भ्रामरी
Bhrāmarī Prāṇāyāma
भीतर लीजिए। फिर पूरी बाहर की साँस पर भँवरे की तरह गुंजन। गुंजन हमेशा लंबा रहता है।
गुंजन कितना लंबा
भीतर की साँस कितनी लंबी
यह कैसे होता है
हाथ कैसे रखें, चुनिए। दोनों ही अभ्यास हैं।
- पालथी मारकर या वज्रासन में बैठिए। रीढ़ सीधी, कंधे ढीले, आँखें हल्के से बंद।
- बैठने के लिए कुछ धीमी साँसें लीजिए। फिर दोनों नथुनों से सहज, एक-सी साँस भीतर लीजिए।
- बाहर छोड़ते हुए गले में धीमा गुंजन कीजिए, भँवरे की तरह, मुँह बंद और होंठ हल्के मिले हुए। इसे सिर, चेहरे और छाती में महसूस कीजिए। एक-सा, न ज़ोर से, न ऊँचा।
- दस फेरे। आवाज़ को ध्यान थामने दीजिए। कोई विचार आए तो गुंजन पर लौट आइए।
- पहले फेरे में पन्ना आपके साथ गुंजन करता है, ताकि आप आवाज़ बनाने से पहले उसे सुन लें। उसके बाद वह आपकी अपनी है।
शुरू करने से पहले
तीस सेकंड। फिर हम शुरू करते हैं।
- अगर आपका रक्तचाप (बीपी) काबू में नहीं है, साँस की गंभीर बीमारी है, या हाल में दिल की कोई तकलीफ़ हुई है, तो यह अभ्यास मत कीजिए। पहले डॉक्टर से पूछिए।
- कभी भी चक्कर आए, साँस फूले या तबीयत बिगड़े, तुरंत रुक जाइए और सामान्य साँस लीजिए। कुछ नहीं बिगड़ता। ठीक लगने पर दोबारा शुरू कीजिए।
- खाली पेट, या खाने के कम से कम दो घंटे बाद।
- साँस कहीं रोकी नहीं जाती। अगर गुंजन के बाद अगली साँस हाँफकर भरनी पड़े, तो छोटा चुनिए। लंबा होने से ज़्यादा ज़रूरी है सहज होना।
- यह इलाज में सहारा देता है। इलाज की जगह नहीं लेता।
दस फेरे।
दस गुंजन, हर एक उस साँस से लंबा जिसने उसे भरा।