सूर्योदय
सूर्य त्राटक
सूरज उगते समय क्षितिज पर, या उसके पास के आकाश पर, नज़र; सूरज उग जाए तो बंद। उगी हुई थाली को कभी सीधे नहीं। इसका मार्गदर्शन आगे जोड़ा जाएगा।
शिविर में सिखाया जाता है · मार्गदर्शन आगेसुबह
पहले चरण के पाँच · गरम होने तक
पाँचों, क्रम से, यह तय करने से पहले कि आज मन कैसा है।
मेहनत गरम होने तक, साँस तेज़, पर इतनी कि बात कर सकें। मध्यम मेहनत ने उदासी और घबराहट पर सबसे ज़्यादा किया।
खोलिएसातवाँ समूह · आरोहण, लय में
भीतर की साँस पर छाती ऊपर, बस उतनी जितनी आज उठती है; बाहर की साँस पर माथा ज़मीन पर, और बाहर की साँस लंबी।
बालासन में तीसरी बार गुंजन, और अंत में तीन बार ॐ। स्वर पूरी बाहर की साँस पर।
समूह शुरू कीजिए · लयसम वृत्ति · बराबर साँस
भीतर, रुकना, बाहर, रुकना, हर हिस्सा उतनी ही गिनती का। पहले स्तर से, उसके पन्ने की अपनी गिनती में।
रुकना अगर डराए, तो उसे छोड़ दीजिए: बस भीतर और बाहर, बराबर। जब तक अफ़ीम चल रही है, रुकना छोटा ही रहे।
खोलिएदिन में
साइक्लिक मेडिटेशन, भीतर DRT
आसन और लेटकर आराम, बारी-बारी; बीच में DRT, शरीर हिस्सा-हिस्सा ढीला होता हुआ। शिविर में सिखाया जाता है; इसका मार्गदर्शन आगे जोड़ा जाएगा।
शिविर में सिखाया जाता है · मार्गदर्शन आगेयोग निद्रा, दोपहर
लेटकर, ध्यान शरीर में घूमता हुआ। दिन की दो में से पहली। शिविर में सिखाई जाती है; इसका मार्गदर्शन आगे जोड़ा जाएगा।
शिविर में सिखाया जाता है · मार्गदर्शन आगेशाम
महामृत्युंजय · अन्तर्यात्रा
पन्ने पर अन्तर्यात्रा चुनिए: पहला तिहाई ज़ोर से, दूसरा फुसफुसाकर, आख़िरी मन में। एक पंक्ति, एक साँस।
मंत्र पके फल की तरह छूटने की बात करता है, जैसे ककड़ी अपने डंठल से, बिना खींचे। लड़ना नहीं; छूटना।
खोलिएरात, सोने से पहले
शवासन में पूरी साँस
पीठ के बल, एक हाथ पेट पर, एक छाती पर।
नीचे से भरिए: पेट, छाती, हंसली। ऊपर से ख़ाली कीजिए, और बाहर की साँस को लंबी रहने दीजिए। कहीं रोकिए मत।
दस साँसें, फिर बस लेटे रहिए।
योग निद्रा
लेटकर, ध्यान शरीर में घूमता हुआ, नींद तक। शिविर में सिखाई जाती है; इसका मार्गदर्शन आगे जोड़ा जाएगा।
शिविर में सिखाया जाता है · मार्गदर्शन आगेजब डर या भारीपन उठे
लंबी बाहर की साँस
जहाँ भी हों: बैठ जाइए या लेट जाइए, एक हाथ पेट पर।
नाक से भीतर, और बाहर की साँस को भीतर वाली से लंबा होने दीजिए: भीतर तीन तक, बाहर छह तक, या जितना सहज हो। कहीं रोकिए मत।
डर से बहस मत कीजिए, उसे भगाइए मत। बस उसे साँस की ताल दीजिए, कुछ मिनट, या जब तक वह हल्का न हो। डर साँस की ताल पर चलता है।
भ्रामरी
सीधे बैठिए, आँखें बंद, होंठ हल्के मिले हुए। अँगूठों से कान बंद कीजिए।
नाक से साँस भरिए। फिर पूरी बाहर की साँस पर भँवरे की तरह गुंजन, गले में, मुँह बंद।
हर गुंजन के बाद एक दीया छूइए, या गिनती ख़ुद रखिए। दस बार। इसके चित्र अभी नहीं हैं।
इसका अपना पन्नाघर पर
हर सुबह, हर दोपहर
जागकर, हरकत के बाद: सम वृत्ति, पहले स्तर से, उसके दस चक्र।
दोपहर को लेटकर आराम, योग निद्रा की तरह: ध्यान शरीर में धीरे-धीरे घूमता हुआ।
डॉक्टर, कब
जीवन ख़त्म करने के विचार आएँ: उसी दिन कोई आदमी और कोई डॉक्टर।
डर के साथ छाती में दर्द हो, साँस न आए, या बेहोशी लगे: पहले डॉक्टर।
बीता हुआ कल बार-बार पूरे ज़ोर से लौटे, या डॉक्टर ने मन के लिए दवा दी हो: कोई जानकार, और दवा वैसे ही लेते रहिए। यह अभ्यास उसके साथ चलता है।
यह क्रम क्यों
डर का केंद्र नाक से चलती साँस की ताल पर चलता मिला, और साँस ही वह चीज़ है जिसे बदला जा सकता है। हरकत की एक बारी के आधे घंटे में मन सुधरा और घबराहट घटी; रोज़ पाँच मिनट की लंबी बाहर की साँस ने मन को ध्यान से ज़्यादा उठाया; ज़ोर से ॐ कहने पर डर का केंद्र धीमा पड़ा; और ओपिऑइड छोड़ते आदमियों में योग ने दवा के साथ घबराहट ज़्यादा घटाई।
शुरू करने से पहले
अपनी सुविधा के भीतर ही कीजिए। ज़रा भी दर्द हो तो रुक जाइए। यह इलाज का साथ देता है, उसकी जगह नहीं लेता; जो ब्यूप्रेनॉर्फ़िन या मेथाडोन पर है, वह उस पर बना रहे।
जब तक अफ़ीम चल रही है, हर बार साँस रोकना छोटा रखिए।
पत्र · श्रीअरविन्द का एक पत्र
एक शिष्य को; पत्र यह नहीं बताता कि किसे। तीसरा उपाय, श्रीमाँ की ओर मुड़ना, उसकी अपनी राह का है।
श्रीअरविन्द ने यह पत्र अंग्रेज़ी में लिखा था, और यहाँ यह उन्हीं के शब्दों में है। आश्रम का हिन्दी अनुवाद अभी हमारे पास नहीं है, और उनके शब्दों का अनुवाद हम स्वयं नहीं करते।
When a habit of these moods (depression or revolt) has been formed, they cannot be got rid of at once. There are three ways of doing it — (1) to strengthen your own will, so that nothing can come or stay as it likes but only as you like; (2) to think of something else, plunge the mind in some healthy activity; (3) to turn to the Mother and call in her force. One can do any of these or all, but even in doing them, it will take a little time to get rid of the habit.
श्रीअरविन्द, Letters on Yoga IV (संपूर्ण ग्रंथावली, खंड ३१), पृष्ठ ७३५
यह यहाँ क्यों है
वे कारण को मनोदशाओं की आदत कहते हैं, और कहते हैं कि आदत को जाने में थोड़ा समय लगता है। यह पन्ना हरकत से शुरू होता है, जो उनका दूसरा उपाय है: मन के लिये कोई स्वस्थ काम। यह पढ़ना हमारा है।