हँसी · घूमती हँसी
हल्कापन अपनी पूरी चमक में। अभ्यास उसे दबाना नहीं है। उसे सब तक घुमाना है।
पास में कुछ सफ़ेद हो, धागा या कपड़ा, तो कलाई पर बाँध लो। भरत के यहाँ सफ़ेद हास्य का रंग है। या जैसे हो, वैसे ही शुरू करो।
पहले शरीर, फिर आवाज़, उसके बाद सिर्फ़ भीतर। कोई भी, कभी भी; कुछ बंद नहीं है।
हँसी घूमी, और तुम तक लौट आई।
हर राह शान्त पर, बीच में, ख़त्म होती है। वह राह किसी और दिन के लिये है।
यह क्यों
भरत किसी भाव को चार तरह से दिखाते हैं, चार अभिनय: शरीर से (आङ्गिक), आवाज़ से (वाचिक), जो पहना जाए उससे (आहार्य), और भीतर से (सात्त्विक) (अभिनयदर्पण ३८; घोष, १९५७)। यह अभ्यास इन्हें बाहर से भीतर की ओर चलता है।
भरत कहते हैं कि हँसी दो तरह की है: जब आदमी ख़ुद हँसे, और जब वह दूसरों को हँसाए (६.४९ से पहले का गद्य)। घेरा दूसरी तरह की हँसी है। वे छह हँसियाँ गिनाते हैं, उस हल्की मुस्कान से जिसमें दाँत नहीं दिखते, उस हँसी तक जिसमें हाथ पसलियों पर चले जाते हैं (६.५२ से ५९)। मन का द्वार उनमें पहली है।
भरत के यहाँ हास्य के देवता प्रमथ हैं, शिव के अपने गण (६.४४ से ४५), उसका रंग सफ़ेद (६.४२ से ४३), उसकी लय मध्य (१९.५८ से ५९), और उसके स्वर मध्यम और पञ्चम, इसलिये घेरा म और प पर हँसता है। वह शृङ्गार से उपजता है (६.३९)।
जो हँसी न आए, वह कहीं छूटी नहीं: घेरा फिर भी घूमता है। कितना तेज़, तेज़ गिना जाए, यह हमारा है। यहाँ जो भी करते हो, वह न रखा जाता है, न कहीं भेजा जाता है।