तलब, तड़प
तलब आनंद की खोज है, ऐसी जगह में जो उसे थाम नहीं सकती। यहाँ वह आनंद की ओर चलती है।
मैं भावोद्वेगोंको चिल्लाते सुनता हूं, “जीवन, जीवन, जीवन!” आत्माका उत्तर होता है: “भगवान्, भगवान्, भगवान्!” जबतक तुम जीवनको भगवान्के रूपमें नहीं देखोगे और उसी रूपमें उससे प्रेम नहीं करोगे, तबतक जीवन तुम्हारे लिये मुहरबन्द आनन्द रहेगा।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४४८ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३५६) पूरा प्रसंग →१कथा
राहतुलसीदास, जिनका प्रेम रात भर दौड़ा, और मुड़ गया›
फिर वाल्मीकि
तुलसीदास के ही समय के नाभादास ने भक्तों की अपनी माला में उन्हें उसके शीर्ष पर रखा, माला का सुमेरु, और बताया कि वे कौन थे:
कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ॥
त्रेता काव्य निबन्ध, करी सतकोटि रमायन।
इक अक्षर उद्धरैं, ब्रह्म हत्यादि परायन॥
अब भक्तनि सुखदैन, बहुरि लीला विस्तारी।
रामचरन रसमत्त, रहत अहनिसि व्रतधारी॥
संसार अपार के पार को, सुगम रूप नवका लयौ।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ॥
नाभादास, भक्तमाल, छप्पय 126 (श्रीभक्तमाल, मलूकपीठ, वृन्दावन, पृ. 131)तो करुण के दीये का शोक, वह शोक जो पहला श्लोक बना, यहाँ लौट आता है। पर तुलसी के फिर वाल्मीकि होने से पहले, वे एक युवक थे जिन्हें अपनी पत्नी से इतना प्रेम था कि उसके बिना एक रात भी न सह सके।
हाड़-चाम
तिया सौं सनेह, बिन पूछे पिता गेह गई, भूली सुधि देह, भजे वाही ठौर आये हैं।
बधू अति लाज भई, रिस सौं निकसि गई, प्रीति राम नई, तन हाड़-चाम छाये हैं॥
सुनी जब बात, मानौ ह्वै गयौ प्रभात, वह पाछे पछितात, तजि काशीपुरी धाये हैं।
कियौ तहाँ वास, प्रभुसेवा लै प्रकास कीनौ, लीनौ दृढभाव, नैन रूप के तिसाये हैं॥
प्रियादास, भक्तिरसबोधिनी, कवित्त 508 (श्रीभक्तमाल, मलूकपीठ, वृन्दावन, पृ. 131)प्रियादास इसे चार पंक्तियों में कहते हैं और किसी का न्याय करने नहीं रुकते। न उस आदमी का जो रात में पत्नी के पीछे दौड़ा। न उस पत्नी का जिसके शब्द क्रोध और लाज में निकले, और जो बाद में पछताई। वे बस इतना कहते हैं कि क्या हुआ, और कि वह प्रभात जैसा था।
अब न नसैहौं
बरसों बाद, अपनी विनय-पत्रिका में, राम को लिखी अपनी अर्ज़ियों की पोथी में, तुलसी ने यह लिखा:
अबलौं नसानी, अब न नसैहौं।
राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं॥
पायेउँ नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं।
स्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं॥
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं।
मन मधुकर पनकै तुलसी रघुपति-पद-कमल बसैहौं॥
तुलसीदास, विनय-पत्रिका 105 (गीता प्रेस, पृ. 171)वही प्रेम
हर ज्योतिर्गण एक ऐसी तड़प जानता है जो सुबह तक रुकती नहीं। उसके लिये उसने अँधेरे में जो पार करना था, पार किया है, और रास्ते में अपनी देह भूल गया है। उससे कहा गया है कि यही भूख उसकी खोट है।
तुलसी का प्रेम मारा नहीं गया। इस कथा में कुछ भी उनसे प्रेम छोड़ने को नहीं कहता। जो शक्ति रात में एक स्त्री के घर तक दौड़ी, वही शक्ति है जिसने रामचरितमानस लिखा, वह पोथी जो इस धरती के हर गाँव में गाई जाती है। बस उसे ऐसा विषय मिल गया जो नित नया था, जो हाड़-चाम पर ख़त्म नहीं होता।
और जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो उन बरसों को कोसा नहीं। लिखा: अबलौं नसानी, अब न नसैहौं। जब वे इन्द्रियों के बस में थे, इन्द्रियाँ उन पर हँसी थीं। उन्होंने उनसे घृणा नहीं की; बस उन्हें फिर हँसने न दिया। यही इस दीये का अभ्यास है: छूना नहीं। तड़प पूरी रहती है। बस वह उसकी ओर मुड़ जाती है जो चुकता नहीं।
