मैथिलीशरण गुप्त · साकेत · एक भरत मिलाप

लोकापवाद

एक आदमी चौदह बरस एक ऐसे नाम के नीचे जीता है जो उसने नहीं कमाया, उस काम के लिए जो उसकी माँ ने उसके नाम पर किया। साकेत का हर वह दृश्य जिसमें भरत हैं, पूरा, जैसे रामलीला खेलती है, झाँकी-झाँकी, जब तक दोनों भाई मिल नहीं जाते।

भरत मिलाप क्या है

हर शरद में उत्तर भारत के नगर और गाँव रामलीला खेलते हैं, "राम की लीला", दशहरे पर खेली जाने वाली रामायण। कहीं-कहीं वह पूरे महीने चलती है। उसकी शक्ति चित्रों की एक पाँत है: हर दृश्य अपने चरम पर ठहरकर थम जाता है, एक झाँकी, और लोग गाते हैं और कथा में साथ देते हैं। कोई बाहर से नहीं देखता। गाँव ही पात्र बनता है, मुखौटे, पोशाकें, पुतले और रोशनी बनाता है, और किसी की जाति, धर्म या उम्र पूछे बिना साथ खड़ा होता है।

रामनगर में, बनारस के गंगा पार, एक दिन ऐसा आता है जब भरत राम की खड़ाऊँ सिर पर बाँधकर चित्रकूट से चलते हैं, उन्हें सिंहासन पर रखते हैं और नन्दिग्राम में पर्णकुटी बनाकर रहने जाते हैं, और उस कुटी की आरती पर लोग भरत की जय बोलते हैं। और बनारस में, नाटी इमली के मैदान पर, भरत मिलाप का दिन आता है: भाई मिलते हैं, गले लगते हैं, और उसे देखने भीड़ उमड़ पड़ती है।

इसकी तीन बातें इस पन्ने के लिए सच हैं।

यह ऐसा खेल है जिसके भीतर पूरा गाँव है। किसी आदमी के चौदह बरस कभी अकेले उसके नहीं होते: पत्नी उन्हें थामती है, भाई घर चलाता है, माँ उन्हें सहती है, नगर उन्हें देखता है।

यह दृश्य-दृश्य चलता है, और हर दृश्य इतनी देर थमता है कि उसे देखा जा सके। व्रत ऐसे ही निभता है। एक साथ नहीं। एक थमा हुआ चित्र, फिर अगला।

और भीड़ मिलन के लिए आती है। युद्ध के लिए नहीं, राजतिलक के लिए नहीं। दो भाइयों के एक-दूसरे की बाँहों में गिरने के लिए। लीला के सारे दिनों में जिस दिन तक लोग चलकर आते हैं, वह लौटने का दिन है।

रामलीला का वर्णन यूनेस्को की सूची (संगीत नाटक अकादमी) से है; रामनगर की खड़ाऊँ और नाटी इमली का भरत मिलाप अमर उजाला, वाराणसी की खबरों (13 अक्टूबर 2023, 4 अक्टूबर 2025) से।

द्वार से पहले

भरत ननिहाल में थे। एक दूत उन्हें जल्दी में घर लाया है और कारण नहीं बताता। साँझ को रथ अयोध्या के पास पहुँचता है, और वे सारथी से धीरे चलने को कहते हैं:

निकट ज्यों ज्यों आ रहा है गेह ,

सिहरती है क्यों न जाने देह !

पृ. ११२

हर वह आदमी जो दूर रहा है, यह रास्ता जानता है। किसी केन्द्र में, शहर में, या बरसों अपने ही सिर में। घर पास आता है और देह काँपने लगती है, इससे पहले कि मन जाने कि डर किस बात का है।

भरत ने कुछ नहीं किया। उन्हें अभी पता भी नहीं कि उनके नाम पर क्या किया गया। वे बस इतना जानते हैं कि नगर बहुत चुप है। यह थामे रहिए: डर अपराध से पहले आता है, और वह अपराध का सबूत नहीं है।

रामलीला का मैदान नीचे है। ↓

हर झाँकी एक दृश्य है। बाईं ओर से बारी-बारी खोलिए।

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जब सातों दृश्य खेल लिए जाएँ, दोनों भाई मिलेंगे।

बिना मैदान के पढ़िए

दृश्य १ / ७ · वलय ४: परिवार

घर

नगर चुप है: न बाज़ार, न पाठशाला, बच्चे बूढ़ों जैसे गम्भीर; लोग उन पर दोष लगाना चाहते हैं, पर उनका मुँह देखकर नहीं लगा पाते। महल के द्वार पर उन्हें पता चलता है कि पिता नहीं रहे, भाई वन चले गये, और यह दोनों उनकी माँ ने उनके लिए माँगा। वे उस पर हर वह नाम बरसाते हैं जो उनके पास है। शत्रुघ्न उस पर हाथ उठाना चाहते हैं; भरत उनका हाथ पकड़ लेते हैं। फिर वे कौसल्या के पास दौड़ते हैं, जिस माँ ने सबसे ज़्यादा खोया है, और खुद को अपराधी कहते हैं, गृहकलह की जड़। वे उन्हें गोद में ले लेती हैं: यह सब झूठ है, तू निष्पाप है, मैं तेरी साक्षी हूँ। वे जीना माँगते हैं, पर केवल नगर का दोष सहने के लिए। गुरु उन्हें बताते हैं कि कहाँ देखें।

गुप्त की पंक्तियाँ

चाहते थे जन—करें आक्षेप , दीखते थे पर भरत निर्लेप ।

भरत—अपराधी भरत—है प्राप्त , दो उसे आदेश अपना आप्त ।

“झूठ यह सब झूठ, तू निष्पाप ; साक्षिणी तेरी यहाँ मैं आप ।

मैं जियूँ लोकापवाद - निमित्त , तब न होगा तनिक प्रायश्चित्त ? तुम सभी त्यागो मुझे यदि हाय ! तो मरूँ मैं भी न क्यों निरुपाय !

“किन्तु मुझ पर आज सारी सृष्टि , कर रही मानो घृणा की वृष्टि ।

भरत, देखो आप अपनी ओर , निज हृदय - सागर गभीर हिलोर ।

पृ. १११ से १३०

यह इस साइट के हर पन्ने का दूसरा पहलू है। यहाँ घर लौटने वाला वह आदमी नहीं है जिसने नशा किया। घर लौटता है उसका बेटा, उसका भाई, उसकी पत्नी, और वे ऐसे घर में आते हैं जहाँ उनके नाम पर कुछ किया गया। नगर उन्हें देखता है और दोष लगाना चाहता है। और वे पहले खुद पर दोष लगाते हैं: अपराधी भरत, गृहकलह की जड़।

देखिए वे उसका क्या करते हैं। वे केवल दोष ढोने के लिए जीना चाहते हैं। फिर, अगर सब त्याग दें, तो मरना। परिवार में लाज यही रूप लेती है: सब कुछ ढो लो, या मिट जाओ। कौसल्या दोनों से इनकार करती हैं। उन्होंने पति और बेटा खोया है, और पहला काम वे यह करती हैं कि दूसरी स्त्री के बेटे को गोद में लेकर कहती हैं: मैं तेरी साक्षी हूँ। एक व्यक्ति जो यह कह दे, घर ऐसे बचता है।

और वसिष्ठ घृणा की वर्षा से बहस नहीं करते। वे भरत को घुमा देते हैं। अपनी ओर देखो, इस ओर नहीं कि वे तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं।

गुप्त, पूरा दृश्य · पृ. १११ से १३०

पृ. १११

सप्तम सर्ग

'स्वप्न' किसका देखकर सविलास—
कर रही है कवि-कला कल-हास ?
और 'प्रतिमा' भेंट किसकी भास ,
भर रही है वह करुण-निःश्वास ?

छिन्न भी है, भिन्न भी है, हाय !
क्यों न रोवे लेखनी निरुपाय ?
क्यों न भर आँसू बहावे नित्य ?
सींच करुणे, सरस रख साहित्य !
जानकर क्या शून्य निज साकेत ,
लौट आये राम अनुज - समेत ?
या उन्हीं के अन्य रूप अनन्य ,
ये भरत - शत्रुघ्न दोनों धन्य ?
क्यों हुए हैं ये उदास अशान्त ?
शीघ्र यात्रा ने किया है क्लान्त ?
या शशी में ज्यों मही की म्लानि ,
दूर भी बिम्बित हुई गृह - ग्लानि ?

“सूत, रथ की गति करो कुछ मन्द ,
अश्व अपने से चलें स्वच्छन्द ।

पृ. ११२

अनुज, देखो, आ गया साकेत ,
दीखते हैं उच्च राज - निकेत ।
काम्य, कर्बुर, केतु - भूषित अट्ट ,
गगन में ज्यों सान्ध्य घन-संघट्ट ।
अवनि - पुण्याकृष्ट, लोक - ललाम ,
मौन खिंच आया यथा सुरधाम !
किन्तु करते हाय ! आज प्रवेश ,
काँपता है क्यों हृदय सविशेष !
जान पड़ता है, न जाकर आप ,
मैं खिंचा जाता, खिंचे ज्यों चाप !
जब उमड़ना चाहिए आह्लाद ,
हो रहा है क्यों मुझे अवसाद ?
निकट ज्यों ज्यों आ रहा है गेह ,
सिहरती है क्यों न जाने देह !
बन्धु, दोनों ओर दो तुम ध्यान ,
आ गये ये बाह्य नगरोद्यान ।
हो रही है सन्ध्या अभी उपलब्ध ,
किन्तु मानो अर्द्धनिशि निस्तब्ध !
नागरिक - गण - गोष्ठियों से हीन ,
आज उपवन हैं विजन में लीन ।
वृक्ष मानो व्यर्थ बाट निहार ,
झँप उठे हैं झीम, मूक, थक, हार !
कर रही सरयू जिसे कुछ रुद्ध ,
बह रही है वायु - धारा शुद्ध ।
पर किसे है आज इसकी चाह ?
भर रही यह आप ठण्ढी आह !
जा रहा है व्यर्थ सुरभि - समीर ,
हैं पड़े हत - से सरों के तीर !
देखकर ये रिक्त क्रीड़ा क्षेत्र ,
हैं भरे आते उमड़कर नेत्र ।

पृ. ११३

याद है, घुड़दौड़ का वह खेल ,
हँस मुझे जब हाथ से कुछ ठेल ,
हय उड़ाकर, उछल आप समक्ष ,
प्रथम लक्ष्मण ने धरा ध्वजलक्ष ?
दीख पड़ते हैं न सादी आज ,
गज न लाते हैं निषादी आज ,
फिर रही गायें रँभाती दूर ,
भागते हैं श्लथ - शिखण्ड मयूर ।
पार्श्व से यह खिसकती-सी आप ,
जा रही सरयू बही चुपचाप ।
चल रही नावें न उसमें तैर ,
लोग करते हैं न तट पर सैर ।
कुछ न कुछ विघटित हुआ विभ्राट ,
विप्र-पंक्ति-विहीन हैं सब घाट ।
क्या हुआ सन्ध्यार्घ्य का वह ठाठ ?
सुन नहीं पड़ता कहीं श्रुति-पाठ !
ये तरणि अपने अतुल कुल-मूल ,
सुरस देते हैं जिन्हें युग कूल ,
उदित थे जिस लालिमा के संग ,
अस्त भी हैं रख वही रस - रंग ।
आयँगे फिर ये इसी विध कल्य ,
जन्म - जीवन का यही साफल्य ।
नमन तुमको देव, निज कुलकेतु ,
तुम तपो चिरकाल इस भव-हेतु ।
मानते हैं अनुज अपने ज्येष्ठ ,
मुक्ति से आवागमन यह श्रेष्ठ ।
धड़कता है किन्तु मेरा चित्त ,
भटकता है भावना का पित्त ।
निकट हो दिनरात - सन्धि सहर्ष ,
किन्तु जँचता है मुझे संघर्ष ।

पृ. ११४

दीखता है अन्धकार समीप ,
भीत मत हो, आर्य हैं कुल - दीप ।”

तब कहा शत्रुघ्न ने भर आह—
“था कहाँ मेरा विचार - प्रवाह !
घर पहुँचकर, कल्पना के साथ ,
हो रहा था मैं सहर्ष सनाथ !
पूछते थे कुशल मानो तात ,
प्रेम-पूर्वक भेटते थे भ्रात ।
बढ़ रहा था जननियों का मोद ,
हँस रही थीं भाभियाँ सविनोद ।
कह यहाँ के वृत्त सहचर बाल ,
पूछते थे सब वहाँ के हाल ।
प्राप्त मातुल से हुए जो द्रव्य ,
था अमात्यों को वही सब श्रव्य ।
सब हमें नव, हम सभीको नव्य ,
हो रहे थे ज्ञात कितने भव्य ।
वेष - भाषा - भंगियों पर हास्य ,
कर रहे थे सरस सबके आस्य ।
हम अतिथि - से थे स्वगृह में आज ,
सम्मिलित था क्या अपूर्व समाज ।
हो रहा था हर्ष, उत्सव, गान ,
और सबका संग भोजन - पान ।
पर निरख अब दृश्य ये विपरीत ;
हो उठा हूँ आर्य्य, मैं अति भीत ।
जान पड़ता है, पिता सविशेष ,
रुग्ण होकर पा रहे हैं क्लेश ।”
“रुग्ण ही हों तात, हे भगवान !”
भरत सिहरे शफर - वारि - समान ।

पृ. ११५

ली उन्होंने एक लम्बी साँस ;
हृदय में मानो गड़ी हो गाँस ।

“सूत तुम खींचे रहो कुछ रास ,
कर चुके हैं अश्व अति आयास ।
या कि ढीली छोड़ दो, हा हन्त ,
हो किसी विध इस अगति का अन्त ।
जब चले थे तुम यहाँ से दूत ,
तब पिता क्या थे अधिक अभिभूत ?
पहुँच ही अब तो गये हम लोग ,
ठीक कह दो, था उन्हें क्या रोग ?”
दूत बोला उत्तरीय समेट—
“कर सका था मैं न प्रभु से भेट ।
आप आगे आ रहा जो वीर ,
आप हों उसके लिए न अधीर ।”

प्राप्त इतने में हुआ पुर - द्वार ,
प्रहरियों का मौन विनयाचार ।
देखकर उनका गँभीर विषाद ,
भरत पूछ सके न कुछ संवाद ।
उभय ओर सुहर्म्य पुलिनाकार ,
बीच में पथ का प्रवाह - प्रसार ।
बढ़ चला निःशब्द - सा रथ-पोत ,
था तरंगित मानसिक भी स्रोत ।
उच्च थी गृहराज दोनों ओर ,
निकट था जिसका न ओर न छोर ।
राजमार्ग - वितान - सा था व्योम ,
छत्र - सा ऊपर उदित था सोम ।

पृ. ११६

“क्या यही साकेत है जगदीश !
थी जिसे अलका झुकाती शीश ?
क्या हुए वे नित्य के आनन्द ?
शान्ति या अवसन्नता यह मन्द ?
है न क्रय - विक्रय, न यातायात ,
प्राणहीन पड़ा पुरी का गात ।
सुन नहीं पड़ती कहीं कुछ बात ,
सत्य ही क्या तब नहीं हैं तात ?
आज क्या साकेत के सब लोग ,
साँग कर अपने अखिल उद्योग ,
शान्त हो बैठे सहज ही श्रान्त ?
दीखते हैं किन्तु क्यों उद्भ्रान्त ?
सब कला - गृह शिक्षणालय बन्द ,
छात्र क्यों फिरते नहीं स्वच्छन्द ?
हो रहे बालक बँधे - से कीर ,
बाल्य ही में वृद्ध - सम गम्भीर !
झिझिक आते हैं जहाँ जो लोग ,
प्रकट कर कोई अकथ अभियोग ,
मौन रहते हैं खड़े बेचैन ;
सिर झुकाकर फिर उठाते हैं न ।”

चाहते थे जन—करें आक्षेप ,
दीखते थे पर भरत निर्लेप ।
देख उनका मुख समक्ष समोह ,
भूल जाते थे सभी विद्रोह ।
“ये गगन - चुम्बित महा प्रासाद ,
मौन साधे हैं खड़े सविषाद ।
शिल्प - कौशल के सजीव प्रमाण ,
शाप से किसके हुए पाषाण !

पृ. ११७

आ खड़े हैं मेटने को आधि ,
आत्मचिन्तन - रत अचल ससमाधि ,
किरणचूड़, गवाक्ष - लोचना मींच ,
प्राण-से ब्रह्माण्ड में निज खींच ?
सूत, मागध, वन्दि, याचक, भृत्य ,
दीख पड़ते हैं न करते कृत्य ।
एक प्रहरी ही, सतर्क विशेष ,
व्यक्त करते हैं अशुभ उन्मेष !”

“आ गये !” सहसा उठा यह नाद ,
बढ़ गया अवरोध तक संवाद ।
रथ रुका, उतरे उभय अविलम्ब ,
ले सचिव सिद्धार्थ - कर - अवलम्ब ।
“हो गये तुम जीर्ण ऐसे तात !
मैं सुनूँगा क्या भयानक बात ?”
मुँह छिपा सचिवांक में तत्काल ,
हो गये चुप भरत आँसू डाल ।
सचिव उनको एक बार विलोक ,
ले चले, आँसू किसी विध रोक ।
“मैं कहूँ तुमसे भयानक बात ?
राज्य भोगो तुम जयी-कुल-जात !”
भरत को क्या ज्ञात था वह भेद ,
तदपि बोले वे सशंक, सखेद—
“तात कैसे हैं ?” सचिव की उक्ति—
“पा चुके वे विश्व-बाधा-मुक्ति ।”
“पर कहाँ इस समय नरनाथ ?”
सचिव फिर बोले उठाकर हाथ—
“सब रहस्य जहाँ छिपे हैं रम्य ,
योगियों का भी वहाँ क्या गम्य ?”

पृ. ११८

“किन्तु उनके पुत्र हैं हम लोग ,
मार्ग दिखलाओ मिले शुभ योग ।”
“मार्ग है शत्रुघ्न, दुर्गम सत्य ,
तुम रहो उनके यथार्थ अपत्य ।”

आ गया शुद्धान्त का था द्वार ,
एक पद था देहली के पार ।
“हा पितः !” सहसा चिहुँक, चीत्कार ,
गिर पड़े सुकुमार भरत कुमार !

केकयी बढ़ मन्थरा के साथ ,
फेरने उन पर लगी झट हाथ ।
रह गये शत्रुघ्न मानो मूक ,
कण्ठरोधक थी हृदय की हूक ,
देर में निकली गिरा—“हा अम्ब !
आज हम सबके कहाँ अवलम्ब ?
देखने को तात शून्य निकेत ,
क्या बुलाये हम गये साकेत ?”
सिहरकर गिरते हुए से काँप ,
बैठ वे नीचे गये मुँह ढाँप ।
“वत्स, स्वामी तो गये उस ठौर ,
लौटना होगा न जिससे और !”
“कौन था हमसे अधिक हा शोक !
वे गये जिसके लिए उस लोक ?
हृदय, आशंका हुई क्या ठीक ,
हो गई आशा अशेष अलीक !”
“मैं स्वयं पतिघातिनी हूँ हाय !
जीव जीवन - मृत्यु का व्यवसाय !”

