गुस्सा, खीज, कड़वाहट
गुस्सा वह बल है जिसे अभी दिशा नहीं मिली। यहाँ उसे दिशा मिलती है।
कर्म-पथका चमत्कार यह है कि भगवान्के साथ शत्रुता भी मुक्तिका साधन बनायी जा सकती है। कभी-कभी भगवान् हमें अपनी ओर खींचकर द्रुत वेगसे अपने साथ सटा लेते हैं और फिर हमारे साथ एक भयानक, अजेय और दुराग्रही शत्रुके रूपमें युद्ध भी करते हैं।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ३७३ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३३३) पूरा प्रसंग →१कथा
राहशिशुपाल, जिसका क्रोध उन्हें कभी नहीं छोड़ पाया›
सभा
युधिष्ठिर के महायज्ञ, राजसूय में, देश के सब राजा एक सभा में बैठे थे, और उनके साथ ऋषि। पहला सम्मान उनमें से किसी एक को जाना था, और वह कृष्ण को गया। युधिष्ठिर ने अपने हाथों से उनके चरण धोए, उन्हें पीला रेशम और रत्न पहनाए, और उनकी आँखें ऐसी भर आईं कि वे उनकी ओर देख न सके। पूरी सभा हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। नमो, सबने कहा, जय। फूल बरसे। 10.74.28 से 29
क्रोध
एक आदमी खड़ा नहीं हुआ। चेदि का राजा, दमघोष का पुत्र, शिशुपाल, कृष्ण के गुणों का बखान तब तक सुनता रहा जब तक एक शब्द और सहना उसके बस में न रहा। वह अपने आसन से उछलकर उठा, बाँह हवा में उठाई, और हर राजा और हर ऋषि के सामने उसने भगवान पर कठोर शब्द फेंके। उस सभा में उसे किसी का डर नहीं था। 10.74.30
इत्थं निशम्य दमघोषसुतः स्वपीठाद् उत्थाय कृष्णगुणवर्णनजातमन्युः।
उत्क्षिप्य बाहुमिदमाह सदस्यमर्षी संश्रावयन् भगवते परुषाण्यभीतः॥श्रीमद्भागवत 10.74.30
ग्वाला, उसने कहा। अपने कुल पर कलंक। हर वर्ण और हर धर्म से बाहर, अपनी मनमानी करने वाला, जिसके नाम एक भी गुण नहीं। क्या देवताओं के लिये रखा भोग कौआ खाएगा? वह बोलता गया, बोलता गया। इसमें कुछ नया नहीं था। नारद कहते हैं कि जिस दिन से वह तुतलाकर बोलना सीखा, उसी दिन से उसकी जीभ कृष्ण के विरुद्ध चल रही थी। उसका पूरा जीवन एक क्रोध था, और उस क्रोध का एक ही चेहरा था। 10.74.31 से 37, 7.1.17
मौन
कृष्ण कुछ नहीं बोले। राजाओं से वह सुना न गया; वे कान बंद करके बाहर चले गए, चेदि के राजा को कोसते हुए। पाण्डव और उनके साथी उसे मारने के लिये शस्त्र उठाकर उठ खड़े हुए। और शिशुपाल, एक पल को भी डगमगाए बिना, तलवार और ढाल उठाकर कृष्ण के साथ खड़े हर आदमी पर अपने शब्द फेंकता रहा। 10.74.38 से 42
ज्योति
तब कृष्ण उठे। उन्होंने अपने लोगों को रोका, और अपने तीखी धार वाले चक्र से उस आदमी का सिर ले लिया जो उन पर झपट रहा था। सभा में कोलाहल मच गया, और शिशुपाल के पीछे चलने वाले राजा जान बचाकर भागे। और तब वह हुआ जिसकी उस सभा में किसी ने आशा नहीं की थी। 10.74.43 से 44
चैद्यदेहोत्थितं ज्योतिर्वासुदेवमुपाविशत्।
पश्यतां सर्वभूतानामुल्केव भुवि खाच्च्युता॥श्रीमद्भागवत 10.74.45
शिशुपाल के शरीर से एक ज्योति उठी और वासुदेव में समा गई, सब प्राणियों के देखते-देखते, जैसे आकाश से धरती पर उल्का गिरती है। मिट्टी में नहीं। अँधेरे में कहीं दूर नहीं। उनमें। 10.74.45
क्यों
युधिष्ठिर यह समझ न सके। जिस आदमी ने बोलना सीखने के दिन से जीवन भर भगवान की निंदा की, वह सारे संसार की आँखों के सामने उनमें समा जाता है? उसकी जीभ क्यों न गल गई, वह अँधेरे में क्यों न गिरा? उन्होंने नारद की ओर देखा। 7.1.13 से 20
एतद्भ्राम्यति मे बुद्धिर्दीपार्चिरिव वायुना।
ब्रूह्येतदद्भुततमं भगवान्ह्यत्र कारणम्॥श्रीमद्भागवत 7.1.20