नाभादास, भक्तमाल, छप्पय 126, और प्रियादास, भक्तिरसबोधिनी (1712), कवित्त 508, श्रीभक्तमाल (सम्पादक राजेन्द्रदास, मलूकपीठ, वृन्दावन) के छपे पृष्ठ 131 पर पढ़े गए (स्कैन के जलचिह्न के नीचे का एक शब्द वृन्दावन 2002 की छपाई के पृष्ठ 701 पर पढ़ा गया)। तुलसीदास, विनय-पत्रिका 105, गीता प्रेस, गोरखपुर के संस्करण के छपे पृष्ठ 171 पर पढ़ी गई। कहना हमारा है, और इसका उसके लिये क्या अर्थ है, यह भी।
४वाणी
श्रीमाँ की डायरी, प्रार्थना और ध्यान, का एक पूरा पन्ना, जैसा उन्होंने इस दिन लिखा: भगवान् से एक प्रार्थना, यहाँ पूरी। यह इस दीये पर है, यह हमारा चुनाव है।
श्रीमाँ · २३ जनवरी, १९१७
तूने इतने पूर्ण और इतने तीव्र एक प्रेमसे, एक सौंदर्यसे और एक आनंदसे मेरी सत्ताको भर दिया कि मुझे यह असंभव प्रतीत हुआ कि वह अन्यत्र संचारित न हो, वह मानों एक ज्वलंत अग्निकुंड था जिसमेंसे चिंतनकी फूंक चिनगारियोंको बहुत दूरतक उड़ा ले गयी और वे मनुष्योंके हृदयोंकी गुप्त गहराइयोंमें जाकर एकदम अनुरूप अन्य अंगोंको, तेरे दिव्य प्रेमकी आगको, हे भगवान्, जलाने लगीं, उस प्रेमकी आगको जो मानव जीवोंको अदम्य भावसे तेरी ओर धकेलता और आकर्षित करता है। हे मेरे परम प्रिय प्रभु! ऐसी कृपा कर कि यह मेरी आनंदविभोर चेतनाका महज एक दर्शन ही न रह जाय, बल्कि यह एक ऐसा सत्य बन जाय जो जीवों और वस्तुओंका सच्चा रूपांतर साधित करे।
ऐसा वर दे कि जिस प्रेम, जिस सौंदर्य और जिस आनंदने मेरी सत्ताको इस तरह परिप्लावित कर दिया है कि उनके वेगको सहन करनेकी शक्ति भी पर्याप्त मात्रामें उसमें नहीं है, वे ठीक उसी तरह उन सब लोगोंकी चेतनाको भी परिप्लावित कर दें जिन्हें मैंने देखा है, जिनके विषयमें मैंने सोचा है, और जिनके विषयमें न तो मैंने सोचा है तथा न जिन्हें मैंने देखा ही है . . .। ऐसा कर दे कि सब लोग जाग उठें तथा तेरे असीम आनंदके विषयमें सचेतन हो जायं!
हे मेरे मधुर मालिक! उनके हृदयोंको आनंद, प्रेम और सौंदर्यसे भर दे।
श्रीमाँ, प्रार्थना और ध्यान, पृष्ठ २१० से २११
मैं भावोद्वेगोंको चिल्लाते सुनता हूं, “जीवन, जीवन, जीवन!” आत्माका उत्तर होता है: “भगवान्, भगवान्, भगवान्!” जबतक तुम जीवनको भगवान्के रूपमें नहीं देखोगे और उसी रूपमें उससे प्रेम नहीं करोगे, तबतक जीवन तुम्हारे लिये मुहरबन्द आनन्द रहेगा।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४४८ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३५६)विचार और सूत्र से: लगभग १९१३ में श्रीअरविन्द ने इन्हें एक कॉपी में लिखा, तीन शीर्षकों में, ज्ञान, कर्म और भक्ति, और कभी छपने के लिये तैयार नहीं किया। श्रीमाँ ने १९५८ से १९७० तक इन्हें एक-एक करके पढ़ा और उन पर बोलीं; वही 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में है। नीचे: इस पंक्ति के साथ क्या खड़ा है, उस पर उनकी टिप्पणी, और यह यहाँ क्यों है।
इसके साथ, श्रीअरविन्द
इन्द्रियां कहती हैं: “वह उससे प्रेम करता है”, किन्तु आत्मा कहती है: “भगवान्, भगवान्, भगवान्।” जीवनका सर्वग्राही सूत्र यही है।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४४९ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३५६)इस पर, श्रीमाँ
इसी प्रकार श्रीअरविन्द जीवनके रहस्यको हमारे सामने प्रकट एवं सूत्रबद्ध करते हैं। अब इसे समझना और जीवनमें उतारना ही बाकी है।
श्रीमाँ, 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३५६, ४-४-७०यह यहाँ क्यों है
जीवन के लिये भावों की पुकार ठुकराई नहीं जाती; आत्मा उसका उत्तर देती है। यह यहाँ इसलिये है कि तड़प ग़लत नहीं है, वह अपने सच्चे विषय को खोज रही है। यह नहीं कहता कि हर तलब पूरी की जाय। यह पढ़ना हमारा है।
हर सूत्र, श्रीमाँ की टिप्पणी के साथ, आश्रम की साइट पर पढ़िये →
एक लम्बी साँस
५बैठक
हर समूह की सावधानियाँ उसके अपने चरणों के साथ आती हैं।
क्या साथ लेकर चलेंगे?
