जागते ही
IRT, करवट, और धीरे ऊपर
बिस्तर पर, पीठ के बल। साइक्लिक मेडिटेशन का अपना क्रम: पंजों से चेहरे तक, एक-एक हिस्सा कसते हुए, फिर पूरा शरीर एक साथ: कसिए, कसिए, कसिए। फिर छोड़िए, और ढीले पड़ जाइए।
फिर बाईं करवट, सिर बाईं बाँह पर। फिर धीरे-धीरे ऊपर, और ऊपर आते हुए पैर, कूल्हे और पेट कसे हुए, साँस चलती हुई, जब तक सिर साफ़ न हो। यही वह वाक्य है: जब खड़े होते ही कमरा घूमे, तब भी यही करना है।
कोई घड़ी नहीं: हर बार कसना तब छूटता है जब आप छोड़ें। इसके चित्र अभी नहीं हैं; यह रेखाओं में बना है।
सुबह
जंघा 2 · हर बैठक से कसकर उठना
पैर साथ, बाँहें आगे, कंधों की ऊँचाई पर। घुटने धीरे मोड़िए, जाँघें ज़मीन के बराबर तक या जितना आराम से हो; एड़ियाँ और पंजे ज़मीन पर, घुटने साथ। थामते हुए साँस चलती रहे।
उठने से पहले कूल्हे और पेट कसिए; फिर साँस छोड़ते हुए धीरे उठिए, जैसा मॉड्यूल कहता है, और खड़े होकर एक पल बिना हिले रहिए। हर उठना उसी पल का अभ्यास है जब कमरा घूमता है।
पाँच बार, मॉड्यूल की अपनी गिनती। धूसर आए, तो कसे रहिए और ठहरिए; बढ़े, तो बैठ जाइए। इसके चित्र अभी नहीं हैं; यह रेखाओं में बना है।
पिंडली-शक्ति-विकासक · उकड़ूँ से उठना
पैर साथ, मुट्ठियाँ बँधी, गर्दन ढीली। साँस भरते हुए उकड़ूँ बैठिए, बाँहें आगे ज़मीन के बराबर, एड़ियाँ ज़मीन पर, घुटने साथ, जितना नीचे जा सकें।
मॉड्यूल में उठते हुए साँस रोकी जाती है, बाँहें एक पूरा घेरा बनाती हैं, और अंत में मुट्ठियाँ छाती के आगे मिलती हैं; फिर छाती फैलाते हुए तेज़ी से साँस बाहर।
जब तक खड़े होते ही धूसर आता है, उठने से पहले कूल्हे और पेट कसिए, और साँस रोकने की जगह धीरे उठिए, साँस चलती हुई। जितनी बार आराम से हो। इसके चित्र अभी नहीं हैं; यह शब्दों में है।
दिन में
पानी, और धीरे उठना
मॉड्यूल दिन भर सादा पानी पीने को कहता है। गर्मी में और ज़्यादा: गर्मी खड़े रहने की सहनशक्ति का बड़ा हिस्सा ले लेती है।
ज़मीन पर देर तक बैठने के बाद, धूप के बाद, या गरम पानी से नहाने के बाद, उसी तरह उठिए: पहले कूल्हे और पेट कसकर, फिर धीरे।
जब खड़े होते ही कमरा घूमे
वह वाक्य · कसिए और ठहरिए
पैर, कूल्हे और पेट ज़ोर से कसिए, और जहाँ हैं वहीं ठहरिए, बिना हिले, साँस चलती हुई, जब तक कमरा न ठहरे। मुट्ठियाँ भी बाँध सकते हैं।
फिर छोड़िए, और चलने से पहले एक पल और खड़े रहिए। धूसर बढ़े, तो बैठ जाइए या उकड़ूँ: नीचे बैठा आदमी गिरता नहीं।
रात में उठें तो
रात में उठना
नींद से, गरम बिस्तर से, अँधेरे में उठें, तो सुबह वाला ही क्रम: पहले करवट, फिर धीरे ऊपर, उठते हुए पैर, कूल्हे और पेट कसे हुए। एक हाथ दीवार के पास।
घर पर
डॉक्टर, कब
अगर चक्कर अफ़ीम छोड़ने के पहले हफ़्तों के बाद भी बना रहे, थकान, जी मिचलाने और भूख न लगने के साथ: कॉर्टिसोल की जाँच। यह ज़्यादा अभ्यास की वजह नहीं।
पूरी बेहोशी, गिरना, छाती में दर्द, बहुत तेज़ या बहुत धीमी धड़कन, या लेटे-लेटे भी चक्कर: उसी दिन डॉक्टर।
दबाव की गोली लेते हों, तो डॉक्टर को बताइए कि खड़े होते ही कमरा घूमता है।
यह क्रम क्यों
खड़े होने के पहले पलों में हर किसी का दबाव गिरता है, और उठने की मेहनत ख़ुद पैरों की नसें खोलती है; अफ़ीम और गर्मी इस गिरावट को गहरा करती हैं। खड़े होते हुए पैर, कूल्हे और पेट कसने से गिरावट छोटी हुई और चक्कर कम; बेहोशी की कगार पर कसने से दबाव लौटा, और जिन्हें यह सिखाया गया वे कम बार फिर बेहोश हुए। सिर्फ़ पैरों को मज़बूत करने से गिरावट नहीं बदली: काम पल पर कसने ने किया। इसीलिए हर उठना, बिस्तर से और हर बैठक से, उसी पल का अभ्यास है।
शुरू करने से पहले
अपनी सुविधा के भीतर ही कीजिए। ज़रा भी दर्द हो तो रुक जाइए। यह इलाज का साथ देता है, उसकी जगह नहीं लेता; जो ब्यूप्रेनॉर्फ़िन या मेथाडोन पर है, वह उस पर बना रहे।
जब तक अफ़ीम चल रही है, हर बार साँस रोकना छोटा रखिए।