मेरी बुद्धि इस पर डोल रही है, उन्होंने कहा, जैसे हवा में दीये की लौ। यह सबसे बड़ा आश्चर्य मुझे बताइये। इसका कारण स्वयं भगवान ही होंगे। 7.1.20
नारद का उत्तर दीयों के इस पूरे घर की जड़ है। मन को उनसे बाँधो, बैर से, या बिना बैर, भय से, स्नेह से, कामना से, किसी भी तरह: वे इन्हें अपने से अलग नहीं देखते। और तब उन्होंने वह कहा जो कहने का साहस कोई नहीं करता: 7.1.25 से 28
यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात्।
न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः॥श्रीमद्भागवत 7.1.26
जैसे मनुष्य दृढ़ बैर के बंधन से उनमें तन्मय हो जाता है, वैसा भक्ति-योग से भी नहीं होता: यह मेरा निश्चित मत है। दीवार की कोठरी में ततैया जिस कीड़े को बंद कर देता है, वह क्रोध और भय में ततैये के सिवा कुछ नहीं सोचता, और ततैये का ही रूप पा जाता है। शिशुपाल ने कृष्ण को किसी भक्त से कम नहीं सोचा। उसने और कुछ सोचा ही नहीं, और नारद कहते हैं कि तीन जन्मों तक ऐसा ही रहा। 7.1.26 से 27, 7.1.46
जन्मत्रयानुगुणितवैरसंरब्धया धिया।
ध्यायंस्तन्मयतां यातो भावो हि भवकारणम्॥श्रीमद्भागवत 10.74.46
तीन जन्मों में बढ़े बैर से जकड़ी बुद्धि से, उनका ध्यान करते हुए, वह उनमें तन्मय हो गया। क्योंकि भाव ही होने का कारण है। 10.74.46
हर राह
गोप्यः कामाद्भयात्कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः।
सम्बन्धाद्वृष्णयः स्नेहाद्यूयं भक्त्या वयं विभो॥श्रीमद्भागवत 7.1.30
गोपियाँ उन तक काम से पहुँचीं, कंस भय से, शिशुपाल और दूसरे राजा द्वेष से, वृष्णि संबंध से, तुम पाण्डव स्नेह से, और हम भक्ति से। 7.1.30
कतमोऽपि न वेनः स्यात्पञ्चानां पुरुषं प्रति।
तस्मात्केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत्॥श्रीमद्भागवत 7.1.31
इनमें कोई वेन नहीं है। इसलिये किसी भी उपाय से मन कृष्ण में लगाओ। वेन वह राजा था जिसके मन में उनके लिये कुछ नहीं था, न प्रेम, न घृणा, और खोया वही। श्रीधर इस श्लोक को ऐसे पढ़ते हैं कि तीव्रता के अभाव से: उसके भीतर भगवान की ओर कुछ जलता ही नहीं था। भाव का प्रकार निर्णय नहीं करता। उसकी शक्ति करती है। 7.1.31
उसके भीतर की आग
हर ज्योतिर्गण इस आग को जानता है। उन पर गुस्सा जो समझे नहीं, उन पर जिन्होंने उसे बेचा, बीते बरसों पर, बातें बनाते गाँव पर, खुद पर। उससे कहा गया है कि इसे बुझा दो, जैसे गुस्सा ही दुश्मन हो, और उसने कोशिश की है, और यह और भड़ककर लौटा है।
भागवत शिशुपाल से अपनी आग बुझाने को नहीं कहता। उसकी प्रशंसा भी नहीं करता: उसके शब्दों ने पूरी सभा को चोट पहुँचाई, और कथा यह नहीं छिपाती। वह जो कहता है वह इन दोनों से अनोखा है। जिस आग ने अपना लक्ष्य एक पल को भी नहीं छोड़ा, वह वहीं पहुँची जिधर वह मुड़ी थी। उसका क्रोध उसका नाश नहीं था। वह उसके भीतर की सबसे निष्ठावान चीज़ थी।
इसलिये उसके भीतर कुछ भी मारना नहीं है। जो शक्ति उसमें उठती है, तीखी, तेज़, ऊँची, वही शक्ति है जिसे इकट्ठा करने में एक ऋषि अपना जीवन लगाता है। आसपास के लोगों पर फेंकी जाए तो उन्हें जलाती है और लौटकर उसे जलाती है। मोड़ी जाए, और एक बिंदु पर थामी जाए, स्थिर, जैसे इस दीये के अभ्यास में लौ थामी जाती है, तो वह ज्योति बन जाती है जो वहीं जाती है जिधर उसने उसे मोड़ा है।
इस कथा में खोया केवल वह जिसके भीतर कुछ नहीं था। वह वैसा नहीं है। आज रात उसके भीतर जो भी जल रहा है, वही सामग्री है।