बैठक
बैठक शुरू कीजिए →क्या साथ लेंगे, यह चुनिए, फिर बैठक खुलती है।
बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, गरम, बिना जल्दी। फिर हर आसन में थोड़ी धीमी होती जाती है, लगभग छह साँस एक मिनट तक। हर पंक्ति साँस भीतर आते समय मन में पढ़ी जाती है, सफ़ेद, और बाहर जाते समय बोलकर कही जाती है, सुनहरी।
- आसनचिंगारी, हर आसन एक बार
- साँसअ · उ · म · एक साँस पर तीन ध्वनियाँ
- जपवही शब्द, बैठकर।
- विश्रामशशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।
या कोई एक, अकेले: आसन · साँस · जप · विश्राम
विश्राम
शशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।
शशाङ्कासनकूल्हे एड़ियों पर बैठा लीजिए। माथा ज़मीन पर, हाथ आगे फैले हुए। अब मुँह बंद करके तीन बार गुंजन कीजिए।
शवासनपैर सीधे कीजिए और पीठ के बल लेट जाइए। पैर थोड़े खुले, हाथ शरीर के बग़ल में। आँखें बंद। अब तीन बार ॐ का उच्चारण कीजिए, और उसकी गूँज पूरे शरीर में महसूस कीजिए।
यह क्यों
भरत के नाट्यशास्त्र में यह शृङ्गार रस है। इसका स्थायी भाव रति है; रंग श्याम; देवता विष्णु; स्वर मध्यम, पञ्चम (घोष, खंड १: ६.१७, ६.४२ से ४५, १९.३८ से ४०)। दीया वही रंग रखता है।
भरत इस अवस्था को मध्य लय, विलम्बित काकु और उदात्त व स्वरित उच्चारण देते हैं (घोष, खंड १: लय १९.५८ से ५९ के बाद के गद्य में, पृ. ३५१; काकु १९.५८ से ५९ में, पृ. ३५०; उच्चारण १९.४३ में, पृ. ३४७)। इसलिये बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, गरम, बिना जल्दी। जहाँ यह ख़त्म होती है, धीमी, वह हर अवस्था के लिये एक है: लगभग छह साँस एक मिनट में, वह गति जिस पर माला और योग का मंत्र पढ़ते हुए साँस अपने आप ठहर गई (बर्नार्डी और साथी, BMJ 2001, 323, पृ. 1446 से 1449)। हर अवस्था को वहीं ख़त्म करना हमारा है।
भरत ने अभिनेता और दर्शक के लिये लिखा था। यहाँ आप दोनों हैं, और यह सब भगवान की ओर मुड़ा है। यह मोड़ हमारा है, भरत का नहीं।
यह तीव्र अवस्थाओं की साँस है: गुस्सा, उदासी, तलब और विस्मय। किसी को जाने को नहीं कहा जाता। हर एक को एक ध्वनि मिलती है जो बाहर जाती है, और चुप्पी में ख़त्म होती है।
ॐ आनन्दमयि: माँ के लिये श्री अरविन्द का मंत्र, जो आनन्द से शुरू होता है।
इस साइट पर यह काम आता है: तलब.
प्रह्लाद की नवधा भक्ति (श्रीमद्भागवत ७.५.२३) में से यह बैठक सचमुच ये रूप रखती है: कीर्तन · स्मरण · वन्दन। हर रस भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है, यह रूप गोस्वामी की शिक्षा है, उनके भक्तिरसामृतसिन्धु में।