ॐ नमो भगवते
अद्भुत · अभिभूत, विस्मय
ॐ नमो भगवते
ॐ नमो भगवते पर माँ के शब्द (अंग्रेज़ी में) · Mother's Agenda, खंड ६, १९ फ़रवरी १९६५
The first word represents: the supreme invocation, the invocation to the Supreme.The second word represents: total self-giving; perfect surrender.The third word represents: the aspiration, what the manifestation must become—Divine.
पहला शब्द: परम आवाहन, परम का आवाहन।दूसरा शब्द: पूर्ण आत्मदान; सम्पूर्ण समर्पण।तीसरा शब्द: अभीप्सा, अभिव्यक्ति को जो बनना है: दिव्य।माँ के शब्द ऊपर ज्यों के त्यों हैं। यह हिन्दी हमारी है।
यही क्यों
विस्मय वह अवस्था है जिसमें कुछ इतना बड़ा होता है कि भीतर समाता नहीं। हाथ बिना किसी के कहे ऊपर उठते हैं, और फिर सिर झुकता है। यह मंत्र दोनों रखता है, इसी क्रम में, और फिर एक तीसरी बात।
यह माँ का अपना मंत्र है, और उन्होंने इसके तीन शब्दों का जो अर्थ बताया वह ऊपर दिया है, ज्यों का त्यों।
उससे पहले के आसन का भी यही आकार है: हाथ ऊपर, जब तक वे टिके रहें, और उसके बाद का आराम एक प्रणाम, माथा धरती पर।
यह कहाँ से है: माँ का मंत्र। इसके तीन शब्दों पर उनका लिखा हुआ: Mother's Agenda, खंड ६, १९ फ़रवरी १९६५।
Mother's Agenda, vol. 6, 19 February 1965: the note she wrote and gave to Satprem (Institut de Recherches Évolutives, Paris). Not in the Collected Works of the Mother. Checked word for word against the Ashram's page (motherandsriaurobindo.in, The Mother's mantra), 8 October 2026.
पदच्छेद, मिलाया गया: माँ का लिखा हुआ, Mother's Agenda, खंड ६, १९ फ़रवरी १९६५.
ॐ नमः भगवते
वाचिक: एक साँस छोड़ने भर की लंबाई में, बोलकर। अक्षर साथ-साथ जलते हैं। उपांशु: होंठ हिलते हैं, साँस उसे उठाती है, कमरे में कोई और नहीं सुनता। रोशनी हर पंक्ति में अपने रंग में चलती है, जैसे बोलकर। मानस: कुछ कहा नहीं जाता। शब्द धुँधले हो जाते हैं, रोशनी फिर भी उनमें चलती है, और उनका अर्थ रहता है, साँस और मनकों के साथ। अन्तर्यात्रा: एक माला जो अपने आप भीतर की ओर जाती है। पहला तिहाई बोलकर, दूसरा फुसफुसाकर, आख़िरी मन में। आवाज़ कमरे से अपने आप चली जाती है, आपको तय नहीं करना पड़ता।
कितनी बार
गिनती आमतौर पर एक सौ आठ होती है, और वहीं से शुरू करना ज़रूरी नहीं। ग्यारह भी पूरा जप है।
किस तरह
यही परंपरा का क्रम है, और यह स्तरों की सीढ़ी नहीं, भीतर की ओर लौटना है। यहाँ कुछ भी बंद नहीं है। आज आप जिस पायदान पर हैं, वहीं खड़े रहिये।