कथा: श्रीमद्भागवत, 10.74.28 से 46 और 7.1.13 से 46, संस्कृत में, GRETIL के पाठ में (उलरिख़ श्टील) पढ़ी गई; श्लोक संख्या उसी पाठ की है, और सातवें स्कन्ध में वह कुछ छपे संस्करणों से एक कम चलती है (यहाँ का 7.1.30 वहाँ 7.1.31 है)। वेन क्यों खोया, यह श्रीधर स्वामी की भावार्थदीपिका में 7.1.31 के पढ़ने के अनुसार है। हिन्दी में कहना हमारा है, और इसका उसके लिये क्या अर्थ है, यह भी।
४वाणी
श्रीमाँ की डायरी, प्रार्थना और ध्यान, का एक पूरा पन्ना, जैसा उन्होंने इस दिन लिखा: भगवान् से एक प्रार्थना, यहाँ पूरी। यह इस दीये पर है, यह हमारा चुनाव है।
श्रीमाँ · २१ नवंबर, १९१४
हे प्रभु! तूने मुझे अपनी शक्ति प्रदान की है जिसमें कि तेरी शांति और आनंदका राज्य इस जगत्में स्थापित हो।
और अब यह सत्ता संपूर्ण पृथ्वीको लपेट लेनेवाले शांतिके एक आलिंगनके सिवा, सभी चीजोंको डुबा देनेवाले आनंदके एक सागरके सिवा और कुछ नहीं है।
ऐ घृणासे भरा हुआ मनुष्य! तेरे हृदयसे हिंसा वैसे ही धुल जायगी जैसे समुद्र बालूपर पड़े हुए पदचिह्नोंको धो डालता है।
ऐ प्रतिशोधपर जीनेवाले मनुष्यो! तुम्हारे हृदयोंमें शांति वैसे ही प्रवेश करेगी जैसे अपनी माताकी गोदमें झूलते हुए बालककी आत्मामें वह प्रवेश करती है।
कारण, विश्व-जननीने पृथ्वीकी ओर अपनी दृष्टि फेरी है और उसे आशीर्वाद दिया है।
श्रीमाँ, प्रार्थना और ध्यान, पृष्ठ १६३
कर्म-पथका चमत्कार यह है कि भगवान्के साथ शत्रुता भी मुक्तिका साधन बनायी जा सकती है। कभी-कभी भगवान् हमें अपनी ओर खींचकर द्रुत वेगसे अपने साथ सटा लेते हैं और फिर हमारे साथ एक भयानक, अजेय और दुराग्रही शत्रुके रूपमें युद्ध भी करते हैं।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ३७३ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३३३)विचार और सूत्र से: लगभग १९१३ में श्रीअरविन्द ने इन्हें एक कॉपी में लिखा, तीन शीर्षकों में, ज्ञान, कर्म और भक्ति, और कभी छपने के लिये तैयार नहीं किया। श्रीमाँ ने १९५८ से १९७० तक इन्हें एक-एक करके पढ़ा और उन पर बोलीं; वही 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में है। नीचे: इस पंक्ति के साथ क्या खड़ा है, उस पर उनकी टिप्पणी, और यह यहाँ क्यों है।
इसके साथ, श्रीअरविन्द
कर्मका पथ एक प्रकारसे भगवान्के तिहरे मार्गका एक अत्यधिक कठिन पक्ष है; तो भी क्या यह, कम-से-कम, इस जड़ जगत्में सबसे अधिक सरल, विस्तृत और आनंददायक भी नहीं है? कारण, प्रत्येक क्षण हम भगवान्से, जो कि स्वयं कर्मी हैं, टकराते हैं, तथा उनके सहस्रों दिव्य स्पर्शोंसे उन्हीं जैसे बन जाते हैं।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ३७२ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३३३)इस पर, श्रीमाँ
संक्षेपमें, भागवत कृपा इतनी अद्भुत है कि तुम कुछ भी करो वह तुम्हें भागवत लक्ष्यकी ओर देर या सवेर ले ही जायगी।
श्रीमाँ, 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३३३, ५-३-७०यह यहाँ क्यों है
वे भगवान् के प्रति शत्रुता की बात करते हैं, कर्म-पथ के भीतर, कर्म के जीवन में; लोगों पर क्रोध की नहीं, और वे क्रोध की प्रशंसा नहीं करते। यह यहाँ एक ही बात के लिये है: मनुष्य की सबसे उग्र गति भी राह बन सकती है। यह पढ़ना हमारा है।
हर सूत्र, श्रीमाँ की टिप्पणी के साथ, आश्रम की साइट पर पढ़िये →
एक लम्बी साँस
५बैठक
हर समूह की सावधानियाँ उसके अपने चरणों के साथ आती हैं।
क्या साथ लेकर चलेंगे?