पृ. ११९

“हा ! अमर भी मृत्यु-करगत जीव !
मुक्त होकर भी अधीन अतीव !
किन्तु साधारण न थी वह व्यक्ति ,
अतुल थी जिसकी अलौकिक शक्ति ।
जीर्ण तुमको जान सहसा तात !
कर गया क्या काल यह अपघात ?
तो धरा - धन हो भले ही ध्वस्त ,
आर्य, हो जाओ तनिक आश्वस्त ।
हम करेंगे काल से संग्राम ,
हैं कहाँ अग्रज हमारे राम ?”
“हैं कहाँ वे सजल घन-सम श्याम ?”
वन न था हा ! किन्तु वह था धाम ?
“वन गये वे अनुज - सीता - युक्त !”
“वन गये ?” बोले भरत भययुक्त ।
“तो सँभालेगा हमें अब कौन ?
यों अनाश्रित रह सका कब कौन ?”
“आर्य का औदास्य यह अवलोक ,
सहम - सा मेरा गया पितृ - शोक !”
“अनुज, ठहरो, मैं लगा दूँ होड़ ,
रह सकें यदि आर्य हमको छोड़ ।
जायँ वे इस गेह ही से रूठ ,
यह असम्भव, झूठ निश्चय झूठ !
हँस रही यह मन्थरा क्यों घूर ?
री अभागिन ! दूर हो तू दूर ।
भेद है इसमें निहित कुछ गूढ़ ,
माँ कहो, मैं हो रहा हूँ मूढ़ ।”
“वत्स, मेरा भी इसी में सार ,—
जो किया, कर लूँ उसे स्वीकार ।
साक्षि हो अनपेक्ष्य मेरे अर्थ ,
सत्य कर दे सर्व सहन-समर्थ !

पृ. १२०

तो सुनो, यह क्यों हुआ परिणाम ,—
प्रभु गये सुर - धाम, वन को राम ।
माँग मैंने ही लिया कुल-केतु ,
राजसिंहासन तुम्हारे हेतु ।”

“हा हतोस्मि !” हुए भरत हतबोध ,
‘हूँ !’ कहा शत्रुघ्न ने सक्रोध ।
ओंठ काटा और पटका पैर ,
किन्तु लेता वीर किससे वैर ?
केकयी चिल्ला उठी सोन्माद—
“सब करें मेरा महा अपवाद ;
किन्तु उठ ओ भरत, मेरा प्यार ,
चाहता है एक तेरा प्यार ।
राज्य कर, उठ वत्स, मेरे बाल ,
मैं नरक भोगूँ भले चिरकाल ।
दण्ड दे, मैंने किया यदि पाप ,
दे रही हूँ शक्ति वह मैं आप ।”
“दण्ड, ओहो दण्ड, कैसा दण्ड ?
पर कहाँ उद्दण्ड ऐसा दण्ड ?
घोर नरकानल चिरन्तन चण्ड ,
किन्तु वह तो है यहाँ हिम - खण्ड ।
चण्डि ! सुनकर ही जिसे, सातंक ,
चुभ उठे सौ बिच्छुओं के डंक ।
दण्ड क्या उस दुष्टता का स्वल्प ?
है तुषानल तो कमल-दल-तल्प ?
जी, द्विरसने ! हम सभीको मार ,
कठिन तेरा उचित न्याय - विचार ।
मृत्यु ? उसमें तो सहज ही मुक्ति ,
भोग तू निज भावना की भुक्ति ।

पृ. १२१

धन्य तेरा क्षुधित पुत्र - स्नेह ,
खा गया जो भूनकर पति - देह !
ग्रास करके अब मुझे हो तृप्त ,
और नाचे निज दुराशय - दृप्त !”
“चुप अरे चुप, केकयी का स्नेह ,
जान पाया तू न निस्सन्देह ।
पर वही यह वत्स, तुझमें व्याप्त ,
छोड़ता है राज - पद भी प्राप्त ।
सब करें मेरा महा अपवाद ,
किन्तु तू तो न कर हाय ! प्रमाद ।
हो गये थे देव जीवन्मुक्त ,
उचित था जाना न ऋण-संयुक्त ।
ले लिए इस हेतु वर युग लभ्य ,
उचित मानेंगे इसे सब सभ्य ।
‘क्या लिया’ बस है यहीं सब शल्य ,
किन्तु मेरा भी यहीं वात्सल्य ।”
“सब बचाती हैं सुतों के गात्र ,
किन्तु देती हैं डिठौना मात्र ।
नील से मुँह पोत मेरा सर्व ,
कर रही वात्सल्य का तू गर्व ।
खर मँगा, वाहन वही अनुरूप ,
देख लें सब—है यही वह भूप !
राज्य, क्यों माँ, राज्य, केवल राज्य ?
न्याय - धर्म - स्नेह, तीनों त्याज्य !
सब करें अब से भरत की भीति ,
राजमाता केकयी की नीति—
स्वार्थ ही ध्रुव-धर्म हो सब ठौर !
क्यों न माँ ? भाई, न बाप, न और !
आज मैं हूँ कोसलाधिप धन्य ,
गा, विरुद गा, कौन मुझ-सा अन्य ?

पृ. १२२

कौन हा ! मुझ-सा पतित-अतिताप ?
हो गया वर ही जिसे अभिशाप !
तू अड़ी थी राज्य ही के अर्थ ,
तो न था तेरा तनय असमर्थ ।
और भू पर था न कोसल मात्र ,
छत्र-भागी है कहीं भी क्षात्र ।
क्षत्रियों के चाप - कोटि - समक्ष ,
लोक में है कौन दुर्गम लक्ष ?
था न किस फल का तुझे अधिकार ?
सुत न था मैं एक, हम थे चार !
राज सुख है वलि पुरुष का भोग ,
मूल्य जिसका प्राण का विनियोग ।
स्वार्थिनी तू कर सकेगी त्याग ?
राज्य में घर से लगी हा आग ।
स्वप्न किसका देखते हैं लोग ,
जो तजे लोकार्थ निद्रा - योग ।
किन्तु करके दूसरे का होम ,
पान करना चाहती तू सोम ।
हाय ! ऐसी तो न थी यह बुद्धि ,
क्या हुई तेरे हृदय की शुद्धि ?
और से करते हुए छल - पाप ,
हम छले जाते प्रथम ही आप ।
सूर्यकुल में यह कलंक कठोर !
निरख तो तू तनिक नभ की ओर ।
देख तेरी उग्र यह अनरीति ,
खस पड़ें नक्षत्र ये न सभीति !
भरत - जीवन का सभी उत्साह ,
हो गया ठंडा यहाँ तक आह !
ये गगन के चन्द्रमणि-मय हार ,
जान पड़ते हैं ज्वलित अंगार !

पृ. १२३

कौन समझेगा भरत का भाव—
जब करे माँ आप यों प्रस्ताव !
री, हुआ तुझको न कुछ संकोच ?
तू बनी जननी कि हननी, सोच !
इष्ट तुझको दृप्त - शासन - नीति ,
और मुझको लोक - सेवा - प्रीति ।
वेन होता योग्य जिसका जात ,
जड़भरत - जननी वही विख्यात !
व्यर्थ आशा, व्यर्थ यह संसार !”
रो दिया, हो मौन राजकुमार ।
थे भरे घन - से खड़े शत्रुघ्न ,
बरस अब मानो पड़े शत्रुघ्न ,—
“तुम यहाँ थे हाय ! सोदरवर्य ,
और यह होता रहा, आश्चर्य !
वे तुम्हारे भुज - भुजंग विशाल ,
क्या यहाँ कीलित हुए उस काल ?
राज्य को यदि हम बना लें भोग ,
तो बनेगा वह प्रजा का रोग ।
फिर कहूँ मैं क्यों न उठकर ओह !
आज मेरा धर्म राजद्रोह !
विजय में बल और गौरव - सिद्धि ,
क्षत्रियों के धर्म - धन की वृद्धि ।
राज्य में दायित्व का ही भार ,
सब प्रजा का वह व्यवस्थागार ।
बहु प्रलोभन हो किसी के हेतु ,
तो उचित है क्रान्ति का ही केतु ।
दूर हो ममता, विषमता, मोह ,
आज मेरा धर्म राजद्रोह ।
त्याग से भी कठिन जिसकी प्राप्ति ,
स्वार्थ की यदि हो उसी में व्याप्ति ,

पृ. १२४

छोड़ दूँ तो क्यों न मैं भी छोह ?
आज मेरा धर्म राजद्रोह ।
दो अभीप्सित दण्ड मुझको अम्ब ,
न्याय ही शत्रुघ्न का अवलम्ब ,
मैं तुम्हारा राज्य - शासन - भार ,
कर नहीं सकता यथा स्वीकार ।
मानते थे सब जिसे निज शक्ति ,
बन गई अब राजभक्ति विरक्ति ।
हा ! अराजक भाव, जो था पाप ,
कर दिया है पुण्य तुमने आप ।
राज-पद ही क्यों न अब हट जाय ?
लोभ-मद का मूल ही कट जाय ?
कर सके कोई न दर्प न दम्भ ,
सब जगत में हो नया आरम्भ ।
विगत हों नर-पति, रहें नर मात्र ,
और जो जिस कार्य के हों पात्र—
वे रहें उस पर समान नियुक्त ,
सब जियें ज्यों एक हो कुल भुक्त ।”
“अनुज, उस राजत्व का हो अन्त ,
हन्त ! जिस पर केकयी के दन्त ।
किन्तु राजे रामराज्य नितान्त—
विश्व के विद्रोह करके शान्त ।
रघु - भगीरथ - सगर-राज्य-किरीट ,
केकयी का सुत भरत मैं ढीट—
यदि छुऊँ तो पाप - कर गल जाय ,
या वही अनुताप से जल जाय !
तात, राज्य नहीं किसी का वित्त ,
वह उन्हीं के सौख्य-शान्ति-निमित्त—
स्वबलि देते हैं उसे जो पात्र ,
नियत शासक लोक-सेवक मात्र !”

पृ. १२५

“आर्य छाती फट रही है हाय !
राज्य भी अब तो बना व्यवसाय ।
हम उसे लें बेचकर भी धर्म ,
अतुल कुछ में आज ऐसा कर्म !
भ्रातृ-निष्कासन, पिता का घात ,
हो चुके दो दो जहाँ उत्पात ,
और दो हों—मातृवध, गृहदाह !
बस यही इस चित्त की अब चाह !
पूर्ण हो दुरदृष्ट तेरी तुष्टि !”
वीर ने मारी हृदय पर मुष्टि ।
उठ भरत ने धर लिया झट हाथ ,
और वे बोले व्यथा के साथ—
“हाय ! मारोगे किसे हे तात ,
मृत्यु निष्कृति हो जिसे हे तात ?
छोड़ दो इसको इसी पर वीर ,
आर्य-जननी-ओर आओ धीर !”
युगल कण्ठों से निकल अविलम्ब ,
अजिर में गूँजी गिरा—“हा अम्ब !”
शोक ने ली अफर आज डकार—
वत्स हम्बा कर उठे डिडकार !
सहन कर मानो व्यथा की चोट ,
हृदय के टुकड़े उड़े सस्फोट—
“तुम कहाँ हो अम्ब, दीना अम्ब ,
पति - विहीना, पुत्र - हीना अम्ब !
भरत—अपराधी भरत—है प्राप्त ,
दो उसे आदेश अपना आप्त ।
आज माँ, मुझ-सा अधम है कौन ?
मुँह न देखो, पर न हो तुम मौन ।
प्राप्त है यह राज्यहारी चोर ,
दूर से षड्यन्त्रकारी घोर ,

पृ. १२६

आ गया मैं—गृहकलह का मूल ;
दण्ड दो, पर दो पदों की धूल ।”

“झूठ यह सब झूठ, तू निष्पाप ;
साक्षिणी तेरी यहाँ मैं आप ।
भरत में अभिसन्धि का हो गन्ध ,
तो मुझे निज राम की सौगन्ध ।
केकयी, सुन लो बहन यह नाद ,
ओह ! कितना हर्ष और विषाद !”
पूर्ण महिषी का हुआ उत्संग ,
जा गिरा शबरीशरार्त - कुरंग ।
“वत्स रे आ जा, जुड़ा यह अंक ;
भानुकुल के निष्कलंक मयंक ?
मिल गया मेरा मुझे तू राम ,
तू वही है, भिन्न केवल नाम ।
एक सुहृदय, और एक सुगात्र ,
एक सोने के बने दो पात्र ।
अग्रजानुज मात्र का है भेद ,
पुत्र मेरे, कर न मन में खेद ।
केकयी ने कर भरत का मोह ,
क्या किया ऐसा बड़ा विद्रोह ?
भर गई फिर आज मेरी गोद ,
आ, मुझे दे राम का - सा मोद ।
किन्तु बेटा, हो गई कुछ देर ,
सो गये हैं देव ये मुँह फेर !
हो गई है हृदय की गति मग्न ,
तदपि अब भी स्नेह में है मग्न !
देख लो हे नाथ लो परितोष ;
जननियों के जात हैं निर्दोष !”

पृ. १२७

नाव में नृप किन्तु पाँव पसार ,
सुप्त थे भव - सिन्धु के पर-पार !

“हा पिता, यों हो रहे हो सुप्त ;
क्या हुई वह चेतना चिरलुप्त ?
जिस अभागे के लिए यह काण्ड ,
आ गया वह भर्त्सना का भाण्ड !
शास्ति दो, पाओ अहो ! आरोग्य ,
मैं नहीं हूँ यों अभाषण-योग्य ।
त्याज्य भी यह नीच हे नरराज ,
हो न अन्तिम वचन-वंचित आज !”
“राज्य तुमको दे गये नरराज ,
सुत, जलांजलि दो उन्हें तुम आज !”
दे तुम्हें क्या वत्स, मेरा प्यार ?
लो तुम्हीं अन्त्येष्टि का अधिकार ।
“राज्य—” हा ! वह राज्य बनकर काल ,
भरत के पीछे पड़ा विकराल !
यह अराजक उग्र आज नितान्त ,
प्राण लेकर भी न होगा शान्त !”
“वत्स, धीरे, कठिनता के साथ ,
सो सके हैं, छटपटाकर नाथ ।
हो न जावे शान्ति उनकी भंग ,
धर्म पालो धीरता के संग ।
संगिनी इस देह को मैं नित्य ,
साक्षि हैं ध्रुव, धरणि, अनिलादित्य ।
सुत, तुम्हारे भाव ये अविभक्त ,
मैं स्वयं उन पर करूँगी व्यक्त ।”
“हाय ! मत मारो मुझे इस भाँति ,
माँ, जियो, मैं जी सकूँ जिस भाँति ।

पृ. १२८

मैं सहन के अर्थ ही, मन-मार ,
वहन करता हूँ स्वजीवन - भार ।
मैं जियूँ लोकापवाद - निमित्त ,
तब न होगा तनिक प्रायश्चित्त ?
तुम सभी त्यागो मुझे यदि हाय !
तो मरूँ मैं भी न क्यों निरुपाय !
आर्य को तो मुँह दिखाने योग्य ,
रख मुझे ओ भाग्य के फल भोग्य ।”
शोक से अति आर्त, अनुज समेत ,
भरत यों कह हो गये हतचेत ।
लोटता हो ज्यों हृदय पर साँप ,
समय कौसल्या, सुमित्रा काँप—
हाय कर, करने लगीं उपचार—
व्यजन, सिंचन, परस और पुकार ।
भ्रातृ युग सँभले नयन निज खोल ,
पर सके मुँह से न वे कुछ बोल ।
देख सुत - हठ और वंश - अरिष्ट ,
कह न माँएँ भी सकीं निज इष्ट ।
आ गये तब तक तपोव्रतनिष्ठ ,
राजकुल के गुरु वरिष्ठ वसिष्ठ ।
प्राप्त कर उनके पदों की ओट ,
रो पड़े युग बन्धु उनमें लोट—
“क्या हुआ गुरुदेव, यह अनिवार्य ?”
“वत्स, अनुपम लोक-शिक्षण-कार्य ।
त्याग का संचय, प्रणय का पर्व ,
सफल मेरा सूर्यकुलगुरु-गर्व !”
“किन्तु मुझ पर आज सारी सृष्टि ,
कर रही मानो घृणा की वृष्टि ।
देव, देखूँ मैं किधर, किस भाँति ?”
“भरत, तुम आकुल न हो इस भाँति ।

पृ. १२९

वत्स, देखो तुम पिता की ओर ,
सत्य भी शव-सा अकम्प कठोर !
और उनका प्रेम - ओघ अभग्न ,
वे स्वयं जिसमें हुए चिरमग्न !
और देखो भ्रातृवर की ओर ,
त्याग का जिसके न ओर, न छोर ।
अतुल जिसकी पुण्य पितर-प्रीति—
स्वकुल-मर्यादा, विनय, नय-नीति ।
और उस अग्रज-वधू की ओर ,
वत्स, देखो तुम निहार—निहोर ।
हाँ, जिसे वे गहन-कण्टक-शूल ,
बन गये गृह-वाटिका के फूल !
और देखो उस अनुज की ओर ,
आह ! वह लाक्ष्मण्य कैसा घोर !
वह विकट व्रत और वह दृढ़ भक्ति ,
एक में सबकी अटल अनुरक्ति ।
और देखो इस अनुज की ओर ,
हो रहा जो शोक - मग्न विभोर ।
आज जो सबसे अधिक उद्भ्रान्त ;
सुमन - सम हिमवाष्प भाराक्रान्त !
वत्स, देखो जननियों की ओर ,
आज जिनकी भोग-निशि का भोर !”
“हाय भगवन् ! क्यों हमारा नाम ?
अब हमें इस लोक में क्या काम ?
भूमि पर हम आज केवल भार ,
क्यों सहे संसार हाहाकार ?
क्यों अनाथों की यहाँ हो भीड़ ?
जीव-खग उड़ जाय अब निज नीड़ ।”
“देवियो, ऐसा नहीं वैधव्य ,
भाव भव में कौन वैसा भव्य ?

पृ. १३०

धन्य वह अनुराग निर्गत - राग ,
और शुचिता का अपूर्व सुहाग ।
अग्निमय है अब तुम्हारा नाम ,
दग्ध हों जिसमें स्वयं सब काम ।
सहमरण के धर्म से भी ज्येष्ठ ,
आयु भर स्वामि - स्मरण है श्रेष्ठ ।
तुम जियो अपना वही व्रत पाल ,
धर्म की बल - वृद्धि हो चिरकाल ।
सहन कर जीना कठिन है देवि ,
सहज मरना एक दिन है देवि !
भरत, देखो आप अपनी ओर ,
निज हृदय - सागर गभीर हिलोर ।
पूर्ण हैं अगणित वहाँ गुण-रत्न ,
अमर भी जिनके लिए कृतयत्न ।
भरत - भावामृत पियें जन जाग ,
मोह - विष था केकयी का भाग ।

दृश्य २ / ७ · केन्द्र

चिता

सुबह, और सरयू तक राजा की अन्तिम यात्रा। जलती चिता पर भरत टूट जाते हैं: रुको, पिता, मुझे वे वरदान नहीं चाहिए। वे लोगों से अपना न्याय माँगते हैं: जो किसी दूसरे का हक़ हरे, उसके लिए कौन-सा दण्ड ठीक है? मेरी जय मत बोलो, इस चिता में अंगार काफ़ी हैं। सब मेरे साथ वन चलो, राम को लौटा लाओ, और भरत उनका प्रतिनिधि बने। और अगर यह न हो, तो मुझे यहीं पिता की चिता के पास सदा के लिए रहने दो। वे चिता के पैरों में पड़ जाते हैं और उठते नहीं। वसिष्ठ उन्हें उठाते हैं: पिता का संस्कार कर चुके, अब अपनी माताओं को सँभालो, वे घायल हैं। फिर गुरु चिता की ओर हाथ उठाते हैं और सारी भीड़ एक स्वर में कहती है: राम नाम सत्य है।

गुप्त की पंक्तियाँ

धन किसी का जो हरे क्रम - भोग्य , दण्ड क्या उसके लिए है योग्य ?

