वीर · अभिनय · करना

संकल्प · किसी और के लिये

बेचैनी अपनी पूरी ताक़त में। अभ्यास उसे दबाकर बैठना नहीं है। उसे किसी और तक राह देना है, और फल छोड़ देना है।

पास में कुछ हल्का नारंगी हो, धागा या कपड़ा, तो कलाई पर बाँध लो। भरत के यहाँ हल्का नारंगी वीर का रंग है। या जैसे हो, वैसे ही शुरू करो।

पहले शरीर, फिर आवाज़, उसके बाद सिर्फ़ भीतर। कोई भी, कभी भी; कुछ बंद नहीं है।

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भरत के यहाँ अद्भुत वीर से उपजता है (६.३९)। वह राह किसी और दिन के लिये है।

माला

यह क्यों

भरत किसी भाव को चार तरह से दिखाते हैं, चार अभिनय: शरीर से (आङ्गिक), आवाज़ से (वाचिक), जो पहना जाए उससे (आहार्य), और भीतर से (सात्त्विक) (अभिनयदर्पण ३८; घोष, १९५७)। यह अभ्यास इन्हें बाहर से भीतर की ओर चलता है।

भरत के यहाँ वीर की जड़ उत्साह है। वह उत्साह, लगन और सूझ से उपजता है, और धीरज और दृढ़ता में दिखता है (६.६७ से ६८)। वह तीन तरह का है: दान से, धर्म से, और युद्ध से (६.७९)। यह अभ्यास पहले दो हैं। लड़ने को यहाँ कोई नहीं है।

श्री अरविन्द, गीता की सीढ़ी पर, अभ्यास, ज्ञान, ध्यान और कर्मफल के त्याग पर (१२.१२), Essays on the Gita में (CWSA 19, पृ. ४०३), अंग्रेज़ी में: “But more powerful still is the giving up of the fruit of one’s works, because that immediately destroys all causes of disturbance and brings and preserves automatically an inner calm and peace”. कर्म के फल का त्याग इनसे भी अधिक बलवान है, क्योंकि वह अशान्ति के हर कारण को तुरन्त मिटा देता है, और भीतर शान्ति ले आता है और उसे बनाए रखता है। इसलिये यह पन्ना कभी नहीं पूछता कि कैसा रहा।

भरत के यहाँ वीर की दृष्टि उजली और पूरी खुली होती है, पुतलियाँ सीधी (८.५०), और यही मन का द्वार है। उसका रंग हल्का नारंगी (६.४२ से ४३), उसके देवता इन्द्र (६.४४ से ४५), उसके स्वर षड्ज और ऋषभ: रोशनी सा पर चलती है और रे पर पहुँचती है।

छह काम हमारे हैं, एक गाँव के लिये लिखे हुए, और तुम्हारा अपना कोई भी काम उतना ही अच्छा है। कितना एक सा, एक सा गिना जाए, यह हमारा है। यहाँ जो भी चुनते हो, वह न रखा जाता है, न कहीं भेजा जाता है।

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