन्ना, जैसा उन्होंने इस दिन लिखा: भगवान् से एक प्रार्थना, यहाँ पूरी। यह इस दीये पर है, यह हमारा चुनाव है।
श्रीमाँ · २ फरवरी, १९१४
हे प्रभु, मैं एक ऐसा जीवंत प्रेम बनना चाहती हूं जो सब एकाकीपनको भर दे, सारे कष्टको शांत कर दे।
हे प्रभु, मैं तेरे आगे पुकार करती हूं, मुझे एक ऐसी धधकती ज्वाला बना दे जो सब कष्टोंको भस्मीभूत कर दे और उन्हें एक ऐसे आनंदमय प्रकाशमें बदल दे जो सब हृदयोंको प्रकाशित कर सके।
मेरी प्रार्थना स्वीकार कर, मुझे पवित्र प्रेम और असीम करुणाकी ज्वालामें रूपांतरित कर दे।
श्रीमाँ, प्रार्थना और ध्यान, पृष्ठ ३६
दुःख-दर्द हमारी दिव्य जननीका स्पर्श है जो हमें यह सिखाती है कि किस तरह सहन किया जाता और आनंदमें वर्द्धित हुआ जाता है। उस माताकी शिक्षाके तीन स्तर हैं — सबसे पहले सहनशीलता, फिर अंतरात्माकी समता और अंतमें परमानंद।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ९३ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. १७७)विचार और सूत्र से: लगभग १९१३ में श्रीअरविन्द ने इन्हें एक कॉपी में लिखा, तीन शीर्षकों में, ज्ञान, कर्म और भक्ति, और कभी छपने के लिये तैयार नहीं किया। श्रीमाँ ने १९५८ से १९७० तक इन्हें एक-एक करके पढ़ा और उन पर बोलीं; वही 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में है। नीचे: इस पंक्ति के साथ क्या खड़ा है, उस पर उनकी टिप्पणी, और यह यहाँ क्यों है।
इस पर, श्रीमाँ
जहांतक नैतिक बातोंसे सम्बन्ध है, यह बिलकुल स्पष्ट है, इसमें तर्क करनेकी कोई गुंजायश नहीं — सभी नैतिक कष्ट तुम्हारे स्वभावको बनाते हैं और तुम्हें सीधे आनन्दतक ले जाते हैं, बशर्ते कि तुम यह जानो कि उन्हें कैसे लिया जाय। परन्तु जब वे शरीरको छूते हैं...
उनकी बात आगे चलती है।
श्रीमाँ, 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. १७७इसके साथ, श्रीअरविन्द
फिर भी, ऐ मानवात्मा, दुःखकी खोज मत कर, क्योंकि यह भगवान्की इच्छा नहीं है, केवल उनके आनंदकी ही खोज कर; दुःख-कष्टका जहांतक प्रश्न है, वह तो निश्चित रूपसे उनके विधानके अनुसार उतनी बार और उतनी ही मात्रामें तेरे पास आयेगा ही जितनी बार और जितनी मात्रामें आना तेरे लिये आवश्यक है। उस समय उसे सहन कर ताकि तू अंतमें उनके आनंदोल्लाससे भरे हृदयको खोज सके।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ५०२ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३७०)यह यहाँ क्यों है
दुःख को एक स्पर्श की तरह देखा गया है जो सिखाता है, तीन स्तरों में, और श्रीमाँ जोड़ती हैं: बशर्ते कि तुम जानो उसे कैसे लिया जाय। उसी पुस्तक में दूसरा आधा भी है, ऊपर दिया हुआ: दुःख की खोज मत कर। इसलिये यह नहीं कहता कि शोक अच्छा है या उसे खोजना चाहिये। यह पढ़ना हमारा है।
हर सूत्र, श्रीमाँ की टिप्पणी के साथ, आश्रम की साइट पर पढ़िये →
एक लम्बी साँस
५बैठक
हर समूह की सावधानियाँ उसके अपने चरणों के साथ आती हैं।
क्या साथ लेकर चलेंगे?
बैठक
बैठक शुरू कीजिए →क्या साथ लेंगे, यह चुनिए, फिर बैठक खुलती है।
बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, गहरा और धीमा। फिर हर आसन में थोड़ी धीमी होती जाती है, लगभग छह साँस एक मिनट तक। हर पंक्ति साँस भीतर आते समय मन में पढ़ी जाती है, सफ़ेद, और बाहर जाते समय बोलकर कही जाती है, सुनहरी।
- आसनअस्त और उदय के ३ आसन, हर एक में शब्द कई बार
- साँसअ · उ · म · एक साँस पर तीन ध्वनियाँ
- जपवही शब्द, बैठकर।
- विश्रामशशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।
या कोई एक, अकेले: आसन · साँस · जप · विश्राम
विश्राम
शशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।
शशाङ्कासनकूल्हे एड़ियों पर बैठा लीजिए। माथा ज़मीन पर, हाथ आगे फैले हुए। अब मुँह बंद करके तीन बार गुंजन कीजिए।
शवासनपैर सीधे कीजिए और पीठ के बल लेट जाइए। पैर थोड़े खुले, हाथ शरीर के बग़ल में। आँखें बंद। अब तीन बार ॐ का उच्चारण कीजिए, और उसकी गूँज पूरे शरीर में महसूस कीजिए।
यह क्यों
भरत के नाट्यशास्त्र में यह करुण रस है। इसका स्थायी भाव शोक है; रंग कपोत; देवता यम; स्वर गान्धार, निषाद (घोष, खंड १: ६.१७, ६.४२ से ४५, १९.३८ से ४०)। दीया वही रंग रखता है।
भरत इस अवस्था को विलम्बित लय, विलम्बित काकु और अनुदात्त, स्वरित व कम्पित उच्चारण देते हैं (घोष, खंड १: लय १९.५८ से ५९ के बाद के गद्य में, पृ. ३५१; काकु १९.५८ से ५९ में, पृ. ३५०; उच्चारण १९.४३ में, पृ. ३४७)। इसलिये बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, गहरा और धीमा। जहाँ यह ख़त्म होती है, धीमी, वह हर अवस्था के लिये एक है: लगभग छह साँस एक मिनट में, वह गति जिस पर माला और योग का मंत्र पढ़ते हुए साँस अपने आप ठहर गई (बर्नार्डी और साथी, BMJ 2001, 323, पृ. 1446 से 1449)। हर अवस्था को वहीं ख़त्म करना हमारा है।
भरत ने अभिनेता और दर्शक के लिये लिखा था। यहाँ आप दोनों हैं, और यह सब भगवान की ओर मुड़ा है। यह मोड़ हमारा है, भरत का नहीं।
यह तीव्र अवस्थाओं की साँस है: गुस्सा, उदासी, तलब और विस्मय। किसी को जाने को नहीं कहा जाता। हर एक को एक ध्वनि मिलती है जो बाहर जाती है, और चुप्पी में ख़त्म होती है।
कृष्णाय वासुदेवाय: वसुदेव के पुत्र कृष्ण को, हरि को, परमात्मा को, उन गोविन्द को जो झुके हुओं का क्लेश नष्ट करते हैं: बार बार नमस्कार।
इस साइट पर यह काम आता है: दर्द, भारी मन.
प्रह्लाद की नवधा भक्ति (श्रीमद्भागवत ७.५.२३) में से यह बैठक सचमुच ये रूप रखती है: कीर्तन · स्मरण · वन्दन · आत्मनिवेदन। हर रस भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है, यह रूप गोस्वामी की शिक्षा है, उनके भक्तिरसामृतसिन्धु में।