आह ! मेरी जय न बोलो हार , इस चिता ही में बहुत अंगार !

राम का प्रतिनिधि भरत बन जाय ।

“इस, पिता ही की चिता के पास , मुझ अगति को भी मिले चिरवास !”

कर चुके हो मृतजनक-संस्कार , हत जननियों का करो उपचार ।

कण्ठ कण्ठ गा उठा, शून्य शून्य छा उठा— सत्य काम सत्य है, राम नाम सत्य है !

पृ. १३१ से १३५

यहीं से यह आता है। अफ़ीम से नहीं। उस रात से जब आदमी किसी आग के सामने खड़ा होता है और मान लेता है कि जो हुआ वह उसका है, कि उसे दण्ड मिलना चाहिए, और कि उसके लिए अब बस राख के पास की जगह बची है। बहुत-से आदमी, जिन्होंने पहले खुराक की ओर हाथ बढ़ाया, उन्होंने पहले इसकी ओर बढ़ाया था।

गुप्त इसका उत्तर तर्क से नहीं देते। वसिष्ठ उन्हें एक काम देते हैं: तुम्हारी माताएँ घायल हैं, जाकर उन्हें सँभालो। उनके अपराध के बारे में उनसे कुछ नहीं पूछा गया। उनके हाथों से कुछ माँगा गया। एक पंक्ति में इस साइट का पूरा तरीका यही है। "तुम्हारा दोष नहीं", यह नहीं, जो उस हालत में आदमी सुन नहीं सकता, बल्कि "तुम्हारी ज़रूरत है", जो वह सुन सकता है।

और जो पुकार पूरी भीड़ हर अर्थी पर लगाती है, राम नाम सत्य है, यहाँ वैसी ही कही गई है जैसी वह है: विलाप नहीं, एक कथन। जो सत्य है, वह राजा के साथ नहीं मरता।

अगर आप आज रात उस आग के सामने खड़े हैं और मन मरे हुओं के साथ रहने की बात कर रहा है, तो Tele-MANAS को 14416 पर फ़ोन कीजिए। कोई उत्तर देगा।

गुप्त, पूरा दृश्य · पृ. १३१ से १३५

पृ. १३१

मरण है अवकाश, जीवन कार्य ,
कर रहा हूँ आप मैं आचार्य ।
व्याप्त हैं तुममें पिता के प्राण ,
शोक छोड़ो शूर पाओ त्राण ।
हम रुकें क्यों, चल रही है साँस ,
गति न बिगड़े, दे नियति भी आँस ।
विघ्न तो हैं मार्ग के कुश - काँस ,
फँस न जावे इस हृदय में फाँस ।
तात, जीवनगीत सुनकर काल ,
नाचता है आप, देकर ताल ।
सुगति होती है तभी यह प्राप्त ,
प्रलय में भी लय रहे, निज व्याप्त ।
उठ खड़े हो निज पदों पर आज ,
धैर्य धारें स्वजन और समाज ।
वीर देखो, उस प्रजा की ओर ,
चाहती है जो कृपा की कोर ।”
सान्त्वना में शोक की वह रात ,
कट चली, होने लगा फिर प्रात ।
दूर बोला ताम्रचूड़ गभीर—
‘क्रूर भी है काल निर्झर - नीर ।’
अरुण - पूर्व उतार तारक - हार ,
मलिन-सा सित-शून्य अम्बर धार ,
प्रकृति - रंजन - हीन, दीन, अजस्र ,
प्रकृति-विधवा थी भरे हिम - अस्र ।

आज नरपति का महासंस्कार ,
उमड़ने दो शोक - पारावार ।
है महायात्रा यही, इस हेतु ,
फहरने दो आज सौ केतु !

पृ. १३२

घहरने दो सघन दुन्दुभि - घोर ,
सूचना हो जाय चारों ओर—
सुकृतियों के जन्म में भव-भक्ति !
और उनकी मृत्यु में शुभ मुक्ति !
अश्व, गज, रथ, हों सुसज्जित सर्व !
आज है सुर-धाम-यात्रा-पर्व ?
सम्मिलित हों स्वजन, सैन्य, समाज ,
बस, यही अन्तिम बिदा है आज ।
सूत, मागध, वन्दि आदि अभीत ,
गा उठें जीवन - विजय के गीत—
तुच्छ कर नृप मृत्यु - पक्ष समक्ष ,
पा गये हैं आज अपना लक्ष ।
राजगृह की वह्नि बाहर जोड़ ,
कर उठे द्विज होम—आहुति छोड़ ।
कुल - पुरोहित और कुल - आचार्य ,
भरत युत करने लगे सब कार्य ।
शव बना था शिव-समाधि-समान ,
था शिवालय - तुल्य शिविका यान ।
और जिनसे था बहन - सम्बन्ध ,
थे भरत के भव्य - भद्र - स्कन्ध ।
बज रहे थे झाँझ, झालर, शंख ,
पा गया जयघोष अगणित पंख ।
भाव - गद्गद हो रहे थे लोग ,
गा रहे थे, रो रहे थे लोग ।
बरसता था नेत्र - नीर नितान्त ,
मार्ग-रज-कण थे प्रथम ही शान्त ।
पाँवड़ों पर बीच में शव - यान ,
उभय ओर मनुष्य - पंक्ति महान ।
आज पैदल थे सभी सत्पात्र ,
वाहनों पर नृप - समादर मात्र ,

पृ. १३३

शेष - दर्शन कर सभक्ति, सयत्न ,
धन लुटाते थे वसन, धन, रत्न ।
आ गया सब संघ सरयू - तीर ,
करुण - गद्गद था सहज ही नीर ।
आप सरिता बीच - वेणी खोल ,
कर रही थी कल - विलाप विलोल !
अगरु - चन्दन की चिता थी सेज ,
राजशव था सुप्त, संयत तेज ।
सरस कर भूतल, बरस एकान्त ,
क्षितिज पर मानो शरद-घन शान्त !
फिर प्रदक्षिण, प्रणति जय जयकार ,
सामगान - समेत शुचि - संस्कार ।
बरसता था घृत तथा कर्पूर ,
सूर्य पर था एक लघु घन दूर ।
जागकर ज्वाला उठी तत्काल ,
बिम्ब पानी में पड़ा सुविशाल ।
फिर प्रदक्षिणा कर तथा कर जोड़ ,
रो उठे यों भरत धीरज छोड़—
“तात यह क्या देखता हूँ आज ?
जा रहे हो तुम कहाँ नरराज !
देव, ठहरो, हो न अन्तर्धान ,
चाहिए मुझको न वे वरदान ।
इस अधम की बाट तो कुछ देर ,
देखते तुम काल - कारण हेर ।
बन गये हैं आर्य, तुम परलोक ,
कौन समझे आज मेरा शोक ?
स्वर्ग क्या, अपवर्ग पाओ तात ,
पर बता जाओ मुझे यह बात—
राज्य - संग तुम्हें कहाँ से हाय !
दे सकूँगा आर्य को अनुपाय ?

पृ. १३४

आज तुम नरराज, प्रश्नातीत ,
ये प्रजाजन, ही कहें, नयनीत—
धन किसी का जो हरे क्रम - भोग्य ,
दण्ड क्या उसके लिए है योग्य ?
आह ! मेरी जय न बोलो हार ,
इस चिता ही में बहुत अंगार !
था तुम्हें अभिषेक जिनका मान्य ,
हैं कहाँ वे धीर - वीर - वदान्य ?
वन चलो सब पंच मेरे साथ ,
हैं वहीं सबके प्रकृति नरनाथ ,
राज्य पालें राम जनकप्राय ,
राम का प्रतिनिधि भरत बन जाय ।
निज प्रजा - परिवार - पालन-भार ;
यदि न आर्य करें स्वयं स्वीकार ।
तो चुनो तुम अन्य निज नरपाल ,
जो किसी माँ का जना हो लाल ।
व्यर्थ हो यदि भरत का उद्योग ,
तो करें इतनी कृपा सब लोग—
“इस, पिता ही की चिता के पास ,
मुझ अगति को भी मिले चिरवास !”

साथ ही आनन्द और विषाद ,
‘जयभरत’, ‘जयराम’ जय जय नाद !
लौटते थे पर भरत गति - हीन ,
पितृ - चिता के पादतल में लीन ।
दे रहे थे धैर्य लोग सराह ,
विकल थे सब किन्तु, आप कराह ।
“भरत !” बोले गुरु—“भरत, हो शान्त ,
जनकवर के जातवर कुलकान्त !

पृ. १३५

कर चुके हो मृतजनक-संस्कार ,
हत जननियों का करो उपचार ।
भेज यों पितृवन उन्हें सस्नेह ,
पुत्र, इनको ले चलो अब गेह ।”

बोले फिर मुनि यों चिता की ओर हाथ कर
“देखो सब लोग, अहा ! क्या ही अधिपत्य है !
त्याग दिया आप अज - नन्दन ने एक साथ ,
पुत्र - हेतु प्राण, सत्य - करण अपत्य है !
पा लिया है सत्य-शिव-सुन्दर-सा पूर्ण लक्ष
इष्ट हम सबको इसीका आनुगत्य है !
सत्य है स्वयं ही शिव, राम सत्य-सुन्दर हैं ,
सत्य काम सत्य और राम नाम सत्य है !”

कण्ठ कण्ठ गा उठा, शून्य शून्य छा उठा—
सत्य काम सत्य है, राम नाम सत्य है !

दृश्य ३ / ७ · वलय ३: मन

धूल

चित्रकूट के हिरन और पक्षी डरकर भागते हैं; वन के ऊपर धूल उठती है: भरत सेना लेकर आ रहे हैं। लक्ष्मण धनुष चढ़ाते हैं। ज़ाहिर है, वे वह पूरा करने आ रहे हैं जो उनकी माँ ने शुरू किया; अगर वे बुरी नीयत से आए हैं, तो यह बाण उन्हें चुनेगा, और मैं आपकी भी नहीं सुनूँगा। राम यह नहीं मानते: राम ने माँ का चाहा किया, तो भरत पिता का चाहा क्यों न करेंगे? लक्ष्मण: मनुष्य का मन दुर्बल और चंचल है, गिरना सहज है, उठना कठिन। राम: हम उन्हें साधारण आदमी क्यों मानें? मन की गति नीचे-ऊपर एक-सी है। फिर दोनों भाई वन से निकलते हैं और धूल में दण्डवत् गिर पड़ते हैं, और राम भरत को छाती से उठा लेते हैं। भरत: मेरा भाग्य धूल ही है; तुमने मुझे धरती दे दी और मेरी ओर देखा तक नहीं। राम: राम तो सदा से भरत के भाव का भूखा है।

गुप्त की पंक्तियाँ

आये होंगे यदि भरत कुमति-वश वन में , तो मैंने यह संकल्प किया है मन में— उनको इस शर का लक्ष चुनूँगा क्षण में ,—

माता का चाहा किया राम ने आहा ! तो भरत करेंगे क्यों न पिता का चाहा ?”

“मानव-मन दुर्बल और सहज चंचल है , इस जगती-तल में लोभ अतीव प्रबल है ! देवत्व कठिन, दनुजत्व सुलभ है नर को , नीचे से उठना सहज कहाँ ऊपर को ?”

हम सुगति छोड़ क्यों कुगति विचारें जन की ? नीचे - ऊपर सर्वत्र तुल्य गति मन की ।”

“हा आर्य, भरत का भाग्य रजोमय ही है ,

चिरकाल राम है भरत - भाव का भूखा ,

पृ. १४७ से १५२

हर उस आदमी ने, जो बदला है, लक्ष्मण से भेंट की है। वह साफ़ होकर लौटता है, पूरा नगर पीछे, और एक भाई धनुष चढ़ाए द्वार पर खड़ा है। और लक्ष्मण दुष्ट नहीं हैं। वे वही कहते हैं जो हर वह जानता है जो किसी आदत के पास रहा है: मन दुर्बल है, गिरना सहज, उठना कठिन। उनके पास कारण हैं।

राम कारणों से इनकार नहीं करते। वे कहते हैं कि मन जैसे नीचे जाता है वैसे ही ऊपर। आदमी उतनी ही आसानी से उठ सकता है जितनी से गिरा। यह तथ्य नहीं, निर्णय है, और परिवार यह धूल बैठने से पहले ले सकता है: भला सोच सकते हो तो बुरा क्यों सोचो?

और देखिए भरत आकर क्या करते हैं। वे अपनी निर्दोषता का तर्क नहीं देते। धूल में गिर पड़ते हैं। शक का उत्तर शब्दों से नहीं दिया गया। उसका उत्तर था धरती पर पड़ा एक आदमी, और एक भाई जिसने उसे उठा लिया।

गुप्त, पूरा दृश्य · पृ. १४७ से १५२

पृ. १४७

अष्टम सर्ग

“पर यह क्या, खग-मृग भीत भगे आते हैं ,
मानो पीछे से व्याध लगे आते हैं ।
चर्चा भी अच्छी नहीं बुरों की मानो ,
साँपों की बातें जहाँ वहीं वे जानो ।
अस्फुट कोलाहल भरित मर्मरित वन है ,
वह धूलि-धूसरित उच्च गभीर गगन है ।
देखो, यह मेरा नकुल देहली पर से ,
बाहर की गति-विधि देख रहा है डर से ।
लो, ये देवर आ रहे बाढ़ के जल - से ,
पल पल में उथले - भरे, अचल - चंचल से !
होगी ऐसी क्या बात, न जानें स्वामी ,
भय न हो उन्हें, जो सदय पुण्य-पथ-गामी ।”

“भाभी, भय का उपचार चाप यह मेरा ,
दुगुना गुणमय आकृष्ट आप यह मेरा ।
कोटिक्रम - सम्मुख कौन टिकेगा इसके—
आई परास्तता कर्म भोग में जिसके ।
सुनता हूँ, आये भरत यहाँ दल-बल से ,
वन और गगन है विकल चमू-कलकल से ।
विनयी होकर भी करें न आज अनय वे ,
विस्मय क्या है, क्या नहीं स्वमातृतनय वे ?
पर कुशल है कि असमर्थ नहीं हैं हम भी ,
जैसे को तैसे, एक बार हो यम भी ।
हे आर्य, आप गम्भीर हुए क्यों ऐसे—
निज रक्षा में भी तर्क उठा हो जैसे ?

पृ. १४८

आये होंगे यदि भरत कुमति-वश वन में ,
तो मैंने यह संकल्प किया है मन में—
उनको इस शर का लक्ष चुनूँगा क्षण में ,—
प्रतिरोध आपका भी न सुनूँगा रण में !”
“गृह-कलह शान्त हो, हाय! कुशल हो कुल की ,
अक्षुण्ण अतुलता रहे सदैव अतुल की ।
विग्रह के ग्रह का कोप न जानें अब क्यों ,
आ बैठे देवर, राज्य छोड़ तुम जब यों ?”

“भद्रे, न भरत भी उसे छोड़ आये हों ,
मातृश्री से भी मुँह न मोड़ आये हों ।
लक्ष्मण, लगता है यही मुझे हे भाई ,
पीछे न प्रजा हो पुरी शून्य कर आई ।”
“आशा अन्तःपुर-मध्यवासिनी कुलटा ,
सीधे हैं आप, परन्तु जगत है उलटा ।
जब आप पिता के वचन पाल सकते हैं ,
तब माँ की आज्ञा भरत टाल सकते हैं ?”
“भाई कहने को तर्क अकाट्य तुम्हारा ,
पर मेरा ही विश्वास सत्य है सारा ।
माता का चाहा किया राम ने आहा !
तो भरत करेंगे क्यों न पिता का चाहा ?”
“मानव-मन दुर्बल और सहज चंचल है ,
इस जगती-तल में लोभ अतीव प्रबल है !
देवत्व कठिन, दनुजत्व सुलभ है नर को ,
नीचे से उठना सहज कहाँ ऊपर को ?”
“पर हम क्यों प्राकृत-पुरुष आपको मानें ?
निज पुरुषोत्तम की प्रकृति क्यों न पहचानें ?
हम सुगति छोड़ क्यों कुगति विचारें जन की ?
नीचे - ऊपर सर्वत्र तुल्य गति मन की ।”

पृ. १४९

“बस हार गया मैं आर्य आपके आगे ,
तब भी तनु में शत पुलक भाव ये जागे ।
“देवर, मैं तो जी गई, मरी जाती थी ,
विग्रह की दारुण मूर्ति दृष्टि आती थी ।
अच्छा ले आये आर्यपुत्र, तुम इनको ,
ये तुम्हें छोड़ कब, कहाँ मानते किनको ?
सन्तोष मुझे है आज, यहाँ देवर ये ;
हा ! क्या जानें क्या कर न बैठते घर ये ।”
“पर चिन्तित हूँ, सहज प्रेम के कारण ,
हठपूर्वक मुझको भरत करें यदि वारण ?
वह देखो, वन के अन्तराल से निकले ।
मानो दो तारे क्षितिज-जाल से निकले ।
वे भरत और शत्रुघ्न, हमीं दो मानो ,
फिर आया हमको यहाँ प्रिये, तुम जानो ।”
कहते - कहते प्रभु उठे बढ़े वे आगे ,
सीता - लक्ष्मण भी संग चले अनुरागे ।

देखी सीता ने स्वयं साक्षिणी हो हो ,—
प्रतिमाएँ सम्मुख एक एक की दो दो !
रह गये युग्म स्ववेद्य आप ही आधे ,
जगती ने थे निज चार चिकित्सक साधे !
दोनों आगत आ गिरे दण्डवत् नीचे ,
दोनों से दोनों गये हृदय पर खींचे ।
सीता-चरणामृत बना नयन-जल उनका ,
इनका दृगम्बु अभिषेक सुनिर्मल उनका !
“रोकर रज में लोटो न भरत, ओ भाई ,
यह छाती ठण्डी करो सुमुख सुखदायी ।
मानस के मोती यों न बिखेरो, आओ ।
उपहार - रूप यह हार मुझे पहनाओ ।”

पृ. १५०

“हा आर्य, भरत का भाग्य रजोमय ही है ,
उर रहते उर्वी उसे तुम्हींने दी है ।
उस जड़ जननी का विकृत वचन तो पाला ,
तुमने इस जन की ओर न देखा - भाला !
“ओ निर्दय, कर दे न यों निरुत्तर मुझको ,
रे भाई, कहना यही उचित क्या तुझको ?
चिरकाल राम है भरत - भाव का भूखा ,
पर उसको तो कर्त्तव्य मिला है रूखा !”
इतने में कलकल हुआ वहाँ जय जय का ,
गुरुजन सह पुरजन-पंच-सचिव-समुदाय का ।
हय-गज-रथादि निज नाद सुनाते आये ,
खोये - से अपने प्राण सभीने पाये ।
क्या ही विचित्रता चित्रकूट ने पाई ,
सम्पूर्ण अयोध्या जिसे खोजती आई ।
बढ़कर प्रणाम कर वसिष्ठादि मुनियों को ,
प्रभु ने आदर से लिया गृही मुनियों को ।

