चाहो तो आँखें बंद। न कुछ रिकॉर्ड होता है, न कहीं भेजा जाता है। जब तक यह चलता है, स्क्रीन जली रहती है।
कैसे चलता है
- एक पत्ता, एक पेंसिल, कोई भी काग़ज़।
- पत्ते को देखो। उसकी किनारी। उसकी नसें। जहाँ वह डंठल से मिलता है। हर एक पर छुओ।
- अब उसे बनाओ। फ़ोन नीचे रख दो। चित्र बन जाए तो छुओ।
- पत्ता और चित्र पास पास। हाथ ने क्या देखा? ठहरो। दबाए रखो।
- जब तैयार हो, फिर दबाए रखो, और पत्ते को एक बार और देखो, उसी रास्ते से।
सावधानी
- कोई अंक नहीं, कुछ सही या ग़लत नहीं। जो छूट गया उसे बस देख लिया जाता है।
- आँखें पूरे समय खुली रह सकती हैं।
- कोई भी फूल, कोई भी पत्ता, पास की कोई भी चीज़ चलेगी।
श्रीअरविन्द ने एक साधक को लिखा, जिसे एकाग्रता में आए ख़ालीपन से डर लगता था:
Consciousness is not dissolved; it is the limits of the consciousness that are dissolved.चेतना मिटती नहीं; मिटती हैं चेतना की सीमाएँ।
Letters on Yoga III, CWSA 30, पृ. २७६
यह कहाँ से आया
ये श्रीअरविन्द के अभ्यास हैं, A System of National Education से, जो १९१० में शिक्षक और बच्चे के बारे में लिखी गई थी। यहाँ ये एक बड़े आदमी को दिए गए हैं, क्योंकि माँ कहती हैं कि इन्द्रियों की शिक्षा “कभी रुकनी नहीं चाहिए”।
स्क्रीन पर इनका क्रम, और जो देखा उससे होकर लौटने का रास्ता, हमारे हैं। इन्हें परखा नहीं गया है। हम इनसे कोई परिणाम होने का दावा नहीं करते।
श्रीअरविन्द, उसी किताब में, इस पर कि चित्र बनाना इन्द्रियों की शिक्षा का हिस्सा क्यों है। कौशल के लिए नहीं:
Imitation by the hand ensures accuracy of observation.हाथ से नक़ल करना देखने की सटीकता पक्की करता है।
Early Cultural Writings, CWSA 1, पृ. ४०३
श्रीअरविन्द, A System of National Education (1910) में, इस पर कि इन्द्रियाँ क्यों चूकती हैं। वे कहते हैं, दोष कभी इन्द्रिय में नहीं होता:
In themselves the organs do their work perfectly. The eye gives the right form, the ear the correct sound, the palate the right taste, the skin the right touch, the nose the right smell.अपने आप में इन्द्रियाँ अपना काम पूरी तरह ठीक करती हैं। आँख सही रूप देती है, कान सही ध्वनि, जीभ सही स्वाद, त्वचा सही स्पर्श, नाक सही गन्ध।
Early Cultural Writings, CWSA 1, पृ. ३९७