करुण · अभिनय · करना

शोक से श्लोक · दुःख से छन्द

दुःख अपने पूरे भार में। अभ्यास उसे उतारना नहीं है। उसे चरण और लय देना है।

पास में कुछ धूसर हो, कबूतर के रंग का, धागा या कपड़ा, तो कलाई पर बाँध लो। भरत के यहाँ वही करुण का रंग है। या जैसे हो, वैसे ही शुरू करो।

पहले शरीर, फिर आवाज़, उसके बाद सिर्फ़ भीतर। कोई भी, कभी भी; कुछ बंद नहीं है।

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हर राह शान्त पर, बीच में, ख़त्म होती है। वह राह किसी और दिन के लिये है।

माला

यह क्यों

रामायण में वाल्मीकि ने एक बहेलिये को क्रौंच के जोड़े में से एक को मारते देखा, और दुःख में उनके मुँह से शब्द फूट पड़े (१.२.९ से १४)। उन शब्दों के बारे में उन्होंने कहा: चरणों में बँधा, अक्षरों में सम, वीणा और ताल के योग्य, जो दुःख में मुझसे निकला वह श्लोक हो (१.२.१७)। शोक श्लोक बन गया, शोकः श्लोकत्वमागतः (१.२.३९)।

यह छन्द अनुष्टुभ् है: एक चरण में आठ अक्षर, एक श्लोक में चार चरण। कौन सी थाप गुरु है और कौन सी लघु, यह तुम्हारी थापें तय करती हैं। तीन बातें छन्द का अपना नियम तय करता है: हर चरण में पाँचवाँ लघु और छठा गुरु, और सातवाँ पहले और तीसरे चरण में गुरु, दूसरे और चौथे में लघु। वाल्मीकि का पहला श्लोक यही नियम निभाता है, और जब तुम्हारा अपना कोई न हो, तो मन का द्वार उसी की लय बजाता है।

भरत के यहाँ करुण धीमा है (१९.५८ से ५९), उसका रंग कबूतर जैसा धूसर (कपोत, ६.४२ से ४५), उसके स्वर गान्धार और निषाद। बाँसुरी तुम्हारी पंक्ति ग और नि पर बजाती है, और हर चरण सा पर ख़त्म करती है।

तुम्हारे शब्द न माँगे जाते हैं, न तुमसे दूर जाते हैं। श्लोक रखोगे, तो सिर्फ़ उसकी लय रखी जाती है, इसी फ़ोन पर, और उसे जाने भी दे सकते हो। कितना लंबा, लंबा गिना जाए, यह हमारा है।

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