जिस पर पाले का एक पर्त - सा छाया ,
हत जिसकी पंकज-पंक्ति, अचल-सी काया ,
उस सरसी-सी, आभरणरहित, सितवसना ,
सिहरे प्रभु माँ को देख, हुई जड़ रसना ।
“हा तात !” कहा चीत्कार समान उन्होंने ,
सीता सह लक्ष्मण लगे उसी क्षण रोने ।
उमड़ा माँओं का हृदय हाय ! ज्यों फटकर ,—
“चिर मौन हुए वे तात तुम्हींको रटकर ।”
“जितने आगत हैं रहें क्यों न गत - धर्मा ,
पर मैं उनके प्रति रहा क्रूर ही कर्मा ।”
दी गुरु वसिष्ठ ने उन्हें सान्त्वना बढ़कर ,—
“वे समुपस्थित सर्वत्र कीर्ति पर चढ़कर ।

पृ. १५१

वे आप उऋण ही नहीं हुए जीवन से ,
उलटा भव को कर गये ऋणी निज धन से ।
वे चार चार दे गये एक के बदले ,
तुम तक को यों तज गये टेक के बदले !
वे हैं अशोच्य, हाँ स्मरण-योग्य हैं सबके ,
अभिमान-योग्य, अनुकरण-योग्य हैं सबके ।”
बोले गुरु से प्रभु साश्रु वदन, बद्धांजलि—
“दे सकता हूँ क्या उन्हें अभी श्रद्धांजलि ?
पितृ-देव गये हैं हाय ! तृषित ही सुरपुर !”
भर आया उनका गला, हुआ आतुर उर ।
फिर बोले वे—“क्या करूँ और मैं कहिए ,
गुरुदेव, आप ही तात-तुल्य अब रहिए ।”
“वह भार प्राप्त है मुझे अपूर्ण प्रथम ही ,
हम जब जो उनके लिए करें, है कम ही ।”
“भगवन् इस जन में भक्तिभाव अविचल है ,
पर अर्पणार्थ बस पत्र - पुष्प - फल - जल है ।”
“हा ! याद न आवे उन्हें तुम्हारे वन की ?”
प्रभु-जननी रोने लगीं व्यथा से मन की ।
“वे सब दुःखों से परे आज हैं देवी ,
स्वर्गीय भाव से भरे आज हैं देवी ।
उनको न राम - वनवास देख दुख होगा ,
अवलोक भरत का वही भाव सुख होगा ।”
गुरु - गिरा श्रवण कर हुए सभी गद्गद-से ,
बोले तब राघव भरे स्नेह के नद - से—
“पूजा न देखकर देव भक्ति देखेंगे ,
थोड़े को भी वे सदय बहुत लेखेंगे ।”
कौसल्या को अब रहा न मान - परेखा ,
पर कैकेयी की ओर उन्होंने देखा ।
बोली वह अपना कण्ठ परिष्कृत करके ,
प्रभु के कन्धे पर वलय - शून्य कर धरके—

पृ. १५२

“है श्रद्धा पर ही श्राद्ध, न आडम्बर पर ,
पर तुम्हें कमी क्या, करो, कहें जो गुरुवर ।”
यह कह मानो निज भार उतारा उसने ,
लक्ष्मण - जननी की ओर निहारा उसने ।
कुछ कहा सुमित्रा ने न अश्रुमय मुख से ,
सिर से अनुमति दी नेत्र पोंछकर दुख से ।
“जो आज्ञा” कह प्रभु घूम अनुज से बोले—
“लेकर अपने कुछ चुने वनेचर भोले ,
सबका स्वागत - सत्कार करो तुम तब लौं ,
मैं करूँ स्वयं करणी कार्य सब जब लौं ।”

दृश्य ४ / ७ · वलय २: काया

पादुका

पूरा दरबार तारों के नीचे कुटी के आगे बैठता है। भरत: अब ऐसा क्या बचा जो मैं चाहूँ? कैकेयी उठकर बोलती है, और मरने से सहने की ओर मुड़ती है (वह उसका पन्ना है)। राम: घर लौट जाओ। भरत: तो मुझे यहाँ तुम्हारा व्रत निभाने दो। राम: हम एकात्मा हैं, काया दो हैं। भरत: तो इस काया की मुझे कोई माया नहीं; यह तुम्हारी कुटी के आगे पड़ी सड़ जाए। राम: पर मुझे अभी उस तन का प्रयोजन है, भाई। बूढ़े जाबालि से नहीं रहा जाता: लोग राज के लिए पिता को मार देते हैं और ये दोनों उसे देने को लड़ रहे हैं; जब सब राख ही होना है, तो सुख क्यों न भोगो? राम और लक्ष्मण उन्हें उत्तर देते हैं। भरत कहते हैं सीता राज करें; वे हँसकर मना कर देती हैं। अन्त में, आधी रात के पास, वे खड़ाऊँ माँगते हैं: मुझे इन्हें ले जाने दो, और इनके बल पर चौदह बरस पार कर लूँ। लोग जयजयकार करते हैं, और वंचित होना भी भरत का यश गिना जाता है।

गुप्त की पंक्तियाँ

“तो इस काया पर नहीं मुझे कुछ माया । सड़ जाय पड़ी यह उसी उटज के आगे , मिल जायँ तुम्हींमें प्राण आर्त्त अनुरागे ।” “पर मुझे प्रयोजन अभी अनुज उस तन का ।”

“मैं कहता हूँ—सब भस्मशेष जब लोगो , तब दुःख छोड़कर क्यों न सौख्य ही भोगो ?” “पर सौख्य कहाँ है, मुने, आप बतलावें ?”

बोले लक्ष्मण—“ये सौख्य खोज मरते हैं !

जूझेगा दुख से दास उदास भवन में ।

बस, मिलें पादुका मुझे, उन्हें ले जाऊँ , बच उनके बल पर, अवधि-पार मैं पाऊँ ।

वंचित होना भी श्लाघ्य भरत का जाना ।

पृ. १५३ से १६५

जाबालि को सुनिए। यह सबसे पुरानी आवाज़ है, और हर उस आदमी ने जिसने नशा किया है, इसे रात के दो बजे सुना है: सब राख होना है, तो सुख क्यों न ले लो? गुप्त इसे एक विद्वान बूढ़े को देते हैं, और उसे अच्छी तरह कहने देते हैं। राम उन्हें चिल्लाकर चुप नहीं कराते। एक प्रश्न पूछते हैं: वह सुख है कहाँ? और लक्ष्मण हम सबकी ओर से उत्तर देते हैं: ये लोग उसे खोजते-खोजते मर जाते हैं।

भरत, इस बीच, अपनी देह छोड़ चुके हैं: द्वार पर पड़ी सड़ जाए। और राम वह वाक्य कहते हैं जिस पर यह पूरा पन्ना घूमता है: मुझे अभी उस तन का प्रयोजन है। देह उनकी फेंकने की चीज़ नहीं है। उसकी ज़रूरत है।

तो वे थामने को कुछ माँगते हैं। वचन नहीं, विचार नहीं। लकड़ी की एक जोड़ी खड़ाऊँ, जिसे ले जाएँ, रखें, हर सुबह देखें, और उसके बल पर बरस पार करें। अभ्यास यही होता है। देह के थामने को कुछ, जब मन बहस हार रहा हो।

गुप्त, पूरा दृश्य · पृ. १५३ से १६५

पृ. १५३

तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे ,
नीले वितान के तले दीप बहु जागे ।
टकटकी लगाये नयन सुरों के थे वे ,
परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे ।
उत्फुल्ल करौंदी - कुञ्ज वायु रह रहकर ,
करती थी सबको पुलक - पूर्ण मह महकर ।
वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी ,
प्रभु बोले गिरा गम्भीर नीरनिधि जैसी ।
“हे भरतभद्र, अब कहो अभीप्सित अपना ,”
सब सजग हो गये, भङ्ग हुआ ज्यों सपना ।

पृ. १५४

“हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी ?
मिल गया अकंटक राज्य उसे जब, तब भी ?
पाया तुमने तरु - तले अरण्य - बसेरा ,
रह गया अभीप्सित शेष तदपि क्या मेरा ?
तनु तड़प तड़पकर तप्त तात ने त्यागा ,
क्या रहा अभीप्सित और तथापि अभागा ?
हा ! इसी अयश के हेतु जनन था मेरा ,
निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा ।
अब कौन अभीप्सित और आर्य वह किसका ?
संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका ।
मुझसे मैंने ही आज स्वयं मुँह फेरा ,
हे आर्य, बता दो तुम्हीं अभीप्सित मेरा ?”
प्रभु ने भाई को पकड़ हृदय पर खींचा ,
रोदन जल से सविनोद उन्हें फिर सींचा !—
“उसके आशय की थाह मिलेगी किसको ?
जनकर जननी ही जान न पाई जिसको ?”

“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को ।”
चौंके सब सुनकर अटल केकयी-स्वर को ।
सबने रानी की ओर अचानक देखा ,
वैधव्य - तुषारावृत यथा विधु - लेखा ।
बैठी थी अचल तथापि असंख्यतरंगा ,
वह सिंही अब थी हहा ! गोमुखी गंगा—
“हाँ, जनकर भी मैंने न भरत को जाना ,
सब सुन लें, तुमने स्वयं अभी यह माना ।
यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया ,
अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया ।
दुर्बलता का ही चिह्न विशेष शपथ है ,
पर, अबलाजन के लिए कौन-सा पथ है ?

पृ. १५५

यदि मैं उकसाई गई भरत से होऊँ ,
तो पति समान ही स्वयं पुत्र भी खोऊँ !
ठहरो, मत रोको मुझे, कहूँ सो सुन लो ,
पाओ यदि उसमें सार उसे सब चुन लो ।
करके पहाड़ - सा पाप मौन रह जाऊँ ?
राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ ?”
थी सनक्षत्र शशि - निशा ओस टपकाती ,
रोती थी नीरव सभा हृदय थपकाती ।
उल्का - सी रानी दिशा दीप्त करती थी ,
सबमें भय - विस्मय और खेद भरती थी ।
“क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी ,
मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी ।
जल पंजर - गत अब अरे अधीर, अभागे ,
वे ज्वलित भाव थे स्वयं तुझीमें जागे ।
पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में ?
क्या शेष बचा था कुछ न और इस जन में ?
कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य - मात्र, क्या तेरा ?
पर आज अन्य-सा हुआ वत्स भी मेरा ।
थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके ,
जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके ?
छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे ,
रे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे ?
कहते आते थे यही अभी नरदेही ,
‘माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही ।’
अब कहें सभी यह हाय ! विरुद्ध विधाता ,—
‘है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता ।’
बस मैंने इसका बाह्य - मात्र ही देखा ,
दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा ,
परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा ,
इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा !

पृ. १५६

युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी—
‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी ।’
निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा—
‘धिक्कार ! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा ।’”
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई ,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई ।”
पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई—
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई ।”

“हा ! लाल ? उसे भी आज गमाया मैंने ,
विकराल कुयश ही यहाँ कमाया मैंने ।
निज स्वर्ग उसीपर वार दिया था मैंने ,
हर तुम तक से अधिकार लिया था मैंने ।
पर वही आज यह दीन हुआ रोता है ,
शंकित सबसे धृत हरिण-तुल्य होता है ।
श्रीखण्ड आज अंगार - चण्ड है मेरा ,
तो इससे बढ़कर कौन दण्ड है मेरा ?

पटके मैंने पद - पाणि मोह के नद में ,
जन क्या क्या करते नहीं स्वप्न में, मद में ?
हा ! दण्ड कौन, क्या उसे डरूँगी अब भी ?
मेरा विचार कुछ दयापूर्ण हो तब भी ?
हा दया ! हन्त वह घृणा ! अहह वह करुणा !
वैतरणी - सी हैं आज जाह्नवी - वरुणा !
सह सकती हूँ चिरनरक, सुनें सुविचारी ,
पर मुझे स्वर्ग की दया दण्ड से भारी ।
लेकर अपना यह कुलिश-कठोर कलेजा ,
मैंने इसके ही लिए तुम्हें वन भेजा ।

पृ. १५७

घर चलो इसीके लिए, न रूठो अब यों ,
कुछ और कहूँ तो उसे सुनेंगे सब क्यों ?
मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे ,
मेरे दुगुने प्रिय रहो न मुझसे न्यारे ।
मैं इसे न जानूँ, किन्तु जानते हो तुम ,
अपने से पहले इसे मानते हो तुम ।
तुम भ्राताओं का प्रेम परस्पर जैसा ,
यदि वह सबपर यों प्रकट हुआ है वैसा ,
तो पाप-दोष भी पुण्य-तोष है मेरा ,
मैं रहूँ पंकिला, पद्म-कोष है मेरा ।
आगत ज्ञानीजन उच्च भाल ले लेकर ,
समझावें तुमको अतुल युक्तियाँ देकर ।
मेरे तो एक अधीर हृदय है बेटा ,
उसने फिर तुमको आज भुजा भर भेटा ,
देवों की ही चिरकाल नहीं चलती है ,
दैत्यों की भी दुर्वृत्ति यहाँ फलती है ।”
हँस पड़े देव केकयी-कथन यह सुनकर ,
रो दिये क्षुब्ध दुर्दैव दैत्य सिर धुनकर !
“छल किया भाग्य ने मुझे अयश देने का ,
बल दिया उसीने भूल मान लेने का ।
अब कटे सभी वे पाश नाश के प्रेरे ,
मैं वही केकयी, वही राम तुम मेरे ।
होने पर बहुधा अर्ध रात्रि अँधेरी ,
जीजी आकर करती पुकार थीं मेरी—
‘लो कुहुकिनि, अपना कुहुक, राम यह जागा ,
निज मँझली माँ का स्वप्न देख उठ भागा !’
भ्रम हुआ भरत पर मुझे व्यर्थ संशय का ,
प्रतिहिंसा ने ले लिया स्थान तब भय का ।
तुम पर ऐसी भ्रान्ति भरत से पाती ,
तो उसे मानने भी न यहाँ मैं आती ।—

पृ. १५८

जीजी ही आतीं, किन्तु कौन मानेगा ?
जो अन्तर्यामी, वही इसे जानेगा ।”
“हे अम्ब तुम्हारा राम जानता है सब ,
इस कारण वह कुछ खेद मानता है कब ?”
“क्या स्वाभिमान रखती न केकयी रानी ?
बतला दे कोई मुझे उच्चकुल - मानी ।
सहती कोई अपमान तुम्हारी अम्बा ?
पर हाय, आज वह हुई निपट नालम्बा ।
मैं सहज मानिनी रही, सरल क्षत्राणी ,
इस कारण सीखी नहीं दैन्य यह वाणी ।
पर महा दीन हो गया आज मन मेरा ,
भावज्ञ, सहेजो तुम्हीं भाव - धन मेरा ।
समुचित ही मुझको विश्व - घृणा ने घेरा ,
समझाता कौन सशान्ति मुझे भ्रम मेरा ?
यों ही तुम वन को गये, देव सुरपुर को ,
मैं बैठी ही रह गई लिए इस उर को !
बुझ गई पिता की चिता भरत - भुजधारी ,
पितृभूमि आज भी तप्त तथापि तुम्हारी ।
भय और शोक सब दूर उड़ाओ उसका ,
चलकर सुचरित, फिर हृदय जुड़ाओ उसका ।
हो तुम्हीं भरत के राज्य, स्वराज्य सम्हालो ,
मैं पाल सकी न स्वधर्म, उसे तुम पालो ।
स्वामी को जीते जी न दे सकी सुख मैं ,
मरकर तो उनको दिखा सकूँ यह मुख मैं ।
मर मिटना भी है एक हमारी क्रीड़ा ,
पर भरत-वाक्य है—सहूँ विश्व की व्रीड़ा ।
जीवन-नाटक का अन्त कठिन है मेरा ,
प्रस्ताव मात्र में जहाँ अधैर्य अँधेरा ।
अनुशासन ही था मुझे अभी तक आता ,
करती है तुमसे विनय आज यह माता ।”—

पृ. १५९

“हा मातः, मुझको करो न यों अपराधी ।
मैं सुन न सकूँगा बात और अब आधी ।
कहती हो तुम क्या अन्य तुल्य यह वाणी ,
क्या राम तुम्हारा पुत्र नहीं वह मानी ?
इस भाँति मानकर हाय, मुझे न रुठाओ ,
जो उठूँ न मैं, क्यों तुम्हीं न आप उठाओ ।
वे शैशव के दिन आज हमारे बीते ,
माँ के शिशु क्यों शिशु ही न रहे मनचीते ।
तुम रीझ - खीझकर प्यार जनाती मुझको ,
हँस आप रुठातीं, आप मनातीं मुझको ।
वे दिन बीते, तुम जीर्ण दुःख की मारी ,
मैं बड़ा हुआ अब और साथ ही भारी ।
अब उठा सकोगी तुम न तीन में कोई ।”
“तुम हलके कब थे ?”—हँसी केकयी, रोई !
“माँ, अब भी तुमसे राम विनय चाहेगा ?
अपने ऊपर क्या आप अद्रि ढाहेगा ?
अब तो आज्ञा की अम्ब, तुम्हारी बारी ,
प्रस्तुत हूँ मैं भी धर्मधनुर्धृतिधारी ।
जननी ने मुझको जना, तुम्हींने पाला ,
अपने साँचे में आप यत्न से ढाला ।
सबके ऊपर आदेश तुम्हारा मैया ,
मैं अनुचर पूत, सपूत, प्यार का भैया ।
वनवास लिया है मान तुम्हारा शासन ,
लूँगा न प्रजा का भार, राज - सिंहासन ?
पर यह पहला आदेश प्रथम हो पूरा ,
वह तात - सत्य भी रहे न अम्ब, अधूरा—
जिस पर हैं अपने प्राण उन्होंने त्यागे ,
मैं भी अपना व्रत - नियम निबाहूँ आगे ।
निष्फल न गया माँ, यहाँ भरत का आना ,
सिरमाथे मैंने वचन तुम्हारा माना ।

पृ. १६०

सन्तुष्ट मुझे तुम देख रही हो वन में ,
सुख धन धरती में नहीं, किन्तु निज मन में ।
यदि पूरा प्रत्यय न हो तुम्हें इस जन पर ,
तो चढ़ सकते हैं राजदूत तो घन पर !”
“राघव, तेरे ही योग्य कथन है तेरा ,
दृढ़ बाल - हठी तू वही राम है मेरा ।
देखें हम तेरा अवधि मार्ग सब सहकर ,”
कौसल्या चुप हो गई आप यह कहकर ।
ले एक साँस रह गई सुमित्रा भोली ,
कैकेयी ही फिर रामचन्द्र से बोली—
“पर मुझको तो परितोष नहीं है इससे ,
हा ! तब तक मैं क्या कहूँ सुनूँगी किससे ?”
“जीती है अब भी अम्ब, ऊर्मिला बेटी ;
इन चरणों की चिरकाल रहूँ मैं चेटी ।”
“रानी, तूने तो रुला दिया पहले ही ,
यह कह काँटों पर सुला दिया पहले ही ।
आ मेरी सबसे अधिक दुःखिनी, आ जा ,
पिस मुझसे चन्दन-लता मुझीपर छा जा ।
हे वत्स, तुम्हें वनवास दिया मैंने ही ,
अब उसका प्रत्याहार किया मैंने ही ।”
“पर रघुकुल में जो वचन दिया जाता है ,
लौटाकर वह कब कहाँ लिया जाता है ?
क्यों व्यर्थ तुम्हारे प्राण खिन्न होते हैं ,
वे प्रेम और कर्त्तव्य भिन्न होते हैं ।
जाने दो निर्णय करें भरत ही सारा—
मेरा अथवा है, कथन यथार्थ तुम्हारा ।
मेरी - इनकी चिर - पंच रहीं तुम माता ,
हम दोनों के मध्यस्थ आज ये भ्राता ।”