बैठक
बैठक शुरू कीजिए →क्या साथ लेंगे, यह चुनिए, फिर बैठक खुलती है।
बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, तीखा, तेज़। फिर हर आसन में थोड़ी धीमी होती जाती है, लगभग छह साँस एक मिनट तक। हर पंक्ति साँस भीतर आते समय मन में पढ़ी जाती है, सफ़ेद, और बाहर जाते समय बोलकर कही जाती है, सुनहरी।
- आसनअस्त और उदय, हर आसन एक बार
- साँसअ · उ · म · एक साँस पर तीन ध्वनियाँ
- जपवही शब्द, बैठकर।
- विश्रामशशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।
या कोई एक, अकेले: आसन · साँस · जप · विश्राम
विश्राम
शशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।
शशाङ्कासनकूल्हे एड़ियों पर बैठा लीजिए। माथा ज़मीन पर, हाथ आगे फैले हुए। अब मुँह बंद करके तीन बार गुंजन कीजिए।
शवासनपैर सीधे कीजिए और पीठ के बल लेट जाइए। पैर थोड़े खुले, हाथ शरीर के बग़ल में। आँखें बंद। अब तीन बार ॐ का उच्चारण कीजिए, और उसकी गूँज पूरे शरीर में महसूस कीजिए।
यह क्यों
भरत के नाट्यशास्त्र में यह रौद्र रस है। इसका स्थायी भाव क्रोध है; रंग रक्त; देवता रुद्र; स्वर षड्ज, ऋषभ (घोष, खंड १: ६.१७, ६.४२ से ४५, १९.३८ से ४०)। दीया वही रंग रखता है।
भरत इस अवस्था को द्रुत लय, दीप्त काकु और उदात्त व कम्पित उच्चारण देते हैं (घोष, खंड १: लय १९.५८ से ५९ के बाद के गद्य में, पृ. ३५१; काकु १९.५८ से ५९ में, पृ. ३५०; उच्चारण १९.४३ में, पृ. ३४७)। इसलिये बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, तीखा, तेज़। जहाँ यह ख़त्म होती है, धीमी, वह हर अवस्था के लिये एक है: लगभग छह साँस एक मिनट में, वह गति जिस पर माला और योग का मंत्र पढ़ते हुए साँस अपने आप ठहर गई (बर्नार्डी और साथी, BMJ 2001, 323, पृ. 1446 से 1449)। हर अवस्था को वहीं ख़त्म करना हमारा है।
भरत ने अभिनेता और दर्शक के लिये लिखा था। यहाँ आप दोनों हैं, और यह सब भगवान की ओर मुड़ा है। यह मोड़ हमारा है, भरत का नहीं।
यह तीव्र अवस्थाओं की साँस है: गुस्सा, उदासी, तलब और विस्मय। किसी को जाने को नहीं कहा जाता। हर एक को एक ध्वनि मिलती है जो बाहर जाती है, और चुप्पी में ख़त्म होती है।
शान्ति: वह हम दोनों की साथ साथ रक्षा करे, साथ साथ पोषण करे; हम साथ मिलकर पराक्रम करें; हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, और हम एक दूसरे से द्वेष न करें।
इस साइट पर यह काम आता है: शर्म और अकेलापन.
प्रह्लाद की नवधा भक्ति (श्रीमद्भागवत ७.५.२३) में से यह बैठक सचमुच ये रूप रखती है: कीर्तन · स्मरण · वन्दन · आत्मनिवेदन। हर रस भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है, यह रूप गोस्वामी की शिक्षा है, उनके भक्तिरसामृतसिन्धु में।