शान्ति
रौद्र · गुस्सा, खीज, कड़वाहट
ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
वह हम दोनों की साथ साथ रक्षा करे, साथ साथ पोषण करे; हम साथ मिलकर पराक्रम करें; हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, और हम एक दूसरे से द्वेष न करें।
यही क्यों
गुस्से में लगभग हमेशा कोई दूसरा होता है। यह मंत्र गुस्से को जाने को नहीं कहता। हर पंक्ति में दोनों को रखता है, और चौथी पंक्ति में द्वेष को उगने से पहले ही खुलकर कह देता है: मा विद्विषावहै। इसीलिये यहाँ यह गुस्से का जप है। बल बना रहता है, और उसे एक हम मिलता है जिसके भीतर वह काम करे।
इसकी हर पंक्ति दोनों को साथ रखती है: सह, साथ, और नौ, हम दोनों। न मैं, न सब: हम दोनों। सिखाने वाला और सीखने वाला, दोनों एक साथ बोलते हैं, सिखाने से पहले।
इसीलिये यह यहाँ है। इस प्रशिक्षण का छठा चरण वही है: जो इससे होकर निकला है, वह उसके सामने खड़ा है जो अभी इसी में है। कोई किसी से ऊपर नहीं। यह वाक्य उसी कमरे का है, और उसी कमरे के लिये बहुत पहले लिखा गया था।
मा विद्विषावहै पर ठहरिये। हम एक दूसरे से द्वेष न करें। यह भावुकता नहीं है। यह मानकर चलता है कि कठिन काम में साथ लगे दो लोग अक्सर एक दूसरे से चिढ़ने लगते हैं, और शुरू करने से पहले प्रार्थना करता है कि इस बार ऐसा न हो।
जिन कठिनाइयों में यह साथ देता है: शर्म और अकेलापन
वाचिक: एक साँस छोड़ने भर की लंबाई में, बोलकर। अक्षर साथ-साथ जलते हैं। उपांशु: होंठ हिलते हैं, साँस उसे उठाती है, कमरे में कोई और नहीं सुनता। रोशनी हर पंक्ति में अपने रंग में चलती है, जैसे बोलकर। मानस: कुछ कहा नहीं जाता। शब्द धुँधले हो जाते हैं, रोशनी फिर भी उनमें चलती है, और उनका अर्थ रहता है, साँस और मनकों के साथ। अन्तर्यात्रा: एक माला जो अपने आप भीतर की ओर जाती है। पहला तिहाई बोलकर, दूसरा फुसफुसाकर, आख़िरी मन में। आवाज़ कमरे से अपने आप चली जाती है, आपको तय नहीं करना पड़ता।
कितनी बार
तीन ही पूरा है। एक बार आरंभ में, एक बार अंत में।
किस तरह
यही परंपरा का क्रम है, और यह स्तरों की सीढ़ी नहीं, भीतर की ओर लौटना है। यहाँ कुछ भी बंद नहीं है। आज आप जिस पायदान पर हैं, वहीं खड़े रहिये।