पृ. १६१

“हा आर्य ! भरत के लिए और था इतना ?”
“बस भाई, लो माँ, कहें और वे कितना ?”
“कहने को तो है बहुत दुःख से सुख से ,
पर आर्य ! कहूँ तो कहूँ आज किस मुख से ?
तब भी है तुमसे विनय, लौट घर जाओ ।”
“इस ‘जाओ’ का क्या अर्थ, मुझे बतलाओ ?”
“प्रभु, पूर्ण करूँगा यहाँ तुम्हारा व्रत मैं ।”
“पर क्या अयोग्य, असमर्थ और अनिरत मैं ?”
“यह सुनना भी है पाप, भिन्न हूँ क्या मैं ?”
“इस शंका से भी नहीं खिन्न हूँ क्या मैं ?”
“हम एकात्मा हैं, तदपि भिन्न है काया ।”
“तो इस काया पर नहीं मुझे कुछ माया ।
सड़ जाय पड़ी यह उसी उटज के आगे ,
मिल जायँ तुम्हींमें प्राण आर्त्त अनुरागे ।”
“पर मुझे प्रयोजन अभी अनुज उस तन का ।”
“तो भार उतारो तात, तनिक इस जन का ।
तुम निज विनोद में व्यथा छिपा सकते हो ,
करके इतना आभास नहीं थकते हो ।
पर मैं कैसे, किसलिए, सहूँ यह इतना ?”
“मुझ जैसे मेरे लिए तुम्हें यह कितना ?
शिष्टागम निष्फल नहीं कहीं होता है ,
वन में भी नागरभाव-बीज बोता है ।
कुछ देख रही है दूर दृष्टि-मति मेरी ,
क्या तुम्हें इष्ट है वीर, विफल-गति मेरी ?
तुमने मेरा आदेश सदा से माना ,
हे तात, कहो क्यों आज व्यर्थ हठ ठाना ?
करने में निज कर्त्तव्य कुयश भी यश है ।”
हे आर्य, तुम्हारा भरत अतीव अवश है ।
क्या कहूँ और क्या करूँ कि मैं पथ पाऊँ ?
क्षण भर ठहरो, मैं ठगा न सहसा जाऊँ ।”

पृ. १६२

सन्नाटा-सा छा गया सभा में क्षण भर ,
हिल सका न मानो स्वयं काल भी कण भर ।
जावालि जरठ को हुआ मौन दुःसह-सा ,
बोले वे स्वजटिल शीर्ष डुलाकर सहसा—
“ओहो ! मुझको कुछ नहीं समझ पड़ता है ,
देने को उलटा राज्य द्वन्द्व लड़ता है ।
पितृ-वध तक उसके लिए लोग करते हैं ,”
“हे मुने, राज्य पर वही मर्त्य मरते हैं ।”
“हे राम, त्याग की वस्तु नहीं वह ऐसी ।”
“पर मुने, भोग की भी न समझिए वैसी ।”
“हे तरुण, तुम्हें संकोच और भय किसका ?”
“हे जरठ, नहीं इस समय आपको जिसका !”
“पशु-पक्षी तक हे वीर, स्वार्थ-लक्ष्मी हैं ।”
“हे धीर, किन्तु मैं पशु न आप पक्षी हैं !”
“मत की स्वतन्त्रता विशेषता आर्यों की ,
निज मत के ही अनुसार क्रिया कार्यों की ,
हे वत्स, विफल परलोक-दृष्टि निज रोको ।”
“पर यही लोक हे तात, आप अवलोको ।”
“यह भी विनश्य है, इसीलिए हूँ कहता ।”
“क्या?—हम रहते, या राज्य हमारा रहता ?”
“मैं कहता हूँ—सब भस्मशेष जब लोगो ,
तब दुःख छोड़कर क्यों न सौख्य ही भोगो ?”
“पर सौख्य कहाँ है, मुने, आप बतलावें ?”
“जनसाधारण ही जहाँ मानते आवें ।”
“पर साधारण जन आप न हमको जानें ,
जनसाधारण के लिए भले ही मानें ।”
“वह भावुकता है ।” “हमें इसीमें सुख है ,
फिर पर-सुख में क्यों चारुवाक्य, यह दुख है ?”
तब वाम देव ने कहा—“धन्य भावुकता ,
कर सकता उसका मूल्य कौन है चुकता ?

पृ. १६३

भावुक जन से ही महत्कार्य होते हैं ,
ज्ञानी संसार असार मान होते हैं ।”
“किनसे विवाद है आर्य, आप करते हैं ?”
बोले लक्ष्मण—“ये सौख्य खोज मरते हैं !
सुख मिले जहाँ पर जिन्हें, स्वाद वे चक्खें ,
पर औरों का भी ध्यान कृपा कर रक्खें ।
शासन सब पर है, इसे न कोई भूले—
शासक पर भी, वह भी न फूलकर ऊले ।”

हँसकर जावालि, वसिष्ठ और तब हेरे ,
मुसकराकर गुरु ने कहा—“शिष्य हैं मेरे !
मन चाहे जैसे और परीक्षा लीजे ,
आवश्यक हो तो स्वयं दीक्षा दीजे ।”
प्रभु बोले—“शिक्षा वस्तु सदैव अधूरी ,
हे भरतभद्र, हो बात तुम्हारी पूरी ।”

“हे देव, विफल हो वार वार भी, मन की ,—
आशा अटकी है अभी यहाँ इस जन की ।
जब तक पितुराज्ञा आर्य यहाँ पर पालें ,
तब तक आर्या ही चलें,—स्वराज्य सँभालें ।”
“भाई, अच्छा प्रस्ताव और क्या इससे ?
हम - तुमको सन्तोष सभी को जिससे ।”
“पर मुझको भी हो तब न ?” मैथिली बोलीं—
कुछ हुई कुटिल-सी सरल दृष्टियाँ भोली ।
“कह चुके अभी मुनि—‘सभी स्वार्थ ही देखें ।’
अपने मन में वे यहाँ मुझीको लेखें !”
“भाभी, तुम पर है मुझे भरोसा दूना ,
तुम पूर्ण करो निज भरत-मातृ-पद ऊना ।

पृ. १६४

जो कोसलेश्वरी हाय ! वेश ये उनके ?
मण्डन हैं अथवा चिन्ह शेष ये उनके ?”
“देवर, न रुलाओ आह, मुझे रोकर यों ,
कातर होते हो तात, पुरुष होकर यों ?
स्वयमेव राज्य का मूल्य जानते हो तुम ,
क्यों उसी धूल में मुझे सानते हो तुम ?
मेरा मण्डन सिन्दूर - बिन्दु यह देखो ,
सौ-सौ रत्नों से इसे अधिक तुम लेखो ।
शत चन्द्र - हार उस एक अरुण के आगे ,
कब स्वयं प्रकृति ने नहीं स्वयं ही त्यागे ?
इस निज सुहाग की सुप्रभात बेला में ,
जाग्रत जीवन की खण्डमयी खेला में ,
मैं अम्बा - सम आशीष तुम्हें दूँ, आओ ,
निज अग्रज से भी शुभ्र सुयश तुम पाओ !”
“मैं अनुगृहीत हूँ, अधिक कहूँ क्या देवी ,
निज जन्म जन्म में रहूँ सदा पद-सेवी ।
हे यशस्विनी, तुम मुझे मान्य हो यश से ,
पर लगें न मेरे वचन तुम्हें कर्कश - से ,
तुमने मुझको यश दिया स्वयं श्रीमुख से ,
सुख-दान करें अब आर्य बचाकर दुख से ।
हे राघवेन्द्र, यह दास सदा अनुयायी ,
है बड़ी दण्ड से दया अन्त में न्यायी !”
“क्या कुछ दिन तक भी राज्य भार है भाई ?
सब जाग रहे हैं, अर्द्धरात्रि हो आई ।”
“हे देव भार के लिए नहीं रोता हूँ ,
इन चरणों पर ही मैं अधीर होता हूँ ।
प्रिय रहा तुम्हें यह दयाधृष्टलक्षण तो ,
कर लेंगी प्रभु-पादुका राज्य-रक्षण तो ।
तो जैसी आज्ञा, आर्य सुखी हों वन में ,
जूझेगा दुख से दास उदास भवन में ।

पृ. १६५

बस, मिलें पादुका मुझे, उन्हें ले जाऊँ ,
बच उनके बल पर, अवधि-पार मैं पाऊँ ।
हो जाय अवधि-मय अवध अयोध्या अब से ,
मुख खोल नाथ कुछ बोल सकूँ मैं सबसे ।”
“रे भाई, तूने रुला दिया मुझको भी ,
शंका थी तुमसे यही अपूर्व अलोभी !
था यही अभीप्सित तुझे अरे अनुरागी ,
तेरी आर्या के वचन सिद्ध ने त्यागी !”
“अभिषेक अम्बु हो कहाँ अधिष्ठित, कहिए ।
उसकी इच्छा है—यहीं तीर्थ बन रहिए ।
हम सब भी कर लें तनिक तपोवन-यात्रा ।”
“जैसी इच्छा, पर रहे नियत ही मात्रा ।”
तब सबने जय जयकार किया मनमाना ,
वंचित होना भी श्लाघ्य भरत का जाना ।
पाया अपूर्व विश्राम साँस-सी लेकर ,
गिरि ने सेवा की शुद्ध अनिल जल देकर ।
मूँदे अनन्त के नयन धार वह झाँकी ,
शशि खिसक गया निश्चिन्त हँसी हँस बाँकी ।
द्विज चहक उठे, हो गया नया उजियाला ,
हाटक-पट पहने दीख पड़ी गिरिमाला ।
सिन्दूर - चढ़ा आदर्श - दिनेश उदित था ,
जन जन अपने को आप निहार मुदित था ।
सुख लूट रहे थे अतिथि विचरकर गाकर—
‘हम धन्य हुए इस पुण्य भूमि पर आकर ।’
इस भाँति जनों के मनोमुकुल खिलते थे ,
नव नव मुनि-दर्शन, प्रकृति-दृश्य मिलते थे ।

दृश्य ५ / ७ · वलय ५: गाँव

नन्दिग्राम

बरसों बाद भी अयोध्या में रात है। महल के पास एक पर्णकुटी, उसमें सोने का एक मन्दिर जिसमें केवल एक पादपीठ, और उस पर खड़ाऊँ। भरत बाहर बैठे हैं, जटाएँ, धनुष, हूबहू राम-से: कवि कहते हैं, हमें भरत में राम मिले, भरत को भी राम जल्दी मिलें। माण्डवी हर साँझ माताओं की सेवा के बाद फल लेकर आती हैं। वे हँस नहीं पातीं। भरत कहते हैं यह दुख भी एक दिन हँसने की याद बन जाएगा। वे कहती हैं ऊर्मिला ने आज पानी भी नहीं लिया। भरत कहते हैं तो आज उपवास, और फिर: एक मैं न होता तो क्या संसार में कुछ घट जाता? सब मेरे पीछे हुआ। माण्डवी उन्हें देर तक उत्तर देती हैं, और वह उत्तर इस सर्ग का हृदय है। फिर शत्रुघ्न राज्य की खबर लाते हैं: कारीगर, वैद्यों की नई जड़ी-बूटियाँ, अपने बीज का इतिहास रखते किसान, किसी घर में कलह नहीं, हर गाँव एक स्वतन्त्र देश-सा। भरत मानसरोवर से आए एक योगी की बात कहते हैं जो उन्हें एक संजीवनी दे गए, जिसे उन्होंने खड़ाऊँ के पास रखा है। दक्षिण में राम के युद्ध की खबर आती है, और भरत कहते हैं: मेरी तपस्विनी माँ का पाप भी आज पुण्य हुआ।

गुप्त की पंक्तियाँ

भरत ने उनके अनुराग से , भवन में वन का व्रत ले लिया !

एक न मैं होता तो भव की क्या असंख्यता घट जाती ?

सुख को लात मारकर तुम-सा कौन दुःख से जूझा है ?

सुख तो सभी भोग लेते हैं , दुःख धीर ही सहते हैं ।

भूरि-भाग्य ने एक भूल की सबने उसे सँभाला है , हमें जलाती पर प्रकाश भी फैलाती यह ज्वाला है ।

अपना ग्राम ग्राम है मानो एक स्वतन्त्र देश सम्पन्न ।

गुण अर्पण करके औरों को , लेना अपने सिर सब दोष ।”

उस तपस्विनी मेरी माँ का आज पाप भी पुण्य हुआ ।

पृ. १६७, पृ. २५१ से २७२

घर में वन का व्रत। इस साइट पर ज़्यादातर आदमी यही कर रहे हैं: पहाड़ पर नहीं, किसी केन्द्र में नहीं, उसी घर में, उन्हीं लोगों के पास, बाहर वही गलियाँ। भरत यह चौदह बरस करते हैं और कवि कहते हैं वे हूबहू राम-से दिखते हैं। जो साधना जीता है, वह उसी जैसा हो जाता है जिसकी वह बाट देख रहा है।

उनकी अब भी रातें आती हैं जब वे कहते हैं: मैं पैदा न होता तो कुछ न खोता। माण्डवी यह नहीं कहतीं कि वे ग़लत हैं। वे बताती हैं कि वे क्या हैं: वह जिसने सुख को लात मारी और दुख से जूझा। और फिर इस साइट के हर परिवार के लिए पंक्ति: भाग्य ने एक भूल की, और हम सबने उसे सँभाला। यह हमें जलाती है। रोशनी भी देती है।

और देखिए, जब वे व्रत निभा रहे हैं, गाँव का क्या होता है। कारीगर, नई दवाओं वाले वैद्य, बीज का इतिहास रखने वाले किसान, किसी घर में कलह नहीं। केन्द्र में साधना निभाता आदमी अपने गाँव से छिपा नहीं रहता। वह गाँव में दिखता है।

आख़िर में: संजीवनी खड़ाऊँ के पास रखी है। अभ्यास और औषधि साथ-साथ। अगले दृश्य के लिए इसे थामे रहिए।

गुप्त, पूरा दृश्य · पृ. १६७, पृ. २५१ से २७२

पृ. १६७

नवम सर्ग

अवध को अपनाकर त्याग से ,
वन तपोवन-सा प्रभु ने किया ।
भरत ने उनके अनुराग से ,
भवन में वन का व्रत ले लिया !

पृ. २५१

एकादश सर्ग

जयति कपिध्वज के कृपालु कपि ,
वेद - पुराण - विधाता व्यास ,
जिनके अमर गिराश्रित हैं सब
धर्म नीति, दर्शन, इतिहास !

बरसें बीत गईं, पर अब भी
है साकेत पुरी में रात ,
तदपि रात चाहे जितनी हो ,
उसके पीछे एक प्रभात ।
ग्रास हुआ आकाश, भूमि क्या ,
बचा कौन अँधियारे से ?
फूट उसी के तनु से निकले
तारे कच्चे पारे से !
विकच व्योम-विटपी को मानो
मृदुल बयार हिलाती है ,
अंचल भर भर कर मुक्ता-फल
खाती और खिलाती है !
सौध-पार्श्व में पर्णकुटी है ,
उसमें मन्दिर सोने का ,
जिसमें मणिमय पादपीठ है ,
जैसा हुआ न होने का ।

पृ. २५२

केवल पादपीठ, उस पर हैं
पूजित युगल पादुकाएँ ,
स्वयं-प्रकाशित रत्न-द्वीप हैं
दोनों के दायें-बायें ।

उटज-अजिर में पूज्य पुजारी
उदासीन - सा बैठा है ।
आप देव-विग्रह मन्दिर से
निकल लीन-सा बैठा है ।
मिले भरत में राम हमें तो ,
मिलें भरत को राम कभी ,
वही रूप है, वही रंग है ,
वही जटाएँ, वही सभी !
बायीं ओर धनुष की शोभा ,
दायीं ओर निषंग - छटा ,
वाम पाणि में प्रत्यंचा है ,
पर दक्षिण में एक जटा !
“आठ मास चातक जीता है
अपने घन का ध्यान किये ,
आशा कर निज घनश्याम की
हमने बरसों बिता दिये !”

सहसा शब्द हुआ कुछ बाहर ,
किन्तु न टूटा उनका ध्यान ,
कब आ पहुँची वहाँ माण्डवी ,
हुआ न उनको इसका ज्ञान ।

पृ. २५३

चार चूड़ियाँ थीं हाथों में ,
माथे पर सिन्दूरी विन्दु ,
पीताम्बर पहने थी सुमुखी ,
कहाँ असित नभ का वह इन्दु ?

फिर भी एक विषाद वदन के
तपस्तेज में पैठा था ,
मानो लौह-तन्तु मोती को
बेध उसी में बैठा था ।

वह सोने का थाल लिये थी ,
उस पर पत्तल छाई थी ,
अपने प्रभु के लिए पुजारिन
फलाहार सज लाई थी ।

तनिक ठिठक, कुछ मुड़कर दायें ,
देख अजिर में उनकी ओर ,
शीश झुकाकर चली गई वह
मन्दिर में निज हृदय हिलोर ।

हाथ बढ़ाकर रक्खा उसने
पादपीठ के सम्मुख थाल ,
टेका फिर घुटनों के बल हो
द्वार-दहेली पर निज भाल ।

टपक पड़ीं उसकी आँखों से
बड़ी बड़ी बूँदें दो - चार ,
दूनी दमक उठीं रत्नों की
किरणें उनमें डुबकी मार !

यही नित्य का क्रम था उसका ,
राजभवन से आती थी ,
स्वश्रू - शुश्रूषिणी अन्त में
पति-दर्शन कर जाती थी ।

पृ. २५४

उठ धीरे, पिय-निकट पहुँचकर ,
उसने उन्हें प्रणाम किया ,
चौंक उन्होंने, सँभल ‘स्वस्ति’ कह ,
उसे उचित सम्मान दिया ।

“जटा और प्रत्यंचा की उस ,
तुलना का फल क्या निकला ?”
हँसने की चेष्टा करके भी
हा ! रो पड़ी बधू विकला ।

“यह विषाद भी प्रिये, अन्त में ,
स्मृति - विनोद बन जावेगा ,
दूर नहीं अब अपना दिन भी
आने को है, आवेगा ।”

“स्वामी, तदपि आज हम सबके
मन क्यों रो रो उठते हैं ,
किसी एक अव्यक्त आर्त्ति से
आतुर हो हो उठते हैं ।”

“प्रिये, ठीक कहती हो तुम यह ,
सदा शंकिनी आशा है ,
होकर भी बहु चित्र - अंकिनी ,
आप रंकिनी आशा है ।

विस्मय है, इतनी लम्बी भी
अवधि बीतने पर आई ,
खड़ा न हो फिर नया विघ्न कुछ ,
स्वयं सभय चिन्ता छाई ।

सुनो, नित्य जन - मनस्कल्पना
नया निकेत बनाती है ,
किन्तु चंचला उसमें सुख से
पल भर बैठ न पाती है ।

पृ. २५५

सत्य सदा शिव होने पर भी ,
विरूपाक्ष भी होता है ,
और कल्पना का मन केवल
सुन्दरार्थ ही रोता है ।

तो भी अपने प्रभु के ऊपर
है मुझको पूरा विश्वास ,
आर्य कहीं हों, किन्तु आर्य के
दिये वचन हैं मेरे पास ।

रोक सकेगा कौन भरत को
अपने प्रभु को पाने से ?
टोक सकेगा रामचन्द्र को
कौन अयोध्या आने से ?”

“नाथ, यहाँ कहकर माँओं को
किसी भाँति कुछ खिला सकी ,
पर ऊर्मिला बहन को यह मैं
आज न जल भी पिला सकी ।

‘कहाँ और कैसे होंगे वे ?’—
कह कह माँएँ रोती हैं ,
‘काँटे उन्हें कसकते होंगे’—
रह रह धीरज खोती हैं !

किन्तु बहन के बहने वाले
आँसू भी सूखे हैं आज ,
वरुनी के वरुणालय भी वे
अलकों-से रूखे हैं आज !

उनके मुहँ की ओर देखकर ,
आग्रह आप ठिठकता है ,
कहना क्या, कुछ सुनने में भी
हाय ! आज वह थकता है ।’

पृ. २५६

दीन भाव से कहा उन्होंने—
‘बहन, एक दिन बहुत नहीं ,
बरसों निराहार रहकर ये
आँखें क्या मर गईं कहीं ?’

विवश लौट आई रोकर मैं ,
लाई हूँ नैवेद्य यहाँ ,
‘आता हूँ मैं’—कहकर देवर
गये उन्हीं के पास वहाँ ।”

सनिःश्वास तब कहा भरत है—
“तो फिर आज रहे उपवास ।”
“पर प्रसाद प्रभु का ?” यह कहकर
हुई माण्डवी अधिक उदास ।

“सबके साथ उसे लूँगा मैं ,
बीते—बीते रही है रात ,
हाय ! एक मेरे पीछे ही
हुआ यहाँ इतना उत्पात !

एक न मैं होता तो भव की
क्या असंख्यता घट जाती ?
छाती नहीं फटी यदि मेरी ,
तो धरती ही फट जाती !”

“हाय ! नाथ धरती फट जाती ,
हम तुम कहीं समा जाते ,
तो हम दोनों किसी मूल में
रहकर कितना रस पाते ।

न तो देखता कोई हमको ,
न वह कभी ईर्ष्या करता ,
न हम देखते आर्त्त किसी को
न यह शोक आँसू भरता ।

पृ. २५७

स्वयं परस्पर भी न देखकर
करते हम बस अंगस्पर्श ,
तो भी निज दाम्पत्य-भाव का
उसे मानती मैं आदर्श ।

कौन जानता किस आकर में
पड़े हृदय रूपी दो रत्न ?
फिर भी लोग किया करते हैं
उसकी आशा पर ही यत्न ।

ऐसे ही अगणित यत्नों से
तुम्हें जगत ने पाया है ,
उस पर तुम्हें न हो, पर उसको
तुम पर ममता - माया है ।

नाथ, न तुम होते तो यह व्रत
कौन निभाता, तुम्हीं कहो ?
उसे राज्य से भी महार्ह धन
देता आकर कौन अहो !

मनुष्यत्व का सत्व-तत्व यों
किसने समझा - बूझा है ?
सुख को लात मारकर तुम-सा
कौन दुःख से जूझा है ?

खेतों के निकेत बनते हैं
और निकेतों के फिर खेत ,
वे प्रासाद रहें न रहें, पर ,
अमर तुम्हारा यह साकेत ।

पृ. २५८

मेरे नाथ, जहाँ तुम होते
दासी वहीं सुखी होती ,
किन्तु विश्व की भ्रातृ-भावना
यहाँ निराश्रित ही रोती ।

रह जाता नरलोक अबुध ही
ऐसे उन्नत भावों से ,
घर घर स्वर्ग उतर सकता है
प्रिय, जिनके प्रस्तावों से ।

जीवन में सुख-दुख निरन्तर
आते जाते रहते हैं ,
सुख तो सभी भोग लेते हैं ,
दुःख धीर ही सहते हैं ।

मनुज दुग्ध से, दनुज रुधिर से ,
अमर सुधा से जीते हैं ,
किन्तु हलाहल भव-सागर का ,
शिव-शंकर ही पीते हैं ।

धन्य हुए हम सब स्वधर्म की
जिस इस नई प्रतिष्ठा से ,
समुत्तीर्ण होंगे कितने कुल
इसी अतुल की निष्ठा से !

हमें ऐतिहासिक घटनाएँ
जो शिक्षा दे जाती हैं ;
स्वयं परीक्षा लेने उसकी
लौट लौटकर आती हैं ।

पृ. २५९

अब के दिन के लिए खेद यह ,
जब यह दुख भी चला चला ?
सच कहती हूँ, यह प्रसङ्ग भी
तुमको जाते हुए खला !”

“प्रिये, सभी सह सकता हूँ मैं ,
पर असह्य तुम सबका ताप ।”
“किन्तु नाथ, हम सबने इसका
लिया नहीं क्या अपने आप ?

भूरि-भाग्य ने एक भूल की
सबने उसे सँभाला है ,
हमें जलाती पर प्रकाश भी
फैलाती यह ज्वाला है ।

कितने कृती हुए, पर किसने
इतना गौरव पाया है ?
मैं तो कहती हूँ, सुदैव ही
यहाँ दुःख यह लाया है !

व्यथा - भरी बातों में ही तो
रहता है कुछ सार भरा ,
तप में तप कर ही वर्षा में
होती है उर्वरा धरा ।

लो, देवर आ गये, उन्हीं के
घोड़े की ये टापें हैं ,
सुदृढ़ मार्ग पर भी द्रुतलय में
यथा मुरज की थापें हैं ।

पृ. २६०

राजनीति बाधक न बने तो
तनिक और ठहरूँ इस ठौर ?”
“सो कुछ नहीं, किन्तु भृत्यों को
प्रिये, कष्ट ही होगा और ।”

“उन्हें हमारे सुख से बढ़कर
नाथ, नहीं कोई सन्तोष ,
सदा हमारे दुःखों पर जो
देते हैं स्वदैव को दोष ।”

आकर—“लघु कुमार आते हैं”—
बोली नत हो प्रतिहारी ,
“आवें” कहा भरत ने, तत्क्षण
आये वे धन्वाधारी ।

कृश होकर भी अंग वीर के
सुगठित शाण - चढ़े - से थे ,
सरल वदन के विनय-तेज युग
मिलकर अधिक बढ़े-से थे ।

दोनों ओर दुकूल फहराता ,
निकले थे मानो दो पक्ष ,
उड़कर भी सुस्फूर्ति-मूर्ति वे
ला सकते थे अपना लक्ष ।

आकर किया प्रणाम उन्होंने ,
दोनों ने आशीष दिया ,
मुख का भाव देखकर उनका
सुख पाया, सन्तोष किया ।

पृ. २६१

“कोई तापस, कोई त्यागी ,
कोई आज विरागी हैं ,
घर सँभालने वाले मेरे
देवर ही बड़भागी हैं !”

मुसकाकर तीनों ने क्षण भर
पाया वर विनोद - विश्राम ,
अनुभव करता था अपने में
चित्रकूट का नन्दिग्राम ।

बोले तब शत्रुघ्न भरत से—
“आर्य, कुशलता है पुर में ,
प्रभु की स्वागत-सज्जा की ही
उत्सुकता सबके उर में ।

अपने अतुलित जनपद की जो
आकृति मात्र रही थी शेष ,
नव्य-भव्य वर्णों का उसमें
होता है अब पुनरुन्मेष ।

वह अनुभूति - विभाग आपका
बढ़ता है विभूति पाकर ,
लिखते हैं लोगों के अनुभव
लेखक जहाँ तहाँ जाकर ।

करते हैं ज्ञानी - विज्ञानी
नित्य नये सत्यों का शोध ,
और सर्वसाधारण उनसे ,
बढ़ा रहे हैं निज निज बोध ।

पृ. २६२

नूतन वृत्तों में कवि-कोविद
नये गीत रच लाते हैं ,
नव रागों में, नव तालों में ,
गायक उन्हें जमाते हैं ।

नये नये में साजों बाजों की
शिल्पकार करते हैं सृष्टि ,
गूढ़ रहस्यों पर ही प्रतिभा
डाल रही है अपनी दृष्टि ।

नई नई नाटक - सज्जाएँ
सूत्रधार करते हैं नित्य ,
और ऐन्द्रजालिक भी अपना
भरते हैं अद्भुत साहित्य ।

चित्रकार नव नव दृश्यों को
ऐसा अंकित करते हैं ,
आनन्दित करने के पहले
जो कुछ शंकित करते हैं ।”

कहा माण्डवी ने—“उलूक भी
लगता है चित्रस्थ भला ,
सुन्दर को सजीव करती है ,
भीषण को निर्जीव कला ।”

“वैद्य नवीन वनस्पतियों से
प्रस्तुत करते हैं नव योग ,
जिनके गन्धस्पर्श मात्र से
मिटें गात्र के बहु विध रोग ।

पृ. २६३

सौगन्धिक नव नव सुगन्धियाँ
प्रभु के लिए निकाल रहे ,
माली नये नये पौधों को
उद्यानों में पाल रहे ।

एक शाल में बहु विभिन्न दल
और विविध वर्धित फल-फूल ,
यथा-विचित्र विश्व-विटपी में
अगणित विटप, एक ही मूल !

तन्तुवाय बुन बना रहे हैं
नये नये बहु पट - परिधान ,—
रखने में फूलों के दल - से ,
फैलाने में गन्ध - समान !

स्वर्णकार कितने प्रकार से
करते हैं मणि - कांचन - योग ,
चमत्कार के ही प्रसार में
लगे चाव से हैं सब लोग ।

गल गल कर ढल रहीं धातुएँ
विघल महानल में जल ज्यों ,
हुए टाँकियों के कौशल से
उपल सुकोमल उत्पल ज्यों !

फूल - पत्तियों से भूषित हैं
फिर सजीव-से नीरस दारु ,
कारु - कुशलताएँ हैं अथवा
उनकी पूर्वस्मृतियाँ चारु !

पृ. २६४

वसुधा - विज्ञों ने कितनी ही
खोजी नई नई खानें ,
पड़े धूलि में होंगे फिर भी
कितने रत्न विना जानें ।

श्रमी कृषक निज बीज-वृद्धि का
रखते हैं जीवित इतिहास ,
राज - घोष में देखा मैंने
आज नया गोवंश - विकास ।

विभु की बाट जोहते हैं सब
ले ले कर अपने उपहार ,
दे देकर निज रचनाओं को
नव नव अलंकार - श्रृङ्गार ।

करा रहे ऊर्जस्वल बल से
नित्य नवल कौशल का मेल ,
साध रहे हैं सुभट विकट बहु
भय - विस्मय - साहस के खेल ।

करके नये नये शस्त्रों से
नये नये लक्षों को विद्ध ,
विविध युद्ध-कौशल उपजा कर
करते हैं सैनिकजन सिद्ध !”

कहा माण्डवी ने—“क्या यों ही
सच्चे कलह कहीं कम हैं ?
हा ! तब भी सन्तुष्ट न होकर
लगे कल्पना में हम हैं !”

पृ. २६५

“प्रिये, तुम्हारी सेवा का सुख
पाने को ही यह श्रम सर्व ,
वीरों के व्रण को बधुओं की
स्नेह-दृष्टि का ही चिर गर्व ।”

“हाय ! हमारे रोने का भी
रखते हैं नर इतना मूल्य !”
“हाँ भद्रे, वे नहीं जानते ,
हँसने का है कितना मूल्य !”

“किन्तु नाथ, मुझको लगती है ,
कलह - मूर्ति ही अपनी जाति ,
आत्मीयों को भी आपस में
हमीं बनातीं यहाँ अराति ।”

“आर्ये, तब क्या कहती हो तुम
यहाँ न होतीं माताएँ ?
होता कुछ वहाँ कहाँ से
जहाँ न होतीं माताएँ ?

नहीं कहीं गृह - कलह प्रजा में ,
हैं सन्तुष्ट तथा सब शान्त ,
उनके आगे सदा उपस्थित
दिव्य राज - कुल का दृष्टान्त ।

अन्न-वृद्धि से तृप्त तथा बहु
कला - सिद्धि से सहज प्रसन्न ,
अपना ग्राम ग्राम है मानो
एक स्वतन्त्र देश सम्पन्न ।

पृ. २६६

बाध्य हुआ था जो नृप-मण्डल
देख हमारी अविचल शक्ति ,
साध्य मानता है अब हमको ,
रखता है मैत्री क्या भक्ति ।

अवधि - यवनिका उठे आर्य, तो
देखेंगे पुर के सब वृद्ध—
प्रभु को आप राज्य सौंपेंगे
पहले से भी अधिक समृद्ध ।”

‘सेंत-मेंत के यश के भागी
प्रिये, तुम्हारा है भर्त्ता ,
करके स्वयं, तुम्हारे देवर
कहते हैं मुझको कर्त्ता !”

“नाथ, देखती हूँ इस घर में
मैं तो इसमें ही सन्तोष ,
गुण अर्पण करके औरों को ,
लेना अपने सिर सब दोष ।”

“आर्य, तराई से आया है ,
एक श्वेत शोभन गज आज ,
प्रभु के स्वागतार्थ उसके मिष
समुपस्थित मानो गिरिराज !

सहज सुगति वह किन्तु निषादी
उसे और शिक्षा देंगे ,
प्रभु के आने तक वे उसको
उत्सव - योग्य बना लेंगे ।”

पृ. २६७

“अनुज, सुनाते रहो सदा तुम ,
मुझको ऐसे ही संवाद ,
सुनो, मिला है हमें और भी ,
हिमगिरि का कुछ नया प्रसाद ।

मानसरोवर से आये थे
सन्ध्या समय एक योगी ,
मृत्युञ्जय की ही यह निश्चय
मुझ पर कृपा हुई होगी ।

वे दे गये मुझे वह औषधि ,
संजीवनी नाम जिसका ,
क्षत-विक्षत जन को भी जीवन
देना सहज काम जिसका ।

किया उसे संस्थापित मैंने
चरण-पादुकाओं के पास ,
फैल रही यह सुरभि उसी की ,
करती है वह विभा-विकास ।”

“आर्य, सभी शुभ लक्षण हैं, पर
मन में खटक रहा है कुछ ,
निकल निकलकर भी काँटे-सा
उसमें अटक रहा है कुछ ,

लाकर दूर दूर से अपने
प्रभु के लिए भेंट सस्नेह ,
जल-थल से पुर के व्यवसायी
लौट रहे हैं निज गेह ।

पृ. २६८

आज एक ऐसे ही जन ने
मुझको यह संवाद दिया ,
सबके लिए अगम दक्षिण का
पथ प्रभु ने है सुगम किया ।

शान्त सदय मुनियों को उद्धत
राक्षस वहाँ सताते थे ,
धर्म - कर्म के घातक होकर
उनको खा तक जाते थे ।

आर्ये, सिहर उठीं तुम सुनकर
हुआ किन्तु अब उनका त्राण !
रहते हैं लेकर ही अथवा
देकर ही प्राणों को प्राण !

प्रभु के शरण हुए कुछ ऋषि-मुनि
कहकर कष्ट - कथा सारी ,
सफल समझ अपना वन आना
द्रवित हुए वे भयहारी ।

अत्रि और अनुसूया ने तब
उनको आशीर्वाद दिया ,
दिव्य वसन-भूषण आर्या को
दे बेटी - सा विदा किया ।

दण्डक बन में जाकर प्रभु ने
लिया धर्म - रक्षा का भार ,
दिया अश्रु-जल हत मुनियों को
उनका अस्थि - समूह निहार ।

पृ. २६९

बाधक हुआ विराध मार्ग में ,
झपटा आर्या पर पाषण्ड ;
जीता हुआ गाड़ देना ही
समुचित था उस खल का दण्ड ।”

“हाय अभागे !” “सचमुच भाभी ,
अच्छा हो अरि का भी अन्त ,
किन्तु स्वयं माँगा था उसने
मुक्ति - हेतु यह दण्ड दुरन्त ।

मिल शरभंग, सुतीक्ष्ण आदि से
आर्य अगस्त्याश्रम आये ,
कौशिक-सम दिव्यास्त्र उन्होंने
उन मुनिवर से भी पाये ।

गोदावरी - तीर पर प्रभु ने
दण्डक वन में वास किया ,
अपनी उच्च आर्य-संस्कृति ने ,
वहाँ अबाध विकास किया ।

राक्षसता उनको विलोककर
थी लज्जा से लोहित - सी ,
शूर्पणखा रावण की भगिनी
पहुँची वहाँ विमोहित - सी ।”

हँसी माण्डवी—“प्रथम ताड़का ,
फिर यह शूर्पणखा नारी ,
किसी बिड़ालाक्षी की भी अब
आने वाली है बारी !”

पृ. २७०

“उनमें भी सुलोचनाएँ हैं
और प्रिये, हममें भी अन्ध ।”
“नाथ, क्यों नहीं—तभी न अब यह
जुड़ता है उनसे सम्बन्ध !—

हाँ देवर, फिर ?” “भाभी, आगे
हुआ सभी रस-भाव विवर्ण ,
आर्या को खाने आई वह—
गई कटाकर नासा-कर्ण !

इसके पीछे उस कुटीर पर
घिरी युद्ध की घोर घटा ,
निशाचरों का गर्जन-तर्जन ,
शस्त्रों की वह तडिच्छटा ।

अभय आर्य ने इन्द्रचाप - सा
चाप चढ़ाकर छोड़े बाण ,
रहा राक्षसों के शोणित की
वर्षा का फिर क्या परिमाण ?

निज संस्कृति-समान आर्या की
अग्रज रक्षा करते थे ,
और प्रहरणों से प्रभुवर के
रण में रिपु-गण मरते थे ।

बहुसंख्यक भी वैरि जनों में
उन गतियों से खेले वे ,
दीख पड़े सबको असंख्य - से
होकर आप अकेले वे !

पृ. २७१

दूषण को सह सकते कैसे
स्वयं सगुण धन्वाधारी ,
खर था खर, पर उनके शर थे
प्रखर पराक्रम - विस्तारी ।

व्रण - भूषण पाकर विजयश्री
उन विनीत में व्यक्त हुई ,
निकल गये सारे कंटक-से
व्यथा आप ही त्यक्त हुई ।

जय जयकार किया मुनियों ने ,
दस्युराज यों ध्वस्त हुआ ,
आर्य - सभ्यता हुई प्रतिष्ठित ,
आर्य - धर्म आश्वस्त हुआ ।

होते हैं निर्विघ्न यज्ञ अब
जप - समाधि - तप - पूजा - पाठ ,
यश गाती हैं मुनि - कन्याएँ ,
कर व्रत - पर्वोत्सव के ठाठ ।”

“धन्य” भरत बोले गद्गद हो—
“दूर विकृति वैगुण्य हुआ ,
उस तपस्विनी मेरी माँ का
आज पाप भी पुण्य हुआ ।

तदपि राक्षसों के विरोध की
हुई मुझे नूतन शंका ,
विश्रुत बली - छली है रावण ,
सोने की जिसकी लंका ।”

पृ. २७२

“नाथ, बली हो कोई कितना
यदि उसके भीतर है पाप ,
तो गजभुक्तकपित्थ - तुल्य वह
निष्फल होगा अपने आप ।”

“प्रिये, ठीक है किन्तु हमें भी
करना है कर्त्तव्य - विचार ,
जलते जलते भी अघमेन्धन
छिटकाता है निज अंगार ।

हत वैरी का भी क्या हमको
करना पड़ता नहीं प्रबन्ध ,
जिसमें सड़कर उसका शव भी
फैलावे न कहीं दुर्गन्ध ।

पुण्य लाभ करने से भी है
पाप काटना कठिन कठोर ,
कुसुम-चयन-सा सहज नहीं है
काँटों से बचना उस ओर ।

पूर्व पुण्य के क्षय होने तक
पापी भी तो दुर्जय है ,
सरला-अबला आर्या ही के
लिए आज मुझको भय है ।

मायावी राक्षस—वह देखो !”
चौंक वीरवर ने थोड़ा ,
दीख न पड़ा चढ़ाकर धन्वा
कब शर जोड़ा, कब छोड़ा ।

दृश्य ६ / ७ · वलय ६: दूसरा आदमी

बाण और संजीवनी

रात के आकाश में एक आकार गुज़रता है, और भरत, उसे राक्षस समझकर, किसी के देखने से पहले बाण छोड़ देते हैं। "हा लक्ष्मण! हा सीते!" एक देह उनके सामने गिरती है। भरत के आँसू उस अजनबी के खून पर गिरते हैं: मैंने किसको मारा? माण्डवी: शोक का समय नहीं; संजीवनी की परीक्षा यहीं हो। भरत खुद उसे ले आते हैं, और घायल की साँस लौटती है; माण्डवी अपना आँचल फाड़कर उसे पट्टी बाँधती हैं। वह आँखें खोलता है: क्या तुम मेरी सीता माता हो? वे हनुमान हैं, लंका से खबर लेकर, उसी संजीवनी के लिए उत्तर उड़ते हुए जो भरत के पास है। वे वन के बरस सुनाते हैं, एक लम्बी कथा में (यहाँ हमारे शब्दों में): सीता का हरण, वन में लक्ष्मण का यह कहना कि भरत की साधना निष्फल नहीं जा सकती, सेतु, युद्ध, और आज रात लक्ष्मण का गिरना, और राम का रावण को पुकारना, आ भाई, हम एक-से दुख के मित्र हैं। केवल संजीवनी, भोर से पहले, उन्हें बचा सकती है। भरत उसे दे देते हैं, और हनुमान आकाश में चले जाते हैं।

गुप्त की पंक्तियाँ

चौंक उठे सब “हरे ! हरे !” कह— “हा ! मैंने किसको मारा !” आहत जन के शोणित पर ही गिरि भरत - रोदन - धारा ।

“साधु-साधु” कह स्वयं भरत ही जाकर उसको ले आये , चमत्कार था, नये प्राण - से उस आहत जन ने पाये ।

अपना अंचल फाड़ माण्डवी उसे बाँधती थी पट्टी !

माताएँ ही माताएँ हैं जिसके लिए जहाँ देखो ।

सोचो, साधु भरत के भी क्या साधन निष्फल जावेंगे ?

‘आ भाई, वह वैर भूलकर हम दोनों समदुःखी मित्र ,

पृ. २७३ से २७५, पृ. २७९, पृ. २८१, पृ. २९७ से २९९

यह रहा छठे चरण का आदमी। भरत से चोट हुई: उन्होंने अँधेरे में, जिसे शत्रु समझा, उस पर पहले बाण चला दिया। हर उस आदमी ने जिसने नशा किया है, यह किया है, किसी ऐसे पर जो बाद में मित्र निकला। और जो संजीवनी उस घायल को बचाती है, वह वही है जिसे वे बरसों से खड़ाऊँ के पास रखे थे, बिना जाने कि वह किस काम आएगी। जो अभ्यास उन्होंने अपने लिए निभाया, वही दूसरे आदमी की ज़रूरत निकला।

जिसने घाव दिया, वही भरता है। इसलिए नहीं कि उसने कोई क़र्ज़ चुकाया। इसलिए कि औषधि उसके पास थी, और अपराध-बोध के रोकने से पहले उसके हाथ उसकी ओर बढ़ गए। माण्डवी अपना आँचल फाड़ती हैं। जिस परिवार ने बरसों किसी आदमी को सँभाला है, वह घाव जल्दी बाँधना जानता है।

और दूर, वन में, वह भाई जिसने कभी भरत के विरुद्ध धनुष चढ़ाया था, अब कहता है: उनकी साधना निष्फल नहीं जा सकती। शक सदा नहीं रहता। बरस निभाए जाएँ तो वह ख़त्म होता है।

गुप्त, पूरा दृश्य · पृ. २७३ से २७५, पृ. २७९, पृ. २८१, पृ. २९७ से २९९

पृ. २७३

“हा लक्ष्मण ! हा सीते !” दारुण ,
आर्त्तनाद गूँजा ऊपर ,
और एक तारक-सा तत्क्षण
टूट गिरा सम्मुख भू पर ।

चौंक उठे सब “हरे ! हरे !” कह—
“हा ! मैंने किसको मारा !”
आहत जन के शोणित पर ही
गिरि भरत - रोदन - धारा ।

दौड़ पड़ीं बहु दास - दासियाँ ,
मूर्च्छित-सा था वह जन मौन ,
भरत कह रहे थे सहला कर—
“बोलो भाई तुम हो कौन ?”

कहा माण्डवी ने तब बढ़कर—
“अब आतुरता ठीक नहीं ,
संजीवनी महौषधि की हो
नाथ परीक्षा क्यों न यहीं ?”

“साधु-साधु” कह स्वयं भरत ही
जाकर उसको ले आये ,
चमत्कार था, नये प्राण - से
उस आहत जन ने पाये ।

आँखें खोल देखती थी वह
विकट मूर्ति हट्टी-कट्टी ,
अपना अंचल फाड़ माण्डवी
उसे बाँधती थी पट्टी !

पृ. २७४

“अहा ! कहाँ मैं, क्या सचमुच ही
तुम मेरी सीता माता ?
ये प्रभु हैं, ये मुझे गोद में
लिटाये लक्ष्मण भ्राता ?”

“तात ! भरत, शत्रुघ्न, माण्डवी
हम सब उनके अनुचारी ,
तुम हो कौन, कहाँ, कैसे हैं
वे खर - दूषण - संहारी ?”

चौंक वीर उठ खड़ा हो गया
पूछा उसने—“कितनी रात ?”
“अर्द्धप्राय” “कुशल है तब भी ,
अब भी है वह दूर प्रभात ।

धन्य भाग्य, इस किंकर ने भी
उनके शुभ दर्शन पाये ?
जिनकी चर्चा कर सदैव ही
प्रभु के भी आँसू आये ।

मेरे लिए न आतुर हो तुम ,
कहाँ पार्श्व का अब वह घाव ?
अम्बा के इस अञ्चल-पट में ,
पुलकित मेरा चिर-शिशु-भाव !

आञ्जनेय को अधिक कृती उन
कार्तिकेय से भी लेखो ,
माताएँ ही माताएँ हैं
जिसके लिए जहाँ देखो ।

पृ. २७५

“पर विलम्ब से हानि, सुनो मैं
हनूमान मारुति, प्रभुदास ,
संजीवनी - हेतु जाता हूँ
योग - सिद्धि से उड़ कैलास ।”

“प्रस्तुत है वह वहीं, उसी से
प्रियवर, हुआ तुम्हारा त्राण ।”
“अहा ! मेरे साथ बचाये ।
तुमने लक्ष्मण के भी प्राण ।

थोड़े में वृत्तान्त सुनो अब
खर - दूषण - संहारी का ,
तुम्हें विदित ही है वह विक्रम ,
उन दण्डक बन-चारी का ।

पृ. २७९

कह सशोक ‘हा !’ दोनों भाई
लगे सकोप पटकने हाथ ,
रोने लगी माण्डवी—“जीजी ,
तुमसे तो ऊर्मिला सनाथ !”

पृ. २८१

‘जिनके अलंकार पाये हैं ,
आर्य उन्हें भी पावेंगे ,
सोचो, साधु भरत के भी क्या
साधन निष्फल जावेंगे ?

पृ. २९७

गिरा हमारे दल पर गिरि-सा
मरते मरते भी वह घोर ,
छोड़ धनुःशर बोले प्रभु भी
कर युग कर रावण की ओर—

‘आ भाई, वह वैर भूलकर
हम दोनों समदुःखी मित्र ,
आ जा, क्षण भेंट परस्पर ,
कर लें अपने नेत्र पवित्र !’

हाय ! किन्तु इसके पहले ही
मूर्च्छित हुआ निशाचर-राज ,
प्रभु भी यह कह गिरे—‘राम से
रावण ही सहृदय है आज !’

सन्ध्या की उस धूसरता में
उमड़ा करुणा का उद्रेक ,
छलक छलक कर झलके ऊपर
नभ के भी आँसू दो एक ।

हम सब हाथों पर सँभालकर
उन्हें शिविर में लेकर आये ,
देख अनुज की दशा दयामय ,
दुगुने आँसू भर लाये ।

‘सर्व कामना मुझे भेंटकर
वत्स, कीर्ति - कामी न बनो ,
रहे सदा तुम तो अनुगामी ,
आज अग्रगामी न बनो !’

पृ. २९८

समझाया वैद्यों ने उनको—
“आर्य, अधीर न हों इस भाँति ,
अब भी आशा, वही करें बस
सफल हो सकें वह जिस भाँति !’

‘तुच्छ रक्त क्या, इस शरीर में
डालो कोई मेरे प्राण ,
गत सुनकर भी मुझे जानकी
पावेगी दुःखों से त्राण ।’

बोल उठे सब—‘प्रस्तुत हैं ये
प्राण, इन्हें लक्ष्मण पावें ,
डूब जायँ हम सौ सौ तारे ,
चन्द्र हमारे बच जावें ।’

“संजीवनी मात्र ही स्वामी ,
आ जावे यदि रातों - रात ,
तो भी बच सकते हैं लक्ष्मण ,
बन सकती है बिगड़ी बात ।

पंजर भग्न हुआ, पर पक्षी
अब भी अटक रहा है आर्य !’
आगे बढ़ बोला मैं—‘प्रभुवर ,
किंकर कर लेगा वह कार्य ।’

आया इसीलिए मैं—आहा !
हुआ बीच में ही वह काम ,
अब आज्ञा दीजे, जाऊँ मैं ,
चिन्तित होंगे वे गुण - धाम ।

पृ. २९९

मायावी रावण प्रसिद्ध है ,
किन्तु सत्य - विग्रह श्रीराम ,
चिन्ता करें न आप चित्त में ,
निश्चित ही है शुभ परिणाम ।”

मारुति ने निज सूक्ष्म गिरा में
बीज-तुल्य जो वृत्त दिया ,
आते ही इस अश्रु - भूमि में
उसने अंकुर - रूप लिया !

चौंक भरत - शत्रुघ्न - माण्डवी
मानो यह दुःस्वप्न विलोक ,
ओषधि देकर भी कुछ उनसे
कह न सके सहकर वह शोक ।

खींचकर श्वास आस-पास से प्रयास बिना
सीधा उठ शूर हुआ तिरछा गगन में ,
अग्नि-शिखा ऊँची भी नहीं है निराधार कहीं ,
वैसा सार-वेग कब पाया सान्ध्य-घन में ?
भूपर से ऊपर गया यों वानरेन्द्र मानो ,
एक नया भद्र भौम जाता था लगन में ,
प्रकट सजीव चित्र-सा था शून्य पट पर ,
दण्ड-हीन केतन दया के निकेतन में !

लंकानल, शंका-दलन, जय जय पवनकुमार ,
तुमने सागर ही नहीं, किया गगन भी पार !

दृश्य ७ / ७ · वलय १: एक साँस

लोकापवाद

हनुमान के जाने के बाद माण्डवी पति को ढाढ़स देती हैं, और वे उन्हें माताओं के पास भेज देते हैं। भरत और शत्रुघ्न अकेले रह जाते हैं और रोते हैं। भरत पूछते हैं: लोग आज भरत का नाम कैसे लेते हैं? शत्रुघ्न: नाम से पहले "साधु" लगाते हैं। और भरत टूट जाते हैं: सीता समुद्र पार बन्धन में है और मैं यहाँ झूठी साधुता ओढ़े बैठा हूँ, अपने नाम के लायक भी नहीं। मुझे शत्रु का रक्त चाहिए, या मैं डूब मरूँ। उठो, सेना सजाओ, अभी। शत्रुघ्न नगर जाकर शंख फूँकते हैं; नन्दिग्राम से भरत उसका उत्तर देते हैं, और अयोध्या शस्त्र लेकर जाग उठती है। फिर एक गम्भीर स्वर: "शान्त, शान्त!" वसिष्ठ सेना को रोकते हैं और हाथ उठाकर सबको दूर लंका का शिविर दिखाते हैं (हमारे शब्दों में): राम की गोद में लक्ष्मण। भरत राम को भाई को जगाते सुनते हैं; हनुमान औषधि लेकर पहुँचते हैं; लक्ष्मण उठते हैं, और उनका पहला ध्यान उस योगी की ओर जाता है जो एक युग से राम का ध्यान धरे बैठा है।

गुप्त की पंक्तियाँ

“लोग भरत का नाम आज कैसे लेते हैं ?” “आर्य, नाम के पूर्व साधु-पद वे देते हैं ।”

बैठा हूँ मैं भण्ड साधुता धारण करके— अपने मिथ्या भरत नाम को नाम न धरके !

अनुज, मुझे रिपु-रक्त चाहिए, डूब मरूँ मैं ! मेटूँ अपने जड़ीभूत जीवन की लज्जा , उठो, इसी क्षण शूर, करो सेना की सज्जा ।

“शान्त, शान्त !” गम्भीर नाद सुन पड़ा अचानक ,

बोले उठे प्रभु चौंक भरत ने भी सुन पाया— “भाई, भाई ! उठो, सबेरा होने आया ,

बीत गई यदि अवधि भारत की क्या गति होगी ?— धरे तुम्हारा ध्यान एक युग से जो योगी ।

पृ. ३०० से ३०३, पृ. ३०८, पृ. ३१७ से ३२०

यही इस पन्ने का शीर्षक है। लोग उन्हें साधु कहते हैं, और वे यह सह नहीं पाते। हर वह आदमी जिसने छोड़ा है, यह जानता है: प्रशंसा निन्दा से बुरी लगती है। क्योंकि वह बरस, रातें, विचार जानता है। "साधु" अपने बारे में कहा गया झूठ लगता है। चौदह बरस एक नाम के नीचे, और जिस क्षण वह अच्छा नाम बनता है, वे उसे पहनने के बजाय मरना चाहते हैं।

और देखिए, लाज आगे क्या करती है। वह कुछ करना चाहती है, अभी, रक्त या डूबना, बस बैठे रहना नहीं। यह खुराक से पहले का क्षण है: जड़ हुई ज़िन्दगी, और उसे अभी तोड़ने की ज़रूरत, कीमत जो भी हो।

गुप्त का उत्तर दो शब्द हैं। शान्त, शान्त। एक साँस। वसिष्ठ सेना को लज्जित नहीं करते। उसे रोकते हैं, और दिखाते हैं कि दूर क्या हो ही रहा है: औषधि पहुँच गई है, भाई जाग रहा है। जिस पर तुम झपटने वाले थे, वह हो रहा है। साँस लो, और देखो।

फिर लक्ष्मण जागते हैं, और पहला ध्यान उन्हें भरत का आता है: योगी। जो नाम भरत नगर से सह न सके, वही नाम भाई उन्हें देता है।

गुप्त, पूरा दृश्य · पृ. ३०० से ३०३, पृ. ३०८, पृ. ३१७ से ३२०

पृ. ३००

द्वादश सर्ग

ढाल लेखनी, सफल अन्त में मसि भी तेरी ,
तनिक और हो जाय असित यह निशा अँधेरी ,
ठहर तभी, कृष्णाभिसारिके, कण्टक, कढ़ जा ,
बढ़ संजीवनि, आज मृत्यु के गढ़ पर चढ़ जा !
झलको, झलमल भाल-रत्न, हम सबके झलको ,
हे नक्षत्र, सुधार्द्र - विन्दु तुम छलको छलको ।
करो श्वास-संचार वायु, बढ़ चलो निशा में ,
जीवन का जय - केतु अरुण हो पूर्व दिशा में ।
ओ कवि के दो नेत्र, अनल - जल दोनों बरसो ,
लक्ष्मण - सा तनु कहाँ, घ्राण ! पाओगे, सरसो ।
देखो, वह शत्रुघ्न - दृष्टि मानो दहती है ,
सदय भरत, यह सुनो, माण्डवी क्या कहती है ?—
“कातर हो तुम आर्यपुत्र, होकर नर नामी ,
तो अबला क्या करे, बता दो मुझको स्वामी ?
पर इतना भी आज तुम्हें अवकाश कहाँ है ?
पुनः परीक्षक हुआ हमारा दैव यहाँ है ।
भव ने इतना भाव - विभव हमसे है पाया ,
उस भावुक को हाय ! तदपि सन्तोष न आया ।
फिर भी सम्मुख अड़ा खड़ा वह भिक्षुक भूखा ,
दया करो हे नाथ, दीन का मुख है सूखा !
हम क्या अब कुछ और नहीं दे सकते उसको ?
आदर से इस ठौर नहीं ले सकते उसको ?

पृ. ३०१

क्या हम उससे नहीं पूछ सकते हैं इतना—
भाई, हमसे तुझे चाहिए अब क्या - कितना ?”
“प्रस्तुत हैं ये प्राण, किन्तु वह सह न सकेगा ,
इनको लेकर प्रिये, शान्ति से रह न सकेगा ।
देखूँ, जलनिधि जुड़ा सके यदि इनकी ज्वाला—
पहने है जो स्वर्णपुरी की शाला - माला ।”
“स्वामी, निज कर्त्तव्य करो तुम निश्चित मन से ,
रहो कहीं भी, दूर नहीं होगे इस जन से ।
डरा सकेगा अब न आप दुर्दम यम मुझको ,
है अपनों के संग मरण जीवन - सम मुझको ।
जो अदृश्य है वही हमें शंकित करता है ,
विकृताकृतियाँ अन्धकार अंकित करता है ।
किन्तु मुझे अब नहीं किसी का कोई भय है ,
भीषण होता स्वयं निराशा - पूर्ण हृदय है ।
न सही, यदि लोक हमारे लिए नहीं है ,
हम सब होंगे जहाँ, हमारा स्वर्ग वहीं है ।
दैव—अभागा दैव—हमारा कर क्या लेगा ?
श्रद्धांजलि चिरकाल भुवन भर, भर भर देगा ।
संवादों को वायु वहन कर फैलाती है ,
अन्तःपुर की याद मुझे रह रह आती है ।”
“जाओ, जाओ, प्रिये सभी को शीघ्र सँभालो ,
यह मुख देखें शत्रु यहाँ तुम देखो - भालो ।”

उठी माण्डवी कर प्रणाम प्रिय चरण भिगो कर ,
बोले तब शत्रुघ्न शूर सम्मुख नत होकर—
“जाओगी क्या तुम निराश ही ! जाओ आर्ये ,
इसी भाँति इस समय स्वस्थता पाओ आर्ये !
सुनती जाओ, किन्तु तुम्हें है व्यर्थ निराशा ,
है अपना ही उदय, और अपनी ही आशा ।

पृ. ३०२

रूठा और अदृष्ट मनाने की बातों से ,
तो मैं सीधा उसे करूँगा आघातों से !”
“विजयी हो तुम तात, और क्या आज कहूँ मैं ?
पर आशा की और कहाँ तक ऐंठ सहूँ मैं ?
मेरा भी विश्वास एक, क्यों व्यर्थ बहूँ मैं ?
हुई आज निश्चिन्त, कहीं भी क्यों न रहूँ मैं ।
जो कुछ भी है प्राप्य यहाँ, मैंने सब पाया ,
हुई पूर्ण परितृप्त हृदय की ममता - माया ।
मुझे किसी के लिये उलहना नहीं रहा अब ,
मुझ-सा प्रत्यय प्राप्त करें सब ओर अहा ! सब ।”
देकर निज गुँजार-गन्ध मृदु - मन्द पवन को ,
चढ़ शिविका पर गई माण्डवी राजभवन को ।
रहे सन्न-से भरत, कहा—“शत्रुघ्न !” उन्होंने ,
उत्तर पाया—“आर्य !” लगे दोनों ही रोने ।
“हनुमान उड़ गये पवन - पथ से हैं कैसे ?”
“जल में पंख समेट शफर सरके ले जैसे !
उठता वह वातूल वेग से है कब ऐसे ?
नहीं, आर्य का बाण गया था उन पर, वैसे !”
“और यहाँ हम विवश बने बैठे हैं कैसे ?”
सुन नीरव शत्रुघ्न रहे जैसे के तैसे ।
“लोग भरत का नाम आज कैसे लेते हैं ?”
“आर्य, नाम के पूर्व साधु-पद वे देते हैं ।”
“भारत-लक्ष्मी पड़ी राक्षसों के बन्धन में ,
सिन्धु-पार वह बिलख रही है व्याकुल मन में ।
बैठा हूँ मैं भण्ड साधुता धारण करके—
अपने मिथ्या भरत नाम को नाम न धरके !
कलुषित कैसे शुद्ध सलिल को आज करूँ मैं ,
अनुज, मुझे रिपु-रक्त चाहिए, डूब मरूँ मैं !
मेटूँ अपने जड़ीभूत जीवन की लज्जा ,
उठो, इसी क्षण शूर, करो सेना की सज्जा ।

पृ. ३०३

पीछे आता रहे राज-मण्डल दल - बल से ,
पथ में जो जो पड़ें, चलें वे जल से - थल से ।
सजे अभी साकेत, बजे हाँ, जय का डंका ,
रह न जाय अब कहीं किसी रावण की लंका !
माताओं से माँग विदा मेरी भी लेना ,
मैं लक्ष्मण-पथ-पथी, ऊर्मिला से कह देना ।
लौटूँगा तो साथ उन्हीं के, और नहीं तो—
नहीं, नहीं, वे मुझे मिलेंगे भला कहीं तो !”
सिर पर नत शत्रुघ्न भरत - निर्देश धरे थे ,
पर ‘जो आज्ञा’ कह न सके, आवेश - भरे थे ।
छूकर उनके चरण द्वार की ओर बढ़े वे ,
झोंके पर ज्यों गन्ध, अश्व पर कूद चढ़े वे ।
निकला पड़ता वक्ष फोड़ कर वीर-हृदय था ,
उधर धरातल छोड़ आज उड़ता-सा हय था ।
जैसा उनके क्षुब्ध हृदय में धड़ धड़ धड़ था ,
वैसा ही उस वाजि-वेग में पड़ पड़ पड़ था ।
फड़ फड़ करने लगे जाग पेड़ों पर पक्षी ,
अपलक था आकाश चपल-वलित - गति—लक्षी ।
क्षण भर वह छवि देख स्वयं विधि की मति मोही ,
सिरजा न हो तुरंग - अंग करके आरोही !
उठ कौंधा - सा त्वरित राज-तोरण पर आया ,
प्रहरी-दल से सजग सैन्य - अभिवादन पाया ।
कूद पड़ा रणधीर, एक ने अश्व सँभाला ,
नीरव ही सब हुआ, न कोई बोला - चाला ।

पृ. ३०८

करके ध्वनि - संकेत शूर ने शंख बजाया ,
अन्तर का आह्वान वेग से बाहर आया ।
निकल उठा उच्छ्वास वक्ष से उभर उभर के ,
हुआ कम्बु कृतकृत्य कण्ठ की अनुकृति करके ।
उधर भरत ने दिया साथ ही उत्तर मानो ;
एक - एक दो हुए, जिन्हें एकादश जानो !
यों ही शंख असंख्य हो गये, लगी न देरी ,
घनन घनन बज उठी गरज तत्क्षण रण-भेरी ,
काँप उठा आकाश, चौंककर जगती जागी ,
छिपी क्षिति में कहीं, सभय निद्रा उठ भागी ।
बोले वन में मोर, नगर में डोले नागर ,
करने लगे तरंग - भंग सौ सौ स्वर - सागर ।
उठी क्षुब्ध - सी अहा ! अयोध्या की नर - सत्ता ,
सजग हुआ साकेत - पुरी का पत्ता पत्ता ।

पृ. ३१७

“शान्त, शान्त !” गम्भीर नाद सुन पड़ा अचानक ,
गूँज उठा हो यथा अवनि पर अम्बर - आनक !
कुलपति वृद्ध वसिष्ठ आ गये तप के निधि-से ,
हंस-वंश-गुरु हंसनिष्ठ, एकानन विधि-से ।

पृ. ३१८

जड़ीभूत - से हुए देख साकेत - निवासी ,
बोल सके कुछ भी न,—हुए यद्यपि अभिलाषी ।
तदपि ऊर्मिला ने प्रयास कर हाथ उठाया ,—
देखा अपना हृदय, मन्द - सा स्पन्दन पाया !
बोले उठे प्रभु चौंक भरत ने भी सुन पाया—
“भाई, भाई ! उठो, सबेरा होने आया ,

पृ. ३१९

मारूँ रावण - सहित इन्द्रजित को मैं जाओ ,—
तुम इस पुर का राज्य विभीषण को दे आओ ।
चलो, समय पर मिलें अयोध्या जाकर सबसे ,
वधू ऊर्मिला मार्ग देखती है घर कब से ?
आये थे तुम साथ हमें सुख ही देने को ,
लाये हम भी तुम्हें न थे अपयश लेने को ।
तुम न जगे तो सुनो, राम भी सो जावेगा ,
सीता का उद्धार असम्भव हो जावेगा ।
वीर कहो फिर कहाँ रहेगी बात तुम्हारी ?
क्षत्रियत्व कर रहा प्रतीक्षा तात तुम्हारी !
अथवा जब तक रात, और सोओ तुम भ्रातः ,
देखेंगे अरि - मित्र पद्म - सा तुमको प्रातः ।
राम-बाण उड़ छेद सुधाकर में कर देगा ,
अमृत तुम्हारे लिए सुमधु-सा टपका देगा !
हनूमान की बाट देख लूँ क्षण भर भाई !”
“समुपस्थित यह दास,” पास ही पड़ा सुनाई ।
बुरे स्वप्न में वीर आ गया उद्बोधन-सा ,
औषधि लेकर किया वैद्य ने व्रण-शोधन-सा ।
संजीवनी-प्रभाव घाव पर सबने देखा ,—
शत्रु-लौहलिपि हुई अहा ! पानी की लेखा ।
फैल गया आलोक, दूर हो गया अँधेरा ,
रवि ने अपना पद्म प्रफुल्लित होता हेरा !
चमक उठा हिम-सलिल रात भर बहते बहते ,
जाग उठे सौमित्रि-सिंह यह कहते कहते—
“धन्य इन्द्रजित ! किन्तु सँभल, वारी अब मेरी !”
चौंक उन्होंने दृष्टि भ्रान्त भौंरी-सी फेरी ।
उन्हें हृदय से लगा लिया प्रभु ने भुज भरके ,
अब्धि अंक में उठे कलाधर यथा उभर के ।
“भाई मेरे लिए लौट फिर भी तू आया ,
जन्म जन्म का इसी जन्म में मैंने पाया !”

पृ. ३२०

“प्रस्तुत है यह दास आर्य-चरणों का चेरा ,
किन्तु कहाँ वह मेघनाद प्रतिपक्षी मेरा ?”
“लक्ष्मण! लक्ष्मण ! हाय ! न चंचल हो पल पल में ,
क्षण भर तुम विश्राम करो इस अंकस्थल में ।”
“हाय नाथ ! विश्राम ? शत्रु अब भी है जीता ,
कारागृह में पड़ी हमारी देवी सीता !
जब तक रहा अचेत अवश था आप पड़ा मैं ,
अब सचेत हूँ और स्वस्थ - सन्नद्ध खड़ा मैं ।
बीत गई यदि अवधि भारत की क्या गति होगी ?—
धरे तुम्हारा ध्यान एक युग से जो योगी ।
माताएँ निज अङ्क - दृष्टि भरने को बैठीं ,
पुर - कन्याएँ कुसुम - वृष्टि करने को बैठीं ।
आर्य अयोध्या जायँ, युद्ध करने मैं जाऊँ ,
पहले पहुँचें आप और मैं पीछे आऊँ ।

मिलाप

वह दिन आता है। पुष्पक दिखता है; भरत और शत्रुघ्न नगर-द्वार के आगे खड़े हैं, मानो राम के प्रतिबिम्ब। राम विमान से कूदते हैं और भरत से ऐसे मिलते हैं जैसे क्षितिज पर सागर और आकाश। भरत चरणों में हैं; राम उन्हें उठने को कहते हैं। फिर द्वार पर माताएँ, और कैकेयी का अन्तिम वचन।

गुप्त की पंक्तियाँ

मिले भरत से राम क्षितिज में सिन्धु, गगन - सम ! “उठ, भाई, तुल सका न तुझसे, राम खड़ा है , तेरा पलड़ा बड़ा, भूमि पर आज पड़ा है !

मैं वन जाकर हँसा, किन्तु घर आकर रोया , खोकर रोये सभी भरत, मैं पाकर रोया !”

“आर्य, यही अभिषेक तुम्हारे भृत्य भरत का ,

पाकर तुम्हें परन्तु भरत को पाया मैंने !”

पृ. ३२७ से ३३०

यही वह दृश्य है जिस तक भीड़ चलकर आती है। युद्ध नहीं। मिलन।

तराज़ू देखिए। राम कहते हैं: मैं तुझसे तुल न सका; तेरा पलड़ा भारी था, इसीलिए वह आज धरती पर है। जो घर रहा और व्रत निभाया, वह युद्ध लड़ने वाले से भारी है। जो आदमी अपने ही घर में, अपने ही गाँव में, चौदह बरस एक ऐसे नाम के नीचे टिका रहा जो उसने नहीं कमाया, वही भारी है।

और राम अब रोते हैं, तब नहीं। खोने पर सब रोए। वे पाने पर रोते हैं। यह साइट इसी लौटने की ओर चलती है: किसी दण्ड का अन्त नहीं, उसका मिलना जो कभी खोया ही नहीं था।

भरत मुकुट नहीं लेते। यह आलिंगन, वे कहते हैं, मेरा अभिषेक है। और अन्तिम वचन उनकी माँ का है। जिस स्त्री ने उनके नाम पर चोट की, वह कहती है: तुम्हें पाकर मैंने भरत को पाया। नाम तब तक ढोया गया जब तक उसे उसके असली हक़दार को लौटाया न जा सके। कुछ खोया नहीं। सँभाला गया।

गुप्त, पूरा दृश्य · पृ. ३२७ से ३३०

पृ. ३२७

आया, आया, किसी भाँति वह दिन भी आया ,
जिसमें भव ने विभव, गेह ने गौरव पाया ।
आये पूर्व - प्रसाद - रूप - से मारुत पुर में ,
प्रकटे फिर, जो छिपे हुए थे सबके उर में ।
अपनों के ही नहीं, परों के प्रति भी धार्मिक ,
कृती प्रवृत्ति - निवृत्ति - मार्ग - मर्यादा - मार्मिक ।
राजा होकर गृही, गृही होकर संन्यासी ,
प्रकट हुए आदर्श - रूप घट घट के वासी ।
पाया, हाँ, आकाश-कुसुम भी हमने पाया ,
फैलाता निज गन्ध गगन में पुष्पक आया ।
अगणित नेत्र - मिलिन्द उड़े, प्रभु-गुण-रव छाया ,
मानुष - मानस लाख तरंगों लहराया ।

भक्ति विभीषण और मुक्ति रावण को देकर ,
विजय सखी के संग शुद्ध सीता को लेकर—
दाक्षिणात्य-लंकेश अतिथि लाकर मन भाये ,
आतिथेय ही बने लक्ष्मणाग्रज घर आये ।
भरत और शत्रुघ्न नगर तोरण के आगे ,
मानो थे प्रतिबिम्ब प्रथम ही उनके जागे ।
कहा विभीषण सुकण्ठ से सुध-सी खोकर—
“प्रकटित सानुज राम आज दुगुने - से होकर !”
वर विमान से कूद, गरुड़ से ज्यों पुरुषोत्तम ,
मिले भरत से राम क्षितिज में सिन्धु, गगन - सम !
“उठ, भाई, तुल सका न तुझसे, राम खड़ा है ,
तेरा पलड़ा बड़ा, भूमि पर आज पड़ा है !

पृ. ३२८

गये चतुर्दश वर्ष, थका मैं नहीं भ्रमण में ,
विचरा गिरि-वन-सिन्धु-पार लंका के रण में ।
श्रान्त आज एकान्त-रूप-सा पाकर तुझको ,
उठ, भाई, उठ, भेंट, अंक में भर ले मुझको !
मैं वन जाकर हँसा, किन्तु घर आकर रोया ,
खोकर रोये सभी भरत, मैं पाकर रोया !”
“आर्य, यही अभिषेक तुम्हारे भृत्य भरत का ,
अन्तर्बाह्य अशेष आज कृत्यकृत्य भरत का ।”
पूरी भी थीं युगल मूर्तियाँ अब तक ऊनी ,
मिल होकर भी एक, हर्षमय थीं अब दूनी ।
हिल हिलकर मिल गईं परस्पर लिपट जटाएँ ,
मुख - चन्द्रों पर झूम रही थीं घूम घटाएँ ।

साधु भरत के अश्रु गिरें चरणों में जब लौं ,
नयनों में ही भरे सती सीता ने तब लौं ।
लता - मूल का खिंचा सलिल फूलों में फूटा ,
फैला वह रस - गन्ध सर्वदा सबने लूटा ।
देवर-भाभी मिले, मिले सब भाई भाई ,
बरसे भू पर फूल, जयध्वनि ऊपर छाई ।
भरत मिले सुग्रीव-विभीषण से यह कहकर—
‘सफल बन्धु-सम्बन्ध हमारा तुममें रहकर ।’

पैदल ही प्रभु चले भीड़ के संग पुरी में ,
संघर्षित थे आज अंग से अंग पुरी में ।
अहा ! समाई नहीं अयोध्या फूली फूली ,
तब तो उसमें भीड़ अमाई ऊली ऊली !
पुरकन्याएँ खील - फूल - धन बरसाती थीं ,
कुल-ललनाएँ धरे भरे शुभ घट, गाती थीं—

पृ. ३२९

“आज हमारे राम हमारे घर फिर आये ,
चारों फल हैं इसी लोक में हमने पाये ।”
द्वार द्वार पर झूल रही थीं शुभ मालाएँ ,
झलती थीं ध्वज-व्यजन शील-शीला शालाएँ ।
राज-मार्ग में पड़े पाँवड़े फूल भरे थे ,
क्षत्र लिए थे भरत, चौंर शत्रुघ्न धरे थे ।
माताओं के भाग आज सोते से जागे ,
पहुँचे पहुँचे राम राज-तोरण के आगे ।
न कुछ कह सकीं, न वे देख ही सकीं सुतों को ,
रोकर लिपटीं उठा उठा उन प्रणति-युतों को ।
काँप रही थीं हर्ष-भार से तीनों थर थर ,
लुटा रही थीं रत्न आज वे तीनों भर भर ।
लिए आरती वे उतारती थीं तीनों पर ,
क्या था, जिसे न आज वारती थीं तीनों पर ।
दिन था मानो यही वधू - वर के लेने का ,
जो जिसको हो इष्ट, वही उसको देने का ।
“बहू, बहू वैदेहि, बड़े दुख पाये तूने !”
“माँ, मेरे सुख आज हुए हैं दूने दूने !”
“आया फिर तू राम, कोख में मानो मेरी ,
लक्ष्मण, मेरी गोद रहे शिशु शैया तेरी ।”
“जन्म जन्म में यही कोख जननी, मैं पाऊँ ।”
“माँ, मैं लक्ष्मण इसी गोद में पलता आऊँ ।”
सुप्रभ प्रभु ने कहा सुमित्रा से नत होकर—
“पाया मैंने अम्ब, पुनः लक्ष्मण को खोकर ।
रख न सका मैं हाय ! दिया मुझको जो तुमने ,
धन्य तुम्हारा पुण्य, प्राण पाये इस द्रुम ने ।”
“किन्तु तुम्हें ही सौंप चुकी हूँ राम इसे मैं ,
लूँ फिर कैसे उसे, दे चुकी आप जिसे मैं ?
लिया अन्य का भार भरत ने, मैं अब हलकी ,
तुमको पाया, रही कामना फिर किस फल की ?”

पृ. ३३०

समझी प्रभु ने कसक भरत-जननी के मन की ,—
“मूल शक्ति माँ तुम्हीं सुयश के इस उपवन की ।
फल, सिर पर ले धूल दिए तुमने जो मीठे ,
उनके आगे हुए सुधा के घट भी सीठे ।”
“भागी हो तुम वत्स राम रघुवर, भव भर के ।
कैकेयी के दोष लिए तुमने गुण करके ,
ढोया जीवन - भार, दुख ही ढाया मैंने ,
पाकर तुम्हें परन्तु भरत को पाया मैंने !”

मैथिलीशरण गुप्त, साकेत (1932), साकेत प्रकाशन, चिरगाँव, 1980 के छपे पन्नों से पढ़ा गया। भरत का हर दृश्य यहाँ पूरा है, सिवाय हनुमान की वन-कथा और युद्ध के दृश्य के, जो हमारे शब्दों में कहे गए हैं और जिनके छन्द बताए गए हैं। कथा-सार, अंग्रेज़ी, पाठ और चित्र हमारे हैं, ज्योतिर्गण के लिए। रामलीला यूनेस्को की सूची (संगीत नाटक अकादमी) से; रामनगर और नाटी इमली अमर उजाला, वाराणसी से।
साकेत, पूरी पुस्तक, जैसी छपी (archive.org)

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